कक्षा 12 रसायन विज्ञान NCERT समाधान: तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम

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यह पृष्ठ कक्षा 12 रसायन विज्ञान के अध्याय 'तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रदान करता है। इसमें अयस्कों के सांद्रण की विभिन्न विधियों जैसे चुंबकीय पृथक्करण और निक्षालन के महत्व की व्याख्या की गई है। समाधान ऊष्मागतिकी के सिद्धांतों, जैसे कि एलिंघम आरेख का उपयोग करके धातुओं के निष्कर्षण की व्यवहार्यता की पड़ताल करते हैं, और बताते हैं कि क्यों कुछ अभिक्रियाएँ ऊष्मागतिकी रूप से संभव होने पर भी कक्ष ताप पर नहीं होती हैं। इसमें हाइड्रोधातुकर्म, फेन प्लवन और अपचयन जैसी विधियों के अनुप्रयोगों पर भी चर्चा की गई है, जो छात्रों को विभिन्न धातुओं के निष्कर्षण में शामिल जटिलताओं को समझने में मदद करते हैं। ये समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी के लिए एक स्पष्ट और संक्षिप्त मार्गदर्शिका प्रदान करते हैं।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
Subjectरसायन विज्ञान
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter6. तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम

Chapter summary

यह अध्याय तत्वों के निष्कर्षण के मूलभूत सिद्धांतों और प्रक्रियाओं पर केंद्रित है। इसमें अयस्कों को सांद्रित करने की विधियों, जैसे चुंबकीय पृथक्करण और निक्षालन, के महत्व को समझाया गया है। साथ ही, धातुओं के निष्कर्षण में ऊष्मागतिकी (एलिंघम आरेख) और विभिन्न अपचयन विधियों की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। यह अध्याय छात्रों को विभिन्न धातुओं के निष्कर्षण के लिए उपयुक्त विधियों का चयन करने और उनके पीछे के वैज्ञानिक तर्क को समझने में मदद करता है।

Learning outcomes

  • चुम्बकीय पृथक्करण विधि द्वारा सांद्रित किए जा सकने वाले अयस्कों को पहचानना।
  • एल्यूमीनियम निष्कर्षण में निक्षालन की भूमिका को समझना।
  • ऊष्मागतिकी के आधार पर अभिक्रियाओं की व्यवहार्यता का विश्लेषण करना।
  • विभिन्न परिस्थितियों में धातुओं के अपचयन की क्षमता की तुलना करना।
  • हाइड्रोधातुकर्म, फेन प्लवन और अपचयन विधियों के अनुप्रयोगों को समझना।
  • सल्फाइड अयस्कों के निष्कर्षण की कठिनाइयों की व्याख्या करना।

Topics covered

Paper topics

  • अयस्कों का सांद्रण
  • चुम्बकीय पृथक्करण
  • निक्षालन
  • धातु निष्कर्षण की ऊष्मागतिकी
  • एलिंघम आरेख
  • अपचयन द्वारा धातु निष्कर्षण
  • हाइड्रोधातुकर्म
  • फेन प्लवन विधि
  • सल्फाइड अयस्कों का निष्कर्षण
  • ऑक्साइड अयस्कों का निष्कर्षण
  • धातुओं का शुद्धिकरण
  • गैंग और अयस्क

Important topics

  • अयस्कों का सांद्रण (चुम्बकीय पृथक्करण, निक्षालन)
  • एलिंघम आरेख और ऊष्मागतिकी व्यवहार्यता
  • फेन प्लवन विधि और अवनमक की भूमिका
  • हाइड्रोधातुकर्म के सिद्धांत
  • विभिन्न धातुओं के निष्कर्षण की विधियाँ

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

उन अयस्कों के नाम बताइए, जिन्हें चुम्बकीय पृथक्करण विधि द्वारा सांद्रित किया जा सकता है?
Solution: चुम्बकीय पृथक्करण विधि का उपयोग उन अयस्कों के सांद्रण के लिए किया जाता है जिनमें अयस्क या गैंग का कोई एक घटक चुम्बकीय गुण प्रदर्शित करता है। इस विधि में, अयस्क को एक शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र से गुजारा जाता है। चुम्बकीय घटक चुम्बक की ओर आकर्षित होता है और अलग एकत्र हो जाता है, जबकि गैर-चुम्बकीय घटक अलग गिर जाता है।

