कक्षा 6 संस्कृत: पाठ 13 लोकमड्गलम् NCERT समाधान
यह पृष्ठ कक्षा 6 के संस्कृत के पाठ 13, 'लोकमड्गलम्' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। यह पाठ वेदों, उपनिषदों और संस्कृत साहित्य से लिए गए मंत्रों पर केंद्रित है, जो न केवल व्यक्तिगत बल्कि सार्वभौमिक कल्याण की कामना करते हैं। समाधान में प्रत्येक मंत्र के शब्दार्थ, सरलार्थ और अंग्रेजी अनुवाद को स्पष्ट रूप से समझाया गया है, जिससे छात्रों को श्लोकों के गहरे अर्थ को समझने में मदद मिलती है। इसमें 'असतो मा सद्गमय' जैसे प्रसिद्ध मंत्रों की व्याख्या भी शामिल है, जो अज्ञान से ज्ञान की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर मार्गदर्शन की प्रार्थना करते हैं। यह संसाधन छात्रों को संस्कृत साहित्य की समृद्ध विरासत से परिचित कराता है और परीक्षा की तैयारी के लिए एक उत्कृष्ट सहायता प्रदान करता है।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 6 |
| Subject | संस्कृत |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 13. लोकमड्गलम् |
Chapter summary
कक्षा 6 के संस्कृत पाठ 13 'लोकमड्गलम्' के NCERT समाधान छात्रों को सार्वभौमिक कल्याण की कामना करने वाले मंत्रों से परिचित कराते हैं। समाधान में उपनिषदों और अन्य संस्कृत स्रोतों से लिए गए श्लोकों के शब्दार्थ, सरलार्थ और अंग्रेजी अनुवाद शामिल हैं। यह पाठ छात्रों को सत्य, ज्ञान, अमरत्व, निर्भीकता और समग्र सुख की प्रार्थनाओं को समझने में मदद करता है।
Learning outcomes
- उपनिषदीय मंत्रों के अर्थ को समझना।
- संस्कृत श्लोकों का हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद करना।
- व्यक्तिगत और सार्वभौमिक कल्याण की अवधारणा को समझना।
- निर्भीकता और आत्मविश्वास के महत्व को पहचानना।
- अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने की प्रेरणा प्राप्त करना।
Topics covered
Paper topics
- मंत्रों का अर्थ
- शब्दार्थ
- सरलार्थ
- अंग्रेजी अनुवाद
- सत्य की ओर गमन
- ज्ञान का प्रकाश
- अमरत्व की प्राप्ति
- निर्भीकता
- आत्मविश्वास
- सार्वभौमिक कल्याण
- शुभकामनाएं
- संस्कृत साहित्य
Important topics
- असतो मा सद्गमय मंत्र
- तमसो मा ज्योतिर्गमय मंत्र
- मृत्योर्माऽमृतं गमय मंत्र
- निर्भीकता का महत्व
- सार्वभौमिक कल्याण की कामना
- श्लोकों का भावार्थ समझना
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Questions and Solutions
पाठ का परिचय
यह पाठ लोक कल्याण की कामना पर आधारित है। इसमें वेद, उपनिषद् और संस्कृत साहित्य से उद्धृत मंत्र शामिल हैं, जो न केवल व्यक्तिगत बल्कि सबके मंगल की कामना करते हैं।
यह पाठ संस्कृत साहित्य के उन महत्वपूर्ण मंत्रों का संकलन है जो विश्व के कल्याण और सभी के सुख की कामना करते हैं। इसमें प्रस्तुत मंत्र हमें जीवन की कठिनाइयों से उबरने, ज्ञान प्राप्त करने और सकारात्मकता की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। पाठ का उद्देश्य छात्रों को सार्वभौमिक भाईचारे और कल्याण की भावना से जोड़ना है।
मंत्र (क)
असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय॥
शब्दार्थ: असतो (असतः) – असत / बुराई से, मा-मुझे, सद् (सत्)-सत्/अच्छाई, तमसो (तमसः)-अंधकार/अज्ञान से, ज्योति:-प्रकाश/ज्ञान, गमय-ले चलो, मृत्योर्माऽमृतम् (मृत्यो:+मा+अमृतम्)-मृत्यु से अमरत्व को।
यह उपनिषद् का एक प्रसिद्ध मंत्र है, जो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की प्रार्थना करता है।
- असतो मा सद्गमय: हे परमात्मा! मुझे असत्य या बुराई के मार्ग से हटाकर सत्य या अच्छाई के मार्ग पर ले चलिए।
- तमसो मा ज्योतिर्गमय: मुझे अज्ञान रूपी अंधकार से निकालकर ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले चलिए।
