कक्षा 12 भौतिकी अध्याय 14: अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी NCERT समाधान
यह पृष्ठ कक्षा 12 भौतिकी के अध्याय 14, 'अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी-पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रदान करता है। इसमें n-प्रकार और p-प्रकार के अर्धचालकों की विशेषताओं, ऊर्जा बैंड अंतराल की तुलना, p-n संधि के व्यवहार (बिना बायस और अग्र अभिनत में), और ट्रांजिस्टर के संचालन के सिद्धांतों को शामिल किया गया है। समाधानों में प्रत्येक प्रश्न के लिए चरण-दर-चरण स्पष्टीकरण दिया गया है, जिससे छात्रों को अर्धचालक उपकरणों के मूल सिद्धांतों को समझने में मदद मिलती है। यह सामग्री परीक्षा की तैयारी और अवधारणाओं की गहन समीक्षा के लिए अत्यंत उपयोगी है।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 12 |
| Subject | भौतिकी |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 14. अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ |
Chapter summary
कक्षा 12 भौतिकी के अध्याय 14 के ये NCERT समाधान अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी की मूल बातें समझाते हैं। इसमें n-प्रकार और p-प्रकार के अर्धचालकों में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक वाहकों की पहचान, कार्बन, सिलिकॉन और जर्मेनियम के ऊर्जा बैंड अंतराल की तुलना, और p-n संधि के अग्र अभिनत व्यवहार का विश्लेषण शामिल है। ट्रांजिस्टर के लिए आवश्यक शर्तें और उनके प्रवर्धक के रूप में कार्य करने के सिद्धांत भी स्पष्ट किए गए हैं।
Learning outcomes
- n-प्रकार और p-प्रकार के अर्धचालकों में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक वाहकों की पहचान करना।
- कार्बन, सिलिकॉन और जर्मेनियम के ऊर्जा बैंड अंतराल की तुलना करना।
- बिना बायस और अग्र अभिनत p-n संधि के व्यवहार को समझना।
- ट्रांजिस्टर के संचालन के लिए आवश्यक शर्तों को सूचीबद्ध करना।
- ट्रांजिस्टर प्रवर्धक की वोल्टता लब्धि की आवृत्ति निर्भरता का वर्णन करना।
Topics covered
Paper topics
- अर्धचालक पदार्थ
- n-प्रकार अर्धचालक
- p-प्रकार अर्धचालक
- ऊर्जा बैंड अंतराल
- p-n संधि
- बिना बायस p-n संधि
- अग्र अभिनत p-n संधि
- ट्रांजिस्टर
- ट्रांजिस्टर की संरचना
- ट्रांजिस्टर का प्रवर्धन
- वोल्टता लब्धि
- आवृत्ति पर निर्भरता
Important topics
- n-प्रकार और p-प्रकार अर्धचालकों में वाहकों की प्रकृति
- ऊर्जा बैंड अंतराल की तुलना
- p-n संधि का अग्र अभिनत व्यवहार
- ट्रांजिस्टर के प्रवर्धक के रूप में कार्य करने की शर्तें
- वोल्टता लब्धि की आवृत्ति निर्भरता
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
n-प्रकार के अर्धचालक बनाने के लिए, शुद्ध जर्मेनियम (Ge) या सिलिकॉन (Si) में पंचसंयोजी (pentavalent) तत्व की अशुद्धियाँ मिलाई जाती हैं। पंचसंयोजी अशुद्धि (जैसे फॉस्फोरस या आर्सेनिक) अपने चार संयोजी इलेक्ट्रॉनों के अलावा एक अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन प्रदान करती है। इस अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन के कारण, n-प्रकार के अर्धचालक में इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक वाहक (majority carriers) होते हैं और विवर (holes) अल्पसंख्यक वाहक (minority carriers) होते हैं। इसलिए, कथन (c) सत्य है कि विवर अल्पसंख्यक वाहक हैं और पंचसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं।
सही विकल्प है: (c)
प्रश्न 2
