कक्षा 10 मनिका अध्याय 9 राष्ट्रं संरक्षयमेव हि NCERT समाधान
यह पृष्ठ कक्षा 10 मनिका के अध्याय 9, 'राष्ट्रं संरक्षयमेव हि' (निश्चय से राष्ट्र की रक्षा करनी चाहिए) के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। यह अध्याय महाभारत की पृष्ठभूमि पर आधारित है और युद्ध के विनाशकारी परिणामों पर प्रकाश डालता है। समाधानों में प्रश्न निर्माण, विपरीतार्थक शब्दों का मिलान, पाठ के संवादों का विश्लेषण, महत्वपूर्ण शब्दार्थ, समास और संधि-विच्छेद का स्पष्टीकरण शामिल है। यह छात्रों को पाठ की गहरी समझ विकसित करने, व्याकरणिक संरचनाओं को पहचानने और संस्कृत भाषा में अपनी दक्षता बढ़ाने में मदद करता है। ये समाधान परीक्षा की तैयारी के लिए एक मूल्यवान संसाधन हैं, जो छात्रों को पाठ्य सामग्री को प्रभावी ढंग से समझने और याद रखने में सहायता करते हैं।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 10 |
| Subject | Manika |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | Chapter 9 राट्रं संरषयमेव ही |
Chapter summary
कक्षा 10 मनिका के अध्याय 9, 'राष्ट्रं संरक्षयमेव हि' के NCERT समाधान, महाभारत के एक अंश पर केंद्रित हैं। यह समाधान छात्रों को युद्ध के विनाशकारी परिणामों, विशेष रूप से द्रौपदी के पुत्रों की मृत्यु के बाद के शोक और क्रोध को समझने में मदद करते हैं। इसमें प्रश्न निर्माण, विपरीतार्थक शब्दों का मिलान, महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दों के अर्थ (हिंदी और अंग्रेजी में), विभिन्न प्रकार के समास और संधि-विच्छेद के उदाहरण शामिल हैं। यह अध्याय छात्रों को राष्ट्र की रक्षा के महत्व और युद्ध की निरर्थकता पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
Learning outcomes
- महाभारत के प्रसंग के माध्यम से राष्ट्र की रक्षा के महत्व को समझना।
- संस्कृत पाठ में प्रयुक्त महत्वपूर्ण शब्दार्थों की पहचान करना और उनका अर्थ समझना।
- दिए गए वाक्यों के लिए उपयुक्त प्रश्न निर्माण का अभ्यास करना।
- विपरीतार्थक शब्दों का सही मिलान करना सीखना।
- संस्कृत व्याकरण में समास और संधि-विच्छेद के नियमों को लागू करना।
- युद्ध के विनाशकारी परिणामों और शोक की भावनाओं का विश्लेषण करना।
Topics covered
Paper topics
- राष्ट्र की रक्षा का महत्व
- महाभारत का प्रसंग
- युद्ध के परिणाम
- शोक और क्रोध की भावनाएं
- प्रश्न निर्माण
- विपरीतार्थक शब्द
- संस्कृत शब्दार्थ
- समास (तत्पुरुष, बहुव्रीहि, कर्मधारय)
- संधि-विच्छेद (वृद्धि, विसर्ग, परसवर्ण, जश्)
- क्षत्रिय धर्म
- वीरगति
- पात्रों का संवाद विश्लेषण
Important topics
- राष्ट्र की रक्षा का महत्व
- समास
- संधि-विच्छेद
- संस्कृत शब्दार्थ
- प्रश्न निर्माण
- युद्ध के विनाशकारी परिणाम
- पात्रों का संवाद विश्लेषण
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Questions and Solutions
प्रश्न निर्माणम्
दिए गए वाक्यों के लिए प्रश्न निर्माण करें:
(i) अयं संसार: विचित्रो वर्तते।
(ii) अयं पाठ: महाभारते आधारित: वर्तते।
(iii) प्राचीने काले आणविकास्त्राणां मानवेषु प्रयोग: निषिद्ध: आसीत्।
(iv) विज्ञानस्य तु दुरुपयोगः अभिशापः एव।
(v) पुरा अपि एतादृशानि अस्त्राणि आसन्।
दिए गए वाक्यों के लिए उपयुक्त प्रश्न इस प्रकार हैं:
प्रश्न: कीदृश: संसार: वर्तते?