उदाहरण के लिए, मैग्नेटाइट (Fe_3O_4) और हेमेटाइट (Fe_2O_3) जैसे लौह अयस्कों को इस विधि से सांद्रित किया जा सकता है, क्योंकि इनमें लौह के ऑक्साइड चुम्बकीय होते हैं। सिडेराइट (FeCO_3) भी कुछ हद तक चुम्बकीय गुण प्रदर्शित कर सकता है।

प्रश्न 2

ऐलुमिनियम के निष्कर्षण में निक्षालन का क्या महत्व है?
Solution: एल्यूमीनियम के निष्कर्षण में, विशेष रूप से बॉक्साइट अयस्क से, निक्षालन एक महत्वपूर्ण चरण है। बॉक्साइट अयस्क में एल्यूमीनियम ऑक्साइड (Al_2O_3) के साथ-साथ सिलिका (SiO_2), आयरन ऑक्साइड (Fe_2O_3) और टाइटेनियम डाइऑक्साइड (TiO_2) जैसी अशुद्धियाँ भी मौजूद होती हैं।

निक्षालन प्रक्रिया में, बॉक्साइट अयस्क को एक उपयुक्त अभिकर्मक के साथ उपचारित किया जाता है ताकि एल्यूमीनियम ऑक्साइड को घुलनशील रूप में परिवर्तित किया जा सके, जबकि अशुद्धियाँ या तो अघुलनशील रहती हैं या अलग रूप में अवक्षेपित हो जाती हैं। बॉक्साइट के लिए सामान्यतः कास्टिक सोडा (NaOH) का उपयोग किया जाता है।

बॉक्साइट को सांद्रित NaOH विलयन के साथ उच्च ताप और दाब पर अभिकृत करने पर एल्यूमीनियम ऑक्साइड घुलनशील सोडियम एल्यूमिनेट (Na[Al(OH)_4]) बनाता है:

Al_2O_3(s) + 2NaOH(aq) + 3H_2O(l) \longrightarrow 2Na[Al(OH)_4](aq)

सिलिका जैसी अशुद्धियाँ भी NaOH से अभिक्रिया कर सकती हैं, लेकिन उन्हें अलग करने के लिए अभिक्रिया की परिस्थितियों को नियंत्रित किया जाता है। आयरन ऑक्साइड और टाइटेनियम डाइऑक्साइड जैसी अन्य अशुद्धियाँ अविलेय रहती हैं और उन्हें छानकर अलग किया जा सकता है।

इसके बाद, सोडियम एल्यूमिनेट विलयन को ठंडा किया जाता है और उसमें एल्यूमीनियम हाइड्रॉक्साइड के बीज मिलाकर एल्यूमीनियम हाइड्रॉक्साइड (Al(OH)_3) का अवक्षेपण कराया जाता है:

Na[Al(OH)_4](aq) \longrightarrow Al(OH)_3(s) + NaOH(aq)

अंत में, एल्यूमीनियम हाइड्रॉक्साइड को गर्म करके शुद्ध एल्यूमिना (Al_2O_3) प्राप्त किया जाता है, जिसका उपयोग एल्यूमीनियम धातु के विद्युत अपघटन में किया जाता है। इस प्रकार, निक्षालन एल्यूमीनियम निष्कर्षण के लिए शुद्ध एल्यूमिना प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण चरण है।

प्रश्न 3

अभिक्रिया Cr_2O_3 + 2Al \longrightarrow Al_2O_3 + 2Cr; (\Delta G^\circ = -421 \text{ kJ}) के गिब्स ऊर्जा मान से लगता है कि अभिक्रिया ऊष्मागतिकी के अनुसार संभव है, परन्तु यह कक्ष ताप पर सम्पन्न क्यों नहीं होती है?
Solution: अभिक्रिया Cr_2O_3 + 2Al \longrightarrow Al_2O_3 + 2Cr का गिब्स ऊर्जा परिवर्तन (\Delta G^\circ = -421 \text{ kJ}) ऋणात्मक है, जो दर्शाता है कि यह अभिक्रिया ऊष्मागतिकी के अनुसार स्वतःप्रवर्तित (spontaneous) है। हालाँकि, कक्ष ताप पर यह अभिक्रिया सम्पन्न नहीं होती है। इसका मुख्य कारण यह है कि किसी भी रासायनिक अभिक्रिया के होने के लिए अभिकारकों को एक निश्चित न्यूनतम ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिसे सक्रियण ऊर्जा (E_a) कहते हैं।

