कक्षा 10 विज्ञान: आनुवंशिकता एवं जैव विकास NCERT समाधान

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यह पृष्ठ कक्षा 10 विज्ञान के अध्याय 9, 'आनुवंशिकता एवं जैव विकास' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रदान करता है। इसमें आनुवंशिकता के मूल सिद्धांतों, मेंडल के प्रयोगों, प्रभावी और अप्रभावी लक्षणों, लिंग निर्धारण, और जैव विकास की प्रक्रियाओं को शामिल किया गया है। समाधानों में विभिन्न तरीकों से लक्षणों की वंशागति, उपार्जित लक्षणों का अगली पीढ़ी में न जाना, और बाघों जैसी प्रजातियों की घटती संख्या के आनुवंशिक कारणों पर चर्चा की गई है। यह खंड छात्रों को जटिल अवधारणाओं को समझने, विभिन्न लक्षणों के उद्भव और विकास के पीछे के कारणों का विश्लेषण करने में मदद करता है। ये समाधान परीक्षा की तैयारी के लिए एक उत्कृष्ट संसाधन हैं, जो छात्रों को अभ्यास करने और अपनी समझ को मजबूत करने में सहायता करते हैं।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 10
Subjectविज्ञान
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter9. आनुवंशिकता एवं जैव विकास

Chapter summary

कक्षा 10 विज्ञान के अध्याय 9 'आनुवंशिकता एवं जैव विकास' के ये NCERT समाधान आनुवंशिकता के मूलभूत सिद्धांतों, मेंडल के नियमों, और लक्षणों की वंशागति पर केंद्रित हैं। इसमें प्रभावी और अप्रभावी लक्षणों की पहचान, स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम, और मानव में लिंग निर्धारण की प्रक्रिया को समझाया गया है। समाधान जैव विकास के कारकों, जैसे विभिन्नताएँ, भौगोलिक पृथक्करण, और प्राकृतिक चयन पर भी प्रकाश डालते हैं। यह छात्रों को यह समझने में मदद करता है कि कैसे लक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होते हैं और समय के साथ प्रजातियों में कैसे परिवर्तन आते हैं।

Learning outcomes

  • आनुवंशिकता के मूल सिद्धांतों को समझना।
  • मेंडल के प्रयोगों और उनके निष्कर्षों का विश्लेषण करना।
  • प्रभावी और अप्रभावी लक्षणों के बीच अंतर स्पष्ट करना।
  • मानव में लिंग निर्धारण की प्रक्रिया को समझना।
  • जैव विकास को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों की पहचान करना।
  • विभिन्नताओं के महत्व और प्रजातियों के अस्तित्व में उनकी भूमिका को समझना।

Topics covered

Paper topics

  • आनुवंशिकता के मूल सिद्धांत
  • मेंडल के प्रयोग और नियम
  • प्रभावी और अप्रभावी लक्षण
  • एकसंकर और द्विसंकर क्रॉस
  • लक्षणों की वंशागति
  • मानव में लिंग निर्धारण
  • जैव विकास
  • विभिन्नताएँ और उनका महत्व
  • स्पीशीएशन (नई प्रजातियों का उद्भव)
  • प्राकृतिक चयन
  • आनुवंशिक विचलन
  • उपार्जित लक्षण

Important topics

  • मेंडल के आनुवंशिकता के नियम
  • प्रभावी और अप्रभावी लक्षणों की पहचान
  • मानव में लिंग निर्धारण की प्रक्रिया
  • जैव विकास के कारक
  • विभिन्नताओं का महत्व
  • स्पीशीएशन की प्रक्रिया

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

यदि एक 'लक्षण - A' अलैंगिक प्रजनन वाली समष्टि के 10 प्रतिशत सदस्यों में पाया जाता है तथा 'लक्षण - B' उसी समष्टि में 60 प्रतिशत जीवों में पाया जाता है, तो कौन सा लक्षण पहले उत्पन्न हुआ होगा?
Solution:

यह संभावना है कि लक्षण 'B' पहले उत्पन्न हुआ होगा। इसका कारण यह है कि यह समष्टि के 60 प्रतिशत जीवों में पाया जाता है, जबकि लक्षण 'A' केवल 10 प्रतिशत जीवों में है। अलैंगिक प्रजनन में, DNA प्रतिकृति के दौरान विभिन्नताएँ कम होती हैं। इसलिए, जो लक्षण अधिक संख्या में मौजूद है, वह संभवतः अधिक समय से समष्टि में है या अधिक प्रभावी ढंग से फैल रहा है।

प्रश्न 2

विभिन्नताओं के उत्पन्न होने से किसी स्पीशीज का अस्तित्व किस प्रकार बढ़ जाता है?
Solution:

विभिन्नताएँ किसी स्पीशीज के अस्तित्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे प्रजातियों को बदलते पर्यावरण के अनुकूल ढलने में मदद करती हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी, जीवों को अपने वातावरण के अनुसार स्वयं को बदलना पड़ता है ताकि वे जीवित रह सकें। विभिन्नताएँ जीवों को विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों, जैसे तापमान परिवर्तन, भोजन की कमी, या नए शिकारियों के प्रति अधिक सहनशील बनाती हैं। यदि किसी प्रजाति में पर्याप्त विभिन्नताएँ नहीं होंगी, तो वह अचानक होने वाले पर्यावरणीय परिवर्तनों का सामना नहीं कर पाएगी और विलुप्त हो सकती है। लैंगिक जनन, जो विभिन्नताओं को उत्पन्न करता है, इस प्रक्रिया में विशेष रूप से सहायक होता है।

प्रश्न 3

मेंडल के प्रयोगों द्वारा कैसे पता चला कि लक्षण प्रभावी अथवा अप्रभावी होते हैं?
Solution:

ग्रेगर मेंडल ने मटर के पौधों पर अपने प्रयोगों के माध्यम से प्रभावी और अप्रभावी लक्षणों की अवधारणा को समझाया। उन्होंने लंबे मटर के पौधों का बौने मटर के पौधों के साथ संकरण कराया। परिणाम स्वरूप, पहली पीढ़ी (F1 पीढ़ी) में उत्पन्न सभी पौधे लंबे थे। इसका अर्थ यह हुआ कि 'लंबेपन' का लक्षण 'बौनेपन' के लक्षण पर प्रभावी था और बौनापन अप्रभावी रहा, जो F1 पीढ़ी में दिखाई नहीं दिया।

इसके बाद, मेंडल ने F1 पीढ़ी के पौधों का स्वपरागण कराया। इस दूसरी पीढ़ी (F2 पीढ़ी) में, लंबे पौधों के साथ-साथ कुछ बौने पौधे भी उत्पन्न हुए (लगभग 3:1 के अनुपात में)। इससे यह निष्कर्ष निकला कि बौनेपन का लक्षण अप्रभावी था और F1 पीढ़ी में छिपा हुआ था, जो F2 पीढ़ी में पुनः प्रकट हुआ। इस प्रकार, मेंडल ने सिद्ध किया कि लक्षणों के जोड़े में एक लक्षण प्रभावी होता है और दूसरा अप्रभावी।

प्रश्न 4

मेंडल के प्रयोगों से कैसे पता चला कि विभिन्न लक्षण स्वतंत्र रूप से वंशानुगत होते हैं?
Solution:

मेंडल ने अपने द्विसंकर क्रॉस (dihybrid cross) प्रयोगों द्वारा यह स्थापित किया कि विभिन्न लक्षण स्वतंत्र रूप से वंशानुगत होते हैं। उन्होंने गोल बीज वाले और पीले रंग के बीज वाले लंबे मटर के पौधों का झुर्रीदार बीज वाले और हरे रंग के बीज वाले बौने मटर के पौधों से संकरण कराया।

