सीबीएसई कक्षा 12 इतिहास: सविनय अवज्ञा और राष्ट्रीय आंदोलन - NCERT समाधान

NCERT Solutions PDF Class 12 PDF

यह पृष्ठ सीबीएसई कक्षा 12 इतिहास के अध्याय 13, 'महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन: सविनय अवज्ञा और उससे आगे' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। इसमें अति लघु और लघु प्रश्नों के उत्तर शामिल हैं, जो छात्रों को राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेताओं, महत्वपूर्ण घटनाओं जैसे रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड, गाँधीजी के आंदोलनों (चंपारण, अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन, असहयोग आंदोलन), चरखे के महत्व, लाहौर अधिवेशन, गाँधी-इर्विन समझौते और द्वितीय विश्व युद्ध के प्रति कांग्रेस के दृष्टिकोण को समझने में मदद करते हैं। ये समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी के लिए एक स्पष्ट और संक्षिप्त समझ प्रदान करते हैं, जिससे वे राष्ट्रीय आंदोलन के विभिन्न पहलुओं का गहन अध्ययन कर सकें।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
Subjectइतिहास
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter13. महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन सविनय अवज्ञा और उससे आगे

Chapter summary

कक्षा 12 इतिहास के अध्याय 13 के लिए ये NCERT समाधान महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन पर केंद्रित हैं, विशेष रूप से सविनय अवज्ञा और उसके बाद के घटनाक्रमों पर। समाधानों में नेताओं की भूमिका, प्रमुख अधिनियमों (जैसे रॉलेट एक्ट), गाँधीजी द्वारा चलाए गए विभिन्न सत्याग्रहों और आंदोलनों, राष्ट्रीय प्रतीकों (जैसे चरखा) के महत्व, कांग्रेस के महत्वपूर्ण अधिवेशनों (जैसे लाहौर अधिवेशन), प्रमुख समझौतों (जैसे गाँधी-इर्विन समझौता) और युद्धकालीन नीतियों पर प्रकाश डाला गया है। यह छात्रों को राष्ट्रीय आंदोलन की जटिलताओं और गाँधीजी के नेतृत्व को समझने में सहायता करता है।

Learning outcomes

  • राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेताओं और उनकी भूमिकाओं को पहचानना।
  • रॉलेट एक्ट जैसे महत्वपूर्ण कानूनों और उनके प्रभाव को समझना।
  • महात्मा गाँधी द्वारा चलाए गए विभिन्न आंदोलनों और सत्याग्रहों का विश्लेषण करना।
  • चरखे जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों के महत्व को स्पष्ट करना।
  • कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन और गाँधी-इर्विन समझौते के महत्व का वर्णन करना।
  • द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नीतियों को समझना।

Topics covered

Paper topics

  • महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन
  • रॉलेट एक्ट
  • जलियांवाला बाग हत्याकांड
  • असहयोग आंदोलन
  • चम्पारण सत्याग्रह
  • अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन
  • चरखे का महत्व
  • कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन
  • पूर्ण स्वराज
  • गाँधी-इर्विन समझौता
  • द्वितीय विश्व युद्ध और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

Important topics

  • सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रारंभ और प्रमुख घटनाएँ
  • गाँधीजी के नेतृत्व में विभिन्न सत्याग्रह और उनके उद्देश्य
  • रॉलेट एक्ट और उसका विरोध
  • लाहौर अधिवेशन और पूर्ण स्वराज की मांग
  • गाँधी-इर्विन समझौते की शर्तें और महत्व
  • राष्ट्रीय आंदोलन में चरखे का प्रतीकात्मक महत्व

PDF preview

Read page by page below. PDF is streamed from the official NCERT website — no download button on this page.

Loading document …
Page of
Loading page …

Questions and Solutions

प्र.1 दो प्रमुख नेताओं के नाम लिखिए जिन्होंने विभिन्न देशों के राष्ट्र निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाई।

दो प्रमुख नेताओं के नाम लिखिए जिन्होंने विभिन्न देशों के राष्ट्र निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाई।
Solution: विभिन्न देशों के राष्ट्र निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाने वाले दो नेता निम्नलिखित हैं:
  1. अमेरिका में जॉर्ज वाशिंगटन: वे अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के सेनापति थे और संयुक्त राज्य अमेरिका के पहले राष्ट्रपति बने, जिन्होंने नवगठित राष्ट्र की नींव रखी।
  2. भारत में महात्मा गाँधी: उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया और अहिंसक सविनय अवज्ञा के माध्यम से भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्ति दिलाने में केंद्रीय भूमिका निभाई।

प्र.2 लाल - बाल - पाल कौन थे ?