कक्ष ताप पर, अभिकारकों (जैसे Cr_2O_3 और Al) के पास इस अभिक्रिया को शुरू करने के लिए पर्याप्त सक्रियण ऊर्जा नहीं होती है। यद्यपि अभिक्रिया ऊष्मागतिकी रूप से अनुकूल है, लेकिन इसकी दर बहुत धीमी होती है क्योंकि सक्रियण ऊर्जा की बाधा को पार करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा उपलब्ध नहीं है। इस अभिक्रिया को सम्पन्न कराने के लिए, अभिकारकों को गर्म करके उनकी गतिज ऊर्जा बढ़ानी पड़ती है ताकि वे सक्रियण ऊर्जा बाधा को पार कर सकें और अभिक्रिया की दर बढ़ सके।

प्रश्न 4

क्या यह सत्य है कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में मैग्नीशियम, Al2O3 को अपचयित कर सकता है और Al, MgO को भी? वे परिस्थितियाँ कौन-सी हैं?
Solution: हाँ, यह सत्य है कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में मैग्नीशियम (Mg), एल्यूमीनियम ऑक्साइड (Al_2O_3) को अपचयित कर सकता है, और एल्यूमीनियम (Al), मैग्नीशियम ऑक्साइड (MgO) को अपचयित कर सकता है। इन परिस्थितियों को समझने के लिए एलिंघम आरेख (Ellingham diagram) का उपयोग किया जाता है। एलिंघम आरेख तापमान के फलन के रूप में धातु ऑक्साइड के निर्माण के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन (\Delta G^\circ) को दर्शाता है।

एलिघम आरेख के अनुसार, Al और Mg के ऑक्साइड निर्माण के वक्र एक-दूसरे को लगभग 1623 K (या 1350°C) पर काटते हैं।

परिस्थितियाँ:

  1. जब तापमान 1623 K से कम हो: इस तापमान सीमा में, Mg के ऑक्साइड निर्माण का \Delta G^\circ मान Al के ऑक्साइड निर्माण के \Delta G^\circ मान से अधिक ऋणात्मक होता है। इसका मतलब है कि MgO का निर्माण Al_2O_3 के निर्माण की तुलना में अधिक स्थिर है। इसलिए, इस तापमान सीमा में, मैग्नीशियम (Mg) एक प्रबल अपचायक के रूप में कार्य करता है और एल्यूमीनियम ऑक्साइड (Al_2O_3) को अपचयित करके एल्यूमीनियम धातु (Al) मुक्त कर सकता है। अभिक्रिया इस प्रकार होगी:

    \frac{3}{2} MgO(s) + Al(l) \longrightarrow \frac{1}{2} Al_2O_3(s) + Mg(g)

  2. जब तापमान 1623 K से अधिक हो: इस तापमान सीमा में, Al के ऑक्साइड निर्माण का \Delta G^\circ मान Mg के ऑक्साइड निर्माण के \Delta G^\circ मान से अधिक ऋणात्मक हो जाता है। इसका मतलब है कि Al_2O_3 का निर्माण MgO के निर्माण की तुलना में अधिक स्थिर है। इसलिए, इस तापमान सीमा में, एल्यूमीनियम (Al) एक प्रबल अपचायक के रूप में कार्य करता है और मैग्नीशियम ऑक्साइड (MgO) को अपचयित करके मैग्नीशियम धातु (Mg) मुक्त कर सकता है। अभिक्रिया इस प्रकार होगी:

    \frac{1}{2} Al_2O_3(s) + Mg(l) \longrightarrow Al(l) + MgO(s)

संक्षेप में, यह तापमान पर निर्भर करता है कि कौन सी धातु दूसरी धातु के ऑक्साइड को अपचयित कर सकती है। जिस धातु का ऑक्साइड निर्माण के लिए \Delta G^\circ मान अधिक ऋणात्मक होता है, वह दूसरी धातु के ऑक्साइड को अपचयित करने में सक्षम होती है।