F1 पीढ़ी में, सभी पौधे लंबे थे और उनके बीज गोल तथा पीले रंग के थे, जो प्रभावी लक्षणों को दर्शाते थे। जब F1 पीढ़ी के पौधों का स्वपरागण कराया गया, तो F2 पीढ़ी में विभिन्न लक्षणों के संयोजन वाले पौधे उत्पन्न हुए। केवल लंबे पौधे और गोल बीज वाले ही नहीं, बल्कि गोल बीज वाले बौने पौधे, झुर्रीदार बीज वाले लंबे पौधे, और झुर्रीदार बीज वाले बौने पौधे भी देखे गए। लक्षणों के इन विभिन्न संयोजनों (जैसे बीज का आकार और बीज का रंग) का स्वतंत्र रूप से वंशानुगत होना यह दर्शाता है कि ये लक्षण एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं और युग्मक निर्माण के समय स्वतंत्र रूप से व्यवस्थित होते हैं।

प्रश्न 5

एक A रुधिर वर्ग वाला पुरुष एक स्त्री जिसका रुधिर वर्ग 'O' है, से विवाह करता है। उनकी पुत्री का रुधिर वर्ग 'O' है। क्या यह सूचना पर्याप्त है यदि आपसे कहा जाए कि कौन सा विकल्प लक्षण-रुधिर वर्ग- 'A' अथवा 'O' प्रभावी लक्षण हैं? अपने उत्तर का स्पष्टीकरण दीजिए।
Solution:

यह सूचना रुधिर वर्ग 'A' और 'O' में से कौन सा प्रभावी है, यह निश्चित रूप से बताने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसका कारण यह है कि रुधिर वर्गों का निर्धारण ABO जीन द्वारा होता है, जिसके तीन एलील (alleles) होते हैं: IA, IB, और i। रुधिर वर्ग 'A' जीनोटाइप IAIA या IAi से हो सकता है, और रुधिर वर्ग 'O' का जीनोटाइप केवल ii होता है।

यदि पिता का रुधिर वर्ग 'A' है, तो उसका जीनोटाइप IAIA या IAi हो सकता है। माँ का रुधिर वर्ग 'O' है, तो उसका जीनोटाइप निश्चित रूप से ii होगा। उनकी पुत्री का रुधिर वर्ग 'O' (जीनोटाइप ii) है, इसका मतलब है कि पुत्री को माँ से एक 'i' एलील और पिता से भी एक 'i' एलील मिला है। इससे यह पता चलता है कि पिता का जीनोटाइप निश्चित रूप से IAi है (क्योंकि उसे पुत्री को एक 'i' एलील देना था)।

इस स्थिति में, हम यह नहीं कह सकते कि 'A' प्रभावी है या 'O' प्रभावी है। हम केवल यह जानते हैं कि 'A' एलील (IA) और 'O' एलील (i) के बीच, 'A' एलील अपना प्रभाव दिखाता है जब वह 'i' के साथ होता है (अर्थात IAi जीनोटाइप में रुधिर वर्ग 'A' होता है)। यह स्थापित तथ्य है कि रुधिर वर्ग 'A' (और 'B') रुधिर वर्ग 'O' पर प्रभावी होता है। दी गई जानकारी से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है, लेकिन यह सीधे तौर पर यह सिद्ध नहीं करता कि 'A' प्रभावी है, बल्कि यह केवल पिता के जीनोटाइप को स्पष्ट करता है।

प्रश्न 6

मानव में बच्चे का लिंग निर्धारण कैसे होता है?
Solution:

मानव में बच्चे का लिंग निर्धारण मुख्य रूप से लिंग गुणसूत्रों (sex chromosomes) द्वारा होता है। मनुष्यों में कुल 23 जोड़े गुणसूत्र होते हैं, जिनमें से 22 जोड़े अलिंग गुणसूत्र (autosomes) होते हैं और 1 जोड़ा लिंग गुणसूत्र का होता है।

स्त्रियों में लिंग गुणसूत्रों का जोड़ा XX होता है, जबकि पुरुषों में यह जोड़ा XY होता है।

