कक्षा 12 राजनीति विज्ञान: अध्याय 1 - शीत युद्ध का दौर NCERT समाधान
यह पृष्ठ कक्षा 12 राजनीति विज्ञान के लिए "समकालीन विश्व राजनीति" पुस्तक के अध्याय 1, "शीत युद्ध का दौर" के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रदान करता है। इसमें शीत युद्ध की प्रकृति, गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्य, सैन्य गठबंधन, और हथियारों की दौड़ जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है। समाधानों को स्पष्टता और सरलता से समझाया गया है, जिससे छात्रों को अवधारणाओं को समझने और परीक्षा के लिए प्रभावी ढंग से तैयारी करने में मदद मिलती है। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर विस्तृत विश्लेषण और प्रासंगिक जानकारी के साथ प्रस्तुत किया गया है, जो छात्रों को विषय की गहरी समझ विकसित करने में सहायता करता है।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 12 |
| Subject | समकालीन विश्व राजनीति |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 1. शीत युद्ध का दौर |
Chapter summary
यह खंड कक्षा 12 राजनीति विज्ञान के अध्याय 1, "शीत युद्ध का दौर" के लिए NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। इसमें शीत युद्ध की परिभाषा, इसके प्रमुख कारण और परिणाम, गुटनिरपेक्ष आंदोलन की भूमिका और उद्देश्य, तथा महाशक्तियों द्वारा स्थापित सैन्य गठबंधनों का विश्लेषण शामिल है। समाधानों में विभिन्न देशों के गुटों से जुड़ाव और हथियारों की दौड़ के साथ-साथ नियंत्रण के कारणों पर भी प्रकाश डाला गया है। यह छात्रों को शीत युद्ध के जटिल परिदृश्य को समझने में मदद करता है।
Learning outcomes
- शीत युद्ध की गलत धारणाओं को पहचानना और सही कथन का चयन करना।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के वास्तविक उद्देश्यों को समझना।
- सैन्य गठबंधनों की विशेषताओं और उनके पीछे के कारणों का विश्लेषण करना।
- शीत युद्ध के दौरान विभिन्न देशों के गुटों से जुड़ाव को समझना।
- हथियारों की दौड़ और हथियारों पर नियंत्रण के कारणों का विश्लेषण करना।
- महाशक्तियों द्वारा छोटे देशों के साथ सैन्य गठबंधन बनाने के कारणों को स्पष्ट करना।
Topics covered
Paper topics
- शीत युद्ध का अर्थ और प्रकृति
- शीत युद्ध के कारण
- शीत युद्ध के परिणाम
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन: उत्पत्ति और उद्देश्य
- महाशक्तियों द्वारा सैन्य गठबंधन (नाटो, वारसा संधि)
- हथियारों की दौड़
- हथियारों पर नियंत्रण के प्रयास
- शीत युद्ध के दौरान देशों का गुटीय जुड़ाव
- साम्यवादी गुट
- पूंजीवादी गुट
- गुटनिरपेक्ष देश
- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की विश्व व्यवस्था
Important topics
- शीत युद्ध की प्रकृति और प्रमुख घटनाएँ
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सिद्धांत और प्रासंगिकता
- नाटो और वारसा संधि जैसे सैन्य गठबंधनों का विश्लेषण
- हथियारों की दौड़ और इसके नियंत्रण के प्रयास
- शीत युद्ध के दौरान विभिन्न देशों की विदेश नीति
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
(अ) यह अमेरिका, सोवियत संघ और उनके संबंधित सहयोगियों के बीच एक प्रतियोगिता थी।
(ब) यह महाशक्तियों के बीच एक वैचारिक युद्ध था।
(स) इससे हथियारों की होड़ मच गई।
(द) अमेरिका और सोवियत संघ प्रत्यक्ष युद्धों में लगे हुए थे।