p-प्रकार के अर्धचालक बनाने के लिए, शुद्ध जर्मेनियम (Ge) या सिलिकॉन (Si) में त्रिसंयोजी (trivalent) तत्व की अशुद्धियाँ मिलाई जाती हैं। त्रिसंयोजी अशुद्धि (जैसे बोरॉन या एल्युमिनियम) के पास संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या चार से कम होती है, जिससे एक सहसंयोजक बंध बनाने में एक इलेक्ट्रॉन की कमी रह जाती है। इस कमी को विवर (hole) कहते हैं। इस प्रकार, p-प्रकार के अर्धचालक में विवर बहुसंख्यक वाहक होते हैं और इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक वाहक होते हैं।
प्रश्न 1 के कथनों के आधार पर, p-प्रकार के अर्धचालक के लिए सत्य कथन यह होगा कि विवर बहुसंख्यक वाहक हैं और त्रिसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं।
सही विकल्प है: (d) (विवर (होल) बहुसंख्यक वाहक हैं और त्रिसंयोजी परमाणु अपमिश्रक हैं।)
प्रश्न 3
कार्बन (C), सिलिकॉन (Si) और जर्मेनियम (Ge) सभी चतुःसंयोजी तत्व हैं और इनके संयोजकता बैंड (valence band) और चालन बैंड (conduction band) के बीच एक ऊर्जा अंतराल (energy gap) होता है। यह ऊर्जा अंतराल इन पदार्थों की विद्युत चालकता को निर्धारित करता है। इन तीनों के लिए ऊर्जा बैंड अंतराल के मान इस प्रकार हैं:
- कार्बन (हीरा): <math>(E_g)_{\rm C} \approx 5.45 \text{ eV}</math>
- सिलिकॉन: <math>(E_g)_{\rm Si} \approx 1.12 \text{ eV}</math>
- जर्मेनियम: <math>(E_g)_{\rm Ge} \approx 0.67 \text{ eV}</math>
इन मानों से स्पष्ट है कि कार्बन का ऊर्जा बैंड अंतराल सबसे अधिक है, उसके बाद सिलिकॉन का और फिर जर्मेनियम का सबसे कम है। अतः, संबंध <math>(E_{g})_{C} > (E_{g})_{Si} > (E_{g})_{Ge}</math> सत्य है।
सही विकल्प है: (c)
प्रश्न 4
जब एक p-n संधि को बिना किसी बाहरी वोल्टेज (बायस) के रखा जाता है, तो संधि के दोनों ओर आवेश वाहकों की सांद्रता में अंतर होता है। p-क्षेत्र में बहुसंख्यक वाहक होल होते हैं और n-क्षेत्र में बहुसंख्यक वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं। संधि के निर्माण के समय, p-क्षेत्र से होल n-क्षेत्र की ओर और n-क्षेत्र से इलेक्ट्रॉन p-क्षेत्र की ओर विसरित होते हैं। यह विसरण (diffusion) उच्च सांद्रता वाले क्षेत्र से निम्न सांद्रता वाले क्षेत्र की ओर होता है। चूँकि p-क्षेत्र में होलों की सांद्रता n-क्षेत्र की तुलना में बहुत अधिक होती है, इसलिए होल p-क्षेत्र से n-क्षेत्र की ओर विसरित होते हैं। यह विसरण संधि पर एक विभव रोधक (potential barrier) उत्पन्न करता है जो इस विसरण को रोकता है।
विकल्प (a) आंशिक रूप से सही हो सकता है क्योंकि n-क्षेत्र के इलेक्ट्रॉन होलों को आकर्षित करते हैं, लेकिन यह विसरण का मुख्य कारण नहीं है। विकल्प (b) तब लागू होता है जब कोई बाहरी विभवान्तर लगाया जाता है। विकल्प (c) विसरण का प्राथमिक कारण है।
सही विकल्प है: (c)
प्रश्न 5
जब एक p-n संधि पर अग्र अभिनत (forward bias) बायस लगाया जाता है, तो बाहरी वोल्टेज का धनात्मक टर्मिनल p-क्षेत्र से और ऋणात्मक टर्मिनल n-क्षेत्र से जोड़ा जाता है। यह बाहरी वोल्टेज संधि के अंदर उत्पन्न विभव रोधक (potential barrier) के विपरीत दिशा में कार्य करता है। परिणामस्वरूप, विभव रोधक का मान कम हो जाता है। जब बाहरी वोल्टेज विभव रोधक से अधिक हो जाता है, तो बहुसंख्यक वाहक (p-क्षेत्र से होल और n-क्षेत्र से इलेक्ट्रॉन) संधि को पार करने लगते हैं, जिससे एक महत्वपूर्ण धारा प्रवाहित होती है।
इसलिए, अग्र अभिनत बायस विभव रोधक को कम कर देता है।
सही विकल्प है: (c)
प्रश्न 6
एक ट्रांजिस्टर (जैसे NPN या PNP) को प्रवर्धक (amplifier) के रूप में प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए, उसकी संरचना और बायसिंग की कुछ विशिष्ट आवश्यकताएं होती हैं:
- आधार क्षेत्र की संरचना: आधार (base) क्षेत्र को बहुत पतला और कम अपमिश्रित (lightly doped) होना चाहिए। पतला आधार यह सुनिश्चित करता है कि उत्सर्जक (emitter) से उत्सर्जित अधिकांश वाहक (इलेक्ट्रॉन या होल) संग्राहक (collector) तक पहुँच सकें, न कि आधार में पुनर्संयोजित (recombine) हों। कम अपमिश्रण सांद्रता भी पुनर्संयोजन को कम करती है।
- संधि बायसिंग: ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक के रूप में संचालित करने के लिए, उत्सर्जक-आधार संधि (emitter-base junction) को अग्र अभिनत (forward biased) रखा जाता है। यह उत्सर्जक से आधार की ओर वाहकों के प्रवाह को सक्षम बनाता है। साथ ही, आधार-संग्राहक संधि (base-collector junction) को उत्क्रम अभिनत (reverse biased) रखा जाता है। यह संग्राहक को आधार से आने वाले वाहकों को प्रभावी ढंग से एकत्र करने की अनुमति देता है।
विकल्प (a) गलत है क्योंकि तीनों क्षेत्रों के आकार और अपमिश्रण सांद्रता भिन्न होती है। विकल्प (d) गलत है क्योंकि प्रवर्धक क्रिया के लिए संग्राहक संधि उत्क्रम अभिनत होती है।
इसलिए, कथन (b) और (c) ट्रांजिस्टर की क्रिया हेतु सही हैं।
सही विकल्प हैं: (b), (c)
प्रश्न 7
एक ट्रांजिस्टर प्रवर्धक की वोल्टता लब्धि (voltage gain) आवृत्ति पर निर्भर करती है। यह निर्भरता प्रवर्धक के डिज़ाइन और उपयोग किए गए ट्रांजिस्टर की विशेषताओं के कारण होती है। सामान्यतः, एक ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के लिए आवृत्ति प्रतिक्रिया (frequency response) इस प्रकार होती है:
- निम्न आवृत्तियों पर: कपलिंग कैपेसिटर (coupling capacitors) और बाईपास कैपेसिटर (bypass capacitors) जैसे परजीवी कैपेसिटेंस (parasitic capacitances) का प्रभाव महत्वपूर्ण हो जाता है। ये कैपेसिटेंस निम्न आवृत्तियों पर प्रतिबाधा (impedance) को बदलते हैं, जिससे वोल्टता लब्धि कम हो जाती है।
- मध्य आवृत्तियों पर: इस आवृत्ति रेंज में, कैपेसिटेंस का प्रभाव नगण्य होता है, और ट्रांजिस्टर का आंतरिक व्यवहार प्रभावी होता है। इस रेंज में वोल्टता लब्धि अपने अधिकतम मान पर होती है और लगभग अचर (constant) रहती है।
- उच्च आवृत्तियों पर: ट्रांजिस्टर के आंतरिक कैपेसिटेंस (जैसे Cbe, Cbc) और अन्य परजीवी कैपेसिटेंस का प्रभाव बढ़ने लगता है। ये कैपेसिटेंस उच्च आवृत्तियों पर सिग्नल को बायपास करने लगते हैं या प्रतिबाधा को कम कर देते हैं, जिससे वोल्टता लब्धि फिर से कम हो जाती है।
अतः, एक विशिष्ट ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के लिए वोल्टता लब्धि उच्च और निम्न आवृत्तियों पर कम होती है और मध्य आवृत्तियों पर अचर रहती है।
सही विकल्प है: (c)
Common mistakes
- n-प्रकार और p-प्रकार के अर्धचालकों में बहुसंख्यक/अल्पसंख्यक वाहकों को गलत पहचानना।
- ऊर्जा बैंड अंतराल के क्रम को गलत याद रखना।
- p-n संधि के अग्र अभिनत व्यवहार को समझने में त्रुटि।
- ट्रांजिस्टर के लिए आवश्यक आधार क्षेत्र की मोटाई और डोपिंग को गलत समझना।
Revision tips
- प्रत्येक प्रकार के अर्धचालक (n-प्रकार, p-प्रकार) के लिए बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक वाहकों को स्पष्ट रूप से याद करें।
- कार्बन, सिलिकॉन और जर्मेनियम के ऊर्जा बैंड अंतराल के क्रम को एक तालिका बनाकर याद करें।
- p-n संधि पर अग्र अभिनत और उत्क्रम अभिनत के प्रभाव को समझें, विशेष रूप से विभव रोधक पर।
- ट्रांजिस्टर के सक्रिय क्षेत्र में संचालन के लिए आवश्यक शर्तों (जैसे आधार का पतला होना, उत्सर्जक संधि का अग्र अभिनत होना) पर ध्यान दें।
Practice MCQs
Q1. n-प्रकार के सिलिकॉन अर्धचालक में कौन-सा कथन सत्य है?
