कक्षा 11 हिंदी NCERT समाधान: पाठ 14. विदाई-संभाषण
यह पृष्ठ कक्षा 11 हिंदी के पाठ 'विदाई-संभाषण' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। यह पाठ लॉर्ड कर्जन के भारत में वायसराय के रूप में कार्यकाल और उनके शासनकाल के दौरान भारतीयों की स्थिति पर केंद्रित है। समाधान में लेखक बालमुकुंद गुप्त के जीवन और साहित्यिक योगदान का भी संक्षिप्त परिचय दिया गया है। पाठ का सारांश लॉर्ड कर्जन के दो बार के कार्यकाल, उनके द्वारा किए गए विकास कार्यों के पीछे के वास्तविक उद्देश्यों, सरकारी निरंकुशता, प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध और अंततः उनके इस्तीफे का विश्लेषण करता है। समाधान व्यंग्यात्मक शैली में भारतीयों की लाचारी को लॉर्ड कर्जन की अपनी लाचारी से जोड़ते हुए बताते हैं कि कैसे अत्याचारी शासन सभी को प्रभावित करता है। इसमें शिवशंभु की गायों के उदाहरण के माध्यम से बिछड़ने के दुख और करुणा को भी समझाया गया है। ये समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी में मदद करने के लिए पाठ की गहरी समझ प्रदान करते हैं।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 11 |
| Subject | हिंदी |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 14. विदाई-संभाषण |
Chapter summary
कक्षा 11 हिंदी के पाठ 14 'विदाई-संभाषण' के NCERT समाधान लॉर्ड कर्जन के वायसराय के रूप में कार्यकाल का विश्लेषण करते हैं। यह पाठ शिवशंभु के चिट्ठे का एक अंश है, जो व्यंग्यात्मक शैली में भारतीयों की दुर्दशा और कर्जन की निरंकुशता को दर्शाता है। समाधान में कर्जन के शासनकाल की घटनाओं, प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध और उनके इस्तीफे के कारणों पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, बिछड़ने के भाव और करुणा को समझाने के लिए शिवशंभु की गायों का उदाहरण भी प्रस्तुत किया गया है।
Learning outcomes
- लॉर्ड कर्जन के भारत में वायसराय के रूप में कार्यकाल और नीतियों को समझना।
- व्यंग्यात्मक लेखन शैली की पहचान करना और उसके प्रभाव का विश्लेषण करना।
- शिवशंभु की गायों के उदाहरण से बिछड़ने के भाव और करुणा को समझना।
- पाठ में निहित राजनीतिक और सामाजिक आलोचना को पहचानना।
- बालमुकुंद गुप्त के साहित्यिक योगदान और उनकी पत्रकारिता की भूमिका को जानना।
Topics covered
Paper topics
- लॉर्ड कर्जन का वायसराय के रूप में कार्यकाल
- भारतीयों की स्थिति और लाचारी
- सरकारी निरंकुशता और प्रेस की स्वतंत्रता
- व्यंग्य और हास्य का प्रयोग
- बालमुकुंद गुप्त का जीवन परिचय
- शिवशंभु के चिट्ठे
- बिछड़ने का भाव और करुणा
- ईश्वर की लीला और मानव जीवन
Important topics
- लॉर्ड कर्जन के शासनकाल का विश्लेषण
- पाठ की व्यंग्यात्मक शैली
- शिवशंभु की गायों का प्रसंग
- प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध का प्रभाव
- लेखक बालमुकुंद गुप्त का परिचय
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Questions and Solutions