प्रश्न 1

कॉपर का निष्कर्षण हाइड्रोधातुकर्म द्वारा किया जाता है, परन्तु जिंक का नहीं। व्याख्या कीजिए।
Solution: हाइड्रोधातुकर्म (Hydrometallurgy) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें धातु को उसके जलीय विलयन से अपचयन द्वारा निष्कर्षित किया जाता है। इस विधि की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या हम एक धातु आयन को दूसरे धातु द्वारा विस्थापित कर सकते हैं।

कॉपर (Cu) और जिंक (Zn) के निष्कर्षण में अंतर को उनके इलेक्ट्रोड विभव (E^\circ) से समझा जा सकता है:

  • कॉपर के लिए, E^\circ(Cu^{2+}/Cu) = +0.34\,\mathrm{V}
  • जिंक के लिए, E^\circ(Zn^{2+}/Zn) = -0.76\,\mathrm{V}

चूंकि जिंक का मानक इलेक्ट्रोड विभव कॉपर की तुलना में बहुत अधिक ऋणात्मक है, जिंक एक प्रबल अपचायक है। इसका मतलब है कि जिंक, कॉपर आयनों को आसानी से अपचयित कर सकता है।

कॉपर के निष्कर्षण में, कॉपर सल्फाइड अयस्क को पहले भर्जित करके कॉपर (I) ऑक्साइड (Cu_2O) में बदला जाता है, जिसे बाद में पिघले हुए कॉपर से अपचयित किया जाता है। हाइड्रोधातुकर्म का उपयोग तब किया जाता है जब कॉपर को उसके विलयन से प्राप्त करना हो। उदाहरण के लिए, यदि कॉपर आयनों (Cu^{2+}) का विलयन मौजूद है, तो जिंक धातु का उपयोग करके कॉपर को विस्थापित किया जा सकता है:

[Cu(CN)_2]^- + Zn \longrightarrow [Zn(CN)_4]^{2-} + Cu \downarrow

इसके विपरीत, जिंक का निष्कर्षण हाइड्रोधातुकर्म द्वारा करना कठिन है। यदि हम जिंक आयनों (Zn^{2+}) के विलयन से जिंक को अपचयित करने का प्रयास करते हैं, तो हमें एक ऐसे अपचायक की आवश्यकता होगी जिसका इलेक्ट्रोड विभव Zn^{2+}/Zn से अधिक ऋणात्मक हो। सामान्यतः उपयोग किए जाने वाले प्रबल अपचायक जैसे कैल्शियम (Ca), मैग्नीशियम (Mg), या एल्यूमीनियम (Al) जल से अभिक्रिया करके हाइड्रोजन गैस उत्पन्न करते हैं। उदाहरण के लिए:

Ca(s) + 2H_2O(l) \longrightarrow Ca(OH)_2(aq) + H_2(g)

इस प्रकार, ये प्रबल अपचायक जलीय विलयन में जिंक आयनों को अपचयित करने के बजाय जल से अभिक्रिया कर लेते हैं। इसलिए, जिंक का निष्कर्षण सामान्यतः विद्युत अपघटनी विधियों या उच्च ताप पर कार्बन द्वारा अपचयन जैसी विधियों से किया जाता है, न कि हाइड्रोधातुकर्म द्वारा।

प्रश्न 2

फेन प्लवन विधि में अवनमक की भूमिका क्या है?
Solution: फेन प्लवन विधि (Froth Flotation Method) का उपयोग मुख्य रूप से सल्फाइड अयस्कों के सांद्रण के लिए किया जाता है। इस विधि में, अयस्क को पानी के साथ मिलाकर एक टैंक में डाला जाता है, और हवा को प्रवाहित किया जाता है। एक फेन बनाने वाला अभिकर्मक (जैसे पाइन तेल) मिलाया जाता है जो हवा के बुलबुलों के साथ मिलकर एक स्थायी फेन बनाता है।

जब अवनमक (Depressant) का उपयोग किया जाता है, तो इसका उद्देश्य दो या दो से अधिक सल्फाइड अयस्कों के मिश्रण में से एक विशेष सल्फाइड अयस्क को फेन में आने से रोकना होता है, जबकि दूसरे सल्फाइड अयस्क को फेन में आने देना होता है। अवनमक एक ऐसे आयन के रूप में कार्य करता है जो एक सल्फाइड अयस्क की सतह पर अधिशोषित होकर उसे जलरागी (hydrophilic) बना देता है, जिससे वह फेन के बुलबुलों से चिपक नहीं पाता।

