कक्षा 7 इतिहास: शासक और इमारतें NCERT समाधान

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यह पृष्ठ कक्षा 7 के लिए NCERT समाधान प्रस्तुत करता है, जो 'शासक और इमारतें' नामक अध्याय पर केंद्रित है। इसमें वास्तुकला की विभिन्न शैलियों, जैसे अनुप्रस्थ टोडा निर्माण और चापाकार सिद्धांत, साथ ही गोथिक शैली की विशेषताओं की विस्तृत व्याख्या शामिल है। समाधान बताते हैं कि कैसे राजाओं ने मंदिरों के निर्माण और अलंकरण के माध्यम से अपनी शक्ति और ईश्वर के साथ अपने संबंध को प्रदर्शित किया। मुगल काल की वास्तुकला, जैसे चारबाग और शाहजहाँनाबाद शहर की योजना, पर भी प्रकाश डाला गया है, जिसमें यमुना नदी की भूमिका और न्याय के प्रति बादशाह के दृष्टिकोण को दर्शाया गया है। ये समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण अवधारणाओं को समझने और याद रखने में मदद करेंगे।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 7
Subjectहमारे अतीत
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter5. शासक और इमारतें

Chapter summary

कक्षा 7 के लिए 'शासक और इमारतें' अध्याय के NCERT समाधान वास्तुकला के इतिहास और विभिन्न शासकों द्वारा निर्मित महत्वपूर्ण इमारतों पर केंद्रित हैं। इसमें अनुप्रस्थ टोडा निर्माण, चापाकार सिद्धांत, शिखर, पितरा-दूरा और गोथिक शैली जैसी वास्तुकला की प्रमुख शब्दावली की व्याख्या की गई है। समाधान यह भी बताते हैं कि कैसे मंदिरों का निर्माण राजाओं की शक्ति और दिव्यता को प्रदर्शित करने का एक माध्यम था, और मुगल काल में चारबाग और शाहजहाँनाबाद जैसे शहरों की योजना कैसे बनाई गई थी।

Learning outcomes

  • वास्तुकला की विभिन्न शैलियों (अनुप्रस्थ टोडा निर्माण, चापाकार, गोथिक) को समझना।
  • मंदिरों और अन्य इमारतों के निर्माण में शासकों की भूमिका का विश्लेषण करना।
  • पितरा-दूरा और चारबाग जैसी सजावटी तकनीकों और बागवानी शैलियों की पहचान करना।
  • मुगल वास्तुकला की प्रमुख विशेषताओं को समझना।
  • इमारतों के माध्यम से शासकों की शक्ति और न्याय की धारणा को जोड़ना।

Topics covered

Paper topics

  • वास्तुकला की शैलियाँ
  • अनुप्रस्थ टोडा निर्माण
  • चापाकार सिद्धांत
  • मंदिरों का निर्माण
  • शिखर
  • पितरा-दूरा
  • गोथिक शैली
  • चारबाग
  • मुगल वास्तुकला
  • शाहजहाँनाबाद
  • यमुना नदी की भूमिका
  • न्याय की धारणा

Important topics

  • वास्तुकला की विभिन्न शैलियाँ और उनकी विशेषताएँ
  • मंदिरों का निर्माण और शासकों की महत्ता
  • मुगल चारबाग की विशेषताएँ
  • गोथिक वास्तुकला
  • पितरा-दूरा तकनीक
  • शाहजहाँ के शहर नियोजन में यमुना नदी की भूमिका

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Questions and Solutions

राजेन्द्र प्रथम तथा महमूद गजनवी की नीतियाँ किन रूपों में समकालीन समय की देन थीं और किन रूपों में ये एक-दूसरे से भिन्न थीं?

