कक्षा 12 भौतिकी अध्याय 5: चुंबकत्व एवं द्रव्य NCERT समाधान

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यह पृष्ठ कक्षा 12 भौतिकी के अध्याय 5, 'चुंबकत्व एवं द्रव्य' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रदान करता है। इसमें पृथ्वी के चुंबकत्व, चुंबकीय द्विध्रुव, चुंबकीय पदार्थ और उनके गुणों से संबंधित अभ्यास प्रश्नों के हल शामिल हैं। समाधानों को स्पष्टता और सरलता से समझाया गया है, जिससे छात्रों को इन जटिल अवधारणाओं को समझने में मदद मिलती है। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर चरण-दर-चरण तरीके से दिया गया है, जिसमें आवश्यक सूत्र और स्पष्टीकरण शामिल हैं। यह संसाधन छात्रों को परीक्षा की तैयारी में सहायता करने और विषय की गहरी समझ विकसित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
Subjectभौतिकी विज्ञान-I
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter5. चुंबकत्व एवं द्रव्य

Chapter summary

कक्षा 12 भौतिकी के अध्याय 5, 'चुंबकत्व एवं द्रव्य' के ये NCERT समाधान पृथ्वी के चुंबकत्व के मूल सिद्धांतों, चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण, और विभिन्न पदार्थों के चुंबकीय व्यवहार पर केंद्रित हैं। इसमें पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के अवयवों, चुंबकीय पदार्थों के प्रकारों (लौहचुंबकीय, अनुचुंबकीय, प्रतिचुंबकीय), और चुंबकीय संततता जैसे विषयों को शामिल किया गया है। समाधान अभ्यास प्रश्नों के माध्यम से इन अवधारणाओं को स्पष्ट करते हैं, जिससे छात्रों को परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण विषयों की तैयारी में मदद मिलती है।

Learning outcomes

  • पृथ्वी के चुंबकत्व के विभिन्न अवयवों को समझना।
  • चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की गणना करना।
  • विभिन्न चुंबकीय पदार्थों के गुणों की व्याख्या करना।
  • चुंबकीय तीव्रता और चुंबकीय पारगम्यता जैसी अवधारणाओं को समझना।
  • चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं और उनके व्यवहार का विश्लेषण करना।

Topics covered

Paper topics

  • पृथ्वी का चुंबकत्व
  • चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण
  • नति कोण
  • दिकपात कोण
  • चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं
  • चुंबकीय पदार्थ
  • लौहचुंबकत्व
  • अनुचुंबकत्व
  • प्रतिचुंबकत्व
  • चुंबकीय संततता
  • चुंबकीय पारगम्यता
  • चुंबकीय तीव्रता

Important topics

  • पृथ्वी के चुंबकत्व के अवयव
  • चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण की गणना
  • चुंबकीय पदार्थों का वर्गीकरण और गुण
  • चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं का व्यवहार
  • चुंबकीय तीव्रता और पारगम्यता

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

(a) एक सदिश को पूर्ण रूप से व्यक्त करने के लिए तीन राशियों की आवश्यकता होती हैं। उन तीन स्वतन्त्र राशियों के नाम लिखिए जो परम्परागत रूप से पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होती हैं।
हल: पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को पूर्ण रूप से व्यक्त करने के लिए तीन स्वतन्त्र राशियों की आवश्यकता होती है। ये राशियाँ पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के अवयव कहलाती हैं:
  1. चुम्बकीय विक्षेपण (Magnetic Declination): यह भौगोलिक याम्योत्तर और चुम्बकीय याम्योत्तर के बीच का कोण है।
  2. अवनति कोण या नति कोण (Angle of Dip or Inclination): यह पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की कुल तीव्रता की दिशा और क्षैतिज दिशा के बीच का कोण है।
  3. पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक (Horizontal Component of Earth's Magnetic Field): यह पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की कुल तीव्रता का क्षैतिज दिशा में घटक है।
इन तीन राशियों के मान ज्ञात होने पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा और परिमाण पूर्ण रूप से ज्ञात किया जा सकता है।