लाल - बाल - पाल कौन थे ?
Solution: 'लाल-बाल-पाल' भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक उग्र राष्ट्रवादी नेताओं के एक समूह को संदर्भित करता है। ये तीनों नेता कांग्रेस के भीतर एक अधिक मुखर और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के समर्थक थे।
  • लाल (लाला लाजपत राय): पंजाब के एक प्रमुख राष्ट्रवादी नेता, जो अपने जोशीले भाषणों और ब्रिटिश शासन के प्रति विरोध के लिए जाने जाते थे।
  • बाल (बाल गंगाधर तिलक): महाराष्ट्र के एक प्रभावशाली नेता, जिन्हें 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' के नारे के लिए जाना जाता है।
  • पाल (विपिन चंद्र पाल): बंगाल के एक राष्ट्रवादी नेता, जो गरम दल के प्रमुख सदस्यों में से एक थे और अपने क्रांतिकारी विचारों के लिए प्रसिद्ध थे।
ये नेता अखिल भारतीय स्तर पर राष्ट्रवादी आंदोलन को मजबूत करने और जनता को संगठित करने में महत्वपूर्ण थे।

प्र.3 गाँधीजी द्वारा भारत में किसानों और मजदूरों के लिए चलाए गए दो आंदोलन के नाम लिखिए।

गाँधीजी द्वारा भारत में किसानों और मजदूरों के लिए चलाए गए दो आंदोलन के नाम लिखिए।
Solution: महात्मा गाँधी ने भारत में किसानों और मजदूरों के अधिकारों की रक्षा और उनके कल्याण के लिए कई आंदोलन चलाए। उनमें से दो प्रमुख आंदोलन निम्नलिखित हैं:
  1. चम्पारण सत्याग्रह (1917): यह आंदोलन बिहार के चम्पारण जिले में नील की खेती करने वाले किसानों के शोषण के विरोध में चलाया गया था। गाँधीजी ने किसानों पर अनुचित करों और जबरन नील की खेती के खिलाफ आवाज उठाई।
  2. अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (1918): यह आंदोलन गुजरात के अहमदाबाद में कपड़ा मिलों के मजदूरों के लिए चलाया गया था। गाँधीजी ने मजदूरों के वेतन में वृद्धि और काम करने की बेहतर परिस्थितियों की मांग का समर्थन किया, और उन्होंने हड़ताल के दौरान भूख हड़ताल भी की।
ये आंदोलन गाँधीजी के अहिंसक प्रतिरोध और सत्याग्रह के सिद्धांतों के प्रभावी उपयोग के उदाहरण हैं।

प्र.4 बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में गाँधीजी के भाषण का महत्व बताइए ?

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में गाँधीजी के भाषण का क्या महत्व था ?
Solution: बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के उद्घाटन के अवसर पर 1916 में महात्मा गाँधी द्वारा दिए गए भाषण का अत्यधिक महत्व था। इस भाषण में गाँधीजी ने भारतीय समाज की गहरी समस्याओं पर प्रकाश डाला:
  • गरीबों और मजदूरों की उपेक्षा: गाँधीजी ने भारतीय विशिष्ट वर्ग की आलोचना की कि वे देश के बहुसंख्यक गरीब और मजदूर वर्ग की समस्याओं पर ध्यान नहीं देते हैं। उन्होंने कहा कि देश की वास्तविक प्रगति केवल तभी संभव है जब किसानों और मजदूरों की स्थिति सुधरे।
  • धन और गरीबी के बीच विषमता: उन्होंने समाज में व्याप्त अमीरी और गरीबी के बीच भारी अंतर पर चिंता व्यक्त की और इसे देश की प्रगति के लिए एक बड़ी बाधा बताया।
  • राष्ट्र की मुक्ति का मार्ग: गाँधीजी ने जोर देकर कहा कि देश की सच्ची मुक्ति केवल तभी संभव है जब आम जनता, विशेषकर किसान और मजदूर, सशक्त हों और उनकी समस्याओं का समाधान हो।
यह भाषण गाँधीजी के सामाजिक न्याय और समतावादी समाज के दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो उनके बाद के आंदोलनों का आधार बना।