राजेन्द्र प्रथम तथा महमूद गजनवी की नीतियाँ किन रूपों में समकालीन समय की देन थीं और किन रूपों में ये एक-दूसरे से भिन्न थीं? (एन॰सी॰ई॰आर॰टी॰ पाठ्यपुस्तक, पेज-66)
Solution: राजेन्द्र प्रथम और महमूद गजनवी दोनों के शासनकाल में, शासकों द्वारा अपने राज्य की शक्ति और समृद्धि का प्रदर्शन करने के लिए विजयों से प्राप्त धन और वस्तुओं का उपयोग करना एक सामान्य प्रथा थी। यह उस समय की एक देन थी।

समानताएँ:

  • धन का उपयोग: दोनों शासकों ने अपने अभियानों से प्राप्त धन का उपयोग अपनी राजधानी को भव्य बनाने में किया। राजेन्द्र प्रथम ने मंदिरों में मूर्तियाँ स्थापित करवाईं, जबकि महमूद गजनवी ने अपनी राजधानी गजनी को समृद्ध किया।

भिन्नताएँ:

  • विध्वंस की नीति: महमूद गजनवी ने भारत में कई मंदिरों को तोड़ा और लूटा, जो उसकी विजय की एक क्रूर नीति को दर्शाता है। इसके विपरीत, राजेन्द्र प्रथम ने मंदिरों को विध्वंस नहीं किया, बल्कि विजयों से प्राप्त मूर्तियों को अपने मंदिरों में स्थापित करवाया।
  • धन का गंतव्य: महमूद गजनवी ने भारत से लूटा हुआ धन गजनी ले जाकर वहाँ खर्च किया। वहीं, राजेन्द्र प्रथम ने दूसरे राज्यों से प्राप्त धन का उपयोग अपने राज्य के विकास और मंदिरों के निर्माण में किया, जिससे वह अपने राज्य में ही रहा।

वास्तुकला की 'गोथिक' शैली के बारे में व्याख्या कीजिए।

वास्तुकला की 'गोथिक' शैली के बारे में व्याख्या कीजिए। (एन॰सी॰ई॰आर॰टी पाठ्यपुस्तक, पेज-72)
Solution: वास्तुकला की 'गोथिक' शैली का उदय बारहवीं शताब्दी में फ्रांस में हुआ था। इस शैली का मुख्य उद्देश्य चर्चों को पहले की तुलना में अधिक ऊँचा और हल्का बनाना था।

गोथिक शैली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • नुकीले मेहराब: इस शैली में ऊँचे और नुकीले मेहराबों का प्रयोग किया जाता था, जो संरचना को ऊँचाई प्रदान करते थे।
  • रंगीन काँच का प्रयोग: खिड़कियों में रंगीन काँच का उपयोग एक महत्वपूर्ण विशेषता थी। इन काँचों पर अक्सर बाइबिल की कहानियों या दृश्यों का चित्रण होता था, जो चर्च के अंदर एक अलौकिक वातावरण बनाते थे।
  • उड़ते हुए पुश्ते (Flying Buttresses): ये बाहरी संरचनाएँ होती थीं जो ऊँचे मेहराबों के भार को सहारा देती थीं और इमारत को स्थिरता प्रदान करती थीं। ये दूर से ही दिखाई देती थीं और गोथिक चर्चों की एक विशिष्ट पहचान थीं।
  • ऊँची मीनारें और बुर्ज: चर्चों में अक्सर ऊँची मीनारें और घंटी वाले बुर्ज बनाए जाते थे, जो दूर से ही आकर्षित करते थे।

पेरिस का नोट्रे डेम कैथेड्रल गोथिक वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसका निर्माण बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी के दौरान कई दशकों में हुआ था।

वास्तुकला का 'अनुप्रस्थ टोडा निर्माण' सिद्धांत 'चापाकार' सिद्धांत से किस तरह भिन्न है?

