कक्षा 9 हिंदी NCERT समाधान: पाठ 6 - प्रेमचंद के फटे जूते
यह पृष्ठ कक्षा 9 हिंदी क्षितिज पुस्तक के पाठ 6, 'प्रेमचंद के फटे जूते' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित यह व्यंग्य, महान लेखक प्रेमचंद के व्यक्तित्व, उनकी सादगी, स्वाभिमान और सामाजिक बुराइयों के प्रति उनके विचारों पर प्रकाश डालता है। समाधानों में प्रेमचंद की विशेषताओं, व्यंग्यात्मक पंक्तियों के अर्थ, और वेशभूषा के प्रति समाज की बदलती सोच जैसे विषयों की गहन व्याख्या शामिल है। ये समाधान छात्रों को पाठ की गहरी समझ विकसित करने और परीक्षा की तैयारी में मदद करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 9 |
| Subject | हिंदी |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 6. हरिशंकर परसाई - प्रेमचंद के फटे जूते |
Chapter summary
कक्षा 9 हिंदी क्षितिज पाठ 6 के ये NCERT समाधान हरिशंकर परसाई के व्यंग्य 'प्रेमचंद के फटे जूते' पर केंद्रित हैं। ये समाधान प्रेमचंद के सादे, आडंबरहीन जीवन, उनके उच्च विचारों और सामाजिक बुराइयों के प्रति उनके रुख को समझने में मदद करते हैं। पाठ में प्रयुक्त व्यंग्यात्मक भाषा, जैसे 'जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है', और 'तुम परदे का महत्व नहीं जानते' का विश्लेषण किया गया है। साथ ही, वेशभूषा के प्रति समाज की बदलती सोच और दिखावे की प्रवृत्ति पर भी प्रकाश डाला गया है।
Learning outcomes
- प्रेमचंद के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं को पहचानना।
- हरिशंकर परसाई की व्यंग्यात्मक शैली को समझना।
- पाठ में प्रयुक्त व्यंग्यात्मक कथनों के गहरे अर्थ को स्पष्ट करना।
- वेश-भूषा के प्रति समाज की बदलती सोच का विश्लेषण करना।
- साहित्यिक कृतियों में निहित सामाजिक संदेशों को समझना।
Topics covered
Paper topics
- प्रेमचंद का व्यक्तित्व
- हरिशंकर परसाई का व्यंग्य
- सादगी और स्वाभिमान
- सामाजिक कुरीतियाँ
- वेश-भूषा का महत्व
- दिखावा और आडंबर
- व्यंग्यात्मक शैली
- साहित्यिक आलोचना
- प्रेमचंद की रचनाएँ
- समाज का बदलता दृष्टिकोण
Important topics
- प्रेमचंद के व्यक्तित्व की विशेषताएँ
- पाठ में निहित व्यंग्य का विश्लेषण
- वेश-भूषा के प्रति समाज की सोच
- हरिशंकर परसाई की व्यंग्य शैली
- साहित्यकार का सामाजिक सरोकार
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
हरिशंकर परसाई द्वारा प्रस्तुत प्रेमचंद के शब्द चित्र से उनके व्यक्तित्व की निम्नलिखित विशेषताएँ उभरकर आती हैं:
- सादगी और स्वाभाविकता: प्रेमचंद आडंबरों से दूर एक सादा जीवन जीते थे। वे जैसे थे, वैसे ही सबके सामने आने में संकोच नहीं करते थे। उनके फटे जूते भी उनकी इसी स्वाभाविकता का प्रतीक हैं।
- उच्च विचार और सामाजिक चेतना: प्रेमचंद के विचार बहुत ऊँचे थे। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से समाज की अनेक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई।
- स्वाभिमान: प्रेमचंद एक स्वाभिमानी व्यक्ति थे। लेखक उन्हें 'साहित्यिक पुरखा' कहकर उनका सम्मान करते हैं, जो उनके आत्म-सम्मान को दर्शाता है।
- दृढ़ता और समझौता न करना: प्रेमचंद किसी भी परिस्थिति में समझौता करने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे हर मुश्किल का डटकर सामना करते थे।
- ईमानदारी: वे अपनी कमियों या साधारण स्थिति को छिपाने का प्रयास नहीं करते थे, वे भीतर और बाहर से एक समान थे।
प्रश्न 2
- क) बाएँ पाँव का जूता ठीक है मगर दाहिने जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है।
- ख) लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिंचाते हैं जिससे फोटो में खुशबू आ जाए।
- ग) तुम्हारी यह व्यंग्य मुसकान मेरे हौसले बढ़ाती है।
- घ) जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ अँगूठे से इशारा करते हो ?