यह पृष्ठ कक्षा 11 हिंदी के पाठ 14 'विदाई-संभाषण' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। यह पाठ लॉर्ड कर्जन के भारत में वायसराय के रूप में कार्यकाल और उनके शासनकाल के दौरान भारतीयों की स्थिति पर केंद्रित है। समाधान में लेखक बालमुकुंद गुप्त के जीवन और साहित्यिक योगदान का भी संक्षिप्त परिचय दिया गया है। पाठ का सारांश लॉर्ड कर्जन के दो बार के कार्यकाल, उनके द्वारा किए गए विकास कार्यों के पीछे के वास्तविक उद्देश्यों, सरकारी निरंकुशता, प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध और अंततः उनके इस्तीफे का विश्लेषण करता है। समाधान व्यंग्यात्मक शैली में भारतीयों की लाचारी को लॉर्ड कर्जन की अपनी लाचारी से जोड़ते हुए बताते हैं कि कैसे अत्याचारी शासन सभी को प्रभावित करता है। इसमें शिवशंभु की गायों के उदाहरण के माध्यम से बिछड़ने के दुख और करुणा को भी समझाया गया है। ये समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी में मदद करने के लिए पाठ की गहरी समझ प्रदान करते हैं।
लेखक परिचय
बालमुकुंद गुप्त का जन्म 1865 ई. में हरियाणा के रोहतक जिले के ग्डियानी गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम लाला पूरनमल था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही उर्दू भाषा में प्राप्त की और बाद में हिंदी सीखी। यद्यपि उन्होंने केवल मिडिल कक्षा तक ही औपचारिक शिक्षा प्राप्त की, परंतु स्वाध्याय के माध्यम से उन्होंने गहन ज्ञान अर्जित किया। वे खड़ी बोली और आधुनिक हिंदी साहित्य को स्थापित करने वाले प्रमुख लेखकों में से एक माने जाते हैं।
गुप्त जी ने अपने जीवनकाल में कई महत्वपूर्ण समाचार-पत्रों का संपादन किया। उन्होंने उर्दू के दो प्रमुख पत्रों 'अखबार-ए-चुनार' तथा 'कोहेनूर' का संपादन कार्य संभाला। इसके पश्चात, उन्होंने हिंदी के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों जैसे 'हिंदुस्तान', 'हिंदी बंगवासी', और 'भारतमित्र' का भी संपादन किया। उनका देहावसान बहुत कम आयु में, 1907 ई. में हो गया था।
उनकी प्रमुख रचनाएँ पाँच संग्रहों में प्रकाशित हुई हैं: 'शिवशंभु के चिट्ठे', 'चिट्ठे और खत', 'खेल तमाशा', 'गुप्त निबंधावली', और 'स्फुट कविताएँ'।
साहित्यिक दृष्टि से, गुप्त जी भारतेंदु युग और द्विवेदी युग के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखे जाते हैं। वे राष्ट्रीय नवजागरण के एक सक्रिय पत्रकार थे और उस दौर के अन्य पत्रकारों की तरह ही साहित्य सृजन में भी सक्रिय रहे। उनके लिए पत्रकारिता स्वाधीनता संग्राम का एक शक्तिशाली हथियार थी, जिसके कारण उनके लेखन में एक विशेष प्रकार की निर्भीकता और तीक्ष्णता दिखाई देती है। उनकी रचनाओं में व्यंग्य-विनोद का भी उत्कृष्ट पुट मिलता है। उन्होंने बांग्ला और संस्कृत की कुछ रचनाओं का अनुवाद भी किया। वे शब्दों के प्रयोग और उनकी शुद्धता के प्रति अत्यंत सजग थे; उदाहरण के लिए, उन्होंने 'अनस्थिरता' शब्द की शुद्धता को लेकर महावीर प्रसाद द्विवेदी के साथ एक लंबी बहस भी की थी।
पाठ का सारांश