वास्तुकला का 'अनुप्रस्थ टोडा निर्माण' सिद्धांत 'चापाकार' सिद्धांत से किस तरह भिन्न है?
Solution: वास्तुकला में 'अनुप्रस्थ टोडा निर्माण' और 'चापाकार' सिद्धांत दो अलग-अलग तरीके हैं जिनसे इमारतों में छत, दरवाजे और खिड़कियों का निर्माण किया जाता था।

अनुप्रस्थ टोडा निर्माण (Trabeated construction):

  • यह सातवीं से दसवीं शताब्दी के मध्य प्रचलित एक विधि थी।
  • इसमें इमारतों में अधिक कमरे, दरवाजे और खिड़कियाँ बनाने के लिए दो ऊर्ध्वाधर खंभों (स्तंभों) के ऊपर एक क्षैतिज शहतीर (बीम) रखकर छत, दरवाजे या खिड़की का निर्माण किया जाता था।
  • यह एक सरल और सीधा निर्माण सिद्धांत है।

चापाकार सिद्धांत (Arched construction):

  • यह एक अधिक उन्नत निर्माण विधि है।
  • इसमें दरवाजों और खिड़कियों के ऊपर की अधिरचना (भार) का भार सीधे खंभों पर डालने के बजाय, एक मेहराब (आर्क) के माध्यम से स्थानांतरित किया जाता था।
  • मेहराब एक घुमावदार संरचना होती है जो भार को किनारों पर स्थित आधारों (जैसे खंभे या दीवारें) पर वितरित करती है।
  • यह सिद्धांत बड़ी और अधिक खुली जगह बनाने की अनुमति देता था।

संक्षेप में, अनुप्रस्थ टोडा निर्माण में क्षैतिज बीम का उपयोग होता है, जबकि चापाकार सिद्धांत में घुमावदार मेहराबों का उपयोग किया जाता है।

'शिखर' से आपका क्या तात्पर्य है?

'शिखर' से आपका क्या तात्पर्य है?
Solution: मंदिर के संदर्भ में, 'शिखर' मंदिर के सबसे ऊपरी हिस्से को कहा जाता है। यह वह भाग होता है जो सीधे गर्भगृह (जहाँ मुख्य देवता की मूर्ति स्थापित होती है) के ऊपर स्थित होता है। शिखर मंदिर की वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है और यह अक्सर मंदिर की ऊँचाई और भव्यता को दर्शाता है।

'पितरा-दूरा' क्या है?

'पितरा-दूरा' क्या है?
Solution: 'पितरा-दूरा' एक सजावटी तकनीक है जिसका उपयोग इमारतों, विशेष रूप से महलों और मकबरों को अलंकृत करने के लिए किया जाता था। इस तकनीक में, उत्कीर्णित संगमरमर या बलुआ पत्थर की सतह पर रंगीन और कीमती पत्थरों को दबाकर सुंदर और जटिल नमूने या डिज़ाइन बनाए जाते थे। यह तकनीक इमारतों को एक शानदार और बहुमूल्य रूप प्रदान करती थी।

एक मुगल चारबाग की क्या खास विशेषताएँ हैं?

एक मुगल चारबाग की क्या खास विशेषताएँ हैं?
Solution: मुगल चारबाग एक विशेष प्रकार का फारसी-शैली का बगीचा होता है जिसकी अपनी अनूठी विशेषताएँ होती हैं:
  1. चार समान हिस्सों में विभाजन: चारबाग का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसे चार बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। यह विभाजन अक्सर एक केंद्रीय जल स्रोत या पथ के माध्यम से होता है।
  2. दीवारों से घिरा होना: ये बाग आमतौर पर दीवारों से घिरे होते थे, जो उन्हें बाहरी दुनिया से अलग करते थे और एक निजी, शांत स्थान बनाते थे।
  3. कृत्रिम नहरें: बगीचे के चार हिस्सों को कृत्रिम नहरों या पानी की धाराओं द्वारा विभाजित किया जाता था। ये नहरें न केवल सौंदर्य के लिए होती थीं, बल्कि सिंचाई का कार्य भी करती थीं और बगीचे को एक शांत वातावरण प्रदान करती थीं।
  4. आयताकार अहाता: पूरा बगीचा एक आयताकार क्षेत्र में स्थित होता था, जो व्यवस्था और समरूपता का भाव देता था।
यह शैली मुगल सम्राटों को बहुत प्रिय थी और इसे अक्सर उनके मकबरों और महलों के आसपास बनाया जाता था।

किसी मंदिर से एक राजा की महत्ता की सूचना कैसे मिलती थी?

