कक्षा 12 राजनीति विज्ञान: राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ - NCERT समाधान
यह पृष्ठ कक्षा 12 राजनीति विज्ञान के अध्याय 1, 'राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। यह अध्याय भारत के विभाजन की जटिलताओं, द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के परिणामों, और स्वतंत्रता के बाद भारत के एकीकरण में आई विभिन्न चुनौतियों पर प्रकाश डालता है। समाधानों में रियासतों के विलय, धर्मनिरपेक्षता की स्थापना, और राष्ट्र निर्माण के प्रारंभिक एजेंडे जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर स्पष्ट और संक्षिप्त रूप से समझाया गया है, जिससे छात्रों को इन अवधारणाओं को गहराई से समझने में मदद मिलती है। ये समाधान परीक्षा की तैयारी और विषय की ठोस समझ विकसित करने के लिए एक उत्कृष्ट संसाधन हैं।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 12 |
| Subject | स्वतंत्र भारत में राजनीति - II |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 1. राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ |
Chapter summary
कक्षा 12 राजनीति विज्ञान के अध्याय 1 'राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ' के ये NCERT समाधान भारत के विभाजन के बाद की प्रारंभिक चुनौतियों पर केंद्रित हैं। इसमें द्वि-राष्ट्र सिद्धांत, पंजाब और बंगाल का विभाजन, रियासतों का एकीकरण, और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के निर्माण जैसे प्रमुख मुद्दों का विश्लेषण किया गया है। समाधान छात्रों को इन ऐतिहासिक घटनाओं और उनके दूरगामी परिणामों को समझने में मदद करते हैं।
Learning outcomes
- भारत के विभाजन के कारणों और परिणामों को समझना।
- रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया और उसमें आई बाधाओं का विश्लेषण करना।
- धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के निर्माण के तर्कों को समझना।
- राष्ट्र निर्माण के प्रारंभिक एजेंडे की पहचान करना।
- विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित करना।
Topics covered
Paper topics
- राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ
- भारत का विभाजन
- द्वि-राष्ट्र सिद्धांत
- पंजाब और बंगाल का विभाजन
- रियासतों का एकीकरण
- धर्मनिरपेक्षता
- गांधीजी का राष्ट्र निर्माण का एजेंडा
- नेहरू का राष्ट्र निर्माण का एजेंडा
- अल्पसंख्यक समुदाय
- लोकतंत्र का विस्तार
- बल प्रयोग और विलय
Important topics
- भारत का विभाजन और उसके परिणाम
- रियासतों का भारतीय संघ में एकीकरण
- धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के निर्माण के तर्क
- राष्ट्र निर्माण के प्रारंभिक एजेंडे
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
- (क) भारत-विभाजन "द्वि-राष्ट्र सिद्धांत" का परिणाम था।
- (ख) धर्म के आधार पर दो प्रांतों-पंजाब और बंगाल-का बँटवारा हुआ।
- (ग) पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान में संगति नहीं थी।
- (घ) विभाजन की योजना में यह बात भी शामिल थी कि दोनों देशों के बीच आबादी की अदला-बदली होगी।