उत्तर: अयं संसार: विचित्रो वर्तते।
प्रश्न: अयं पाठ: किस्मन् आधारित: वर्तते?
उत्तर: अयं पाठ: महाभारते आधारित: वर्तते।
प्रश्न: प्राचीने काले आणविकास्त्राणां मानवेषु प्रयोग: कदा निषिद्ध: आसीत्?
उत्तर: प्राचीने काले आणविकास्त्राणां मानवेषु प्रयोग: निषिद्ध: आसीत्।
प्रश्न: विज्ञानस्य तु दुरुपयोगः कस्य एव?
उत्तर: विज्ञानस्य तु दुरुपयोगः अभिशापः एव।
प्रश्न: पुरा अपि कानि आसन्?
उत्तर: पुरा अपि एतादृशानि अस्त्राणि आसन्।
विपर्यय मेलनं कुरुत
निम्नलिखित शब्दों का उनके विपरीतार्थक शब्दों से मिलान करें:
(क) शब्दाः
- (1) अहिंसाया:
- (2) सत्प्रयोगः
- (3) विनाशाय
- (4) प्रत्यक्षम्
- (5) अभिशापः
- (6) निर्माणम्
- (7) सायम्
(ख) विपर्ययाः
- (i) विनाशम्
- (ii) वरदानम्
- (iii) हिंसाया:
- (iv) सायम्
- (v) कल्याणाय
- (vi) दुरुपयोगः
- (vii) परोक्षम्
- (viii) प्रात:
दिए गए शब्दों का उनके सही विपरीतार्थक शब्दों से मिलान इस प्रकार है:
- (1) अहिंसाया: - (iii) हिंसाया:
- (2) सत्प्रयोगः - (vi) दुरुपयोगः
- (3) विनाशाय - (v) कल्याणाय
- (4) प्रत्यक्षम् - (vii) परोक्षम्
- (5) अभिशापः - (ii) वरदानम्
- (6) निर्माणम् - (i) विनाशम्
- (7) सायम् - (viii) प्रात:
स्पष्टीकरण:
- अहिंसा का विपरीत हिंसा होता है।
- सत्प्रयोग (अच्छा उपयोग) का विपरीत दुरुपयोग (बुरा उपयोग) होता है।
- विनाश (नष्ट करना) का विपरीत कल्याण (भलाई) होता है।
- प्रत्यक्ष (सामने) का विपरीत परोक्ष (पीछे या अप्रत्यक्ष) होता है।
- अभिशाप (श्राप) का विपरीत वरदान होता है।
- निर्माण (बनाना) का विपरीत विनाश (नष्ट करना) होता है।
- सायम् (शाम) का विपरीत प्रात: (सुबह) होता है।
राष्ट्रं संरक्ष्यमेव हि (पाठ का अंश)
निम्नलिखित संवाद का अध्ययन करें और उसके अर्थ को समझें:
(1) (ततः पुत्रशोकसन्तप्ताः युधिष्ठिरः भीमः द्रौपदी च रणभूमौ प्रविशन्ति।)
द्रौपदी: (दीर्घं नि:श्वस्य) हा हन्त। किम् इदं घोरम् आपतितम्। पापकर्मणा द्रौणिना मे पुत्रा: भ्रातर: च हता:। अग्नि: इव दहति माम् अयं शोक:।
युधिष्ठिर: शुभे! धैर्यं धारय। नूनं तव पुत्राः वीरगतिम् एव प्राप्ताः। वीरजननी त्वं शोचितुं न अर्हसि।
द्रौपदी: कथं मन्दभाग्या अहं धैर्यं धारयामि। यावत् असौ क्रूरकर्मा न दण्ड्यते, तावत् अहम् इतः न गमिष्यामि, अत्रैव प्राणत्यागं च करिष्यामि।
युधिष्ठिर: प्रिये! मा एवं ब्रूयाः स पापकर्मा कुत्र गतः, इति न जानीमः। अतिदूरं किञ्चिद् दुर्गमवनं प्रविष्टः भवेत्।
(भीमं प्रति) आर्यपुत्र! क्षत्रधर्मम् अनुस्मरन् मां शोकसागरात् रक्ष। अस्मिन् संसारे कश्चित् अपि त्वया सदृश: पराक्रमी नास्ति। पुरा वारणावते त्वमेव पाण्डवान् रक्षितवान्। विराट-नगरे अपि त्वं मां प्राणसंकटात् उद्धृतवान्।