प्रश्न 1

(b) दक्षिण भारत में किसी स्थान पर नित कोण का मान लगभग 18° है। ब्रिटेन में आप इससे अधिक नित कोण की अपेक्षा करेंगे या कम की?
हल: नित कोण (Angle of Dip) पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की क्षैतिज तल से झुकाव को दर्शाता है। जैसे-जैसे हम भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर बढ़ते हैं, नित कोण का मान बढ़ता जाता है। दक्षिण भारत भूमध्य रेखा के अपेक्षाकृत करीब है जहाँ नित कोण 18° है। ब्रिटेन उत्तरी ध्रुव के अधिक निकट स्थित है। इसलिए, ब्रिटेन में नित कोण का मान दक्षिण भारत की तुलना में काफी अधिक होगा। वास्तव में, ब्रिटेन में नित कोण लगभग 70° होता है। अतः, आप ब्रिटेन में दक्षिण भारत की तुलना में **अधिक** नित कोण की अपेक्षा करेंगे।

प्रश्न 1

(c) यदि आप आस्ट्रेलिया के मेल्बॉर्न शहर में भू-चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं का नक्शा बनाएँ तो ये रेखाएँ पृथ्वी के अन्दर जाएँगी या इससे बाहर आएँगी?
हल: मेल्बॉर्न शहर दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थित है। पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में, दक्षिणी गोलार्द्ध में पृथ्वी का चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव स्थित होता है (भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव के पास)। चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव से निकलती हैं और चुम्बकीय दक्षिणी ध्रुव में प्रवेश करती हैं। चूँकि मेल्बॉर्न दक्षिणी गोलार्द्ध में है, जहाँ पृथ्वी का चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव स्थित है, इसलिए भू-चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ पृथ्वी के अन्दर **जाएँगी** (चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव में प्रवेश करेंगी)।

प्रश्न 1

(d) एक चुम्बकीय सुई जो कर्घ्वांघर तल में घूमने के लिए स्वतन्त्र है, यदि भू-चुम्बकीय उत्तर या दक्षिण ध्रुव पर रखी हो तो यह किस दिशा में संकेत करेगी?
हल: पृथ्वी के चुम्बकीय ध्रुवों (उत्तरी या दक्षिणी) पर, पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र ऊर्ध्वाधर (vertical) होता है। प्रश्न के अनुसार, चुम्बकीय सुई क्षैतिज तल (horizontal plane) में घूमने के लिए स्वतन्त्र है। चूँकि ध्रुवों पर चुम्बकीय क्षेत्र पूरी तरह से ऊर्ध्वाधर होता है और सुई केवल क्षैतिज तल में घूम सकती है, इसलिए सुई क्षैतिज तल में किसी भी दिशा में संकेत कर सकती है। यह किसी विशेष दिशा में स्थिर नहीं रहेगी क्योंकि क्षैतिज घटक शून्य होता है। अतः, यह ध्रुवों पर **कोई भी दिशा** दर्शाएगी।

प्रश्न 1

(e) यह माना जाता है कि पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र लगभग एक चुम्बकीय द्विघ्वव के क्षेत्र जैसा है जो पृथ्वी के केन्द्र पर रखा है और जिसका द्विघ्वर्व आपूर्ण 8 \times 10^{22} \, \mathrm{JT}^{-1} है। कोई ढंग सुझाइये जिससे इस संख्या के परिमाण की कोटि जांची जा सके।
हल: पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की कोटि ज्ञात करने के लिए, हम पृथ्वी के केंद्र पर रखे एक काल्पनिक चुम्बकीय द्विध्रुव के कारण विषुवत रेखा पर चुम्बकीय क्षेत्र की गणना कर सकते हैं।

दिया गया है:

चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण, M = 8 \times 10^{22} \, \mathrm{JT}^{-1}

पृथ्वी की त्रिज्या, R = 6.4 \times 10^6 \, \mathrm{m}

एक चुम्बकीय द्विध्रुव के कारण उसकी अक्षीय स्थिति पर चुम्बकीय क्षेत्र का सूत्र है:

