CBSE Class 12 Hindi Aroh Chapter 14: Phanishwar Nath Renu NCERT Solutions

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This chapter delves into the life of Luttan Pehelwan, a character from Phanishwar Nath Renu's work, as presented in the CBSE Class 12 Hindi Aroh textbook. The NCERT Solutions provide detailed answers to questions exploring Luttan's journey, his relationship with the wrestling drum (dholak), and his resilience in the face of adversity. The solutions explain the symbiotic relationship between Luttan's wrestling techniques and the drumbeats, his personal tragedies like the loss of his parents and wife, and his eventual fall from royal patronage. Furthermore, the text highlights how Luttan used the dholak to inspire courage and hope in his village during a devastating epidemic, even after losing his own sons. These solutions are designed to help students understand the nuances of the narrative, analyze the character's motivations, and prepare effectively for their examinations by offering clear explanations and insights into the text.

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
Subjectआरोह
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter14. फणीश्वर नाथ रेणु

Chapter summary

Chapter 14 of CBSE Class 12 Hindi Aroh focuses on the character of Luttan Pehelwan, exploring his life, struggles, and resilience. The NCERT Solutions cover key aspects such as the connection between Luttan's wrestling and the rhythm of the dholak, his personal losses, and his role in inspiring the village during an epidemic. The solutions analyze the impact of the dholak's sound on the villagers and discuss the changing status of wrestling as a sport. This chapter's solutions offer a deep dive into the narrative's themes of courage, hope, and the human spirit.

Learning outcomes

  • Understand the relationship between Luttan's wrestling techniques and the dholak's beats.
  • Analyze the significant turning points in Luttan Pehelwan's life.
  • Explain the role of the dholak in inspiring courage during times of crisis.
  • Describe the impact of the dholak's sound on the villagers during an epidemic.
  • Discuss the changing status of wrestling as a sport and its historical significance.
  • Evaluate Luttan's resilience in the face of personal tragedies and societal changes.

Topics covered

Paper topics

  • Luttan Pehelwan's life and struggles
  • The role of the dholak in wrestling and inspiration
  • Luttan's personal tragedies (orphanhood, wife's death, sons' death)
  • Loss of royal patronage
  • Resilience and courage during an epidemic
  • The impact of sound on human emotions
  • Wrestling as a sport: past and present
  • Social commentary through literature

Important topics

  • Luttan's relationship with the dholak
  • Luttan's resilience during the epidemic
  • The changing status of wrestling
  • Luttan's personal life and challenges
  • The symbolic meaning of the dholak's beats

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

कुश्ती के समय ढोल की आवाज़ और लुट्टन के दाँव-पेंच में क्या तालमेल था? पाठ में आए ध्वन्यात्मक शब्द और ढोल की आवाज़ आपके मन में कैसी ध्वनि पैदा करते हैं, उन्हें शब्द दीजिए।
Solution:

कुश्ती के समय ढोल की आवाज़ और लुट्टन के दाँव-पेंचों के बीच एक गहरा और अद्भुत तालमेल था। ढोल की प्रत्येक थाप लुट्टन के लिए एक नई प्रेरणा और ऊर्जा का स्रोत थी, जो उसे कुश्ती के नए दाँव-पेंच सीखने और उन्हें प्रभावी ढंग से आज़माने के लिए प्रेरित करती थी। ढोल की आवाज़ उसके लिए केवल संगीत नहीं थी, बल्कि एक मार्गदर्शक और गुरु की तरह थी।

पाठ में ढोल की आवाज़ के लिए कुछ ध्वन्यात्मक शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो लुट्टन के दाँव-पेंचों को दर्शाते हैं:

  • चट धा, गिड़ धा: यह आवाज़ लुट्टन को लड़ने के लिए ललकारती थी, जैसे 'आजा भिड़ जा'।
  • चटाक चट धा: यह आवाज़ प्रतिद्वंद्वी को उठाकर पटक देने के दाँव का संकेत देती थी।
  • चट गिड़ धा: यह आवाज़ लुट्टन को निर्भय रहने और 'मत डरना' का हौसला देती थी।
  • धाक धिना तिरकट तिना: यह आवाज़ प्रतिद्वंद्वी के दाँव को काटकर उसे बाहर करने का संकेत देती थी, जैसे 'दाँव काटो, बाहर हो जाओ'।
  • धिना धिना, धिक धिना: यह आवाज़ प्रतिद्वंद्वी को चित्त करने का संकेत देती थी, जैसे 'चित्त करो'।