शीत युद्ध के संदर्भ में, जो कथन गलत है वह है (द) अमेरिका और सोवियत संघ प्रत्यक्ष युद्धों में लगे हुए थे। शीत युद्ध वास्तव में दो महाशक्तियों - संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ - और उनके सहयोगियों के बीच एक वैचारिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रतिद्वंद्विता थी, जिसमें हथियारों की होड़ भी शामिल थी। हालाँकि, दोनों महाशक्तियाँ सीधे तौर पर एक-दूसरे के खिलाफ सैन्य संघर्ष में शामिल नहीं हुईं, बल्कि उन्होंने अप्रत्यक्ष तरीकों जैसे प्रॉक्सी युद्धों, जासूसी और प्रचार का सहारा लिया। इसलिए, यह कहना गलत है कि वे प्रत्यक्ष युद्धों में लगे हुए थे।
प्रश्न 2
(अ) उपनिवेशवाद से मुक्त हुए देशों को स्वतंत्र नीतियों को अपनाने में समर्थ बनाना।
(ब) किसी भी सैन्य गठबंधन में शामिल होने के लिए इंकार करना।
(स) वैश्विक मुद्दों पर 'तटस्थता' की नीति का पालन करना।
(द) वैश्विक आर्थिक विषमताओं की समाप्ति पर ध्यान केंद्रित करना।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन का एक प्रमुख उद्देश्य उपनिवेशवाद से मुक्त हुए देशों को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने में मदद करना और किसी भी सैन्य गठबंधन में शामिल होने से इनकार करना था। इसके अतिरिक्त, यह वैश्विक आर्थिक विषमताओं को समाप्त करने पर भी ध्यान केंद्रित करता था। हालाँकि, 'तटस्थता' (neutrality) की नीति का पालन करना इसका एकमात्र या मुख्य उद्देश्य नहीं था। गुटनिरपेक्ष देशों ने सक्रिय रूप से वैश्विक मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त की और शांति व विकास के लिए प्रयास किए, जो केवल तटस्थ रहने से कहीं अधिक था। इसलिए, कथन (स) गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्य को पूरी तरह से नहीं दर्शाता है, क्योंकि आंदोलन का रुख केवल तटस्थता से कहीं अधिक सक्रिय था।
प्रश्न 3
(क) गठबंधन के सदस्य देशों को अपने भू-क्षेत्र में महाशक्तियों के सैन्य अड्डे के लिए स्थान देना ज़रूरी था।
(ख) सदस्य देशों को विचारधारा और रणनीति दोनो स्तरों पर महाशक्ति का समर्थन करना था।
(ग) जब कोई राष्ट्र किसी एक सदस्य-देश पर आक्रमण करता था तो इसे सभी सदस्य देशों पर आक्रमण समझा जाता था।
(घ) महाशक्तियाँ सभी सदस्य देशों को अपने परमाणु हथियार विकसित करने में मदद करती थीं।
(क) सही: सैन्य गठबंधनों में, सदस्य देशों से अक्सर यह अपेक्षा की जाती थी कि वे अपने क्षेत्र में महाशक्तियों को सैन्य अड्डे स्थापित करने की अनुमति दें, ताकि उनकी सामरिक पहुँच बढ़ सके।
(ख) सही: सदस्य देशों को न केवल महाशक्ति की सैन्य और राजनीतिक रणनीतियों का समर्थन करना होता था, बल्कि उनकी विचारधारा (जैसे पूंजीवाद या साम्यवाद) को भी अपनाना या उसका समर्थन करना होता था।
(ग) सही: यह विशेषता विशेष रूप से नाटो (NATO) जैसे गठबंधनों में प्रमुख थी, जहाँ एक सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाता था और सामूहिक सुरक्षा का सिद्धांत लागू होता था।
(घ) गलत: महाशक्तियाँ आमतौर पर अपने परमाणु हथियारों के एकाधिकार को बनाए रखना चाहती थीं और सदस्य देशों को अपने परमाणु हथियार विकसित करने में मदद करने के बजाय, उन पर नियंत्रण रखने का प्रयास करती थीं।
प्रश्न 4
(क) पोलैंड
(ख) फ्रांस
(ग) जापान
(घ) नाइजीरिया
(ङ) उत्तरी कोरिया
(च) श्रीलंका
शीत युद्ध के दौरान विभिन्न देशों का गुटीय जुड़ाव इस प्रकार था:
- (क) पोलैंड: साम्यवादी गुट (सोवियत संघ के नेतृत्व में)
- (ख) फ्रांस: पूंजीवादी गुट (अमेरिका के नेतृत्व में)
- (ग) जापान: पूंजीवादी गुट (अमेरिका के नेतृत्व में)
- (घ) नाइजीरिया: गुटनिरपेक्ष (किसी भी गुट में शामिल नहीं)
- (ङ) उत्तरी कोरिया: साम्यवादी गुट (सोवियत संघ और चीन के प्रभाव में)
- (च) श्रीलंका: गुटनिरपेक्ष (किसी भी गुट में शामिल नहीं)