B = \frac{\mu_0}{2\pi} \frac{M}{d^3}

विषुवत रेखा पर (द्विध्रुव के लम्ब समद्विभाजक पर) चुम्बकीय क्षेत्र का सूत्र है:

B = \frac{\mu_0}{4\pi} \frac{M}{d^3}

यदि हम पृथ्वी के केंद्र पर द्विध्रुव मान लें, तो विषुवत रेखा पर किसी बिंदु (जैसे पृथ्वी की सतह पर) के लिए दूरी d को पृथ्वी की त्रिज्या R के बराबर लिया जा सकता है।

यहाँ, \frac{\mu_0}{4\pi} = 10^{-7} \, \mathrm{TmA}^{-1}

अतः, विषुवत रेखा पर चुम्बकीय क्षेत्र होगा:

B = 10^{-7} \times \frac{8 \times 10^{22}}{(6.4 \times 10^6)^3}

B = 10^{-7} \times \frac{8 \times 10^{22}}{262.144 \times 10^{18}}

B \approx 10^{-7} \times 0.0305 \times 10^{4}

B \approx 0.305 \times 10^{-3} \, \mathrm{T}

B \approx 3.05 \times 10^{-4} \, \mathrm{T}

इस मान को गॉस (G) में बदलने पर (1 T = 10^4 G):

B \approx 3.05 \, \mathrm{G}

यह गणना किया गया मान पृथ्वी की सतह पर मापे गए औसत चुम्बकीय क्षेत्र (लगभग 0.25 G से 0.65 G) के परिमाण की कोटि के समान है। इस प्रकार, हम पृथ्वी के चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण के मान से उसके चुम्बकीय क्षेत्र की कोटि का अनुमान लगा सकते हैं।

प्रश्न 1

(f) भू-गर्भशास्त्रियों का मानना है कि मुख्य N-S चुम्बकीय घुवों के अतिरिक्त, पृथ्वी की सतह पर कई अन्य स्थानीय घ्रुव भी है, जो विभिन्न दिशाओं में विन्यस्त है। ऐसा होना कैसे सम्भव है?
हल: पृथ्वी का मुख्य चुम्बकीय क्षेत्र एक विशाल द्विध्रुव के रूप में माना जाता है, जो पृथ्वी के कोर से उत्पन्न होता है। हालाँकि, पृथ्वी की सतह पर स्थानीय चुम्बकीय ध्रुवों का अस्तित्व संभव है, जो मुख्य द्विध्रुव क्षेत्र से भिन्न दिशाओं में विन्यस्त होते हैं। इसका कारण पृथ्वी की पपड़ी (crust) में मौजूद चुम्बकित खनिज (जैसे लौह अयस्क) हैं।

जब ये खनिज बनते हैं या पृथ्वी के इतिहास में किसी समय चुम्बकित होते हैं, तो वे स्थानीय चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में चुम्बकित हो जाते हैं। ये स्थानीय चुम्बकन क्षेत्र मुख्य द्विध्रुव क्षेत्र के साथ अध्यारोपित (superimpose) हो जाते हैं। यदि इन स्थानीय चुम्बकित क्षेत्रों का परिमाण पर्याप्त रूप से बड़ा हो, तो वे पृथ्वी की सतह पर कुछ स्थानों पर मुख्य चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को बदल सकते हैं, जिससे स्थानीय चुम्बकीय ध्रुवों का आभास होता है। ये स्थानीय ध्रुव मुख्य द्विध्रुव के प्रभाव को निरस्त या प्रबल कर सकते हैं, और विभिन्न दिशाओं में विन्यस्त हो सकते हैं।

प्रश्न 2

(a) एक जगह से दूसरी जगह जाने पर पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र बदलता है। क्या यह समय के साथ भी बदलता है? यदि हाँ, तो कितने समय अन्तराल पर इसमें पर्याप्त परिवर्तन होते हैं?
हल: हाँ, पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र न केवल स्थान के साथ बदलता है, बल्कि यह **समय के साथ भी बदलता है**। इस परिवर्तन को **भू-चुम्बकीय विचलन (Geomagnetic Variation)** कहा जाता है।

पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन विभिन्न समय अंतरालों पर होते हैं:

  • अल्पकालिक परिवर्तन: ये सौर ज्वालाओं (solar flares) और भू-चुम्बकीय तूफानों (geomagnetic storms) के कारण होते हैं, जो मिनटों से लेकर घंटों तक के पैमाने पर होते हैं।
  • दैनिक परिवर्तन: सूर्य के प्रकाश के कारण आयनमंडल में होने वाले परिवर्तनों से भी दैनिक (लगभग 24 घंटे) परिवर्तन होते हैं।
  • वार्षिक परिवर्तन: पृथ्वी के वायुमंडल और आयनमंडल में मौसमी परिवर्तनों के कारण भी कुछ वार्षिक परिवर्तन देखे जा सकते हैं।
  • दीर्घकालिक परिवर्तन: पृथ्वी के कोर में होने वाली प्रक्रियाओं के कारण चुम्बकीय क्षेत्र में दीर्घकालिक परिवर्तन होते हैं, जो सैकड़ों से हजारों वर्षों के पैमाने पर होते हैं। इसमें चुम्बकीय ध्रुवों का विचलन और यहाँ तक कि ध्रुवों का उलटना (magnetic pole reversal) भी शामिल है।
पर्याप्त परिवर्तन, जो भू-वैज्ञानिक अध्ययनों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, आमतौर पर **कुछ सौ वर्षों** के अन्तराल पर देखे जाते हैं। भू-चुम्बकीय तूफानों के दौरान परिवर्तन बहुत तीव्र और अनियमित हो सकते हैं।

प्रश्न 2

(b) पृथ्वी के क्रोड में लोहा है, यह ज्ञात है। फिर भी भू-गर्भशास्त्री इसको पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का स्रोत नहीं मानते। क्यों?
हल: यह सच है कि पृथ्वी के क्रोड (core) में भारी मात्रा में लोहा (लगभग 85%) और निकल मौजूद है। हालाँकि, भू-गर्भशास्त्री इसे पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का प्राथमिक स्रोत नहीं मानते हैं क्योंकि क्रोड का तापमान अत्यधिक उच्च होता है। पृथ्वी के क्रोड का तापमान सूर्य की सतह के तापमान (लगभग 5500°C) के बराबर या उससे भी अधिक माना जाता है।

इस अत्यधिक तापमान पर, लोहा और निकल अपनी लौहचुंबकीय (ferromagnetic) अवस्था खो देते हैं और अनुचुंबकीय (paramagnetic) या इससे भी अधिक संभवतः एक प्लाज्मा जैसी अवस्था में होते हैं। चुम्बकत्व के लिए आवश्यक लौहचुंबकीय अवस्था केवल क्यूरी तापमान (Curie temperature) से नीचे ही संभव है। चूँकि क्रोड का तापमान क्यूरी तापमान से बहुत अधिक है, इसलिए वहाँ मौजूद लोहा स्थायी चुम्बक के रूप में कार्य नहीं कर सकता है। इसलिए, क्रोड में मौजूद लोहा सीधे तौर पर पृथ्वी के स्थायी चुम्बकीय क्षेत्र का स्रोत नहीं है।