जब युग्मक (gametes) बनते हैं, तो प्रत्येक युग्मक में केवल एक लिंग गुणसूत्र होता है। स्त्रियों के अंडाणु (egg) में हमेशा एक X गुणसूत्र होता है। पुरुषों के शुक्राणु (sperm) में या तो X गुणसूत्र होता है या Y गुणसूत्र होता है।

निषेचन के समय, जब शुक्राणु अंडाणु से मिलता है:

  • यदि X गुणसूत्र वाला शुक्राणु अंडाणु (जिसमें X गुणसूत्र है) से मिलता है, तो युग्मनज (zygote) का जीनोटाइप XX होगा, और इससे एक पुत्री का जन्म होगा।
  • यदि Y गुणसूत्र वाला शुक्राणु अंडाणु (जिसमें X गुणसूत्र है) से मिलता है, तो युग्मनज का जीनोटाइप XY होगा, और इससे एक पुत्र का जन्म होगा।

इस प्रकार, पिता के शुक्राणु में उपस्थित Y या X गुणसूत्र ही यह निर्धारित करता है कि जन्म लेने वाले बच्चे का लिंग क्या होगा।

प्रश्न 7

वे कौन से विभिन्न तरीके हैं जिनके द्वारा एक विशेष लक्षण वाले व्यष्टि जीवों की संख्या समष्टि में बढ़ सकती है।
Solution:

एक विशेष लक्षण वाले व्यष्टि जीवों की संख्या समष्टि में कई तरीकों से बढ़ सकती है, जो मुख्य रूप से प्राकृतिक चयन और अनुकूलन से संबंधित हैं:

  1. प्रजनन सफलता: यदि कोई विशेष लक्षण जीव को प्रजनन में अधिक सफल बनाता है (जैसे बेहतर साथी आकर्षित करना या संतान की बेहतर देखभाल करना), तो उस लक्षण वाले जीवों की संख्या बढ़ सकती है।
  2. पर्यावरणीय अनुकूलन: यदि कोई विशेष लक्षण जीव को उसके पर्यावरण में जीवित रहने में मदद करता है (जैसे शिकारियों से बचाव के लिए छलावरण, या प्रतिकूल मौसम में जीवित रहने की क्षमता), तो उस लक्षण वाले जीव अधिक संख्या में जीवित रहेंगे और प्रजनन करेंगे, जिससे उनकी संख्या बढ़ेगी।
  3. संसाधनों का बेहतर उपयोग: यदि कोई लक्षण जीव को भोजन या अन्य आवश्यक संसाधनों को अधिक कुशलता से प्राप्त करने या उपयोग करने में सक्षम बनाता है, तो वह अधिक स्वस्थ रहेगा और अधिक संतान उत्पन्न कर सकेगा।
  4. रोग प्रतिरोधक क्षमता: यदि किसी विशेष लक्षण के कारण जीव में किसी विशेष बीमारी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है, तो वह बीमारी से कम प्रभावित होगा और उसकी संख्या बढ़ सकती है।
  5. लैंगिक चयन: कुछ मामलों में, एक विशेष लक्षण साथी को आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे उस लक्षण वाले जीवों की प्रजनन दर बढ़ जाती है।

संक्षेप में, कोई भी लक्षण जो जीव की उत्तरजीविता (survival) या प्रजनन (reproduction) को बढ़ाता है, वह प्राकृतिक चयन के माध्यम से समष्टि में उस लक्षण वाले जीवों की संख्या को बढ़ाने में सहायक हो सकता है।

प्रश्न 8

एक एकल जीव द्वारा उपार्जित लक्षण सामान्यतः अगली पीढ़ी में वंशानुगत नहीं होते। क्यों?
Solution:

एक एकल जीव द्वारा उपार्जित लक्षण (acquired characteristics) सामान्यतः अगली पीढ़ी में वंशानुगत नहीं होते क्योंकि वे जीव के जनन कोशिकाओं (germ cells) या DNA में कोई स्थायी परिवर्तन नहीं लाते हैं। वंशानुगत लक्षण वे होते हैं जो जनन कोशिकाओं में मौजूद DNA में परिवर्तन के कारण होते हैं और निषेचन के बाद संतान में स्थानांतरित होते हैं।