यह पाठ, 'विदाई-संभाषण', लॉर्ड कर्जन के भारत में वायसराय के रूप में कार्यकाल (1899-1904 और 1904-1905) के दौरान भारतीयों की दयनीय स्थिति का खुलासा करता है। यह शिवशंभु के चिट्ठे का एक अंश है। लॉर्ड कर्जन के शासनकाल में यद्यपि विकास के अनेक कार्य हुए और नए आयोगों का गठन किया गया, किंतु इन सबका मुख्य उद्देश्य शासन में अंग्रेजों का वर्चस्व स्थापित करना और भारत के संसाधनों का अधिकतम लाभ अंग्रेजों के हित में सुनिश्चित करना था। कर्जन ने हर स्तर पर अंग्रेजों के प्रभुत्व को मजबूत करने का प्रयास किया और वे सरकारी निरंकुशता के प्रबल समर्थक थे। इसी कारण उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। अंततः, जब वे कौंसिल में अपने मनपसंद अंग्रेज सदस्यों को नियुक्त करवाने में सफल नहीं हो पाए, तो उन्हें देश और विदेश दोनों जगह अपमानित होना पड़ा। इस कारण क्षुब्ध होकर उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और इंग्लैंड वापस लौट गए।
लेखक ने व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग करते हुए भारतीयों की बेबसी, दुख और लाचारी को लॉर्ड कर्जन की अपनी लाचारी से जोड़ने का प्रयास किया है। इसके माध्यम से लेखक यह बताना चाहते हैं कि शासन के अत्याचारी रूप से हर कोई प्रभावित होता है, चाहे वह सामान्य जनता हो या स्वयं लॉर्ड कर्जन जैसा वायसराय। यह निबंध उस समय लिखा गया था जब प्रेस पर पाबंदियों का दौर चल रहा था। ऐसी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में, विनोदप्रियता, चंचलता, संजीदगी, नवीन भाषा-प्रयोग और प्रवाह के साथ यह एक साहसिक गद्य का उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करता है।
लेखक लॉर्ड कर्जन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि आखिरकार आपके शासन का अंत हो ही गया, जबकि आपकी तो यहाँ स्थायी वायसराय बने रहने की इच्छा थी। इतनी जल्दी देश छोड़ने की बात न तो आपको पता थी और न ही देशवासियों को। यह ईश्वर की इच्छा का ही परिणाम है। आपके दूसरी बार भारत आने पर भारतीय प्रसन्न नहीं थे; वे आपके जाने की ही प्रतीक्षा कर रहे थे। तथापि, आपके जाने से कुछ लोग दुखी भी हैं। लेखक बिछड़ने के समय को पवित्र, निर्मल और कोमल बताते हैं, जो करुणा उत्पन्न करता है। भारत में तो पशु-पक्षी भी ऐसे समय में उदास हो जाते हैं। लेखक शिवशंभु की दो गायों का उदाहरण देते हैं: एक बलशाली गाय दूसरी कमजोर गाय को लगातार परेशान करती रहती थी। एक दिन बलशाली गाय को पुरोहित को दान में दे दिया गया। परंतु, उसके जाने के बाद कमजोर गाय प्रसन्न नहीं हुई; उसने चारा भी खाना छोड़ दिया। यदि पशुओं की यह दशा है, तो मनुष्यों की स्थिति का अंदाजा लगाना कठिन है।
लेखक आगे कहते हैं कि इस देश में पहले भी अनेक शासक आए और चले गए, यह एक स्वाभाविक परंपरा है। परंतु, आपका शासनकाल विशेष रूप से दुखों से भरा रहा। कर्जन ने अपने सारे कार्य सुखांत समझकर किए थे, लेकिन उनका अंत दुख में हुआ। वास्तव में, ईश्वर की लीला को कोई नहीं समझ सकता। आपके दूसरी बार भारत आने पर आपने ऐसे कार्य करने की योजना बनाई थी जिससे भविष्य के शासकों को कोई परेशानी न हो, परंतु सब कुछ उलट गया। आप स्वयं भी बेचैन रहे और देश में अशांति फैलाई। आने वाले शासकों को भी निश्चित रूप से परेशानी का सामना करना पड़ेगा। आपने स्वयं भी कष्ट सहे और जनता को भी कष्ट दिए।
लेखक यह भी बताते हैं कि आपका पद पहले बहुत ऊँचा था, परंतु आज आपकी दशा दयनीय है। दिल्ली दरबार में ईश्वर और एडवर्ड के बाद आपका ही सर्वोच्च स्थान था। आपकी कुर्सी सोने की बनी थी और जुलूस में आपका हाथी सबसे आगे और सबसे ऊँचा था। परंतु, जंगी लाट (कमांडर-इन-चीफ) के मुकाबले में आपको नीचा देखना पड़ा। आप स्वभाव से धीर और गंभीर थे, फिर भी कौंसिल में गैरकानूनी कानून पास करके आपने अपनी गरिमा को ठेस पहुंचाई।