कथन (घ) गलत है। भारत के विभाजन की मूल योजना में दोनों देशों के बीच आबादी की अदला-बदली की कोई औपचारिक व्यवस्था शामिल नहीं थी। हालाँकि, विभाजन के बाद बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिसके कारण लाखों लोग विस्थापित हुए और एक अनियोजित तथा दुखद आबादी की अदला-बदली हुई। अन्य कथन (क), (ख), और (ग) भारत-विभाजन के संदर्भ में सही हैं। द्वि-राष्ट्र सिद्धांत विभाजन का आधार था, पंजाब और बंगाल जैसे प्रांतों का धर्म के आधार पर बँटवारा हुआ, और पूर्वी व पश्चिमी पाकिस्तान के बीच भौगोलिक और सांस्कृतिक दूरी के कारण संगति की कमी थी।
प्रश्न 2
- (क) धर्म के आधार पर देश की सीमा का निर्धारण
- (ख) विभिन्न भाषाओं के आधार पर देश की सीमा का निर्धारण
- (ग) भौगोलिक आधार पर किसी देश के क्षेत्रों का सीमांकन
- (घ) किसी देश के भीतर प्रशासनिक और राजनीतिक आधार पर क्षेत्रों का सीमांकन
यहाँ सिद्धांतों और उनके उदाहरणों का सही मेल दिया गया है:
- (क) धर्म के आधार पर देश की सीमा का निर्धारण - 2. भारत और पाकिस्तान (विभाजन मुख्य रूप से धार्मिक आधार पर हुआ)
- (ख) विभिन्न भाषाओं के आधार पर देश की सीमा का निर्धारण - 1. पाकिस्तान और बांग्लादेश (पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में भाषाई और सांस्कृतिक अंतर थे)
- (ग) भौगोलिक आधार पर किसी देश के क्षेत्रों का सीमांकन - 4. झारखंड और छत्तीसगढ़ (ये राज्य भौगोलिक और सांस्कृतिक आधार पर बनाए गए)
- (घ) किसी देश के भीतर प्रशासनिक और राजनीतिक आधार पर क्षेत्रों का सीमांकन - 3. हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड (ये राज्य प्रशासनिक और राजनीतिक पुनर्गठन के तहत बने)
स्पष्टीकरण:
- भारत और पाकिस्तान का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ था।
- पाकिस्तान का निर्माण भी धर्म के आधार पर हुआ था, लेकिन पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच भाषाई और सांस्कृतिक भिन्नताएँ थीं, जो बाद में बांग्लादेश के निर्माण का कारण बनीं।
- झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों का गठन मुख्य रूप से भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारणों से हुआ है।
- हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों का गठन प्रशासनिक और राजनीतिक पुनर्गठन के तहत हुआ है।
प्रश्न 3
यह प्रश्न छात्रों को भारत के राजनीतिक नक्शे पर कुछ प्रमुख पूर्व रियासतों के स्थानों को पहचानने और चिह्नित करने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह एक व्यावहारिक गतिविधि है जिसे शिक्षक की सहायता से पूरा किया जाना चाहिए।
निर्देश:
- एक समकालीन भारत का राजनीतिक नक्शा प्राप्त करें जिसमें राज्यों की सीमाएँ स्पष्ट रूप से दिखाई गई हों।
- नक्शे पर निम्नलिखित रियासतों के अनुमानित स्थानों को पहचानें और चिह्नित करें:
- जुनागढ़: वर्तमान गुजरात राज्य में स्थित।
- हैदराबाद: वर्तमान तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्यों के आसपास स्थित एक बड़ी रियासत थी।
- मैसूर: वर्तमान कर्नाटक राज्य का हिस्सा।
- (नोट: प्रश्न में 'मसूर' लिखा है, संभवतः यह 'मैसूर' का ही संदर्भ है, जो दक्षिण भारत में एक प्रमुख रियासत थी।)
- चिह्नित स्थानों पर रियासतों के नाम लिखें।
यह अभ्यास छात्रों को भारत के भौगोलिक और राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया को समझने में मदद करता है, विशेष रूप से उन रियासतों के संदर्भ में जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद भारतीय संघ में शामिल होने में प्रारंभिक हिचकिचाहट दिखाई थी।
