कक्षा 9 हिंदी NCERT समाधान: पाठ 10 - ललद्यद वाख

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यह पृष्ठ कक्षा 9 हिंदी (क्षितिज भाग 1) के पाठ 10, 'ललद्यद वाख' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। ये समाधान कवयित्री ललद्यद द्वारा रचित वाखों पर केंद्रित हैं, जो जीवन के आध्यात्मिक और दार्शनिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। समाधानों में 'रस्सी' के प्रतीकात्मक अर्थ, ईश्वर प्राप्ति के लिए किए जा रहे कवयित्री के व्यर्थ प्रयासों के कारणों, 'घर जाने की चाह' के तात्पर्य, और 'जेब टटोली कौड़ी न पाई' जैसी पंक्तियों के भावार्थ को स्पष्ट किया गया है। इसके अतिरिक्त, 'खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं, न खाकर बनेगा अंहकारी' तथा 'बंद द्वार की साँकल खोलने' जैसे विषयों पर भी गहन चर्चा की गई है। ये समाधान छात्रों को कठिन अवधारणाओं को समझने, परीक्षा की तैयारी करने और आध्यात्मिक ज्ञान को आत्मसात करने में मदद करेंगे।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 9
Subjectहिंदी
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter10. ललद्यद वाख

Chapter summary

कक्षा 9 हिंदी (क्षितिज भाग 1) के पाठ 10 के ये NCERT समाधान कवयित्री ललद्यद के चार वाखों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। ये समाधान ईश्वर प्राप्ति के मार्ग, जीवन में संतुलन के महत्व, और सांसारिक मोह-माया से मुक्ति जैसे विषयों पर केंद्रित हैं। इसमें 'रस्सी' के प्रतीकात्मक अर्थ, भक्ति के कच्चे प्रयासों की विफलता, और परमात्मा से मिलन की अभिलाषा को समझाया गया है। साथ ही, आत्मनिरीक्षण के महत्व और मध्यम मार्ग अपनाने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला गया है।

Learning outcomes

  • ललद्यद के वाखों में प्रयुक्त प्रतीकों (जैसे 'रस्सी', 'घर') के अर्थ को समझना।
  • ईश्वर प्राप्ति के लिए कवयित्री के प्रयासों की व्यर्थता के कारणों का विश्लेषण करना।
  • जीवन में भोग और त्याग के बीच संतुलन के महत्व को समझना।
  • आत्मनिरीक्षण के महत्व और उसके परिणामों को पहचानना।
  • कवयित्री द्वारा सुझाए गए आध्यात्मिक उन्नति के उपायों को समझना।
  • समाज में व्याप्त भेदभाव के कारणों और हानियों का मूल्यांकन करना।
  • भेदभाव को मिटाने के लिए व्यावहारिक सुझावों का प्रस्ताव करना।

Topics covered

Paper topics

  • ललद्यद का जीवन परिचय
  • वाख शैली
  • प्रतीकात्मकता ('रस्सी', 'घर', 'जेब टटोली')
  • ईश्वर प्राप्ति के साधन
  • भक्ति मार्ग की कठिनाइयाँ
  • सांसारिक मोह और त्याग
  • मध्यम मार्ग का महत्व
  • आत्मनिरीक्षण
  • आत्मा-परमात्मा का संबंध
  • समाज में भेदभाव
  • धार्मिक सहिष्णुता
  • संतों और भक्तों की शिक्षाएं

Important topics

  • वाखों में प्रयुक्त प्रतीकों का अर्थ
  • ईश्वर प्राप्ति के लिए कवयित्री के प्रयास और उनकी विफलता
  • भोग और त्याग के बीच संतुलन का महत्व
  • आत्मनिरीक्षण का महत्व
  • समाज में भेदभाव के कारण और निवारण

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Questions and Solutions

प्रश्न 1: 'रस्सी' यहाँ पर किसके लिए प्रयुक्त हुआ है और वह कैसी है?

'रस्सी' यहाँ पर किसके लिए प्रयुक्त हुई है और वह कैसी है?
Solution:

इस वाख में 'रस्सी' शब्द का प्रयोग मानव के शरीर के लिए किया गया है। यह रस्सी कच्ची और नाशवान है, जिसका अर्थ है कि यह कभी भी टूट सकती है और इसका जीवन अनिश्चित है। कवयित्री इस भौतिक शरीर रूपी रस्सी के सहारे ईश्वर तक पहुँचने का प्रयास कर रही है, परन्तु यह माध्यम स्वयं ही कमजोर और क्षणभंगुर होने के कारण उसे सफलता नहीं मिल पा रही है।

प्रश्न 2: कवियत्री द्वारा मुक्ति के लिए किए जाने वाले प्रयास व्यर्थ क्यों हो रहे हैं?

