कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान: अध्याय 7 - बुनकर, लोहा बनाने वाले और फैक्ट्री मालिक NCERT समाधान

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यह पृष्ठ कक्षा 8 के सामाजिक विज्ञान के अध्याय 7, 'बुनकर, लोहा बनाने वाले और फैक्ट्री मालिक' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। यह अध्याय भारत के औद्योगिक इतिहास के महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालता है, जिसमें कपड़ा उद्योग और लौह निर्माण उद्योग शामिल हैं। समाधानों में यूरोप में भारतीय कपड़ों की मांग, विभिन्न प्रकार के कपड़ों जैसे मलमल, कैलिको, सिट्ज़ और बांडाना की उत्पत्ति, और अगरिया समुदाय जैसे पारंपरिक शिल्पकारों की भूमिका पर चर्चा की गई है। यह अध्याय बताता है कि कैसे ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों ने भारतीय बुनकरों और लोहा बनाने वालों के व्यवसायों को प्रभावित किया, जिससे उनके उद्योगों का पतन हुआ और बेरोजगारी बढ़ी। ये समाधान छात्रों को इन ऐतिहासिक परिवर्तनों को समझने और परीक्षा के लिए प्रभावी ढंग से तैयारी करने में मदद करेंगे।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 8
Subjectसामाजिक विज्ञान
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter7. बुनकर, लोहा बनाने वाले और फैक्ट्री मालिक

Chapter summary

कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान के अध्याय 7 के ये NCERT समाधान भारत के औद्योगिक इतिहास के महत्वपूर्ण कालखंड को कवर करते हैं। इसमें यूरोपीय बाजारों में भारतीय वस्त्रों की लोकप्रियता, विभिन्न प्रकार के कपड़ों के नामकरण का इतिहास (जैसे मलमल, कैलिको, सिट्ज़), और पारंपरिक शिल्प जैसे लोहा बनाना (अगरिया समुदाय) शामिल हैं। समाधान विस्तार से बताते हैं कि कैसे ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन और औद्योगिक क्रांति ने भारत के पारंपरिक उद्योगों को प्रभावित किया, जिससे बुनकरों और लोहा बनाने वालों के सामने चुनौतियाँ आईं और अंततः उनके उद्योगों का पतन हुआ।

Learning outcomes

  • यूरोप में भारतीय कपड़ों की मांग और उनके प्रकारों को समझना।
  • मलमल, कैलिको, सिट्ज़ और बांडाना जैसे कपड़ों के नामों की ऐतिहासिक उत्पत्ति का विश्लेषण करना।
  • अगरिया समुदाय और उनके लोहा बनाने की कला के बारे में जानना।
  • ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों के कारण भारतीय कपड़ा और लौह उद्योगों पर पड़े प्रभावों का मूल्यांकन करना।
  • 18वीं और 19वीं सदी में भारतीय शिल्पकारों के सामने आई चुनौतियों को समझना।

Topics covered

Paper topics

  • भारतीय वस्त्रों की यूरोपीय मांग
  • मलमल (मुसलिन)
  • कैलिको
  • शिट्ज़ (छींट)
  • बांडाना
  • जामदानी
  • अगरिया समुदाय
  • लोहा प्रगलन उद्योग
  • ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियां
  • कपड़ा उद्योग पर प्रभाव
  • लौह उद्योग पर प्रभाव
  • 18वीं और 19वीं सदी का औद्योगिक इतिहास

Important topics

  • यूरोप में भारतीय कपड़ों की मांग और विविधता
  • कपड़ों के नामों की ऐतिहासिक उत्पत्ति
  • अगरिया समुदाय और लोहा बनाने की कला
  • ब्रिटिश नीतियों का भारतीय बुनकरों और लोहा बनाने वालों पर प्रभाव
  • 19वीं सदी में भारतीय लौह प्रगलन उद्योग का पतन

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

यूरोप में किस तरह के कपड़ों की भारी मांग थी ?
Solution: यूरोप के बाजारों में भारत में बने विभिन्न प्रकार के कपड़ों की अत्यधिक मांग थी। इनमें विशेष रूप से मलमल (बारीक सूती कपड़ा), कैलिको (एक प्रकार का सूती कपड़ा), सिट्ज़ (छापेदार सूती कपड़ा), कोंसा, बांडाना (छापेदार गुलबंद) और जामदानी (सजावटी चिन्हों वाला बारीक मलमल) जैसे वस्त्र शामिल थे। इन कपड़ों की गुणवत्ता, डिज़ाइन और कारीगरी के कारण इनकी मांग बनी हुई थी।