उदाहरण के लिए, यदि हमारे पास जिंक सल्फाइड (ZnS) और लेड सल्फाइड (PbS) का मिश्रण है, और हम ZnS को अलग करना चाहते हैं, तो सोडियम साइनाइड (NaCN) को अवनमक के रूप में उपयोग किया जा सकता है। NaCN ZnS की सतह पर एक जटिल यौगिक बनाकर उसे जलरागी बना देता है, जिससे वह फेन में नहीं आता और टैंक के तल में बैठ जाता है। दूसरी ओर, PbS जलविरागी (hydrophobic) बना रहता है और फेन के बुलबुलों के साथ ऊपर आकर फेन के रूप में एकत्र हो जाता है।

इस प्रकार, अवनमक फेन प्लवन विधि में अयस्कों के चयनात्मक पृथक्करण (selective separation) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रश्न 3

अपचयन द्वारा ऑक्साइड अयस्कों की अपेक्षा पाइराइट से ताँबे का निष्कर्षण अधिक कठिन क्यों हैं?
Solution: पाइराइट (Pyrite) मुख्य रूप से कॉपर सल्फाइड (Cu_2S) होता है। ऑक्साइड अयस्कों की तुलना में सल्फाइड अयस्कों से धातु का निष्कर्षण सामान्यतः अधिक जटिल होता है क्योंकि सल्फाइड आयन (S^{2-}) को हटाना या ऑक्सीकृत करना अधिक कठिन होता है।

कॉपर सल्फाइड (Cu_2S) के निष्कर्षण में मुख्य कठिनाई यह है कि Cu_2S का कार्बन (C) या हाइड्रोजन (H_2) द्वारा अपचयन ऊष्मागतिकी रूप से अनुकूल नहीं होता है। कॉपर सल्फाइड के निर्माण के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन (\Delta_f G^\circ) का मान कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) या जल (H_2O) के निर्माण के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन से अधिक ऋणात्मक होता है। इसका मतलब है कि Cu_2S का अपचयन स्वतःप्रवर्तित नहीं होता है।

उदाहरण के लिए:

  • कार्बन द्वारा अपचयन:

    2 Cu_2S + C \longrightarrow 4 Cu + CS_2

    यह अभिक्रिया स्वतःप्रवर्तित नहीं है।

  • हाइड्रोजन द्वारा अपचयन:

    Cu_2S + H_2 \longrightarrow 2 Cu + H_2S

    यह अभिक्रिया भी स्वतःप्रवर्तित नहीं है।

इसके विपरीत, कॉपर ऑक्साइड (CuO या Cu_2O) का कार्बन या हाइड्रोजन द्वारा अपचयन अधिक आसानी से हो जाता है क्योंकि कॉपर ऑक्साइड के निर्माण के लिए \Delta_f G^\circ का मान CO या H_2O के निर्माण के मान से कम ऋणात्मक होता है।

इसलिए, सल्फाइड अयस्कों, जैसे पाइराइट (Cu_2S) से कॉपर का निष्कर्षण करने के लिए, पहले अयस्क का भर्जन (Roasting) किया जाता है। भर्जन प्रक्रिया में, सल्फाइड अयस्क को हवा की उपस्थिति में गर्म किया जाता है, जिससे वह ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है:

2 Cu_2S(s) + 3O_2(g) \longrightarrow 2 Cu_2O(s) + 2 SO_2(g)

इसके बाद, प्राप्त कॉपर ऑक्साइड (Cu_2O) को कार्बन या किसी अन्य अपचायक द्वारा आसानी से अपचयित करके कॉपर धातु प्राप्त की जाती है:

Cu_2O(s) + C(s) \longrightarrow 2 Cu(l) + CO(g)

इस प्रकार, सल्फाइड अयस्कों से सीधे अपचयन द्वारा कॉपर का निष्कर्षण कठिन होता है, जबकि ऑक्साइड अयस्कों से यह अपेक्षाकृत आसान होता है।