कवियत्री द्वारा मुक्ति के लिए किए जाने वाले प्रयास व्यर्थ क्यों हो रहे हैं?
Solution:

कवयित्री के मुक्ति के प्रयास इसलिए व्यर्थ हो रहे हैं क्योंकि वह अभी भी सांसारिक मोह-माया और विभिन्न बंधनों में उलझी हुई है। वह सच्चे मन से प्रभु भक्ति नहीं कर पा रही है। जिस प्रकार कच्चे मिट्टी के सकोरे में रखा पानी अधिक समय तक नहीं टिक पाता, उसी प्रकार कवयित्री के भक्ति के प्रयास भी कच्चे हैं। इस अपरिपक्वता के कारण उसके द्वारा किए जा रहे मुक्ति के सभी प्रयास विफल सिद्ध हो रहे हैं।

प्रश्न 3: कवियत्री का 'घर जाने की चाह' से क्या तात्पर्य है?

कवियत्री का 'घर जाने की चाह' से क्या तात्पर्य है?
Solution:

कवयित्री का 'घर जाने की चाह' से तात्पर्य प्रभु से मिलना है। वह इस संसार रूपी सागर को पार करके अपने परमात्मा की शरण में जाना चाहती है। आत्मा का परमात्मा से मिलन ही उसका वास्तविक 'घर' है, और वह सांसारिक माया-मोह में भटकना नहीं चाहती, बल्कि अपने मूल स्रोत में विलीन होना चाहती है।

प्रश्न 4: भाव स्पष्ट कीजिए -

भाव स्पष्ट कीजिए - 1-जेब टटोली कौड़ी न पाई।
Solution:

इस पंक्ति का भाव यह है कि कवयित्री इस संसार में आकर सांसारिक कार्यों में उलझ गई और जब अंत समय आया तथा उसने आत्मनिरीक्षण (जेब टटोली) किया, तो उसे अपने जीवन में कुछ भी सार्थक या पुण्य का कार्य नहीं मिला। अब उसे इस बात की चिंता सता रही है कि वह भवसागर पार कराने वाले मांझी अर्थात् ईश्वर को उतराई के रूप में क्या प्रदान करेगी, क्योंकि उसने जीवन भर कुछ भी ऐसा संचित नहीं किया जो ईश्वर को भेंट किया जा सके।

खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं, न खाकर बनेगा अंहकारी।
Solution:

इन पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री मनुष्य को ईश्वर प्राप्ति के लिए एक संतुलित और मध्यम मार्ग अपनाने का उपदेश दे रही है। उसका कहना है कि केवल सांसारिक भोग-विलास (खा-खाकर) में लिप्त रहने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होगी, बल्कि इससे व्यक्ति का पतन ही होगा। दूसरी ओर, यदि व्यक्ति अत्यधिक वैराग्य अपनाकर सब कुछ त्याग देता है (न खाकर), तो उसके मन में अहंकार उत्पन्न हो सकता है। इसलिए, कवयित्री सुझाव देती है कि अहंकार रहित होकर और माया-मोह से विरक्त रहते हुए, एक संतुलित जीवन जीते हुए ईश्वर प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए।

प्रश्न 5: बंद द्वार की साँकल खोलने के लिए ललद्यद ने क्या उपाय सुझाया है?

बंद द्वार की साँकल खोलने के लिए ललद्यद ने क्या उपाय सुझाया है?
Solution:

ललद्यद ने 'बंद द्वार की साँकल' खोलने के लिए यह उपाय सुझाया है कि मनुष्य को भोग-विलास और त्याग के बीच एक संतुलन स्थापित करना चाहिए। इसका अर्थ है कि व्यक्ति को न तो सांसारिक विषयों में अत्यधिक लिप्त होना चाहिए और न ही उनसे पूरी तरह विरक्त हो जाना चाहिए। अज्ञानता को ही बंद द्वार की साँकल बताया गया है। इस साँकल को खोलने के लिए इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना और विवेकपूर्ण आचरण करना आवश्यक है, जिससे मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो सके।

प्रश्न 1: ईश्वर प्राप्ति के लिए बहुत से साधक हठयोग जैसी कठिन साधना भी करते हैं, लेकिन उससे भी लक्ष्य प्राप्ति नहीं होती। यह भाव किन पंक्तियों में व्यक्त हुआ है?

ईश्वर प्राप्ति के लिए बहुत से साधक हठयोग जैसी कठिन साधना भी करते हैं, लेकिन उससे भी लक्ष्य प्राप्ति नहीं होती। यह भाव किन पंक्तियों में व्यक्त हुआ है?
Solution:

यह भाव निम्नलिखित पंक्तियों में व्यक्त हुआ है:

आई सीधी राह से, गई न सीधी राह।

सुषुम-सेतु पर खड़ी थी, बीत गया दिन आह!