यह अंश महाभारत के युद्ध के बाद का है, जहाँ पुत्रों की मृत्यु से दुखी द्रौपदी और युधिष्ठिर रणभूमि में हैं।
संवाद का विश्लेषण:
- द्रौपदी का शोक: द्रौपदी अपने पुत्रों और भाइयों की मृत्यु पर गहरा शोक व्यक्त करती है। वह द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) को पापी और क्रूरकर्मा बताती है और कहती है कि उसका शोक उसे आग की तरह जला रहा है।
- युधिष्ठिर का आश्वासन: युधिष्ठिर द्रौपदी को धैर्य धारण करने के लिए कहते हैं। वे उसे समझाते हैं कि उसके पुत्र वीरगति को प्राप्त हुए हैं और एक वीर की माता होने के नाते उसे शोक नहीं करना चाहिए।
- द्रौपदी की प्रतिज्ञा: द्रौपदी अपने दुर्भाग्य पर खेद व्यक्त करती है और प्रतिज्ञा करती है कि जब तक क्रूरकर्मा द्रोणपुत्र को दण्ड नहीं मिलता, वह यहाँ से नहीं जाएगी और प्राण त्याग देगी।
- युधिष्ठिर की अनभिज्ञता और भीम से आग्रह: युधिष्ठिर बताते हैं कि वे नहीं जानते कि वह पापी कहाँ गया है, संभवतः किसी दूर के दुर्गम वन में चला गया होगा। फिर वे भीम से क्षत्रिय धर्म का स्मरण कराते हुए उसे शोक से बचाने का आग्रह करते हैं।
- भीम की वीरता का स्मरण: द्रौपदी भीम के पराक्रम की याद दिलाती है, जैसे उसने वारणावत में पांडवों की और विराट-नगर में स्वयं उसकी रक्षा की थी। वह भीम से आशा करती है कि वह उसे इस शोक सागर से निकालेगा।
यह संवाद युद्ध के बाद की त्रासदी, व्यक्तिगत दुख, न्याय की मांग और पारिवारिक संबंधों की गहराई को दर्शाता है।
शब्दार्थाः
दिए गए संस्कृत शब्दों के अर्थ हिंदी और अंग्रेजी में लिखें:
दौणिना - द्रोणपुत्रेण, द्रोण के पुत्र द्वारा (By Drona's son Ashwatthama)।
इतः - अत्रत्य:, यहाँ से (From here)।
पराक्रमी - वीर:, ताकतवर (Brave)।
उद्धृतवान् - रक्षितवान्, बचाया (Saved)।
दिए गए संस्कृत शब्दों के अर्थ निम्नलिखित हैं:
- दौणिना - द्रोणपुत्रेण, द्रोण के पुत्र द्वारा (By Drona's son Ashwatthama)।
- इतः - अत्रत्य:, यहाँ से (From here)।
- पराक्रमी - वीर:, ताकतवर (Brave)।
- उद्धृतवान् - रक्षितवान्, बचाया (Saved)।
अतिरिक्त शब्दार्थ (पाठ से):
- पुत्रशोकसन्तप्ताः - पुत्रों के शोक से व्याकुल (Distressed by the grief of sons)।
- हा हन्त - अरे! खेद है! (Alas! What a pity!)।
- घोरम् - भयंकर, भयानक (Terrible, dreadful)।
- आपतितम् - घटित हुआ, आ पड़ा (Happened, befallen)।
- पापकर्मणा - पापी कर्म वाले (By the doer of sinful deeds)।
- हताः - मारे गए (Killed)।
- दहति - जलाता है (Burns)।
- शोकः - दुःख, ग़म (Grief, sorrow)।
- शुभ - कल्याणी, हे शुभे (O auspicious one, O good lady)।
- धैर्यं धारय - धैर्य धारण करो (Hold courage)।
- नूनं - निश्चय ही, अवश्य (Certainly, surely)।