Common mistakes

  • ऊष्मागतिकी रूप से संभव अभिक्रियाओं के लिए सक्रियण ऊर्जा की आवश्यकता को अनदेखा करना।
  • विभिन्न धातुओं की अपचायक क्षमता की तुलना करते समय एलिंघम आरेख की व्याख्या में त्रुटि करना।
  • हाइड्रोधातुकर्म में प्रबल अपचायकों की जल के साथ अभिक्रिया की उपेक्षा करना।
  • फेन प्लवन में अवनमक की भूमिका को गलत समझना।

Revision tips

  • प्रत्येक अयस्क सांद्रण विधि के लिए उपयुक्त अयस्कों के उदाहरण याद करें।
  • एलिंघम आरेख का अध्ययन करें और विभिन्न तापमानों पर धातुओं की अपचयन क्षमता की तुलना करना सीखें।
  • विभिन्न धातुओं के निष्कर्षण के लिए उपयोग की जाने वाली प्रमुख विधियों (जैसे हाइड्रोधातुकर्म, फेन प्लवन) को समझें।
  • अभिक्रियाओं की ऊष्मागतिकी व्यवहार्यता और सक्रियण ऊर्जा के बीच संबंध पर ध्यान दें।

Practice MCQs

Q1. चुम्बकीय पृथक्करण विधि द्वारा निम्नलिखित में से किस अयस्क को सांद्रित किया जा सकता है?

Q2. बॉक्साइट अयस्क के निक्षालन में मुख्य उद्देश्य क्या है?

Q3. Cr2O3 के एल्यूमीनियम द्वारा अपचयन की अभिक्रिया ऊष्मागतिकी रूप से संभव है, लेकिन कक्ष ताप पर संपन्न नहीं होती। इसका मुख्य कारण क्या है?

Q4. एलिंघम आरेख के अनुसार, किस तापमान से नीचे मैग्नीशियम, एल्यूमीनियम ऑक्साइड (Al2O3) को अपचयित कर सकता है?

Q5. फेन प्लवन विधि में अवनमक की भूमिका क्या है?

Frequently asked questions

कक्षा 12 रसायन विज्ञान में तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है?

यह अध्याय धातुओं को उनके अयस्कों से निकालने की विभिन्न विधियों और उनके पीछे के वैज्ञानिक सिद्धांतों को समझाता है, जो रसायन विज्ञान की व्यावहारिक समझ के लिए महत्वपूर्ण है।

चुम्बकीय पृथक्करण विधि का उपयोग किन अयस्कों के लिए किया जाता है?

इस विधि का उपयोग उन अयस्कों के लिए किया जाता है जिनमें अयस्क या गैंग में से कोई एक घटक चुम्बकीय गुणों वाला होता है, जैसे मैग्नेटाइट (Fe3O4)।

एलिंघम आरेख क्या दर्शाता है और यह धातु निष्कर्षण में कैसे उपयोगी है?

एलिंघम आरेख तापमान के फलन के रूप में धातु ऑक्साइड के निर्माण की गिब्स ऊर्जा परिवर्तन को दर्शाता है। यह विभिन्न तापमानों पर एक धातु को दूसरी धातु के ऑक्साइड से अपचयित करने की व्यवहार्यता का अनुमान लगाने में मदद करता है।

फेन प्लवन विधि में अवनमक का क्या कार्य है?

अवनमक का उपयोग दो सल्फाइड अयस्कों को अलग करने के लिए किया जाता है। यह एक विशेष सल्फाइड अयस्क को फेन में आने से रोकता है, जिससे दूसरे अयस्क को आसानी से अलग किया जा सके।

क्या ऊष्मागतिकी रूप से संभव अभिक्रियाएँ हमेशा कक्ष ताप पर होती हैं?

नहीं, ऊष्मागतिकी रूप से संभव होने पर भी, अभिक्रियाओं को शुरू करने के लिए अक्सर एक निश्चित सक्रियण ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिसके लिए तापन या अन्य ऊर्जा की आवश्यकता हो सकती है।

हाइड्रोधातुकर्म द्वारा जिंक का निष्कर्षण क्यों नहीं किया जाता है?

जिंक एक प्रबल अपचायक है और यह कॉपर के विलयन से कॉपर को विस्थापित कर सकता है। हालांकि, जिंक को अपचयित करने के लिए आवश्यक प्रबल अपचायक (जैसे Ca, Mg) जल से अभिक्रिया करके H2 गैस उत्पन्न करते हैं, जिससे हाइड्रोधातुकर्म अव्यावहारिक हो जाता है।

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