प्रश्न 2

जामदानी क्या है ?
Solution: जामदानी एक प्रकार का बहुत बारीक मलमल कपड़ा होता है, जो अक्सर सलेटी और सफ़ेद रंग का होता है। इसकी विशेषता यह है कि इस पर करघे में ही सजावटी चिन्ह बुने जाते हैं। इसकी बुनाई के लिए आमतौर पर उच्च गुणवत्ता वाले सूती धागों और कभी-कभी सोने के धागों का भी इस्तेमाल किया जाता था, जिससे यह कपड़ा अत्यंत सुंदर और मूल्यवान बन जाता था।

प्रश्न 3

बांडाना क्या है ?
Solution: बांडाना शब्द का प्रयोग एक विशेष प्रकार के कपड़े के लिए किया जाता है, जो आमतौर पर गले या सिर पर बांधने के लिए इस्तेमाल होने वाला एक चटक रंग का छापादार (प्रिंटेड) गुलबंद होता है। यह शब्द हिंदी के 'बांधना' शब्द से निकला है, जो इसके उपयोग को दर्शाता है।

प्रश्न 4

अगरिया कौन होते हैं ?
Solution: अगरिया लोग भारत में लोहा बनाने वाले समुदायों में से एक थे। वे पारंपरिक रूप से लोहा गलाने और उससे विभिन्न प्रकार की वस्तुएं बनाने की कला में अत्यंत निपुण थे। यह समुदाय अपनी इस विशेष शिल्पकारी के लिए जाना जाता था।

प्रश्न 5

रिक्त स्थान भरें :
  1. (क) अंग्रेजी का शिट्ज़ शब्द हिंदी के ...... शब्द से निकला है |
  2. (ख) टीपू की तलवार ..... स्टील से बनी थी |
  3. (ग) भारत का कपड़ा निर्यात ..... सदी में गिरने लगा |
Solution:
  1. (क) अंग्रेजी का शिट्ज़ शब्द हिंदी के छींट शब्द से निकला है।
  2. (ख) टीपू की तलवार बुट्ज़ स्टील से बनी थी। (यह 'वूट्ज़' स्टील का एक प्रकार है, जो अपनी उच्च गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध था)।
  3. (ग) भारत का कपड़ा निर्यात 19 वीं सदी में गिरने लगा।

प्रश्न 6

विभिन्न कपड़ों के नामों से उनके इतिहासों के बारे में क्या पता चलता है ?
Solution: विभिन्न कपड़ों के नाम उनके ऐतिहासिक उद्गम, व्यापारिक मार्गों और उपयोगों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं:
  1. मुसलिन (मलमल): यह नाम संभवतः इराक के मोसूल शहर से आया है। यूरोपीय व्यापारियों ने जब पहली बार भारत से आयातित बारीक सूती कपड़ों को मोसूल में अरब व्यापारियों के पास देखा, तो वे इन सभी बारीक कपड़ों को 'मुसलिन' या 'मलमल' कहने लगे। यह नाम कपड़े की महीन बुनाई को दर्शाता है।
  2. शिट्ज़: यह नाम हिंदी के 'छींट' शब्द से निकला है, जो विशेष रूप से छापेदार (प्रिंटेड) सूती कपड़ों को संदर्भित करता है।
  3. बांडाना: यह शब्द हिंदी के 'बांधना' शब्द से उत्पन्न हुआ है। इसका प्रयोग गले या सिर पर बांधे जाने वाले चटक रंग के छापेदार कपड़े के लिए किया जाता है।
  4. कैलिको: जब पुर्तगाली व्यापारी मसालों की तलाश में भारत आए, तो उन्होंने केरल के कालीकट तट पर डेरा डाला। वहां से वे मसालों के साथ-साथ सूती कपड़ा भी ले गए। उन्होंने इस कपड़े को 'कैलिको' नाम दिया, जो संभवतः कालीकट शहर के नाम से प्रेरित था।
ये नाम न केवल कपड़ों की पहचान कराते हैं, बल्कि उस समय के व्यापारिक संबंधों और भौगोलिक क्षेत्रों की ओर भी इशारा करते हैं।