उपार्जित लक्षण वे होते हैं जो जीव अपने जीवनकाल के दौरान अपने पर्यावरण के साथ अंतःक्रिया के परिणामस्वरूप प्राप्त करता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति व्यायाम करके अपनी मांसपेशियां बनाता है, तो यह एक उपार्जित लक्षण है। यह मांसपेशी वृद्धि उसके जनन कोशिकाओं (शुक्राणु या अंडाणु) के DNA में दर्ज नहीं होती है। इसलिए, जब वह व्यक्ति संतान उत्पन्न करेगा, तो वह संतान जन्म से ही उस बढ़ी हुई मांसपेशी के साथ पैदा नहीं होगी।

केवल वे लक्षण जो जनन कोशिकाओं के DNA में परिवर्तन से उत्पन्न होते हैं (जैसे उत्परिवर्तन या आनुवंशिक पुनर्संयोजन), वही अगली पीढ़ी में वंशानुगत हो सकते हैं।

प्रश्न 9

बाघों की संख्या में कमी आनुवंशिकता के दृष्टिकोण से चिंता का विषय क्यों है।
Solution:

बाघों की संख्या में कमी आनुवंशिकता के दृष्टिकोण से चिंता का विषय है क्योंकि यह उनकी आनुवंशिक विविधता (genetic diversity) को कम करता है। आनुवंशिक विविधता किसी प्रजाति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उसे बदलते पर्यावरण के अनुकूल ढलने और बीमारियों का सामना करने की क्षमता प्रदान करती है।

जब किसी प्रजाति की जनसंख्या बहुत कम हो जाती है, तो उपलब्ध जीनों का पूल (gene pool) भी छोटा हो जाता है। इससे निम्नलिखित समस्याएं उत्पन्न होती हैं:

  • आनुवंशिक भिन्नता में कमी: कम जनसंख्या का मतलब है कि विभिन्न प्रकार के जीन कम उपलब्ध हैं। इससे प्रजाति की नई परिस्थितियों के प्रति अनुकूलन क्षमता कम हो जाती है।
  • अंतःप्रजनन (Inbreeding): छोटी समष्टि में, संबंधित जीवों के बीच प्रजनन की संभावना बढ़ जाती है। अंतःप्रजनन से हानिकारक अप्रभावी जीनों के व्यक्त होने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे आनुवंशिक विकारों और स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्धि हो सकती है।
  • अनुकूलन क्षमता में कमी: यदि पर्यावरण में कोई बड़ा बदलाव आता है (जैसे नई बीमारी या जलवायु परिवर्तन), तो कम आनुवंशिक विविधता वाली प्रजाति के लिए जीवित रहना और अनुकूलन करना बहुत मुश्किल हो जाता है।

इसलिए, बाघों जैसी प्रजातियों की घटती संख्या न केवल जैव विविधता के लिए खतरा है, बल्कि उनकी आनुवंशिक संरचना को भी कमजोर करती है, जिससे उनका भविष्य अनिश्चित हो जाता है।

प्रश्न 10

वे कौन से कारक हैं जो नयी स्पीशीश के उद्भव में सहायक हैं?
Solution:

नई स्पीशीज (जाति) के उद्भव (speciation) में कई कारक सहायक होते हैं, जो मुख्य रूप से आनुवंशिक भिन्नता और अलगाव से संबंधित हैं:

  1. भौगोलिक पृथक्करण (Geographical Isolation): जब किसी प्रजाति की आबादी भौगोलिक बाधाओं (जैसे पहाड़, नदियाँ, समुद्र) द्वारा अलग हो जाती है, तो विभिन्न समूहों के बीच जीन का प्रवाह रुक जाता है। समय के साथ, प्रत्येक अलग-थलग आबादी अपने विशिष्ट वातावरण के अनुसार विकसित होती है और उनमें आनुवंशिक अंतर जमा हो जाते हैं, जिससे वे नई स्पीशीज बन सकती हैं।
  2. आनुवंशिक विचलन (Genetic Drift): छोटी आबादी में, संयोगवश कुछ जीनों की आवृत्ति में परिवर्तन आ सकता है, जो प्राकृतिक चयन से स्वतंत्र होता है। यह विचलन समय के साथ आबादी को मूल आबादी से अलग कर सकता है।
  3. प्राकृतिक चयन (Natural Selection): विभिन्न वातावरणों में, अलग-अलग लक्षण फायदेमंद हो सकते हैं। प्राकृतिक चयन उन लक्षणों का पक्ष लेता है जो किसी विशेष वातावरण में जीवित रहने और प्रजनन के लिए अधिक उपयुक्त होते हैं। इससे विभिन्न आबादी अलग-अलग दिशाओं में विकसित हो सकती हैं।
  4. उत्परिवर्तन (Mutation): DNA में यादृच्छिक परिवर्तन (उत्परिवर्तन) नई आनुवंशिक भिन्नताएँ उत्पन्न करते हैं, जो स्पीशीएशन के लिए कच्चा माल प्रदान करते हैं।
  5. जनसंख्या का अलगाव (Reproductive Isolation): जब दो आबादी इतनी भिन्न हो जाती हैं कि वे आपस में प्रजनन नहीं कर सकतीं या यदि वे प्रजनन करती भी हैं तो उनकी संतानें जननक्षम नहीं होतीं, तो उन्हें अलग-अलग स्पीशीज माना जाता है।

ये कारक मिलकर आनुवंशिक भिन्नता को बढ़ाते हैं और आबादी को अलग करते हैं, जिससे अंततः नई स्पीशीज का उद्भव होता है।

प्रश्न 11

क्या भौगोलिक पृथक्करण स्वपरागित स्पीशीश के पौधें के जाति-उद्भव का प्रमुख कारण हो सकता है? क्यों या क्यों नहीं?
Solution:

नहीं, भौगोलिक पृथक्करण स्वपरागित (self-pollinating) स्पीशीज के पौधों के जाति-उद्भव (speciation) का प्रमुख कारण नहीं हो सकता है। इसके कारण निम्नलिखित हैं:

  1. स्वपरागण में कम विभिन्नता: स्वपरागित पौधों में, नर और मादा युग्मक एक ही पौधे के होते हैं, जिससे आनुवंशिक रूप से समान या बहुत समान संतानें उत्पन्न होती हैं। इनमें प्राकृतिक रूप से विभिन्नताएँ कम होती हैं।
  2. जीन प्रवाह की निरंतरता: भले ही भौगोलिक रूप से आबादी अलग हो जाए, स्वपरागण के कारण जीन का प्रवाह (gene flow) मुख्य रूप से उसी आबादी के भीतर ही सीमित रहता है। विभिन्न आबादी के बीच आनुवंशिक अंतर जमा होने की गति धीमी होती है।
  3. अलगाव का प्रभाव कम: जाति-उद्भव के लिए, विभिन्न आबादी के बीच जीन प्रवाह का रुकना और उनमें पर्याप्त आनुवंशिक अंतर का जमा होना आवश्यक है। स्वपरागित पौधों में, भौगोलिक अलगाव के बावजूद, आंतरिक जीन पूल में महत्वपूर्ण अंतर उत्पन्न होने की संभावना कम होती है, जब तक कि अन्य कारक (जैसे उत्परिवर्तन या तीव्र प्राकृतिक चयन) सक्रिय न हों।

इसके विपरीत, पर-परागण (cross-pollinating) करने वाली प्रजातियों में, भौगोलिक पृथक्करण जाति-उद्भव का एक प्रमुख कारण बन सकता है क्योंकि यह जीन प्रवाह को प्रभावी ढंग से रोकता है और विभिन्न आबादी को स्वतंत्र रूप से विकसित होने देता है, जिससे उनमें महत्वपूर्ण आनुवंशिक अंतर जमा हो जाते हैं।