दिए गए कथनों में से सही कथन है:
- क) बाएँ पाँव का जूता ठीक है मगर दाहिने जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है। (यह कथन पाठ के अनुसार गलत है, क्योंकि प्रेमचंद के दाहिने जूते में छेद था जिससे अँगुली बाहर निकल आई थी।)
- ख) लोग तो इत्र चुपड़कर फोटो खिंचाते हैं जिससे फोटो में खुशबू आ जाए। (✔)
- ग) तुम्हारी यह व्यंग्य मुसकान मेरे हौसले बढ़ाती है। (यह कथन पाठ के संदर्भ में प्रेमचंद के बारे में लेखक की सोच को दर्शाता है, न कि एक सामान्य कथन।)
- घ) जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ अँगूठे से इशारा करते हो ? (यह कथन पाठ के संदर्भ में प्रेमचंद के व्यवहार पर एक प्रश्न है, न कि एक सामान्य सही कथन।)
स्पष्टीकरण: विकल्प (ख) पाठ में लेखक द्वारा प्रेमचंद की सादगी पर किए गए व्यंग्य का हिस्सा है, जहाँ वह कहता है कि लोग फोटो खिंचवाने के लिए सजते-संवरते हैं, जबकि प्रेमचंद की स्थिति इसके विपरीत थी। अन्य विकल्प या तो पाठ के विवरण से मेल नहीं खाते या व्यंग्यात्मक प्रश्न हैं।
प्रश्न 3
- जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं।
इस पंक्ति में व्यंग्य यह है कि समाज में हमेशा से ही भौतिक वस्तु (जूता, जो यहाँ शक्ति, धन या पद का प्रतीक है) का महत्व बौद्धिक या सम्मानजनक वस्तु (टोपी, जो मान-मर्यादा, इज्जत या ज्ञान का प्रतीक है) से अधिक रहा है। लेखक यह कहना चाहता है कि आज के समय में यह अंतर और भी बढ़ गया है। अब लोग अपनी शक्ति या धन के बल पर अनेक सम्मानित या गुणी व्यक्तियों (टोपियों) को अपने अधीन कर लेते हैं या उनका अनादर करते हैं। यहाँ 'जूते पर टोपियाँ न्योछावर होना' का अर्थ है कि शक्ति के सामने सम्मान या ज्ञान का झुक जाना।
प्रश्न 3
- तुम परदे का महत्व नहीं जानते, हम पर्दे पर कुर्बान हो रहे हैं।
इस पंक्ति में लेखक प्रेमचंद की स्वाभाविकता और ईमानदारी पर व्यंग्य करते हुए अपनी दिखावे की प्रवृत्ति को उजागर करता है। 'परदा' यहाँ बाहरी दिखावे, आडंबर या अपनी कमियों को छिपाने का प्रतीक है। प्रेमचंद जैसे व्यक्ति अपनी असलियत को छिपाते नहीं थे, वे जैसे थे वैसे ही दिखते थे, इसलिए वे 'परदे का महत्व नहीं जानते' थे। इसके विपरीत, लेखक और समाज के अन्य लोग बाहरी दिखावे पर बहुत जोर देते हैं, अपनी असलियत को छिपाकर रखते हैं और इसी दिखावे पर 'कुर्बान' हो रहे हैं, यानी अपना सब कुछ इसी पर न्योछावर कर रहे हैं। यह पंक्ति प्रेमचंद की सच्चाई और समाज के पाखंड के बीच के अंतर को दर्शाती है।
प्रश्न 3
- जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ हाथ की नहीं, पाँव की अँगुली से इशारा करते हो ?