प्रश्न 1
लेखक के अनुसार, लॉर्ड कर्जन के भारत आने का मुख्य उद्देश्य केवल अपने शासनकाल में अंग्रेजों का वर्चस्व स्थापित करना और भारत के प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम लाभ अंग्रेजों के हित में उठाना था। यद्यपि उन्होंने विकास के नाम पर नए आयोगों का गठन किया और कई कार्य किए, परंतु इन सबके पीछे उनका अंतिम लक्ष्य भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के लिए अधिक उपयोगी बनाना था। वे सरकारी निरंकुशता के पक्षधर थे और भारतीयों की स्वतंत्रता को सीमित करना चाहते थे, ताकि उनका शासन निर्बाध रूप से चल सके।
प्रश्न 2
लॉर्ड कर्जन सरकारी निरंकुशता के प्रबल समर्थक थे। इसी कारण उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। उनका मानना था कि प्रेस की स्वतंत्रता उनके शासन के लिए बाधा उत्पन्न कर सकती है। इस प्रतिबंध के कारण उस समय के पत्रकारों और लेखकों को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना पड़ा, जैसा कि लेखक बालमुकुंद गुप्त ने स्वयं अनुभव किया।
प्रश्न 3
लॉर्ड कर्जन को अपने कार्यकाल के अंत में विशेष रूप से कौंसिल में गैरकानूनी कानून पास करवाने और मनपसंद अंग्रेज सदस्यों की नियुक्ति करवाने के मुद्दे पर नीचा देखना पड़ा। इस प्रयास में उन्हें देश और विदेश दोनों जगह आलोचनाओं का सामना करना पड़ा और उनकी इच्छा के अनुसार कार्य नहीं हो सका, जिससे वे अपमानित महसूस हुए और अंततः उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
प्रश्न 4
लेखक ने शिवशंभु की दो गायों का उदाहरण देकर बिछड़ने के दुख और उससे उत्पन्न होने वाली करुणा की भावना को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। एक बलशाली गाय के पुरोहित को दान में दिए जाने के बाद, कमजोर गाय का उदास हो जाना और चारा न खाना, यह दर्शाता है कि बिछड़ने का दर्द कितना गहरा होता है। लेखक इस उदाहरण के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि जब पशु भी बिछड़ने के दुख से व्यथित हो सकते हैं, तो मनुष्य की भावनाओं का अंदाजा लगाना और भी कठिन है। यह उदाहरण लॉर्ड कर्जन के जाने पर कुछ भारतीयों के दुख को भी प्रतीकात्मक रूप से दर्शाता है।
प्रश्न 5
पाठ के अंत में लेखक लॉर्ड कर्जन की दो विपरीत दशाओं का वर्णन करता है। पहली दशा उनके उच्च पद और सम्मान की है, जब वे दिल्ली दरबार में ईश्वर और एडवर्ड के बाद सर्वोच्च स्थान पर थे, उनकी कुर्सी सोने की थी और जुलूस में उनका हाथी सबसे आगे था। दूसरी दशा उनके अपमानित और कमजोर होने की है, जब उन्हें जंगी लाट के मुकाबले नीचा देखना पड़ा और कौंसिल में गैरकानूनी कानून पास करके अपनी गरिमा को ठेस पहुंचानी पड़ी। लेखक इन दोनों दशाओं के माध्यम से जीवन की अनिश्चितता और शक्ति के उतार-चढ़ाव को दर्शाते हैं।
प्रश्न 6
'विदाई-संभाषण' पाठ का मूल भाव लॉर्ड कर्जन के निरंकुश शासन पर व्यंग्य करना और भारतीयों की लाचारी को उजागर करना है। लेखक यह बताना चाहते हैं कि किस प्रकार सत्ता का अहंकार और अत्याचारी शासन सभी के लिए कष्टकारी होता है, चाहे वह शासक हो या शासित। पाठ बिछड़ने के समय की करुणा और मानवीय भावनाओं को भी दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, यह पाठ ईश्वर की लीला के रहस्य और जीवन की अनिश्चितता पर भी प्रकाश डालता है।