- मृत्योर्माऽमृतं गमय: मुझे मृत्यु के भय से मुक्त करके अमरत्व या मोक्ष की प्राप्ति की ओर ले चलिए।
इस मंत्र के माध्यम से साधक ईश्वर से मार्गदर्शन मांगता है ताकि वह जीवन की नकारात्मकताओं से ऊपर उठकर सकारात्मकता, ज्ञान और अनंतता को प्राप्त कर सके।
मंत्र (ख)
यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः। एवं मे प्राण मा बिभे:॥
शब्दार्थ: द्यौश्च (द्यौ: + च )-आकाश/अंतरिक्ष अथवा द्युलोक, बिभीत:-डरते हैं, रिष्यत:-दु:खी होते हैं, एवम्-इसी प्रकार, मे प्राण-हे मेरे प्राण!, मा-मत, बिभे:-डरो।
यह मंत्र जीवन शक्ति को निर्भीक बने रहने का उपदेश देता है।
सरलार्थ: जिस प्रकार आकाश (द्युलोक) और पृथ्वी कभी भयभीत नहीं होते और न ही कभी दुखी होते हैं, उसी प्रकार हे मेरी प्राणशक्ति (जीवन शक्ति)! तुम भी कभी भयभीत मत हो।
इस मंत्र का भाव यह है कि मनुष्य को जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी अपने आत्मविश्वास और मनोबल को बनाए रखना चाहिए। जिस प्रकार प्रकृति के तत्व स्थिर और अविचल रहते हैं, उसी प्रकार हमें भी निर्भीक और शांत रहना चाहिए।
मंत्र (ग)
यत् स्वपे अन्नमश्नामि न प्रातरधिगम्यते। सर्वं तदस्तु मे शिवं नहि तद् दृश्यते दिवा॥
शब्दार्थ: यत्-जो, अश्नामि-खाता/खाती हूँ, अधिगम्यते (प्रातरधिगम्यते = प्रात + अधिगम्यते )-प्राप्त होता है, तदस्तु ( तद्अस्तु )-वह हो, शिवम् -कल्याणकारी, दृश्यते - दिखाई देता/देती है, दिवा - दिन (में)।
यह मंत्र स्वयं के कल्याण की कामना करता है, विशेषकर उन चीजों के लिए जिनका हमें प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता।
सरलार्थ: मैं रात में जो भी अन्न खाता/खाती हूँ, वह प्रातःकाल में (पचने के बाद) दिखाई नहीं देता (अर्थात उसका प्रत्यक्ष रूप नहीं रहता)। वह सब अन्न मेरे लिए कल्याणकारी (शिव) हो। इसी प्रकार, जो तत्व दिन में दिखाई नहीं देते (अदृश्य हैं), वे भी मेरे लिए शुभ हों।
इस मंत्र का भाव यह है कि जो भी हम ग्रहण करते हैं, चाहे वह प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे या न दे, वह हमारे लिए स्वास्थ्यवर्धक और कल्याणकारी सिद्ध हो। यह अदृश्य शक्तियों या तत्वों से भी शुभता की अपेक्षा व्यक्त करता है।
मंत्र (घ)
सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वौ भद्राणि पश्यतु। सर्वः कामानवाप्नोतु सर्वः सर्वत्र नन्दतु॥
शब्दार्थ: तरतु-पार करे, दुर्गाणि-कठिनाइयाँ, सर्व:-सब (सभी), भद्राणि-अच्छी कल्याणकारी स्थितियाँ, पश्यतु-देखें, आवाजोतु-पाएँ, कामान्-इच्छाएँ, नन्दतु-खुश होएँ।
यह श्लोक सभी के लिए सुख, समृद्धि और सफलता की कामना करता है।
सरलार्थ:
- सर्वस्तरतु दुर्गाणि: सभी लोग जीवन की कठिनाइयों और बाधाओं को पार करें।
- सर्वौ भद्राणि पश्यतु: सभी लोग कल्याणकारी और शुभ घटनाओं को देखें।
- सर्वः कामानवाप्नोतु: सभी की इच्छाएँ और मनोकामनाएँ पूरी हों।
- सर्वः सर्वत्र नन्दतु: सभी लोग हर स्थान पर प्रसन्न रहें और आनंदित हों।
यह श्लोक एक सार्वभौमिक प्रार्थना है, जिसमें सभी प्राणियों के लिए कष्टों से मुक्ति, सुख-समृद्धि की प्राप्ति और सर्वत्र आनंद की कामना की गई है।
Common mistakes
- मंत्रों के 'मा' शब्द के विभिन्न अर्थों को समझने में भ्रम।
- जटिल संस्कृत शब्दों के अर्थ को समझने में कठिनाई।
- श्लोकों के भावार्थ को केवल शाब्दिक अनुवाद तक सीमित रखना।
Revision tips
- प्रत्येक मंत्र के शब्दार्थ को ध्यान से पढ़ें और समझें।
- सरलार्थ को अपने शब्दों में लिखने का अभ्यास करें।
- मंत्रों में निहित संदेशों को अपने जीवन से जोड़ने का प्रयास करें।
- अंग्रेजी अनुवाद की सहायता से श्लोकों के अर्थ की पुष्टि करें।
Practice MCQs
Q1. 'असतो मा सद्गमय' मंत्र में 'सद्गमय' का क्या अर्थ है?