प्र.5 रौलॅट एक्ट क्या है।

रौलॅट एक्ट क्या है?
Solution: रौलॅट एक्ट, जिसे 1919 में ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित किया गया था, एक विवादास्पद कानून था जिसका उद्देश्य भारत में स्वतंत्रता संग्राम को कमजोर करना था। इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं:
  • बिना वारंट के गिरफ्तारी: यह कानून किसी भी व्यक्ति को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार करने और बिना मुकदमे के अनिश्चित काल के लिए जेल में रखने की शक्ति देता था।
  • सीमित अधिकार: इसने प्रेस की स्वतंत्रता को भी प्रतिबंधित किया और राजनीतिक गतिविधियों पर अंकुश लगाया।
  • न्यायिक प्रक्रिया में बदलाव: इसने सामान्य न्यायिक प्रक्रियाओं को दरकिनार कर दिया, जिससे अभियुक्तों के लिए बचाव के अवसर सीमित हो गए।
इस कानून को 'बिना अपील, बिना वकील, बिना दलील' वाला कानून कहा गया और इसने पूरे भारत में व्यापक विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया, जो बाद में असहयोग आंदोलन का एक प्रमुख कारण बना।

प्र.6 चरखा को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में क्यों चुना गया था ।

चरखा को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में क्यों चुना गया था?
Solution: चरखे को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान एक शक्तिशाली राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में चुना गया था, जिसके कई महत्वपूर्ण कारण थे:
  • स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता का प्रतीक: चरखा भारतीय गांवों के लिए आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक था। यह दर्शाता था कि भारतीय अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए बाहरी सहायता पर निर्भर नहीं रह सकते।
  • आर्थिक सशक्तिकरण: चरखे ने हजारों बेरोजगार गरीबों, विशेषकर महिलाओं को पूरक आय अर्जित करने का एक साधन प्रदान किया। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और गरीबी को कम करने का एक तरीका था।
  • स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक: चरखा स्वदेशी आंदोलन का एक केंद्रीय तत्व बन गया, जो ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं के बहिष्कार और भारतीय निर्मित उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देता था।
  • गाँधीवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व: महात्मा गाँधी ने चरखे को शारीरिक श्रम के सम्मान और सादगीपूर्ण जीवन जीने के प्रतीक के रूप में बढ़ावा दिया।
इस प्रकार, चरखा केवल एक उपकरण नहीं था, बल्कि यह राष्ट्रीय गौरव, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण का एक शक्तिशाली प्रतीक बन गया।

प्र.7 भारत के राष्ट्रीय आदोंलन में कांग्रेस की लाहौर अधिवेशन का क्या महत्व था।

भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन का क्या महत्व था?
Solution: 1929 में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ था। इस अधिवेशन के मुख्य महत्व निम्नलिखित थे:
  • पूर्ण स्वराज का लक्ष्य: कांग्रेस ने इस अधिवेशन में अपने मुख्य लक्ष्य के रूप में 'स्वराज' के स्थान पर 'पूर्ण स्वराज' (पूर्ण स्वतंत्रता) को घोषित किया। इसने ब्रिटिश शासन से पूर्ण मुक्ति की मांग को और अधिक स्पष्ट कर दिया।
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन की तैयारी: पूर्ण स्वराज की घोषणा के साथ ही, कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाने के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया।
  • स्वतंत्रता दिवस का संकल्प: यह तय किया गया कि 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में 'स्वतंत्रता दिवस' के रूप में मनाया जाएगा, जो भविष्य में भारत के गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
  • जवाहरलाल नेहरू का अध्यक्षीय भाषण: पंडित जवाहरलाल नेहरू, जो इस अधिवेशन के अध्यक्ष थे, ने अपने भाषण में समाजवादी विचारों और पूर्ण स्वतंत्रता की आवश्यकता पर जोर दिया।
लाहौर अधिवेशन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी और इसे एक निर्णायक चरण में पहुँचाया।

प्र.8 1931 के गाँधी-इर्विन समझौते का उल्लेख कीजिए ?