किसी मंदिर से एक राजा की महत्ता की सूचना कैसे मिलती थी?
Solution: मंदिर निर्माण राजाओं की महत्ता और शक्ति को प्रदर्शित करने का एक प्रमुख माध्यम था। इससे कई तरह से सूचना मिलती थी:
  1. भव्य निर्माण: सबसे बड़े और सबसे अलंकृत मंदिरों का निर्माण स्वयं राजाओं द्वारा करवाया जाता था। उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत के तंजावुर में राजराजेश्वर मंदिर का निर्माण राजा राजदेव ने करवाया था।
  2. देवताओं के नाम से समानता: अक्सर मंदिरों और उनमें स्थापित देवताओं के नाम राजाओं के नामों से मिलते-जुलते होते थे। जैसे, राजा राजदेव ने राजराजेश्वरम मंदिर बनवाया। यह राजा को ईश्वर के समान या ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करता था।
  3. ईश्वरीय प्रतिनिधित्व: राजा स्वयं को ईश्वर के रूप में या ईश्वर का अंश मानकर अपनी प्रजा पर शासन करते थे। मंदिर इस ईश्वरीय संबंध को स्थापित करने का एक मंच था।
  4. शाही शक्ति का प्रतीक: मंदिर में स्थापित अन्य लघु देवता शासक के सहयोगियों और अधीनस्थों के देवता माने जाते थे। इस प्रकार, मंदिर शासक द्वारा शासित विश्व का एक लघु रूप प्रस्तुत करता था, जहाँ राजा सर्वोच्च होता था।
  5. धार्मिक अनुष्ठान: मंदिरों में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान राजा की शक्ति और प्रजा के प्रति उसकी जिम्मेदारी को भी दर्शाते थे।
इस प्रकार, मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं थे, बल्कि राजा की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक शक्ति के प्रतीक भी थे।

दिल्ली में शाहजहाँ के दीवान-ए-खास में एक अभिलेख में कहा गया है-'अगर पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।' यह धारणा कैसे बनी?

दिल्ली में शाहजहाँ के दीवान-ए-खास में एक अभिलेख में कहा गया है-'अगर पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।' यह धारणा कैसे बनी?
Solution: दिल्ली में शाहजहाँ के दीवान-ए-खास में यह प्रसिद्ध अभिलेख उसकी वास्तुकला की उत्कृष्टता और भव्यता के प्रति प्रशंसा को दर्शाता है। यह धारणा कई कारणों से बनी:
  1. शाहजहाँ का व्यक्तिगत लगाव: अपनी प्रिय पत्नी मुमताज महल की मृत्यु (1631 ई.) के बाद, शाहजहाँ का मन आगरा से उचट गया था। उसने अपनी राजधानी को स्थानांतरित करने का निर्णय लिया और 1639 ई. में यमुना नदी के किनारे लाल किला का निर्माण करवाया।
  2. दीवान-ए-खास की वास्तुकला: लाल किले के अंदर स्थित दीवान-ए-खास संगमरमर से बनी एक अत्यंत सुंदर और अलंकृत इमारत है। इसकी दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी, कीमती पत्थरों का जड़ाऊ काम (पितरा-दूरा) और समग्र डिज़ाइन इसे असाधारण रूप से आकर्षक बनाते थे।
  3. स्वर्ग की कल्पना: इस इमारत की सुंदरता और भव्यता इतनी अधिक थी कि इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो पृथ्वी पर ही स्वर्ग उतर आया हो। अभिलेख में 'यहीं है, यहीं है, यहीं है' का दोहराव इस भावना की गहराई को व्यक्त करता है। यह उस समय की वास्तुकला की पराकाष्ठा का प्रतीक था।
  4. शाही प्रतिष्ठा: यह इमारत शाहजहाँ की शाही प्रतिष्ठा और कला के प्रति उसके प्रेम को भी दर्शाती थी।
इस प्रकार, दीवान-ए-खास की अद्भुत वास्तुकला और सौंदर्य ने ही इस धारणा को जन्म दिया कि यह स्थान पृथ्वी पर स्वर्ग के समान है।

मुगल दरबार से इस बात को कैसे संकेत मिलता था कि बादशाह से धनी, निर्धन, शक्तिशाली, कमज़ोर सभी को समान न्याय मिलेगा?