प्रश्न 4
रियासतों के भारतीय संघ में विलय के संबंध में विस्मय और इंद्रप्रीत दोनों के विचार कुछ हद तक सही हैं, और इस पर एक संतुलित राय बनाई जा सकती है।
विस्मय के विचार से सहमति:
विस्मय का यह कहना सही है कि अधिकांश रियासतों का भारतीय संघ में विलय लोकतांत्रिक तरीके से हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व ही लगभग सभी रियासतों के शासकों ने भारतीय संघ में शामिल होने के लिए सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे। विलय के बाद, इन रियासतों की प्रजा को वे लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त हुए जो उन्हें पहले शासकों के अधीन नहीं थे। कई रियासतों में अलोकतांत्रिक शासन व्यवस्था थी और शासक अपनी प्रजा को लोकतांत्रिक अधिकार देने के इच्छुक नहीं थे। विलय के माध्यम से, इन क्षेत्रों में भी लोकतंत्र का विस्तार हुआ।
इंद्रप्रीत के विचार से आंशिक सहमति:
इंद्रप्रीत का यह तर्क भी महत्वपूर्ण है कि विलय की प्रक्रिया में बल प्रयोग भी हुआ। यह सच है कि कुछ रियासतों, जैसे हैदराबाद और जूनागढ़, के विलय के लिए भारतीय सेना का प्रयोग करना पड़ा। इन मामलों में, शासक (जो मुसलमान थे) और बहुसंख्यक हिंदू जनता की इच्छा के बीच अंतर था, और जनता भारत में विलय चाहती थी। इसी तरह, कश्मीर के मामले में भी पाकिस्तानी कबायली हमले के बाद भारत ने हस्तक्षेप किया। हालाँकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि बल प्रयोग केवल कुछ ही मामलों में हुआ और यह अंतिम उपाय था, जब अन्य सभी विकल्प विफल हो गए थे। लोकतंत्र में आम सहमति महत्वपूर्ण है, लेकिन जब किसी क्षेत्र की जनता का एक बड़ा हिस्सा किसी विशेष शासन या संघ में शामिल होना चाहता है, और शासक बाधा डाल रहा हो, तो ऐसी स्थिति में हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।
निष्कर्ष:
कुल मिलाकर, रियासतों का भारतीय संघ में विलय एक जटिल प्रक्रिया थी। जहाँ अधिकांश विलय शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक सहमति से हुए, वहीं कुछ मामलों में विशेष परिस्थितियों के कारण बल प्रयोग भी करना पड़ा। विलय का अंतिम परिणाम यह हुआ कि भारत एक एकीकृत राष्ट्र के रूप में उभरा और इन क्षेत्रों की प्रजा को लोकतांत्रिक अधिकारों का लाभ मिला। इसलिए, विस्मय का दृष्टिकोण कि विलय से लोकतंत्र का विस्तार हुआ, अधिक व्यापक रूप से सही है, जबकि इंद्रप्रीत का अवलोकन कुछ विशिष्ट मामलों की ओर इशारा करता है जहाँ बल प्रयोग हुआ।
प्रश्न 5
मोहनदास करमचंद गाँधी: "आज आपने अपने सर पर काँटों का ताज पहना है। सत्ता का आसन एक बुरी चीज़ है। इस आसन पर आपको बड़ा सचेत रहना होगा... आपको और ज्यादा विनम्र और धैर्यवान बनना होगा... अब लगातार आपकी परीक्षा ली जाएगी।"
जवाहरलाल नेहरू: "...भारत आजादी की जिंदगी के लिए जागेगा... हम पुराने से नए की ओर कदम बढ़ाएँगे... आज दुर्भाग्य के एक दौर का खात्मा होगा और हिंदुस्तान अपने को फिर से पा लेगा... आज हम जो जश्न मना रहे हैं वह एक कदम भर है, संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं..."
इन दो बयानों से राष्ट्र-निर्माण का जो एजेंडा ध्वनित होता है उसे लिखिए। आपको कौन-सा एजेंडा जँच रहा है और क्यों?
महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के बयानों से राष्ट्र-निर्माण के दो भिन्न, यद्यपि पूरक, एजेंडे ध्वनित होते हैं:
गांधीजी का एजेंडा (नैतिक और आध्यात्मिक):
गांधीजी का बयान राष्ट्र-निर्माण के लिए एक नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। उनका जोर सत्ता के दुरुपयोग से बचने, विनम्रता, धैर्य और निरंतर आत्म-परीक्षा पर है। वे सत्ता को एक जिम्मेदारी मानते हैं, न कि विशेषाधिकार। उनके अनुसार, राष्ट्र-निर्माण का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं है, बल्कि एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जो सत्य, अहिंसा, प्रेम और सेवा के सिद्धांतों पर आधारित हो। यह एजेंडा व्यक्तिगत आचरण और नैतिक मूल्यों पर केंद्रित है, जो एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए आवश्यक हैं।
नेहरू का एजेंडा (आधुनिक और विकासोन्मुख):
नेहरू का बयान एक आधुनिक, प्रगतिशील और विकासोन्मुख राष्ट्र के निर्माण का एजेंडा प्रस्तुत करता है। वे स्वतंत्रता को एक नई शुरुआत के रूप में देखते हैं, जहाँ भारत अतीत की बाधाओं को तोड़कर भविष्य की ओर बढ़ेगा। उनका एजेंडा राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक प्रगति पर भी जोर देता है। वे गरीबी, बेरोजगारी और पिछड़ेपन जैसी समस्याओं को दूर करने और सभी नागरिकों के लिए समानता और न्याय सुनिश्चित करने की बात करते हैं। यह एजेंडा वैज्ञानिक दृष्टिकोण, औद्योगीकरण और एक मजबूत, स्वतंत्र राष्ट्र के निर्माण पर केंद्रित है।
कौन-सा एजेंडा जँच रहा है और क्यों?
दोनों एजेंडे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन नेहरू का एजेंडा राष्ट्र-निर्माण के व्यावहारिक और तात्कालिक लक्ष्यों को अधिक प्रभावी ढंग से संबोधित करता है, विशेषकर स्वतंत्रता के तुरंत बाद की परिस्थितियों में।
- व्यावहारिकता: स्वतंत्रता के बाद भारत को औपनिवेशिक शासन की विरासत से निपटना था, जिसमें गरीबी, अशिक्षा और अविकसित अर्थव्यवस्था शामिल थी। नेहरू का एजेंडा इन समस्याओं के समाधान के लिए एक स्पष्ट खाका प्रस्तुत करता है, जिसमें विकास, आधुनिकीकरण और सामाजिक न्याय पर जोर दिया गया है।
- दूरदर्शिता: नेहरू ने भारत के भविष्य की एक व्यापक तस्वीर पेश की, जिसमें राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक समानता भी शामिल थी। उन्होंने उजड़े हुए लोगों को बसाने, देश को गरीबी और बेरोजगारी से मुक्त करने और एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता को पहचाना।
- संतुलन: जबकि गांधीजी का नैतिक दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है, नेहरू का एजेंडा राष्ट्र-निर्माण के लिए आवश्यक संस्थागत और संरचनात्मक परिवर्तनों पर भी ध्यान केंद्रित करता है। एक मजबूत राष्ट्र के निर्माण के लिए नैतिक मूल्यों के साथ-साथ ठोस विकास रणनीतियों की भी आवश्यकता होती है।
इसलिए, नेहरू का एजेंडा राष्ट्र-निर्माण के लिए अधिक व्यापक और व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने मौजूद चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक था। हालाँकि, गांधीजी के नैतिक आदर्शों को भी राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में एकीकृत किया जाना चाहिए ताकि एक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज का निर्माण हो सके।
प्रश्न 6
प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किए जाने के पक्ष में कई तर्क प्रस्तुत किए, जो केवल भावनात्मक या नैतिक नहीं थे, बल्कि युक्तिपरक भी थे:
नेहरू द्वारा प्रस्तुत तर्क:
- विभाजन की प्रकृति: नेहरू ने तर्क दिया कि भारत का विभाजन मुख्य रूप से धार्मिक आधार पर हुआ था, लेकिन यह एक जटिल प्रक्रिया थी। पाकिस्तान बनने के बाद भारत के सभी मुसलमानों को निकालने की कोई योजना नहीं थी। पंजाब और बंगाल जैसे प्रांतों का बँटवारा परिस्थितियों का परिणाम था।