इस प्रश्न में लेखक प्रेमचंद के उस स्वभाव पर व्यंग्य कर रहा है कि वे उन चीजों या व्यक्तियों से इतनी घृणा करते थे जिन्हें वे समाज के लिए बुरा मानते थे, कि वे उनकी ओर सामान्य रूप से हाथ से इशारा भी नहीं करना चाहते थे। बल्कि, वे अपनी उपेक्षा या तिरस्कार जताने के लिए अपने पैर की उंगली से इशारा करते थे। इसका अर्थ है कि प्रेमचंद ऐसी घृणित चीजों को छूना या उनके करीब आना भी उचित नहीं समझते थे, और उनका तिरस्कार अत्यंत तीव्र था। यह उनकी सामाजिक बुराइयों के प्रति गहरी अरुचि और विरोध को दर्शाता है।
प्रश्न 4
लेखक के विचार बदलने की मुख्य वजह प्रेमचंद का अत्यंत सादा और स्वाभाविक व्यक्तित्व था। प्रारंभ में, लेखक ने प्रेमचंद की फटी हुई पोशाक देखकर सोचा कि शायद यह उनकी विशेष अवसर की पोशाक है और रोजमर्रा में वे इससे भी साधारण कपड़े पहनते होंगे। यह सोच सामान्य लोगों के व्यवहार पर आधारित थी, जो खास मौकों पर अच्छे कपड़े पहनते हैं।
लेकिन, अगले ही पल लेखक को यह अहसास हुआ कि प्रेमचंद जैसे व्यक्ति के लिए 'अलग-अलग पोशाकें' होने की संभावना ही नहीं है। प्रेमचंद का जीवन आडंबरों और दिखावे से कोसों दूर था। वे जैसे थे, वैसे ही दिखते थे, चाहे वह फोटो खिंचवाने का अवसर हो या सामान्य दिन। उनकी सादगी ही उनकी पहचान थी, और वे शायद वेशभूषा पर अतिरिक्त खर्च को फिजूलखर्ची मानते थे। इसलिए, लेखक ने निष्कर्ष निकाला कि प्रेमचंद की कोई 'अलग' या विशेष पोशाक नहीं होगी, बल्कि वे हर स्थिति में एक जैसे ही रहेंगे।
प्रश्न 5
इस व्यंग्य को पढ़कर लेखक की कई बातें आकर्षित करती हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
- व्यंग्यात्मक शैली: लेखक ने अत्यंत कुशलता से प्रेमचंद जैसे महान साहित्यकार के फटे जूते के बहाने उनके सादे और स्वाभिमानी व्यक्तित्व का चित्रण किया है। यह शैली पाठक को सोचने पर मजबूर करती है।
- ईमानदारी और आत्म-विश्लेषण: लेखक न केवल प्रेमचंद पर व्यंग्य करता है, बल्कि अनजाने में अपनी स्वयं की दिखावे की प्रवृत्ति पर भी कटाक्ष करता है। यह ईमानदारी पाठक को प्रभावित करती है।
- सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार: पाठ के माध्यम से लेखक ने समाज में फैले पाखंड, दिखावे और भौतिकतावाद पर भी चोट की है।
- विस्तारण शैली: लेखक एक छोटी सी बात (फटे जूते) को लेकर उसे विस्तार देते हुए प्रेमचंद के पूरे व्यक्तित्व और सामाजिक संदर्भ को सामने ले आता है।
कुल मिलाकर, लेखक की स्पष्टवादिता, व्यंग्य की मार्मिकता और सामाजिक सरोकार पाठक को आकर्षित करते हैं।
प्रश्न 6
पाठ में 'टीला' शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से रास्ते में आने वाली बाधाओं, रुकावटों या कठिनाइयों के प्रतीक के रूप में किया गया है। प्रेमचंद के जीवन के संदर्भ में, ये 'टीले' निम्नलिखित बातों को इंगित कर सकते हैं:
- सामाजिक कुरीतियाँ: समाज में व्याप्त अंधविश्वास, पाखंड, जाति-भेद, छुआछूत जैसी बुराइयाँ जो व्यक्ति के विकास में बाधा डालती हैं।
- अन्याय और शोषण: समाज में व्याप्त अन्याय, गरीबों का शोषण और असमानता, जो व्यक्ति के जीवन को कठिन बनाते हैं।
- व्यक्तिगत संघर्ष: प्रेमचंद के जीवन में आई आर्थिक तंगी, साहित्यिक संघर्ष और समाज से उपेक्षा जैसी व्यक्तिगत कठिनाइयाँ।
- नैतिक बाधाएँ: ऐसी परिस्थितियाँ जहाँ सही और गलत का निर्णय लेना कठिन हो, या जहाँ नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा हो।