मुगल दरबार से इस बात को कैसे संकेत मिलता था कि बादशाह से धनी, निर्धन, शक्तिशाली, कमज़ोर सभी को समान न्याय मिलेगा?
Solution: मुगल दरबार में कुछ प्रतीकात्मक व्यवस्थाएँ की गई थीं जिनसे यह संकेत मिलता था कि बादशाह सभी के साथ समान न्याय करेगा, चाहे उनकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो:
  1. सिंहासन के पीछे का जड़ाऊ काम: बादशाह के सिंहासन के पीछे, पितरा-दूरा तकनीक का उपयोग करके एक जटिल जड़ाऊ काम किया गया था। इसमें पौराणिक यूनानी देवता आर्फियस को वीणा बजाते हुए चित्रित किया गया था।
  2. आर्फियस का प्रतीकवाद: आर्फियस को एक ऐसे संगीतकार के रूप में जाना जाता था जिसका संगीत इतना मधुर होता था कि वह हिंसक जानवरों को भी शांत कर सकता था और उन्हें एक साथ शांतिपूर्वक रहने के लिए प्रेरित कर सकता था।
  3. न्याय का संदेश: इस चित्रण का उद्देश्य यह संदेश देना था कि जिस प्रकार आर्फियस का संगीत सभी को शांत और सद्भाव में रहने के लिए प्रेरित करता था, उसी प्रकार बादशाह का न्याय भी सभी प्रजाओं - चाहे वे धनी हों या निर्धन, शक्तिशाली हों या कमजोर - को समान रूप से प्रभावित करेगा और समाज में शांति और सद्भाव बनाए रखेगा।
  4. सार्वजनिक सभा भवन का उद्देश्य: शाहजहाँ के सार्वजनिक सभा भवन (जैसे दीवान-ए-आम या दीवान-ए-खास) का निर्माण भी इसी विचार को पुष्ट करता था कि बादशाह सभी प्रकार के लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करेगा।
इस प्रकार, दरबार की सजावट और प्रतीकात्मकता के माध्यम से बादशाह अपनी न्यायप्रियता और सभी के प्रति समान व्यवहार की नीति का प्रदर्शन करता था।

शाहजहाँनाबाद में नए मुगल शहर की योजना में यमुना नदी की क्या भूमिका थी?

शाहजहाँनाबाद में नए मुगल शहर की योजना में यमुना नदी की क्या भूमिका थी?
Solution: शाहजहाँनाबाद, जो कि दिल्ली का नया मुगल शहर था, की योजना में यमुना नदी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। शाहजहाँ ने 1639 ई. में इसी नदी के तट पर इस शहर की नींव रखी थी। नदी की उपस्थिति कई कारणों से शहर के लिए उपयुक्त थी:
  1. जल आपूर्ति: यमुना नदी के तट पर स्थित होने के कारण, शहर को पीने के पानी की निरंतर और आसानी से आपूर्ति सुनिश्चित होती थी। यह किसी भी शहर के लिए एक बुनियादी आवश्यकता है।
  2. समतल भूमि: नदी के किनारे का क्षेत्र अक्सर समतल होता है, जो निर्माण गतिविधियों के लिए उपयुक्त होता है। शाहजहाँनाबाद के निर्माण के लिए यह एक आदर्श स्थान था।
  3. शाही महलों का स्थान: शाहजहाँ ने नए शहर में अपने शाही महलों को नदी के तट पर ही बनवाया था। इससे महलों को नदी का सीधा नज़ारा मिलता था और संभवतः शाही परिवार के लिए जल परिवहन और अन्य सुविधाएँ भी उपलब्ध होती थीं।
  4. सौंदर्य और वातावरण: नदी की उपस्थिति शहर को एक सुंदर और शांत वातावरण प्रदान करती थी, जो शाही निवास के लिए उपयुक्त था।
इस प्रकार, यमुना नदी ने न केवल शाहजहाँनाबाद की व्यावहारिक आवश्यकताओं (जैसे जल आपूर्ति) को पूरा किया, बल्कि शहर की योजना और सौंदर्य में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