- वीरगतिम् - वीरों की मृत्यु (Death in battle, heroic death)।
- प्राप्ताः - प्राप्त हुए (Attained)।
- वीरजननी - वीरों की माँ (Mother of heroes)।
- शोचितुं न अर्हसि - शोक करने योग्य नहीं हो (You are not fit to grieve)।
- मन्दभाग्या - दुर्भाग्यशाली (Unfortunate)।
- कथं - कैसे (How)।
- यावत् - जब तक (Until)।
- असौ - वह (That)।
- क्रूरकर्मा - क्रूर कर्म करने वाला (One who performs cruel deeds)।
- दण्ड्यते - दण्डित किया जाता है (Is punished)।
- तावत् - तब तक (Until then)।
- अत्रैव - यहीं पर (Right here)।
- प्राणत्यागं - प्राणों का त्याग (Giving up life)।
- करिष्यामि - करूँगी (I will do)।
- प्रिये - प्रिय (O dear)।
- मा एवं ब्रूयाः - ऐसा मत कहो (Do not say so)।
- कुत्र - कहाँ (Where)।
- गतः - गया (Gone)।
- अतिदूरं - बहुत दूर (Very far)।
- किञ्चिद् - कोई (Some)।
- दुर्गमवनं - दुर्गम वन (Inaccessible forest)।
- प्रविष्टः भवेत् - प्रवेश कर गया होगा (Might have entered)।
- आर्यपुत्र - आर्यपुत्र (My lord, husband)।
- क्षत्रधर्मम् - क्षत्रिय धर्म (Duty of a Kshatriya)।
- अनुस्मरन् - स्मरण करते हुए (Remembering)।
- शोकसागरात् - शोक के सागर से (From the ocean of grief)।
- रक्ष - रक्षा करो (Protect)।
- संसारे - संसार में (In the world)।
- कश्चित् अपि - कोई भी (Anyone at all)।
- सदृशः - समान (Like)।
- नास्ति - नहीं है (Is not)।
- पुरा - पहले (Formerly)।
- वारणावते - वारणावत में (In Varnavata)।
- त्वमेव - तुम ही (You yourself)।
- पाण्डवान् - पांडवों को (The Pandavas)।
- रक्षितवान् - रक्षा की (Protected)।
- विराटनगरे - विराट नगर में (In Virat Nagar)।
- अपि - भी (Also)।
- त्वं - तुम (You)।
- मां - मुझे (Me)।
- प्राणसंकटात् - प्राणों के संकट से (From the danger to life)।
- उद्धृतवान् - बचाया (Saved)।
समासाः
दिए गए सामासिक पदों का विग्रह करें और समास का नाम बताएं:
पुत्रशोकसंतप्ताः
वीरगतिम्
वीरजननी
क्रूरकर्मा
क्षत्रधर्मम्
शोकसागरात्
मन्दभाग्या
दिए गए सामासिक पदों का विग्रह और समास का नाम इस प्रकार है:
- पुत्रशोकसंतप्ताः - पुत्राणाम् शोकः (षष्ठी तत्पुरुषः) तेन संतप्ताः (तृतीया तत्पुरुषः)।
- वीरगतिम् - वीराणाम् गतिम् (षष्ठी तत्पुरुषः)।
- वीरजननी - वीराणाम् जननी (षष्ठी तत्पुरुषः)।
- क्रूरकर्मा - क्रूरं कर्म यस्य सः (बहुव्रीहिः)। (यहाँ 'क्रूर कर्म वाला' अर्थ में बहुव्रीहि है, यदि 'क्रूर कर्म' अर्थ हो तो कर्मधारय भी संभव है, पर संदर्भ बहुव्रीहि का है)।
- क्षत्रधर्मम् - क्षत्राणाम् धर्मम् (षष्ठी तत्पुरुषः)।
- शोकसागरात् - शोक: सागर: इव (कर्मधारयः)। (शोक रूपी सागर से)।