ये ध्वन्यात्मक शब्द और ढोल की थापें न केवल लुट्टन के मन में उत्साह और आनंद भरती थीं, बल्कि उसे विपक्षी पहलवान का सामना करने और उसे परास्त करने का साहस भी देती थीं। ये आवाज़ें लुट्टन के लिए पुनर्जीवन और लड़ने की शक्ति का प्रतीक थीं।

प्रश्न 2

कहानी के किस-किस मोड़ पर लुट्टन के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए?
Solution:

लुट्टन पहलवान के जीवन में कई महत्वपूर्ण मोड़ आए जिन्होंने उसके जीवन की दिशा बदल दी:

  1. बचपन में अनाथ होना: लुट्टन के माता-पिता का बचपन में ही देहांत हो गया था। इसके बाद उसकी सास ने उसका पालन-पोषण किया।
  2. पहलवान बनने का निश्चय: अपनी सास पर हुए अत्याचारों का बदला लेने की प्रेरणा से लुट्टन ने पहलवान बनने का दृढ़ निश्चय किया।
  3. बिना गुरु के कुश्ती सीखना: उसने किसी औपचारिक गुरु से कुश्ती नहीं सीखी, बल्कि ढोल की आवाज़ को ही अपना गुरु मानकर दाँव-पेंच सीखे और ढोल को सदैव अपने पास रखा।
  4. पत्नी की मृत्यु और बच्चों का पालन-पोषण: अल्पायु में ही उसे अपनी पत्नी को खोना पड़ा। इसके बाद उसने अपने दो छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी संभाली और उन्हें भी पहलवानी के दाँव-पेंच सिखाए।
  5. राजसी सुख-सुविधाओं का अंत: उसने राजा की छत्रछाया में लगभग पंद्रह वर्ष सुखपूर्वक बिताए, जहाँ उसे राजसी भोग-विलास प्राप्त थे। परन्तु राजा के निधन के बाद, उनके पुत्र ने लुट्टन के खर्च को फिजूलखर्ची मानकर उसे इन सुविधाओं से वंचित कर दिया।
  6. गाँव के बच्चों को प्रशिक्षण: राजसी आश्रय छिन जाने के बाद, उसने गाँव के बच्चों को पहलवानी सिखानी शुरू की।
  7. बच्चों की मृत्यु का दुःख: उसे अपने बच्चों की मृत्यु जैसे असहनीय दुःख का भी सामना करना पड़ा, जिसका उसने साहसपूर्वक सामना किया।
  8. महामारी के समय ढोलक बजाना: गाँव में फैली महामारी के दौरान, जब चारों ओर निराशा और मृत्यु का सन्नाटा था, तब भी लुट्टन ने ढोलक बजाना जारी रखा। उसने ढोलक की आवाज़ से लोगों में उत्साह का संचार किया और उन्हें मृत्यु से लड़ने का साहस दिया।

प्रश्न 3

लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है?
Solution:

लुट्टन पहलवान ने यह बात इसलिए कही होगी क्योंकि उसने कुश्ती के दाँव-पेंच किसी मनुष्य गुरु से नहीं, बल्कि ढोल की आवाज़ और उसकी थाप से सीखे थे। ढोल की विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ उसे विभिन्न दाँव-पेंचों का संकेत देती थीं और उसे लड़ने के लिए प्रेरित करती थीं। जब ढोल बजता था, तो उसकी नसें उत्तेजित हो जाती थीं और उसका मन प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ने के लिए आतुर हो उठता था। ढोल की आवाज़ उसके लिए केवल संगीत नहीं, बल्कि एक शिक्षक, एक मार्गदर्शक और एक प्रेरणा स्रोत थी, जो उसे लड़ने की शक्ति और साहस प्रदान करती थी। इसलिए, उसने ढोल को ही अपना वास्तविक गुरु माना।

प्रश्न 4

गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान ढोल क्यों बजाता रहा?
Solution:

गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों की मृत्यु के असहनीय दुःख के बावजूद लुट्टन पहलवान ढोल बजाता रहा क्योंकि वह जानता था कि ढोल की आवाज़ में लोगों के मन से निराशा और भय को दूर भगाने की शक्ति है। उस विकट परिस्थिति में, जब गाँव में चारों ओर मृत्यु का सन्नाटा पसरा था और लोग हताश थे, लुट्टन की ढोलक की आवाज़ गाँव वालों के लिए जीने की उमंग और साहस का संचार करती थी। यह आवाज़ उन्हें महामारी से लड़ने और कभी हार न मानने की प्रेरणा देती थी। संभवतः, ढोल बजाकर वह अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को भी कम करने का प्रयास कर रहा था और साथ ही साथ गाँव वालों को मृत्यु की चुनौती का सामना करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था।