Common mistakes

  • वास्तुकला की विभिन्न शैलियों के बीच अंतर करने में कठिनाई।
  • शासकों की नीतियों और वास्तुकला के बीच संबंध को समझने में चूक।
  • मुगल बागवानी शैलियों (जैसे चारबाग) की विशेषताओं को याद रखने में समस्या।

Revision tips

  • प्रत्येक वास्तुकला शैली की मुख्य विशेषताओं को सूचीबद्ध करें।
  • शासकों और उनके द्वारा निर्मित इमारतों के बीच संबंध पर ध्यान केंद्रित करें।
  • चारबाग और शाहजहाँनाबाद जैसे शहरी नियोजन के उदाहरणों को समझें।
  • पितरा-दूरा और गोथिक शैली जैसी सजावटी तकनीकों के बारे में नोट्स बनाएं।

Practice MCQs

Q1. वास्तुकला की किस शैली में नुकीले ऊँचे मेहराब और रंगीन काँच का प्रयोग होता था?

Q2. चारबाग की मुख्य विशेषता क्या है?

Q3. उत्कीर्णित संगमरमर पर रंगीन पत्थरों से बनाए गए सुंदर नमूनों को क्या कहा जाता है?

Q4. शाहजहाँ के दीवान-ए-खास में उत्कीर्ण अभिलेख क्या दर्शाता है?

Q5. महमूद गजनवी और राजेन्द्र प्रथम की नीतियों में मुख्य भिन्नता क्या थी?

Frequently asked questions

कक्षा 7 के 'शासक और इमारतें' अध्याय में किन मुख्य वास्तुकला शैलियों का वर्णन है?

इस अध्याय में अनुप्रस्थ टोडा निर्माण, चापाकार सिद्धांत, गोथिक शैली और मुगल वास्तुकला का वर्णन है।

मंदिरों का निर्माण शासकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण था?

मंदिरों का निर्माण शासकों अपनी शक्ति, धन और ईश्वर के साथ अपने संबंध को प्रदर्शित करने के लिए करवाते थे। वे स्वयं को ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में दिखाना चाहते थे।

चारबाग की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

चारबाग चार समान हिस्सों में बँटे होते थे, दीवार से घिरे होते थे और कृत्रिम नहरों द्वारा चार भागों में विभाजित आयताकार अहाते में स्थित होते थे।

पितरा-दूरा तकनीक क्या है?

पितरा-दूरा उत्कीर्णित संगमरमर या बलुआ पत्थर पर रंगीन, ठोस पत्थरों को दबाकर बनाए गए सुंदर और अलंकृत नमूने होते हैं।

शाहजहाँ के दीवान-ए-खास में उत्कीर्ण अभिलेख का क्या महत्व है?

यह अभिलेख 'अगर पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है' यह दर्शाता है कि शाहजहाँ अपने शहर को स्वर्ग के समान बनाना चाहता था और सभी के लिए समान न्याय का संकेत देता था।

यमुना नदी ने शाहजहाँनाबाद की योजना में क्या भूमिका निभाई?

यमुना नदी ने शाहजहाँनाबाद को पीने के लिए पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की और शहर के नियोजन में एक महत्वपूर्ण भौगोलिक तत्व के रूप में कार्य किया, विशेषकर शाही महलों के लिए।

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