प्रश्न 2

(c) पृथ्वी के क्रोड के बाहरी चालक भाग में प्रवाहित होने वाली आवेश घाराएँ भू-चुम्बकीय क्षेत्र के लिए उत्तरदायी समझी जाती हैं। इन घाराओं को बनाए रखने वाली बैटरी (ऊर्जा स्रोत) क्या हो सकती है?
हल: पृथ्वी के क्रोड के बाहरी भाग (द्रव अवस्था में) में प्रवाहित होने वाली आवेश धाराओं को **डायनमो सिद्धांत (Dynamo Theory)** द्वारा समझाया जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, इन धाराओं को बनाए रखने वाली 'बैटरी' या ऊर्जा स्रोत पृथ्वी के भीतर होने वाली विभिन्न प्रक्रियाएँ हैं, जिनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
  1. संवाहन धाराएँ (Convection Currents): क्रोड के अंदर तापमान प्रवणता (temperature gradient) के कारण पिघली हुई धातु (लोहा-निकल) में संवाहन धाराएँ उत्पन्न होती हैं। गर्म, कम घनत्व वाला पदार्थ ऊपर उठता है और ठंडा, अधिक घनत्व वाला पदार्थ नीचे बैठता है। यह गति आवेशित कणों के प्रवाह का कारण बनती है।
  2. पृथ्वी का घूर्णन (Earth's Rotation): कोरिओलिस बल (Coriolis force) इन संवाहन धाराओं को घुमाता है, जिससे एक जटिल घूर्णी गति उत्पन्न होती है जो विद्युत धाराओं को व्यवस्थित करने में मदद करती है।
  3. रेडियोधर्मी क्षय (Radioactive Decay): क्रोड में मौजूद रेडियोधर्मी तत्वों (जैसे यूरेनियम, थोरियम) के क्षय से उत्पन्न ऊष्मा भी संवाहन को बनाए रखने में योगदान करती है।
  4. पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा (Internal Heat of the Earth): पृथ्वी के निर्माण के समय से मौजूद अवशिष्ट ऊष्मा भी संवाहन के लिए ऊर्जा प्रदान करती है।
ये सभी प्रक्रियाएँ मिलकर एक स्व-स्थायी डायनमो प्रभाव उत्पन्न करती हैं, जो विद्युत धाराओं को बनाए रखता है और इस प्रकार पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को उत्पन्न करता है।

प्रश्न 2

(d) अपने 4.5 अरब वर्षों के इतिहास में पृथ्वी अपने चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा कई बार उलट चुकी होगी। भू-गर्भशास्त्री, इतने सुन्दर अतीत के पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के बारे में कैसे जान पाते हैं?
हल: भू-गर्भशास्त्री पृथ्वी के प्राचीन चुम्बकीय क्षेत्र के बारे में जानकारी मुख्य रूप से **जीवाश्म चुम्बकत्व (Paleomagnetism)** के अध्ययन से प्राप्त करते हैं। यह प्रक्रिया इस प्रकार काम करती है:
  1. चट्टानों का चुम्बकन: जब पिघला हुआ मैग्मा (लावा) पृथ्वी की सतह पर आता है और ठंडा होकर ठोस चट्टान (जैसे बेसाल्ट) बनाता है, तो उसमें मौजूद लौह-चुंबकीय खनिज (जैसे मैग्नेटाइट) पृथ्वी के उस समय के चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में चुम्बकित हो जाते हैं। यह चुम्बकन चट्टान के ठंडा होने पर स्थायी हो जाता है।
  2. तलछटी चट्टानें: इसी तरह, तलछटी चट्टानों के निर्माण के दौरान, चुंबकीय कण तलछट के साथ नीचे बैठते हैं और पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में संरेखित हो जाते हैं, जिससे चट्टान को चुम्बकन प्राप्त होता है।
  3. चट्टानों का विश्लेषण: भू-गर्भशास्त्री इन प्राचीन चट्टानों के नमूनों को एकत्र करते हैं और प्रयोगशाला में उनके चुम्बकन की दिशा और तीव्रता का अध्ययन करते हैं। वे चट्टानों को गर्म करके या अन्य तरीकों से उनके मूल चुम्बकन को पुनः प्राप्त करते हैं।
  4. ध्रुवीय उलटाव का रिकॉर्ड: समय के साथ विभिन्न भूवैज्ञानिक अवधियों की चट्टानों का विश्लेषण करके, भू-गर्भशास्त्री चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में हुए परिवर्तनों का एक विस्तृत रिकॉर्ड बनाते हैं। वे देखते हैं कि कब चुम्बकीय उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव अपनी स्थिति बदलते हैं (ध्रुवीय उलटाव)।
इस प्रकार, चट्टानों में दर्ज चुम्बकीय इतिहास का अध्ययन करके, भू-गर्भशास्त्री पृथ्वी के अतीत के चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा, तीव्रता और ध्रुवीय उलटाव की घटनाओं के बारे में जान पाते हैं।