Explanation: मंत्र में 'सद्गमय' का अर्थ है 'सत्य या अच्छाई की ओर ले चलो'। यह बुराई से अच्छाई की ओर बढ़ने की प्रार्थना है।
Q2. दूसरे मंत्र में 'मा बिभे:' का क्या अर्थ है?
Explanation: 'मा बिभे:' का अर्थ है 'मत डरो'। यह मंत्र जीवन शक्ति को निर्भीक बने रहने का उपदेश देता है।
Q3. तीसरे मंत्र के अनुसार, रात को खाया गया अन्न सुबह क्या नहीं होता?
Explanation: तीसरे मंत्र में कहा गया है कि रात को खाया गया अन्न सुबह दिखाई नहीं देता, अर्थात वह अदृश्य हो जाता है, पर शरीर के लिए गुणकारी होता है।
Q4. चौथे मंत्र में 'सर्वे भद्राणि पश्यतु' का क्या भाव है?
Explanation: इस मंत्र का अर्थ है कि सभी लोग कल्याणकारी और शुभ स्थितियों को देखें।
Q5. यह पाठ 'लोकमड्गलम्' मुख्य रूप से किस पर केंद्रित है?
Explanation: पाठ का मुख्य उद्देश्य वेदों और उपनिषदों के मंत्रों के माध्यम से न केवल व्यक्तिगत बल्कि सभी के मंगल या कल्याण की कामना करना है।
Frequently asked questions
कक्षा 6 के संस्कृत पाठ 13 'लोकमड्गलम्' में क्या सिखाया गया है?
यह पाठ वेदों और उपनिषदों से लिए गए मंत्रों के माध्यम से व्यक्तिगत और सार्वभौमिक कल्याण की कामना करना सिखाता है। इसमें सत्य, ज्ञान, अमरत्व, निर्भीकता और समग्र सुख की प्रार्थनाएं शामिल हैं।
मंत्र 'असतो मा सद्गमय' का क्या अर्थ है?
इस मंत्र का अर्थ है 'मुझे असत्य/बुराई से सत्य/अच्छाई की ओर ले चलो, अंधकार/अज्ञान से प्रकाश/ज्ञान की ओर ले चलो, और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो'। यह सकारात्मकता की ओर बढ़ने की प्रार्थना है।
क्या इन समाधानों में मंत्रों का अंग्रेजी अनुवाद भी शामिल है?
हाँ, इन समाधानों में प्रत्येक मंत्र का हिंदी सरलार्थ के साथ-साथ अंग्रेजी अनुवाद भी प्रदान किया गया है, जिससे छात्रों को अर्थ समझने में आसानी होती है।
यह पाठ छात्रों को परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करेगा?
यह पाठ छात्रों को मंत्रों के अर्थ, शब्दार्थ और भावार्थ को समझने में मदद करता है, जो परीक्षा में पूछे जा सकते हैं। विस्तृत व्याख्या और अनुवाद छात्रों की समझ को बेहतर बनाते हैं।
'लोकमड्गलम्' का क्या अर्थ है?
'लोकमड्गलम्' का अर्थ है 'लोक का मंगल' या 'संसार का कल्याण'। यह पाठ इसी सार्वभौमिक कल्याण की कामना पर आधारित है।
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