संक्षेप में, 'टीला' उन सभी अवरोधों का प्रतीक है जो व्यक्ति को अपने लक्ष्य तक पहुँचने से रोकते हैं, चाहे वे सामाजिक हों, व्यक्तिगत हों या नैतिक।
प्रश्न 7
हमारे मोहल्ले में एक सज्जन हैं, श्रीमान कंजूसलाल। वे अपनी कंजूसी के लिए पूरे इलाके में मशहूर हैं। उनके बच्चों के लिए अच्छे कपड़े या पौष्टिक भोजन का इंतजाम तो दूर, वे खुद भी फटे-पुराने कपड़े पहनते हैं। लेकिन, जब भी कोई बड़ा अफसर या अमीर व्यक्ति उनके घर आता है, तो श्रीमान कंजूसलाल अचानक 'रईस' बन जाते हैं। वे तुरंत अपनी अलमारी से एक महँगा, ब्रांडेड सूट निकालते हैं, जो शायद उन्होंने पिछले दस सालों में सिर्फ दो-तीन बार ही पहना होगा। उस सूट को पहनकर वे ऐसे इतराते हैं, मानो दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति हों।
उनकी यह 'पोशाकी अमीरी' देखकर हंसी भी आती है और गुस्सा भी। वे अपनी असलियत छिपाने के लिए यह दिखावा करते हैं, जबकि असलियत तो उनके फटे जूतों और साधारण जीवन में ही झलकती है। यह देखकर लगता है कि जैसे प्रेमचंद के फटे जूते उनकी सच्चाई बयान करते थे, वैसे ही श्रीमान कंजूसलाल के ये 'खास मौके वाले' महँगे कपड़े उनके झूठे आडंबर का पर्दाफाश करते हैं।
प्रश्न 8
आज के समय में वेश-भूषा के प्रति लोगों की सोच में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है। पहले जहाँ वेश-भूषा व्यक्ति के चरित्र, उसकी सादगी या उसकी सामाजिक स्थिति का एक सामान्य परिचय देती थी, वहीं आज यह काफी हद तक व्यक्ति की हैसियत, उसकी आधुनिकता और उसके 'स्टेटस सिंबल' का पैमाना बन गई है।
मुख्य परिवर्तन इस प्रकार हैं:
- दिखावे का महत्व बढ़ा: आज लोग अपनी वेश-भूषा के माध्यम से अपनी आर्थिक संपन्नता और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करना चाहते हैं। महँगे ब्रांड्स और लेटेस्ट फैशन को अधिक महत्व दिया जाता है।
- चरित्र से अधिक बाहरी रूप पर जोर: कई बार व्यक्ति के बाहरी रूप-रंग और पहनावे को उसके चरित्र या योग्यता से अधिक महत्व दिया जाने लगा है।
- सादा जीवन को पिछड़ा समझा जाना: जो लोग सादे या पारंपरिक कपड़े पहनते हैं, उन्हें कई बार पिछड़ा या कम जानकार समझा जाता है।
- फैशन का बढ़ता प्रभाव: मीडिया, विज्ञापन और सोशल मीडिया के प्रभाव से फैशन का चलन बहुत तेज हो गया है, और लोग लगातार नए फैशन को अपनाने की होड़ में लगे रहते हैं।
- आत्मविश्वास का आधार: कुछ हद तक, अच्छी वेश-भूषा लोगों में आत्मविश्वास बढ़ा सकती है, लेकिन यह तब समस्या बन जाती है जब यह एकमात्र आधार बन जाए।
संक्षेप में, आज वेश-भूषा केवल तन ढकने का साधन नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक पहचान, आर्थिक स्थिति और व्यक्तिगत पसंद का एक महत्वपूर्ण, और कभी-कभी अत्यधिक महत्वपूर्ण, माध्यम बन गई है।
Common mistakes
- व्यंग्य के गहरे अर्थ को सतही तौर पर समझना।
- प्रेमचंद की सादगी को गरीबी या अभाव समझ लेना।
- लेखक के स्वयं पर किए गए व्यंग्य को अनदेखा करना।
- वेश-भूषा के महत्व को अत्यधिक आंकना।
Revision tips
- प्रेमचंद के व्यक्तित्व की विशेषताओं को सूचीबद्ध करें और उदाहरण सहित समझें।
- पाठ में आए व्यंग्यात्मक वाक्यों को पहचानें और उनके छिपे अर्थ को लिखें।
- लेखक की व्यंग्य शैली और उसके प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करें।
- वेश-भूषा और सामाजिक प्रतिष्ठा के संबंध पर अपने विचार स्पष्ट करें।
Practice MCQs
Q1. हरिशंकर परसाई ने प्रेमचंद का कैसा चित्र प्रस्तुत किया है?