Common mistakes

  • उपार्जित लक्षणों और आनुवंशिक लक्षणों के बीच भ्रमित होना।
  • लिंग निर्धारण में केवल माँ की भूमिका को समझना, पिता के योगदान को अनदेखा करना।
  • प्रभावी और अप्रभावी लक्षणों की अवधारणा को ठीक से न समझना।
  • विभिन्नताओं के महत्व को कम आंकना।

Revision tips

  • मेंडल के प्रयोगों और उनके परिणामों को सारणीबद्ध रूप में याद करें।
  • लिंग निर्धारण की प्रक्रिया को चित्र बनाकर समझें।
  • प्रभावी और अप्रभावी लक्षणों के उदाहरणों को सूचीबद्ध करें।
  • जैव विकास के विभिन्न कारकों को उदाहरण सहित समझें।

Practice MCQs

Q1. अलैंगिक प्रजनन वाली समष्टि में यदि एक लक्षण 10% सदस्यों में और दूसरा लक्षण 60% सदस्यों में पाया जाता है, तो कौन सा लक्षण पहले उत्पन्न हुआ होगा?

Q2. मेंडल के प्रयोगों के अनुसार, F1 पीढ़ी में जो लक्षण दिखाई नहीं देता, उसे क्या कहते हैं?

Q3. मानव में बच्चे का लिंग निर्धारण मुख्य रूप से किसके द्वारा होता है?

Q4. एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक कौन से लक्षण स्थानांतरित होते हैं?

Q5. नवीन स्पीशीज के उद्भव में कौन सा कारक सहायक हो सकता है?

Frequently asked questions

कक्षा 10 विज्ञान के अध्याय 9 में कौन से मुख्य विषय शामिल हैं?

इस अध्याय में आनुवंशिकता के मूल सिद्धांत, मेंडल के प्रयोग, प्रभावी और अप्रभावी लक्षण, लक्षणों की वंशागति, मानव में लिंग निर्धारण, और जैव विकास के विभिन्न कारक जैसे विषय शामिल हैं।

मेंडल के प्रयोगों से प्रभावी और अप्रभावी लक्षण कैसे पता चलते हैं?

मेंडल ने मटर के पौधों पर प्रयोग किए। उन्होंने देखा कि जब विपरीत लक्षणों वाले पौधों का संकरण कराया जाता है, तो पहली पीढ़ी (F1) में केवल एक ही लक्षण दिखाई देता है, जिसे प्रभावी लक्षण कहते हैं। जो लक्षण दिखाई नहीं देता, वह अप्रभावी होता है।

मानव में बच्चे का लिंग कैसे निर्धारित होता है?

मानव में लिंग निर्धारण पिता के लिंग गुणसूत्रों (XY) द्वारा होता है। माँ के पास XX गुणसूत्र होते हैं। पिता से X गुणसूत्र मिलने पर पुत्री (XX) और Y गुणसूत्र मिलने पर पुत्र (XY) होता है।

क्या उपार्जित लक्षण अगली पीढ़ी में जा सकते हैं?

नहीं, उपार्जित लक्षण (जो जीवनकाल में अर्जित किए जाते हैं) सामान्यतः अगली पीढ़ी में वंशानुगत नहीं होते क्योंकि वे डी.एन.ए. में परिवर्तन नहीं लाते।

जैव विकास के लिए विभिन्नताएँ क्यों महत्वपूर्ण हैं?

विभिन्नताएँ प्रजातियों को बदलते पर्यावरण के अनुकूल ढलने में मदद करती हैं। यह प्रजातियों के अस्तित्व को बनाए रखने और नई प्रजातियों के उद्भव के लिए आवश्यक है।

ये NCERT समाधान परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करते हैं?

ये समाधान अध्याय की सभी अवधारणाओं को स्पष्ट करते हैं, महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर प्रदान करते हैं, और अभ्यास के लिए एक आधार देते हैं, जिससे छात्रों को परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करने में मदद मिलती है।

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