Common mistakes
- पाठ के व्यंग्यात्मक लहजे को समझने में कठिनाई।
- लॉर्ड कर्जन की नीतियों के पीछे के वास्तविक उद्देश्यों को न समझ पाना।
- शिवशंभु की गायों के उदाहरण और उसके प्रतीकात्मक अर्थ को गलत समझना।
- लेखक बालमुकुंद गुप्त के साहित्यिक योगदान को पाठ के संदर्भ से अलग करके देखना।
Revision tips
- पाठ को व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण से पढ़ें और समझें कि लेखक लॉर्ड कर्जन पर कैसे कटाक्ष कर रहे हैं।
- लॉर्ड कर्जन के कार्यकाल की प्रमुख घटनाओं और उनके परिणामों को सूचीबद्ध करें।
- शिवशंभु की गायों वाले प्रसंग के प्रतीकात्मक अर्थ पर विशेष ध्यान दें।
- लेखक बालमुकुंद गुप्त के जीवन और उनकी रचनाओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी याद रखें।
Practice MCQs
Q1. लॉर्ड कर्जन भारत में कितनी बार वायसराय बनकर आए?
Explanation: लॉर्ड कर्जन 1899-1904 और 1904-1905 तक दो बार भारत के वायसराय रहे।
Q2. शिवशंभु के चिट्ठे किस लेखक की रचना है?
Explanation: पाठ 'विदाई-संभाषण' बालमुकुंद गुप्त के संग्रह 'शिवशंभु के चिट्ठे' का एक अंश है।
Q3. पाठ के अनुसार, लॉर्ड कर्जन का अंत किस रूप में हुआ?
Explanation: लेखक व्यंग्यात्मक ढंग से कहता है कि कर्जन ने सारा राजकाज सुखांत समझकर किया, पर उसका अंत दुख में हुआ।
Q4. शिवशंभु की कितनी गायें थीं?
Explanation: शिवशंभु के पास दो गायें थीं, जिनमें से एक बलशाली थी और दूसरी कमजोर।
Q5. लॉर्ड कर्जन ने किस पर प्रतिबंध लगा दिया था?
Explanation: पाठ के अनुसार, लॉर्ड कर्जन सरकारी निरंकुशता के पक्षधर थे और उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा दिया था।
Frequently asked questions
यह पाठ 'विदाई-संभाषण' किस बारे में है?
यह पाठ लॉर्ड कर्जन के भारत में वायसराय के रूप में कार्यकाल और उनके शासनकाल के दौरान भारतीयों की स्थिति पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी है। यह उनके इस्तीफे और भारत छोड़ने के प्रसंग पर केंद्रित है।
लेखक बालमुकुंद गुप्त का इस पाठ से क्या संबंध है?
बालमुकुंद गुप्त इस पाठ के लेखक हैं और यह पाठ उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह 'शिवशंभु के चिट्ठे' का एक अंश है।
पाठ में शिवशंभु की गायों का उदाहरण क्यों दिया गया है?
शिवशंभु की गायों का उदाहरण बिछड़ने के दुख और करुणा को दर्शाने के लिए दिया गया है। एक गाय के जाने पर दूसरी गाय का उदास हो जाना, मनुष्यों की भावनाओं को समझने का आधार बनता है।
लॉर्ड कर्जन को भारत से क्यों जाना पड़ा?
लॉर्ड कर्जन को कौंसिल में मनपसंद अंग्रेज सदस्य नियुक्त करवाने के मुद्दे पर देश-विदेश दोनों जगह नीचा देखना पड़ा, जिसके कारण क्षुब्ध होकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया और वापस इंग्लैंड चले गए।
यह पाठ परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करता है?
यह पाठ लॉर्ड कर्जन के शासन, व्यंग्य शैली और लेखक के विचारों की गहरी समझ प्रदान करता है, जो परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक होता है।
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