- मन्दभाग्या - मन्दः भाग्यः यस्याः सा (बहुव्रीहिः)। (जिसका भाग्य मंद हो)।
स्पष्टीकरण:
- तत्पुरुष समास: जहाँ उत्तर पद प्रधान होता है और पूर्व पद का कारक चिह्न (विभक्ति) लुप्त हो जाता है। षष्ठी तत्पुरुष में 'का/के/की' और तृतीया तत्पुरुष में 'से/द्वारा' का लोप होता है।
- बहुव्रीहि समास: जहाँ समस्त पद किसी अन्य संज्ञा या सर्वनाम के विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है और उसका अर्थ प्रधान होता है।
- कर्मधारय समास: जहाँ विशेषण-विशेष्य या उपमेय-उपमान का संबंध हो।
सन्धि-विच्छेदः
दिए गए शब्दों का संधि-विच्छेद करें और संधि का नाम बताएं:
अत्रैव
कश्चित्
किञ्चिद्
उद्धृतवान्
दिए गए शब्दों का संधि-विच्छेद और संधि का नाम इस प्रकार है:
- अत्रैव - अत्र + एव (वृद्धिसन्धिः)। यहाँ 'अ' और 'ऐ' मिलकर 'ऐ' बनाते हैं।
- कश्चित् - कः + चित् (विसर्गसन्धिः)। यहाँ 'ः' का 'श्' हो जाता है।
- किञ्चिद् - किम् + चित् (परसवर्ण सन्धिः)। यहाँ 'म्' का 'ं' (अनुस्वार) और उसके बाद आने वाले वर्ण (च) के अनुसार 'ञ्' हो जाता है।
- उद्धृतवान् - उत् + धृतवान् (जश् सन्धिः)। यहाँ 'त्' के बाद 'ध्' आने पर 'त्' का 'द्' हो जाता है (यह व्यंजन संधि का एक रूप है, जिसे जश्त्व भी कहते हैं)।
स्पष्टीकरण:
- वृद्धिसन्धिः: अ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औ।
- विसर्गसन्धिः: विसर्ग के स्थान पर श, ष, स या 'र' या 'लोप' हो जाता है, जो बाद वाले वर्ण पर निर्भर करता है।
- परसवर्ण सन्धिः: अनुस्वार (म्) के बाद यदि कोई व्यंजन आए, तो अनुस्वार उसी व्यंजन के पंचम वर्ण (परसवर्ण) में बदल जाता है।
- जश् सन्धिः: वर्गों के पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे वर्ण के बाद यदि कोई स्वर या तीसरा, चौथा वर्ण आए तो पहले, दूसरे, तीसरे वर्ण के स्थान पर उसी वर्ग का तीसरा वर्ण हो जाता है। (यहाँ 'त्' के बाद 'ध्' है, जो 'द्' का महाप्राण रूप है, इसलिए 'त्' का 'द्' हुआ)।
Common mistakes
- विपरीतार्थक शब्दों का गलत मिलान करना।
- समास और संधि-विच्छेद के नियमों को समझने में कठिनाई।
- संस्कृत शब्दों के अर्थ को ठीक से न समझ पाना।
- प्रश्न निर्माण करते समय क्रिया और कर्ता का सही चयन न कर पाना।
Revision tips
- पाठ के संवादों को ध्यान से पढ़ें और पात्रों की भावनाओं को समझने का प्रयास करें।
- शब्दार्थों की सूची बनाएं और उन्हें याद करें, विशेषकर उन शब्दों पर ध्यान दें जो पाठ में बार-बार आए हैं।
- समास और संधि-विच्छेद के नियमों का अभ्यास करें, पाठ से उदाहरण लेकर उन्हें हल करें।
- प्रश्न निर्माण वाले भाग को हल करने के बाद, अपने उत्तरों की तुलना दिए गए उत्तरों से करें और अंतर समझें।
Practice MCQs
Q1. द्रौपदी के पुत्र किस कारण मारे गए?