प्रश्न 2

(e) बहुत अधिक दूरियों पर (30,000 km से अधिक) पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र अपनी द्विघ्रुवीय आकृति से काफी भिन्न हो जाता है। कौन-से कारक इस विकृति के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं?
हल: पृथ्वी की सतह से बहुत अधिक दूरियों पर (लगभग 30,000 km से अधिक), पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र वास्तव में एक आदर्श द्विध्रुव (dipole) के क्षेत्र से काफी भिन्न हो जाता है। इस विकृति के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित कारक उत्तरदायी हैं:
  1. सौर पवन (Solar Wind): सूर्य से आने वाली आवेशित कणों (मुख्य रूप से प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन) की धारा, जिसे सौर पवन कहा जाता है, पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के साथ परस्पर क्रिया करती है। यह सौर पवन पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को संपीड़ित (compress) करती है और एक 'चुम्बकीय पुच्छ' (magnetotail) बनाती है जो पृथ्वी के घूर्णन की विपरीत दिशा में बहुत दूर तक फैली होती है।
  2. मैग्नेटोस्फीयर (Magnetosphere): सौर पवन के प्रभाव से पृथ्वी के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बनता है जिसे मैग्नेटोस्फीयर कहा जाता है। यह मैग्नेटोस्फीयर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को एक सममित द्विध्रुवीय आकृति से विकृत करता है। यह सौर पवन के दबाव के कारण पृथ्वी के सामने वाले हिस्से (dayside) पर संपीड़ित होता है और पीछे वाले हिस्से (nightside) पर लम्बी पूंछ के रूप में फैलता है।
  3. बाह्य धाराएँ (External Currents): मैग्नेटोस्फीयर के भीतर और आयनमंडल में प्रवाहित होने वाली विद्युत धाराएँ भी पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को प्रभावित करती हैं और इसे द्विध्रुवीय मॉडल से विचलित करती हैं।
संक्षेप में, पृथ्वी के भीतर के स्रोत (जैसे कोर) से उत्पन्न द्विध्रुवीय क्षेत्र बाहरी स्रोतों, विशेष रूप से सौर पवन और उसके परिणामस्वरूप बनने वाले मैग्नेटोस्फीयर, के साथ परस्पर क्रिया के कारण विकृत हो जाता है।

प्रश्न 2

(f) अंतरातारकीय अंतरिक्ष में 10^{12} \, \mathrm{T} की कोटि का बहुत ही क्षीण चुम्बकीय क्षेत्र होता है। क्या इस सीण चुम्बकीय क्षेत्र के भी कुछ प्रभावी परिणाम हो सकते हैं? समझाइए।
हल: हाँ, अंतरातारकीय अंतरिक्ष (interstellar space) में 10^{12} \, \mathrm{T} (या 1 \, \mu \mathrm{G}) की कोटि का बहुत ही क्षीण चुम्बकीय क्षेत्र होने के बावजूद इसके महत्वपूर्ण प्रभावी परिणाम हो सकते हैं।

यह क्षीण चुम्बकीय क्षेत्र निम्नलिखित तरीकों से प्रभावी हो सकता है:

  1. आवेशित कणों का मार्गदर्शन: अंतरातारकीय अंतरिक्ष में घूमते हुए आवेशित कण (जैसे ब्रह्मांडीय किरणें) इन चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं का अनुसरण करते हैं। यह क्षेत्र इन कणों की गति को निर्देशित करता है और उन्हें आकाशगंगा में फैलने में मदद करता है।
  2. अंतरतारकीय माध्यम का संघनन: चुम्बकीय क्षेत्र अंतरतारकीय गैस और धूल के बादलों के संघनन (condensation) और पतन (collapse) में भूमिका निभा सकता है। यह गुरुत्वाकर्षण के साथ मिलकर तारों और ग्रहों के निर्माण के लिए आवश्यक घने बादल बनाने में सहायता कर सकता है।
  3. चुम्बकीय पुनर्संयोजन (Magnetic Reconnection): जहाँ चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ मिलती हैं और पुनर्संयोजित होती हैं, वहाँ ऊर्जा का विमोचन हो सकता है, जो अंतरतारकीय माध्यम को गर्म कर सकता है या आवेशित कणों को त्वरित कर सकता है।
  4. आकाशगंगा की संरचना: बड़े पैमाने पर, ये चुम्बकीय क्षेत्र आकाशगंगाओं की संरचना और गतिशीलता को प्रभावित करते हैं, जैसे कि सर्पिल भुजाओं (spiral arms) का निर्माण और रखरखाव।
यद्यपि यह क्षेत्र बहुत क्षीण है, लेकिन विशाल दूरियों और लंबे समय के पैमाने पर, यह अंतरतारकीय माध्यम के विकास और खगोलीय संरचनाओं के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