प्रश्न 7

इंग्लैंड के ऊन और रेशम उत्पादकों ने अठारहवी सदी की शुरुआत में भारत से आयात होने वाले कपड़े का विरोध क्यों किया था ?
Solution: अठारहवी सदी की शुरुआत में इंग्लैंड के ऊन और रेशम उत्पादकों ने भारत से आयात होने वाले कपड़ों का विरोध कई कारणों से किया:
  1. घरेलू उद्योग की सुरक्षा: उस समय इंग्लैंड में कपड़ा उद्योग का विकास प्रारंभिक अवस्था में था। भारतीय वस्त्र अपनी गुणवत्ता और कम कीमत के कारण ब्रिटिश बाजार में बहुत लोकप्रिय हो रहे थे। ब्रिटिश उत्पादकों को डर था कि वे भारतीय वस्त्रों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे और उनका अपना उद्योग चौपट हो जाएगा।
  2. बाजार पर नियंत्रण: ब्रिटिश उत्पादक अपने देश में भारतीय वस्त्रों पर प्रतिबंध लगाकर या उन पर भारी कर लगाकर अपने लिए एक सुरक्षित बाजार सुनिश्चित करना चाहते थे, ताकि उनका अपना कपड़ा उद्योग फल-फूल सके।
  3. सरकारी हस्तक्षेप: इस विरोध के परिणामस्वरूप, ब्रिटिश सरकार ने 1720 में एक कानून पारित किया, जिसने छपाई वाले सूती कपड़े (शिट्ज़) के उपयोग पर रोक लगा दी। यह कदम ब्रिटिश कपड़ा निर्माताओं के हितों की रक्षा के लिए उठाया गया था।
इस प्रकार, अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए ब्रिटिश उत्पादकों ने भारत से आयातित कपड़ों का पुरजोर विरोध किया।

प्रश्न 8

ब्रिटेन में कपास उद्योग के विकास से भारत के कपड़ा उत्पादकों पर किस तरह के प्रभाव पड़े ?
Solution: ब्रिटेन में कपास उद्योग के तीव्र विकास का भारत के कपड़ा उत्पादकों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। इसके मुख्य प्रभाव निम्नलिखित थे:
  1. बाजार में प्रतिस्पर्धा: अब भारतीय कपड़ों को न केवल यूरोप में, बल्कि अमेरिका जैसे विदेशी बाजारों में भी ब्रिटेन में बने औद्योगिक कपड़ों से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती थी। ब्रिटिश कारखानों में बने कपड़े अक्सर सस्ते और बड़े पैमाने पर उत्पादित होते थे।
  2. निर्यात में कठिनाई: ब्रिटिश सरकार ने भारत से आने वाले कपड़ों पर भारी सीमा शुल्क (import duties) लगा दिए थे। इससे भारतीय कपड़ों का ब्रिटेन में निर्यात करना बहुत महंगा और मुश्किल हो गया।
  3. बेरोजगारी में वृद्धि: इन कारणों से, भारत के हजारों कुशल बुनकर बेरोजगार हो गए। उनकी पारंपरिक कला और आजीविका छिन गई क्योंकि उनके उत्पाद बाजार में टिक नहीं पा रहे थे।
  4. विदेशी बाजारों से निष्कासन: ब्रिटिश औद्योगिक कपड़ों के प्रभुत्व के कारण, भारतीय कपड़ों को विदेशी बाजारों से लगभग बाहर कर दिया गया था।
  5. पेशगी बंद: कपड़ा व्यापारियों और एजेंटों ने बुनकरों को काम शुरू करने से पहले दी जाने वाली पेशगी (advance payment) देना बंद कर दिया, जिससे बुनकरों की आर्थिक स्थिति और भी खराब हो गई।
संक्षेप में, ब्रिटेन के औद्योगिक विकास ने भारत के संपन्न कपड़ा उद्योग को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया।

प्रश्न 9

उन्नीसवी सदी में भारतीय लौह प्रगलन उद्योग का पतन क्यों हुआ ?
Solution: उन्नीसवीं सदी आते-आते भारतीय लौह प्रगलन उद्योग का तेजी से पतन हुआ, जिसके कई प्रमुख कारण थे:
  1. ब्रिटिश विजय और औपनिवेशिक नीतियां: भारत पर अंग्रेजों की जीत के साथ ही, उनकी औपनिवेशिक नीतियों ने स्थानीय उद्योगों को दबाना शुरू कर दिया।
  2. तलवार और हथियार उद्योग का अंत: अंग्रेजों ने अपने सैन्य नियंत्रण को मजबूत करने के लिए स्थानीय हथियार निर्माण को हतोत्साहित किया, जिससे तलवार और अन्य हथियार बनाने वाले भारतीय कारीगरों का काम ठप पड़ गया।
  3. इंग्लैंड से आयातित लोहे का प्रभुत्व: इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के कारण बड़े पैमाने पर और सस्ते लोहे और इस्पात का उत्पादन होने लगा। यह लोहा और इस्पात भारत में आयात किया जाने लगा।
  4. प्रतिस्पर्धा में असमर्थता: भारतीय कारीगरों द्वारा बनाए गए लोहे और इस्पात की तुलना में इंग्लैंड से आने वाला लोहा और इस्पात अक्सर सस्ता और अधिक मात्रा में उपलब्ध होता था। इस प्रतिस्पर्धा में भारतीय लौह प्रगलन उद्योग टिक नहीं सका।
इन कारणों से, भारत का पारंपरिक लौह प्रगलन उद्योग, जो कभी बहुत समृद्ध था, उन्नीसवीं सदी में लगभग समाप्त हो गया।