Explanation: n-प्रकार के अर्धचालक बनाने के लिए शुद्ध सिलिकॉन में पंचसंयोजी अशुद्धि (जैसे फॉस्फोरस) मिलाई जाती है। पंचसंयोजी अशुद्धि अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन प्रदान करती है, जिससे इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक वाहक बन जाते हैं और विवर अल्पसंख्यक वाहक।
Q2. p-प्रकार के अर्द्धचालक में बहुसंख्यक वाहक कौन होते हैं?
Explanation: p-प्रकार के अर्धचालक बनाने के लिए शुद्ध सिलिकॉन में त्रिसंयोजी अशुद्धि (जैसे बोरॉन) मिलाई जाती है। त्रिसंयोजी अशुद्धि एक सहसंयोजक बंध बनाने के लिए एक इलेक्ट्रॉन की कमी छोड़ देती है, जिससे विवर (होल) उत्पन्न होते हैं। ये विवर बहुसंख्यक वाहक होते हैं।
Q3. कार्बन, सिलिकॉन और जर्मेनियम के ऊर्जा बैंड अंतराल (Eg) के संबंध में कौन-सा कथन सत्य है?
Explanation: कार्बन का ऊर्जा बैंड अंतराल सबसे अधिक होता है, उसके बाद सिलिकॉन का और फिर जर्मेनियम का सबसे कम होता है। यह क्रम उनकी चालकता को प्रभावित करता है।
Q4. जब p-n संधि पर अग्र अभिनत बायस लगाया जाता है, तो क्या होता है?
Explanation: अग्र अभिनत में, लगाया गया बाहरी वोल्टेज संधि के विभव रोधक के विपरीत दिशा में कार्य करता है, जिससे विभव रोधक कम हो जाता है और धारा प्रवाह आसान हो जाता है।
Q5. ट्रांजिस्टर के प्रवर्धक के रूप में कार्य करने के लिए, उत्सर्जक संधि और संग्राहक संधि की क्या स्थिति होनी चाहिए?
Explanation: ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक के रूप में उपयोग करने के लिए, उत्सर्जक संधि को अग्र अभिनत (forward biased) और संग्राहक संधि को उत्क्रम अभिनत (reverse biased) रखा जाता है। यह विन्यास धारा प्रवर्धन की अनुमति देता है।
Frequently asked questions
n-प्रकार और p-प्रकार के अर्धचालकों में मुख्य अंतर क्या है?
n-प्रकार अर्धचालक में इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक वाहक होते हैं और पंचसंयोजी अशुद्धि मिलाई जाती है। p-प्रकार अर्धचालक में विवर (होल) बहुसंख्यक वाहक होते हैं और त्रिसंयोजी अशुद्धि मिलाई जाती है।
p-n संधि पर अग्र अभिनत का क्या प्रभाव पड़ता है?
अग्र अभिनत में, p-n संधि पर लगाया गया बाहरी वोल्टेज संधि के विभव रोधक को कम कर देता है, जिससे धारा का प्रवाह आसान हो जाता है।
ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक के रूप में उपयोग करने के लिए क्या शर्तें आवश्यक हैं?
ट्रांजिस्टर को प्रवर्धक के रूप में उपयोग करने के लिए, उत्सर्जक संधि को अग्र अभिनत और संग्राहक संधि को उत्क्रम अभिनत रखा जाता है। साथ ही, आधार क्षेत्र बहुत पतला और कम अपमिश्रित होना चाहिए।
कार्बन, सिलिकॉन और जर्मेनियम के ऊर्जा बैंड अंतराल की तुलना कैसे की जाती है?
इन तीनों में, कार्बन का ऊर्जा बैंड अंतराल सबसे अधिक होता है, उसके बाद सिलिकॉन का और जर्मेनियम का सबसे कम होता है। यह क्रम उनकी अर्धचालक प्रकृति को प्रभावित करता है।
ट्रांजिस्टर प्रवर्धक की वोल्टता लब्धि आवृत्ति पर कैसे निर्भर करती है?
ट्रांजिस्टर प्रवर्धक की वोल्टता लब्धि उच्च और निम्न आवृत्तियों पर कम होती है, जबकि मध्य आवृत्ति परिसर में यह अचर (स्थिर) रहती है।
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