- स्वैच्छिक प्रवासन: भारत के अन्य प्रांतों से पाकिस्तान जाने वाले मुसलमान स्वेच्छा से गए थे, न कि किसी सरकारी आदेश के तहत।
- अल्पसंख्यकों की उपस्थिति: विभाजन के बाद भी भारत में मुसलमानों की एक बड़ी आबादी (1951 की जनगणना के अनुसार लगभग 12%) शेष थी, जिन्हें देश से निकालना संभव नहीं था।
- अन्य अल्पसंख्यक समुदाय: भारत में मुसलमानों के अलावा सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी और यहूदी जैसे अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय भी थे। केवल मुसलमानों को सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय मानकर भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करना न तो उचित था और न ही न्यायसंगत।
- सांस्कृतिक एकता का तर्क: नेहरू का मानना था कि भारत की संस्कृति विभिन्न धर्मों और परंपराओं के संगम से बनी है। भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने से यह मिश्रित चरित्र (Composite Character) प्रभावित होगा और सामाजिक सद्भाव बिगड़ेगा।
- राष्ट्रीय एकता और स्थिरता का तर्क: यदि भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाता, तो इससे अल्पसंख्यकों में असुरक्षा और अलगाव की भावना बढ़ती, जो राष्ट्रीय एकता और स्थिरता के लिए हानिकारक होता। यह देश में सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को भी विषाक्त बना सकता था।
- लोकतांत्रिक मूल्यों का तर्क: एक धर्मनिरपेक्ष राज्य सभी नागरिकों को, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, समान अधिकार और स्वतंत्रता प्रदान करता है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है।
तर्कों की प्रकृति (भावनात्मक/नैतिक बनाम युक्तिपरक):
नेहरू के तर्क केवल भावनात्मक या नैतिक नहीं थे, बल्कि उनमें मजबूत युक्तिपरक आधार भी था:
- युक्तिपरक पहलू: जनसंख्या के आंकड़े, विभाजन की प्रक्रिया की जटिलता, अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की उपस्थिति, और राष्ट्रीय एकता व स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता जैसे बिंदु विशुद्ध रूप से युक्तिपरक और व्यावहारिक थे। उन्होंने भारत की सामाजिक-राजनीतिक वास्तविकता का विश्लेषण प्रस्तुत किया।
- नैतिक पहलू: अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना, सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करना, और एक समावेशी समाज का निर्माण करना नैतिक सिद्धांत थे जो उनके तर्कों का आधार बने।
- भावनात्मक पहलू: भारतीय संस्कृति की विविधता और एकता को बनाए रखने की अपील में भावनात्मक तत्व भी थे, लेकिन यह भावनात्मकता भी राष्ट्रीय एकता और सद्भाव की आवश्यकता पर आधारित थी।
निष्कर्ष:
नेहरू ने भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने के लिए भावनात्मक, नैतिक और युक्तिपरक तर्कों का एक मजबूत मिश्रण प्रस्तुत किया। उन्होंने भारत की विशिष्ट परिस्थितियों और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एक समावेशी और एकीकृत राष्ट्र के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। उनके तर्क भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप की नींव रखने में निर्णायक साबित हुए।
Common mistakes
- विभाजन के केवल एक पहलू पर ध्यान केंद्रित करना।
- रियासतों के एकीकरण को केवल बल प्रयोग के रूप में देखना।
- धर्मनिरपेक्षता के तर्कों को केवल भावनात्मक मानना।
- राष्ट्र निर्माण की जटिलताओं को कम आंकना।
Revision tips
- प्रत्येक प्रश्न के उत्तर को समझने के लिए मुख्य अवधारणाओं को रेखांकित करें।
- रियासतों के एकीकरण से संबंधित विभिन्न दृष्टिकोणों की तुलना करें।
- राष्ट्र निर्माण के लिए गांधीजी और नेहरू के विचारों के बीच अंतर को समझें।
- विभाजन और उसके परिणामों से संबंधित महत्वपूर्ण तिथियों और घटनाओं को याद करें।
Practice MCQs
Q1. भारत-विभाजन के बारे में कौन-सा कथन गलत है?