1931 के गाँधी-इर्विन समझौते का उल्लेख कीजिए?
Solution: 1931 का गाँधी-इर्विन समझौता भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में एक महत्वपूर्ण घटना थी, जो महात्मा गाँधी और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इर्विन के बीच हुई थी। इस समझौते के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन का स्थगन: गाँधीजी ने ब्रिटिश सरकार के साथ बातचीत के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने पर सहमति व्यक्त की।
  • कैदियों की रिहाई: लॉर्ड इर्विन ने आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किए गए सभी अहिंसक राजनीतिक कैदियों को रिहा करने का वादा किया।
  • नमक बनाने की छूट: भारतीयों को समुद्र तटों पर बिना कर दिए नमक बनाने और बेचने की अनुमति दी गई, जो सविनय अवज्ञा आंदोलन का एक प्रमुख मुद्दा था।
  • दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भागीदारी: गाँधीजी ने लंदन में होने वाले दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने पर सहमति व्यक्त की।
यह समझौता आंदोलन को कुछ समय के लिए रोकने और राजनीतिक समाधान खोजने का एक प्रयास था, हालांकि इसके परिणाम मिश्रित रहे।

प्र.9 द्वितीय विश्व युद्ध के प्रति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दृष्टिकोण क्या था ।

द्वितीय विश्व युद्ध के प्रति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दृष्टिकोण क्या था?
Solution: द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के प्रति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दृष्टिकोण जटिल और सशर्त था। गाँधीजी और कांग्रेस के अन्य प्रमुख नेता, जैसे जवाहरलाल नेहरू, नाजी जर्मनी और एडॉल्फ हिटलर के कट्टर विरोधी थे। उनका मानना था कि फासीवाद और लोकतंत्र के बीच युद्ध में लोकतंत्र का पक्ष लेना नैतिक रूप से सही है।

कांग्रेस का रुख इस प्रकार था:

  • अहिंसा का सिद्धांत: गाँधीजी व्यक्तिगत रूप से युद्ध के विरोधी थे और अहिंसा के अपने सिद्धांत पर कायम थे।
  • सशर्त समर्थन: हालाँकि, कांग्रेस ने यह भी तय किया कि यदि ब्रिटिश सरकार युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को स्वतंत्रता देने का वादा करती है, तो कांग्रेस युद्ध प्रयासों में सहायता कर सकती है।
  • ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया: ब्रिटिश सरकार ने स्वतंत्रता देने का कोई ठोस वादा नहीं किया, जिसके कारण कांग्रेस ने युद्ध में सीधे तौर पर भाग लेने से इनकार कर दिया। इसके बजाय, उन्होंने व्यक्तिगत सत्याग्रह जैसे विरोध प्रदर्शनों का सहारा लिया।
यह स्थिति भारत के लिए स्वतंत्रता प्राप्त करने के उद्देश्य से एक रणनीतिक कदम था, लेकिन इसने ब्रिटिश सरकार के साथ तनाव को भी बढ़ाया।

प्र.10 किन कारणों से गाँधीजी ने अंसयोग आदोलन को चलाया यह आदोलन क्यों स्थगित करना पड़ा ।

किन कारणों से गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन चलाया और यह आंदोलन क्यों स्थगित करना पड़ा?
Solution: महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन (1920-22) कई गंभीर कारणों से चलाया था, और बाद में इसे स्थगित करना पड़ा। असहयोग आंदोलन चलाने के कारण:
  1. रॉलेट कानून का विरोध: 1919 में पारित रॉलेट एक्ट, जिसने बिना किसी मुकदमे के गिरफ्तारी की अनुमति दी, ने भारतीयों के बीच भारी आक्रोश पैदा किया। गाँधीजी ने इस दमनकारी कानून का विरोध करने के लिए आंदोलन का आह्वान किया।
  2. जलियांवाला बाग हत्याकांड का अन्याय: 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में निहत्थे भारतीयों पर ब्रिटिश सेना द्वारा की गई गोलीबारी, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए, ने राष्ट्रव्यापी सदमा और रोष पैदा किया। गाँधीजी ने इस बर्बरता का बदला लेने और न्याय की मांग के लिए आंदोलन शुरू किया।
  3. खिलाफत आंदोलन को समर्थन: तुर्की के खलीफा के प्रति ब्रिटिश सरकार की नीतियों के विरोध में चल रहे खिलाफत आंदोलन को समर्थन देना भी असहयोग आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। गाँधीजी ने हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने के लिए इस आंदोलन का समर्थन किया।
  4. स्वराज की मांग: गाँधीजी का मानना था कि ब्रिटिश सरकार भारतीयों को स्वशासन देने में विफल रही है, और असहयोग आंदोलन के माध्यम से वे ब्रिटिश शासन को पंगु बनाकर स्वराज प्राप्त करना चाहते थे।
आंदोलन स्थगित करने का कारण:

असहयोग आंदोलन को फरवरी 1922 में गाँधीजी द्वारा अचानक स्थगित कर दिया गया था। इसका मुख्य कारण उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक स्थान पर हुई एक हिंसक घटना थी। 4 फरवरी 1922 को, प्रदर्शनकारियों की एक भीड़ ने एक पुलिस स्टेशन में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। इस हिंसक घटना से गाँधीजी बहुत दुखी हुए, क्योंकि उनका आंदोलन पूरी तरह से अहिंसक सिद्धांतों पर आधारित था। उन्होंने महसूस किया कि जनता अभी तक अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है, और इसलिए उन्होंने आंदोलन को स्थगित करने का निर्णय लिया ताकि हिंसा को फैलने से रोका जा सके।

Common mistakes

  • नेताओं के नामों और उनके योगदानों को गलत मिलाना।
  • आंदोलनों के कारणों और परिणामों को स्पष्ट रूप से न समझना।
  • ऐतिहासिक घटनाओं के क्रम और उनके महत्व को लेकर भ्रमित होना।
  • गाँधी-इर्विन समझौते की शर्तों को ठीक से याद न रखना।

Revision tips

  • प्रत्येक आंदोलन के पीछे के मुख्य कारणों और गाँधीजी की भूमिका पर ध्यान केंद्रित करें।
  • रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड और गाँधी-इर्विन समझौते जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं की समय-सीमा को समझें।
  • चरखे जैसे प्रतीकों के प्रतीकात्मक अर्थ और राष्ट्रीय आंदोलन में उनके महत्व को याद रखें।
  • अति लघु और लघु प्रश्नों के उत्तरों को संक्षिप्त और सटीक रखने का अभ्यास करें।

Practice MCQs

Q1. गाँधीजी ने चम्पारण सत्याग्रह किस वर्ष चलाया था और यह किसके लिए था?

Q2. रॉलेट एक्ट का मुख्य प्रावधान क्या था?

Q3. कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (1929) का मुख्य उद्देश्य क्या था?

Q4. चरखे को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में क्यों चुना गया?

Q5. गाँधी-इर्विन समझौते में क्या शामिल था?

Frequently asked questions

यह NCERT समाधान किस कक्षा और विषय के लिए है?

यह NCERT समाधान सीबीएसई कक्षा 12 के इतिहास विषय के लिए है, जो अध्याय 13 'महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन: सविनय अवज्ञा और उससे आगे' पर केंद्रित है।

समाधानों में किन प्रमुख आंदोलनों को शामिल किया गया है?

समाधानों में चम्पारण सत्याग्रह, अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन, असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसे प्रमुख आंदोलनों को शामिल किया गया है।

रॉलेट एक्ट क्या था और इसका क्या प्रभाव पड़ा?

रॉलेट एक्ट एक ऐसा कानून था जो ब्रिटिश सरकार को बिना किसी जांच के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और जेल में डालने की शक्ति देता था। इसने राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने का प्रयास किया और इसके विरोध में व्यापक प्रदर्शन हुए।

गाँधी-इर्विन समझौते का क्या महत्व था?

गाँधी-इर्विन समझौते ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने और गाँधीजी के दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने का मार्ग प्रशस्त किया। इसने कुछ अहिंसक कैदियों की रिहाई और नमक बनाने की छूट जैसे प्रावधान भी शामिल किए।

यह समाधान परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करेंगे?

ये समाधान राष्ट्रीय आंदोलन के महत्वपूर्ण पहलुओं, नेताओं, घटनाओं और समझौतों की स्पष्ट और संक्षिप्त जानकारी प्रदान करते हैं, जिससे छात्रों को परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण विषयों को समझने और याद रखने में मदद मिलती है।

Content reviewed by the NCERT Help team. Editorial Team and update policy

NCERT Solutions PDF PDF on NCERT Help. URL unchanged for search indexing.