जेब टटोली, कौडी न पाई।

माझी को दूँ, क्या उतराई?

इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि कवयित्री जीवन की शुरुआत सरलता से करती है, परन्तु सीधी राह पर चलने के बजाय वह हठयोग जैसी कठिन साधनाओं में उलझ जाती है (सुषुम-सेतु पर खड़ी थी)। इस प्रक्रिया में उसका जीवन बीत जाता है, और अंत में आत्मनिरीक्षण करने पर उसे कुछ भी सार्थक नहीं मिलता, जिससे वह ईश्वर को उतराई देने में असमर्थ महसूस करती है।

प्रश्न 2: 'ज्ञानी' से कवयित्री का अभिप्राय है?

'ज्ञानी' से कवयित्री का अभिप्राय है?
Solution:

कवयित्री के अनुसार, 'ज्ञानी' वह व्यक्ति है जिसने आत्मा और परमात्मा के संबंध कोtrue रूप से जान लिया हो। कवयित्री का मानना है कि ईश्वर किसी एक स्थान या धर्म विशेष तक सीमित नहीं है, बल्कि वह कण-कण में व्याप्त है। मनुष्य अक्सर धर्म के आधार पर ईश्वर को मंदिर और मस्जिद जैसी जगहों पर खोजता फिरता है। परन्तु, सच्चा ज्ञानी वह है जो इन बाहरी आडंबरों से परे जाकर अपने अंतःकरण में ही ईश्वर का अनुभव कर लेता है।

प्रश्न 8.1: आपकी दृष्टि में इस कारण देश और समाज को क्या हानि हो रही है?

हमारे संतों, भक्तों और महापुरुषों ने बार-बार चेताया है कि मनुष्यों में परस्पर किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होता, लेकिन आज भी हमारे समाज में भेदभाव दिखाई देता है - आपकी दृष्टि में इस कारण देश और समाज को क्या हानि हो रही है?
Solution:

समाज में व्याप्त भेदभाव के कारण देश और समाज को अनेक गंभीर हानियाँ हो रही हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं:

  1. सांप्रदायिक दंगे और विभाजन: हिंदू-मुस्लिम जैसे धार्मिक भेदभाव के कारण ही भारत और पाकिस्तान जैसे देशों का विभाजन हुआ और आज भी सांप्रदायिक तनाव बना रहता है।
  2. सामाजिक असमानता: भेदभाव के कारण समाज में उच्च और निम्न वर्ग का विभाजन गहराता है, जिससे वर्गों के बीच सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाता।
  3. आपसी संघर्ष: विभिन्न समुदायों के बीच भेदभाव के कारण पर्वों या सामान्य अवसरों पर भी अनायास झगड़े और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  4. अविश्वास और संदेह: आपसी भेदभाव के चलते एक समुदाय या वर्ग दूसरे को संदेह और अविश्वास की दृष्टि से देखता है, जिससे सामाजिक एकता कमजोर होती है।
  5. अलगाववाद और उग्रवाद: भेदभाव की भावना अलगाववाद, उग्रवाद और आतंकवाद जैसी सामाजिक समस्याओं को जन्म देती है, जो देश की सुरक्षा और प्रगति के लिए अत्यंत हानिकारक हैं।

प्रश्न 8.2: आपसी भेदभाव को मिटाने के लिए अपने सुझाव दीजिए।

हमारे संतों, भक्तों और महापुरुषों ने बार-बार चेताया है कि मनुष्यों में परस्पर किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होता, लेकिन आज भी हमारे समाज में भेदभाव दिखाई देता है - आपसी भेदभाव को मिटाने के लिए अपने सुझाव दीजिए।
Solution:

आपसी भेदभाव को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित सुझाव अपनाए जा सकते हैं:

  1. संवाद को बढ़ावा देना: उन विषयों या बातों पर चर्चा करने से बचना चाहिए जिनसे भेदभाव उत्पन्न होता हो। इसके बजाय, आपसी समझ और सद्भाव बढ़ाने वाले संवादों को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  2. सरकारी नीतियां: सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो किसी भी प्रकार के भेदभाव को बढ़ावा न दें, बल्कि सभी नागरिकों को समान अवसर और अधिकार प्रदान करें।
  3. राजनीतिक दलों की भूमिका: राजनीतिक दलों को अपने स्वार्थ के लिए लोगों की धार्मिक या जातीय भावनाओं का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए और एकता को बढ़ावा देना चाहिए।
  4. योग्यता को प्राथमिकता: नौकरियों, शिक्षा और सरकारी योजनाओं में आरक्षण जैसे प्रावधानों के बजाय योग्यता को आधार बनाना चाहिए, ताकि सभी को समान अवसर मिलें।
  5. शैक्षिक पाठ्यक्रम: स्कूली पाठ्यक्रम में एकता, समता, सहिष्णुता और भाईचारे जैसे मूल्यों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी में भेदभाव की भावना न पनपे।