Common mistakes

  • पृथ्वी के चुंबकत्व के अवयवों को गलत समझना।
  • चुंबकीय पदार्थों के वर्गीकरण में भ्रमित होना।
  • चुंबकीय तीव्रता और चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता के बीच अंतर न कर पाना।
  • चुंबकीय संततता की अवधारणा को ठीक से न समझना।

Revision tips

  • पृथ्वी के चुंबकत्व के अवयवों (नति कोण, दिकपात कोण, क्षैतिज घटक) को याद करें।
  • चुंबकीय पदार्थों के वर्गीकरण और उनके गुणों की तुलना करें।
  • चुंबकीय द्विध्रुव से संबंधित सूत्रों का अभ्यास करें।
  • हल किए गए उदाहरणों को स्वयं हल करने का प्रयास करें।

Practice MCQs

Q1. पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को पूर्ण रूप से व्यक्त करने के लिए कितनी स्वतन्त्र राशियों की आवश्यकता होती है?

Q2. ब्रिटेन में नित कोण का मान दक्षिण भारत की तुलना में कैसा होता है?

Q3. पृथ्वी का चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण लगभग कितना है?

Q4. पृथ्वी के क्रोड में लोहा होने के बावजूद इसे चुम्बकत्व का स्रोत क्यों नहीं माना जाता?

Q5. अंतरातारकीय अंतरिक्ष में चुम्बकीय क्षेत्र की कोटि क्या होती है?

Frequently asked questions

कक्षा 12 भौतिकी के अध्याय 5 में कौन से मुख्य विषय शामिल हैं?

अध्याय 5, 'चुंबकत्व एवं द्रव्य', पृथ्वी के चुंबकत्व, चुंबकीय द्विध्रुव, चुंबकीय पदार्थों के गुणों (लौहचुंबकीय, अनुचुंबकीय, प्रतिचुंबकीय), चुंबकीय तीव्रता और पारगम्यता जैसे विषयों को शामिल करता है।

पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को व्यक्त करने वाली तीन स्वतन्त्र राशियाँ कौन सी हैं?

पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को व्यक्त करने वाली तीन स्वतन्त्र राशियाँ हैं: चुम्बकीय विक्षेपण, अवनति कोण (नति कोण), और पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक।

क्या पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र समय के साथ बदलता है?

हाँ, पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र प्रत्येक स्थान पर और प्रत्येक समय बदलता रहता है। इसमें कुछ सौ वर्षों के अन्तराल पर पर्याप्त परिवर्तन हो सकता है।

पृथ्वी के क्रोड को चुम्बकत्व का स्रोत क्यों नहीं माना जाता?

पृथ्वी के क्रोड में लोहा अत्यधिक तापमान के कारण द्रवीभूत अवस्था में होता है, जिससे वह लौह चुम्बकीय प्रकृति नहीं रख पाता और चुम्बकत्व का स्रोत नहीं बन पाता।

ये NCERT समाधान छात्रों की परीक्षा तैयारी में कैसे मदद करते हैं?

ये समाधान अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत और चरण-दर-चरण हल प्रदान करके छात्रों को अवधारणाओं को समझने, महत्वपूर्ण सूत्रों का अभ्यास करने और परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों के प्रकारों से परिचित होने में मदद करते हैं।

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