Explanation: द्रौपदी अपने पुत्रों की मृत्यु का कारण द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) को बताती है, जिससे वह क्रोधित है।
Q2. युधिष्ठिर द्रौपदी को क्या धारण करने के लिए कहते हैं?
Explanation: युधिष्ठिर द्रौपदी के अत्यधिक शोक को देखकर उसे धैर्य धारण करने के लिए कहते हैं।
Q3. द्रौपदी कहाँ प्राणत्याग करने की बात करती है?
Explanation: द्रौपदी रणभूमि में ही प्राणत्याग करने की बात करती है जब तक कि द्रोणपुत्र को दण्डित नहीं किया जाता।
Q4. भीम को द्रौपदी किस लिए याद दिलाती है?
Explanation: द्रौपदी भीम के पराक्रम का स्मरण कराती है और उसे शोकसागर से बचाने का आग्रह करती है, जैसे उसने पहले भी बचाया था।
Q5. 'अत्रैव' शब्द में कौन सी संधि है?
Explanation: 'अत्रैव' का संधि-विच्छेद 'अत्र + एव' है, जिसमें 'अ' और 'ऐ' मिलकर 'ऐ' बनाते हैं, जो वृद्धि संधि का उदाहरण है।
Frequently asked questions
यह NCERT समाधान किस कक्षा और विषय के लिए हैं?
यह NCERT समाधान कक्षा 10 की मनिका (संस्कृत) पुस्तक के अध्याय 9 'राष्ट्रं संरक्षयमेव हि' के लिए हैं।
इस अध्याय के समाधान में मुख्य रूप से क्या शामिल है?
इस अध्याय के समाधान में प्रश्न निर्माण, विपरीतार्थक शब्दों का मिलान, महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दों के अर्थ, समास और संधि-विच्छेद का विस्तृत विश्लेषण शामिल है।
क्या ये समाधान परीक्षा की तैयारी में मदद करेंगे?
हाँ, ये समाधान पाठ की गहरी समझ प्रदान करते हैं और व्याकरणिक अभ्यासों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जो परीक्षा की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
समास और संधि-विच्छेद के कौन से प्रकार इस अध्याय में समझाए गए हैं?
इस अध्याय में षष्ठी तत्पुरुष, तृतीया तत्पुरुष, बहुव्रीहि, कर्मधारय समास और वृद्धि संधि, विसर्ग संधि, परसवर्ण संधि, जश् संधि का विश्लेषण किया गया है।
द्रौपदी के संवाद का मुख्य भाव क्या है?
द्रौपदी का संवाद अपने पुत्रों की मृत्यु पर गहरा शोक, क्रोध और प्रतिशोध की भावना को व्यक्त करता है, साथ ही वह भीम से न्याय की अपेक्षा करती है।
राष्ट्र की रक्षा का क्या महत्व इस पाठ से पता चलता है?
पाठ अप्रत्यक्ष रूप से यह बताता है कि राष्ट्र की रक्षा सर्वोपरि है, लेकिन युद्ध के विनाशकारी परिणाम व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर गहरा दुख लाते हैं, इसलिए रक्षा के साथ-साथ शांति और न्याय भी आवश्यक है।
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