Common mistakes

  • प्रतीकों और लाक्षणिक अर्थों को शाब्दिक रूप से समझना।
  • ईश्वर प्राप्ति के लिए केवल बाहरी आडंबरों पर ध्यान केंद्रित करना।
  • जीवन में अत्यधिक भोग या अत्यधिक त्याग को अपनाना।
  • आत्मनिरीक्षण के महत्व को अनदेखा करना।
  • समाज में भेदभाव के मूल कारणों को न समझना।

Revision tips

  • प्रत्येक वाख के केंद्रीय भाव को समझने के लिए उसे कई बार पढ़ें।
  • ललद्यद द्वारा प्रयुक्त प्रतीकों और उनके अर्थों की सूची बनाएं।
  • ईश्वर प्राप्ति के लिए कवयित्री द्वारा बताए गए विभिन्न मार्गों और उनके परिणामों पर विचार करें।
  • समाज में भेदभाव से संबंधित प्रश्नों के उत्तर देने के लिए दिए गए सुझावों को याद करें।
  • अपने शब्दों में वाखों का सारांश लिखने का अभ्यास करें।

Practice MCQs

Q1. ललद्यद के वाख में 'रस्सी' किसका प्रतीक है?

Q2. कवयित्री के मुक्ति के प्रयास व्यर्थ क्यों हो रहे हैं?

Q3. 'घर जाने की चाह' से कवयित्री का क्या तात्पर्य है?

Q4. जब कवयित्री ने 'जेब टटोली', तो उसे क्या प्राप्त हुआ?

Q5. ललद्यद के अनुसार, 'न खाकर' क्या बनता है?

Frequently asked questions

कक्षा 9 हिंदी के पाठ 10 'ललद्यद वाख' में मुख्य रूप से किन विषयों पर चर्चा की गई है?

इस पाठ में मुख्य रूप से ईश्वर प्राप्ति के साधन, जीवन में संतुलन (भोग और त्याग के बीच), आत्मनिरीक्षण का महत्व, और समाज में व्याप्त भेदभाव जैसे विषयों पर चर्चा की गई है, जो कवयित्री ललद्यद के वाखों के माध्यम से प्रस्तुत किए गए हैं।

ललद्यद के वाख में 'रस्सी' शब्द का क्या अर्थ है?

ललद्यद के वाख में 'रस्सी' शब्द मानव शरीर का प्रतीक है। यह शरीर कच्चा और नाशवान है, और कवयित्री इसी शरीर के सहारे ईश्वर तक पहुँचने का प्रयास कर रही है।

'जेब टटोली कौड़ी न पाई' का क्या भावार्थ है?

इस पंक्ति का भावार्थ यह है कि जब कवयित्री ने अपने जीवन का आत्मनिरीक्षण किया, तो उसे ईश्वर प्राप्ति के लिए कोई पुण्य कर्म या साधन नहीं मिला। वह चिंतित है कि ईश्वर (मांझी) को उतराई के रूप में क्या देगी।

कवयित्री के अनुसार, ईश्वर प्राप्ति के लिए कौन सा मार्ग अपनाना चाहिए?

कवयित्री के अनुसार, ईश्वर प्राप्ति के लिए मध्यम मार्ग अपनाना चाहिए। न तो अत्यधिक भोग-विलास में लिप्त होना चाहिए और न ही पूर्ण वैराग्य अपनाना चाहिए, क्योंकि दोनों ही स्थितियाँ अहंकार या व्यर्थता की ओर ले जाती हैं।

समाज में भेदभाव क्यों दिखाई देता है, जैसा कि पाठ में बताया गया है?

पाठ के अनुसार, समाज में भेदभाव धर्म, वर्ग और अन्य सामाजिक आधारों पर दिखाई देता है। संतों और भक्तों ने बार-बार चेताया है कि मनुष्यों में कोई भेद नहीं है, फिर भी यह भेदभाव आज भी व्याप्त है।

इन NCERT समाधानों का उपयोग परीक्षा की तैयारी के लिए कैसे किया जा सकता है?

ये समाधान प्रत्येक प्रश्न के उत्तर को विस्तार से समझाते हैं, जिससे छात्रों को पाठ की गहरी समझ विकसित करने में मदद मिलती है। महत्वपूर्ण अवधारणाओं और प्रतीकों को स्पष्ट किया गया है, जो परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक होते हैं।

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