प्रश्न 5

ढोलक की आवाज़ का पूरे गाँव पर क्या असर होता था?
Solution:

ढोलक की आवाज़ का पूरे गाँव पर गहरा और सकारात्मक असर होता था। रात के समय जब महामारी के कारण चारों ओर भय, दुख और मृत्यु का सन्नाटा छाया रहता था, तब ढोलक की आवाज़ उस विभीषिका को कम करती थी। यह आवाज़ पीड़ित लोगों की नसों में एक नई ऊर्जा का संचार करती थी, मानो बिजली सी दौड़ जाती हो। ढोलक की थाप सुनकर लोगों को दंगल का दृश्य याद आ जाता था, जिससे उनमें मृत्यु या बीमारी रूपी शत्रु से लड़ने का साहस और उत्साह जागृत होता था। वे अपनी पीड़ा को भूलकर खुशी-खुशी मौत का सामना करने के लिए तैयार हो जाते थे। इस प्रकार, ढोलक की आवाज़ मृतप्राय गाँव वालों में संजीवनी शक्ति भरकर उन्हें महामारी से लड़ने की प्रेरणा देती थी।

प्रश्न 6

महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में क्या अंतर होता था?
Solution:

महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्यों में एक मार्मिक अंतर आ गया था। सूर्योदय के समय, भले ही कोलाहल, हाहाकार और रुदन होता रहता था, फिर भी लोगों के चेहरों पर जीवन की एक झलक दिखाई देती थी। वे एक-दूसरे को सांत्वना देते थे और दुख में शामिल होते थे। लेकिन जैसे ही सूर्यास्त होता था, पूरा परिदृश्य बदल जाता था। लोग अपने घरों में दुबक जाते थे और पूरी तरह खामोश हो जाते थे। ऐसी स्थिति में, माताएँ भी अपने मरते हुए पुत्र को अंतिम विदाई के शब्द तक नहीं कह पाती थीं। इस घोर अंधकार और सन्नाटे के बीच केवल पहलवान की ढोलक की आवाज़ ही सुनाई देती थी, जो मानो महामारी को चुनौती दे रही हो और जीवन का संदेश दे रही हो।

प्रश्न 7

कुश्ती या दंगल पहले लोगों और राजाओं का प्रिय शौक हुआ करता था। पहलवानों को राजा एवं लोगों के द्वारा विशेष सम्मान दिया जाता था - ऐसी स्थिति अब क्यों नहीं है? इसकी जगह अब किन खेलों ने ले ली है? कुश्ती को फिर से प्रिय खेल बनाने के लिए क्या-क्या कार्य किए जा सकते हैं?
Solution:

पहले कुश्ती मनोरंजन का एक प्रमुख साधन थी क्योंकि उस समय मनोरंजन के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे। राजा-महाराजा स्वयं कुश्ती के शौकीन होते थे और दंगलों का आयोजन करवाते थे, जिससे पहलवानों को विशेष सम्मान और प्रसिद्धि मिलती थी।

ऐसी स्थिति अब क्यों नहीं है?

समय के साथ मनोरंजन के साधनों में भारी बदलाव आया है। सिनेमा, टेलीविजन, क्रिकेट जैसे विभिन्न आधुनिक खेल और अन्य मनोरंजक गतिविधियाँ लोगों के जीवन का हिस्सा बन गई हैं। इन नए साधनों की लोकप्रियता के कारण कुश्ती जैसे पारंपरिक खेलों का महत्व कम हो गया है। लोगों का ध्यान और समय इन नए आकर्षणों की ओर अधिक आकर्षित होता है, जिससे कुश्ती को वह पहले जैसा स्थान और सम्मान नहीं मिल पाता।

इसकी जगह अब किन खेलों ने ले ली है?

आज के समय में क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी, बैडमिंटन, टेनिस, बास्केटबॉल जैसे कई खेल कुश्ती की जगह ले चुके हैं और अत्यधिक लोकप्रिय हो गए हैं। ये खेल न केवल दर्शकों के बीच, बल्कि मीडिया और प्रायोजकों के बीच भी अधिक लोकप्रिय हैं।

कुश्ती को फिर से प्रिय खेल बनाने के लिए क्या-क्या कार्य किए जा सकते हैं?