Explanation: विभाजन की योजना में आबादी की अदला-बदली का कोई औपचारिक प्रावधान शामिल नहीं था, यह एक अनियोजित और दुखद परिणाम था।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा सिद्धांत धर्म के आधार पर देश की सीमा निर्धारण से संबंधित है?
Explanation: भारत और पाकिस्तान का विभाजन मुख्य रूप से धर्म के आधार पर हुआ था, जहाँ भारत बहुसंख्यक हिंदू आबादी वाला देश बना और पाकिस्तान मुस्लिम बहुसंख्यक देश।
Q3. रियासतों के भारतीय संघ में विलय के संबंध में विस्मय और इंद्रप्रीत के विचारों में मुख्य अंतर क्या है?
Explanation: विस्मय का मानना है कि रियासतों के विलय से प्रजा तक लोकतंत्र का विस्तार हुआ, जबकि इंद्रप्रीत का तर्क है कि इसमें बल प्रयोग भी हुआ, जो लोकतंत्र के सिद्धांत के विरुद्ध है।
Q4. धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के निर्माण के पक्ष में नेहरू द्वारा प्रस्तुत तर्कों में कौन-सा तर्क युक्तिपरक है?
Explanation: नेहरू ने धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में भावनात्मक और नैतिक तर्कों के साथ-साथ व्यावहारिक और युक्तिपरक तर्क भी दिए, जैसे कि भारत की बहुधार्मिक जनसंख्या और भारतीय संस्कृति की मिश्रित प्रकृति।
Q5. गांधीजी के अनुसार, सत्ता का आसन कैसा है?
Explanation: गांधीजी ने सत्ता को एक बड़ी जिम्मेदारी के रूप में देखा, जिसे काँटों का ताज कहा और सत्तासीन लोगों को विनम्र व धैर्यवान रहने की सलाह दी।
Frequently asked questions
कक्षा 12 राजनीति विज्ञान के अध्याय 1 का मुख्य विषय क्या है?
कक्षा 12 राजनीति विज्ञान के अध्याय 1, 'राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ', भारत की स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र निर्माण की प्रारंभिक चुनौतियों पर केंद्रित है, जिसमें विभाजन, रियासतों का एकीकरण और धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना जैसे मुद्दे शामिल हैं।
भारत के विभाजन का मुख्य कारण क्या था?
भारत के विभाजन का मुख्य कारण 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' था, जिसके अनुसार भारत को दो राष्ट्रों - भारत (हिंदू बहुल) और पाकिस्तान (मुस्लिम बहुल) - में विभाजित किया जाना था।
रियासतों के एकीकरण में क्या चुनौतियाँ थीं?
रियासतों के एकीकरण में मुख्य चुनौती यह थी कि कुछ शासक भारत में विलय नहीं चाहते थे और उन्होंने अपनी प्रजा की इच्छाओं को नजरअंदाज किया। कुछ मामलों में, जैसे हैदराबाद और जूनागढ़, विलय के लिए बल प्रयोग भी करना पड़ा।
धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के निर्माण के लिए नेहरू ने क्या तर्क दिए?
नेहरू ने तर्क दिया कि भारत की बहुधार्मिक जनसंख्या, भारतीय संस्कृति की मिश्रित प्रकृति और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाना आवश्यक है।
ये NCERT समाधान छात्रों की मदद कैसे करते हैं?
ये समाधान छात्रों को 'राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ' अध्याय के प्रत्येक प्रश्न के उत्तर को स्पष्ट और विस्तृत रूप से समझने में मदद करते हैं, जिससे परीक्षा की तैयारी आसान हो जाती है।
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