Explanation: पाठ के अनुसार, प्रेमचंद सादगीपूर्ण जीवन जीते थे और स्वाभिमानी थे, वे जैसे थे वैसे ही दिखना पसंद करते थे।
Q2. पाठ में 'जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है' पंक्ति का क्या व्यंग्यात्मक अर्थ है?
Explanation: यह पंक्ति व्यंग्य करती है कि समाज में आजकल धन-बल या शक्ति का महत्व मान-सम्मान से अधिक हो गया है, जहाँ एक शक्तिशाली व्यक्ति कई सम्मानित लोगों पर हावी हो सकता है।
Q3. प्रेमचंद किस प्रकार के व्यक्ति थे?
Explanation: प्रेमचंद उच्च विचारों वाले, स्वाभिमानी व्यक्ति थे जिन्होंने सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई और कभी समझौता नहीं किया।
Q4. लेखक के अनुसार, प्रेमचंद की 'व्यंग्य मुसकान' कैसी थी?
Explanation: लेखक को प्रेमचंद की वह मुस्कान, जो शायद उनकी फटी जूते की स्थिति पर थी, उनके हौसले बढ़ाने वाली लगी।
Q5. पाठ में 'टीला' शब्द किसका प्रतीक है?
Explanation: पाठ में 'टीला' शब्द का प्रयोग जीवन के मार्ग में आने वाली बाधाओं, सामाजिक कुरीतियों और अन्याय का प्रतीक है।
Frequently asked questions
कक्षा 9 हिंदी के पाठ 'प्रेमचंद के फटे जूते' में लेखक कौन हैं?
कक्षा 9 हिंदी के पाठ 'प्रेमचंद के फटे जूते' के लेखक हरिशंकर परसाई हैं।
यह पाठ किस बारे में है?
यह पाठ महान लेखक प्रेमचंद के व्यक्तित्व, उनकी सादगी, स्वाभिमान और सामाजिक बुराइयों के प्रति उनके विचारों पर आधारित एक व्यंग्य है।
पाठ में प्रेमचंद के फटे जूते का क्या महत्व है?
प्रेमचंद के फटे जूते लेखक के लिए उनके सादे, आडंबरहीन और स्वाभिमानी व्यक्तित्व का प्रतीक हैं, जो समाज के दिखावे पर व्यंग्य करते हैं।
पाठ में 'जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है' इस कथन का क्या अर्थ है?
इस कथन का व्यंग्यात्मक अर्थ है कि आजकल समाज में धन-बल या शक्ति का महत्व मान-सम्मान से अधिक हो गया है।
ये NCERT समाधान छात्रों की कैसे मदद करेंगे?
ये समाधान छात्रों को पाठ की गहरी समझ विकसित करने, महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर जानने और परीक्षा की तैयारी को बेहतर बनाने में मदद करेंगे।
पाठ में 'टीला' शब्द का क्या अर्थ है?
पाठ में 'टीला' शब्द जीवन के मार्ग में आने वाली बाधाओं, सामाजिक कुरीतियों और अन्याय का प्रतीक है।
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