Common mistakes

  • विभिन्न कपड़ों के नामों की उत्पत्ति को गलत समझना।
  • ब्रिटिश नीतियों के भारतीय उद्योगों पर पड़ने वाले प्रभावों को सतही तौर पर समझना।
  • पारंपरिक शिल्पकारों की भूमिका और उनके पतन के कारणों को स्पष्ट न कर पाना।

Revision tips

  • प्रत्येक कपड़े के नाम (मलमल, कैलिको, सिट्ज़, बांडाना) की उत्पत्ति और अर्थ को विस्तार से समझें।
  • ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय वस्त्रों पर लगाए गए प्रतिबंधों और शुल्कों को सूचीबद्ध करें।
  • अगरिया समुदाय और उनके लोहा बनाने के पारंपरिक व्यवसाय के बारे में मुख्य बिंदुओं को याद करें।
  • 19वीं सदी में भारतीय लौह प्रगलन उद्योग के पतन के कारणों को क्रमबद्ध तरीके से लिखें।

Practice MCQs

Q1. यूरोप में किस प्रकार के भारतीय कपड़ों की भारी मांग थी?

Q2. जामदानी क्या है?

Q3. बांडाना शब्द किस हिंदी शब्द से निकला है?

Q4. अगरिया समुदाय किस कला में निपुण था?

Q5. अंग्रेजी का 'शिट्ज़' (chintz) शब्द किस हिंदी शब्द से निकला है?

Q6. 1720 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय कपड़ों पर क्या प्रतिबंध लगाया?

Q7. 19वीं सदी में भारतीय लौह प्रगलन उद्योग के पतन का मुख्य कारण क्या था?

Frequently asked questions

कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान के अध्याय 7 में किन मुख्य विषयों को शामिल किया गया है?

अध्याय 7 'बुनकर, लोहा बनाने वाले और फैक्ट्री मालिक' में मुख्य रूप से 18वीं और 19वीं सदी के दौरान भारत के औद्योगिक इतिहास पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिसमें कपड़ा उद्योग (जैसे मलमल, कैलिको, सिट्ज़) और लौह निर्माण उद्योग (जैसे अगरिया समुदाय) शामिल हैं, और इन पर ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों के प्रभाव का अध्ययन किया गया है।

यह समाधान छात्रों के लिए कैसे उपयोगी है?

यह समाधान छात्रों को अध्याय के प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत और स्पष्ट उत्तर प्रदान करता है, जिससे उन्हें अवधारणाओं को गहराई से समझने और परीक्षा के लिए प्रभावी ढंग से तैयारी करने में मदद मिलती है।

मलमल (मुसलिन) और कैलिको जैसे कपड़ों के नाम कहाँ से आए हैं?

मलमल नाम संभवतः इराक के मोसूल शहर से आया है, जहाँ यूरोपीय व्यापारियों ने भारतीय बारीक सूती कपड़ों को देखा था। कैलिको नाम पुर्तगाली यात्रियों द्वारा केरल के कालीकट तट से लाए गए सूती कपड़ों से जुड़ा है।

अगरिया कौन थे और उनका व्यवसाय क्या था?

अगरिया भारत में लोहा बनाने वाले लोगों का एक पारंपरिक समुदाय था। वे लोहा गलाने और उससे उपयोगी वस्तुएं बनाने की कला में निपुण थे।

ब्रिटेन में कपास उद्योग के विकास ने भारतीय बुनकरों को कैसे प्रभावित किया?

ब्रिटेन में कपास उद्योग के विकास के कारण भारतीय कपड़ों को यूरोपीय और अमेरिकी बाजारों में प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। साथ ही, ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाए गए भारी सीमा शुल्क और प्रतिबंधों के कारण भारत से कपड़ों का निर्यात मुश्किल हो गया, जिससे हजारों बुनकर बेरोजगार हो गए।

19वीं सदी में भारतीय लौह प्रगलन उद्योग क्यों समाप्त हो गया?

19वीं सदी में इंग्लैंड से सस्ते और बेहतर गुणवत्ता वाले लोहे और इस्पात का आयात शुरू हो गया, जिसने भारतीय कारीगरों द्वारा बनाए गए लोहे और इस्पात की मांग को कम कर दिया, जिससे यह उद्योग पतन की ओर अग्रसर हुआ।

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