कुश्ती को पुनः लोकप्रिय बनाने के लिए निम्नलिखित कार्य किए जा सकते हैं:

  • प्रचार और प्रसार: कुश्ती के आयोजनों का अधिक से अधिक प्रचार किया जाए और उन्हें मीडिया के माध्यम से व्यापक दर्शकों तक पहुँचाया जाए।
  • आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएँ: पहलवानों को बेहतर प्रशिक्षण सुविधाएँ और आधुनिक तकनीकें उपलब्ध कराई जाएँ।
  • प्रोत्साहन और पुरस्कार: पहलवानों को बेहतर पुरस्कार राशि, छात्रवृत्ति और अन्य सुविधाएँ प्रदान की जाएँ ताकि वे इस खेल के प्रति आकर्षित हों।
  • नियमों का सरलीकरण: खेल के नियमों को थोड़ा सरल और अधिक रोमांचक बनाया जा सकता है ताकि आम दर्शक उसे आसानी से समझ सकें और उसका आनंद ले सकें।
  • स्कूलों और कॉलेजों में बढ़ावा: स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में कुश्ती को शामिल किया जाए और इसे बढ़ावा दिया जाए ताकि युवा पीढ़ी इससे जुड़े।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शन: भारतीय पहलवानों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, जिससे देश में कुश्ती के प्रति रुचि बढ़े।

Common mistakes

  • Confusing the dholak's sound with mere entertainment rather than a source of inspiration.
  • Underestimating the emotional impact of Luttan's personal losses.
  • Failing to connect the decline of wrestling with the rise of new entertainment forms.
  • Not recognizing the symbolic significance of the dholak during the epidemic.

Revision tips

  • Focus on the symbolic meaning of the dholak in Luttan's life and the village's struggle.
  • Trace the key events in Luttan's life and their impact on his character.
  • Analyze how the author uses sound (dholak beats) to convey emotions and themes.
  • Compare and contrast the past glory of wrestling with its current status.
  • Understand the narrative's message about resilience and hope in the face of adversity.

Practice MCQs

Q1. कुश्ती के समय ढोल की आवाज़ और लुट्टन के दाँव-पेंच में कैसा तालमेल था?

Q2. लुट्टन पहलवान ने अपने गुरु के रूप में किसे स्वीकार किया था?

Q3. गाँव में महामारी फैलने पर लुट्टन पहलवान ढोल क्यों बजाता रहा?

Q4. ढोलक की आवाज़ का गाँव वालों पर क्या असर होता था?

Q5. राजा के निधन के बाद लुट्टन पहलवान की राजसी सुविधाओं से वंचित होने का क्या कारण था?

Frequently asked questions

यह NCERT समाधान किस कक्षा और विषय के लिए हैं?

यह NCERT समाधान CBSE कक्षा 12 के हिंदी आरोह पाठ्यपुस्तक के अध्याय 14, 'फणीश्वर नाथ रेणु' के लिए हैं।

इन समाधानों में लुट्टन पहलवान के जीवन के किन पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है?

समाधान लुट्टन के कुश्ती के दाँव-पेंच और ढोल की आवाज़ के बीच के संबंध, उसके जीवन के महत्वपूर्ण मोड़, व्यक्तिगत त्रासदियों और महामारी के दौरान उसके साहस पर प्रकाश डालते हैं।

ढोलक की आवाज़ का लुट्टन और गाँव वालों के लिए क्या महत्व था?

लुट्टन के लिए ढोलक उसका गुरु था, जो उसे दाँव-पेंच सिखाता था। गाँव वालों के लिए, महामारी के समय ढोलक की आवाज़ निराशा में आशा और मृत्यु के भय में लड़ने का साहस जगाती थी।

क्या ये समाधान परीक्षा की तैयारी में मदद करेंगे?

हाँ, ये समाधान पाठ की गहरी समझ प्रदान करते हैं, मुख्य अवधारणाओं को स्पष्ट करते हैं और लुट्टन पहलवान के चरित्र और उसकी परिस्थितियों का विश्लेषण करने में मदद करते हैं, जो परीक्षा की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण है।

कुश्ती के खेल की वर्तमान स्थिति के बारे में क्या बताया गया है?

समाधान बताते हैं कि मनोरंजन के नए साधनों के आने से कुश्ती का प्रिय खेल के रूप में महत्व कम हो गया है, जबकि पहले राजा-महाराजा और लोग इसे बहुत सम्मान देते थे।

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