प्रश्न 5
शीत युद्ध के दौरान हथियारों की दौड़ और हथियारों पर नियंत्रण दोनों ही घटनाक्रमों के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण थे:
हथियारों की दौड़ के कारण:
- अविश्वास और भय: संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच गहरे वैचारिक मतभेद और आपसी अविश्वास ने दोनों महाशक्तियों को एक-दूसरे पर हावी होने के लिए लगातार अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
- प्रतिष्ठा और शक्ति प्रदर्शन: हथियारों का विकास और संग्रह दोनों गुटों के लिए अपनी श्रेष्ठता, शक्ति और प्रभाव प्रदर्शित करने का एक तरीका बन गया था।
- सुरक्षा की भावना: प्रत्येक महाशक्ति को डर था कि यदि वह पीछे रह गई तो दूसरी महाशक्ति उस पर हावी हो जाएगी, इसलिए उन्होंने अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हथियारों का जखीरा बढ़ाया।
हथियारों पर नियंत्रण के कारण:
- विनाश का डर: परमाणु हथियारों के विकास ने विनाश के ऐसे नए और भयानक साधनों को जन्म दिया, जिससे दोनों महाशक्तियाँ एक पूर्ण परमाणु युद्ध के संभावित परिणामों से भयभीत थीं।
- लागत: हथियारों की दौड़ अत्यंत महंगी थी और दोनों महाशक्तियों के संसाधनों पर भारी बोझ डाल रही थी। नियंत्रण संधियों से इस लागत को कम करने की उम्मीद थी।
- अंतर्राष्ट्रीय दबाव: विश्व के अन्य देश और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी परमाणु युद्ध के खतरे से चिंतित थे और उन्होंने महाशक्तियों पर हथियारों को नियंत्रित करने के लिए दबाव डाला।
- स्थिरता की आवश्यकता: दोनों पक्ष यह समझने लगे थे कि अनियंत्रित हथियारों की दौड़ से अंततः विनाश ही होगा, इसलिए उन्होंने कुछ हद तक स्थिरता बनाए रखने के लिए नियंत्रण उपायों पर सहमति व्यक्त की।
इस प्रकार, हथियारों की दौड़ जहाँ शक्ति और प्रभुत्व की इच्छा से प्रेरित थी, वहीं हथियारों पर नियंत्रण का प्रयास विनाश के डर और स्थिरता की आवश्यकता से उत्पन्न हुआ।
प्रश्न 6
महाशक्तियों (जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ) ने छोटे देशों के साथ सैन्य गठबंधन कई रणनीतिक कारणों से स्थापित किए थे:
- सामरिक ठिकाने (Military Bases): छोटे देशों के साथ गठबंधन करके, महाशक्तियाँ उनके भू-भाग पर सैन्य अड्डे स्थापित कर सकती थीं। इससे उन्हें दुनिया भर में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने, त्वरित प्रतिक्रिया देने और अपने विरोधियों पर नजर रखने में मदद मिलती थी।
- संसाधनों तक पहुँच: कुछ छोटे देशों के पास महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन या सामरिक भौगोलिक स्थिति होती थी। गठबंधन के माध्यम से महाशक्तियाँ इन संसाधनों तक पहुँच सुनिश्चित कर सकती थीं और उनका उपयोग अपने हितों के लिए कर सकती थीं।
- प्रभाव क्षेत्र का विस्तार: गठबंधन बनाकर, महाशक्तियाँ अपने राजनीतिक और वैचारिक प्रभाव को छोटे देशों तक फैला सकती थीं। यह उनके विरोधी गुट के प्रभाव को सीमित करने में भी सहायक होता था।
- सामूहिक सुरक्षा का भ्रम: गठबंधन का सदस्य बनकर, छोटे देशों को महाशक्ति से सुरक्षा का आश्वासन मिलता था, जबकि महाशक्ति को अपने पक्ष में एक सहयोगी मिल जाता था। यह शीत युद्ध के दौरान शक्ति संतुलन बनाए रखने का एक तरीका था।
- अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाना: गठबंधन के माध्यम से महाशक्तियाँ संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपने पक्ष में वोट या समर्थन जुटा सकती थीं, जिससे उनकी कूटनीतिक स्थिति मजबूत होती थी।
- हथियारों का परीक्षण और प्रदर्शन: कुछ मामलों में, छोटे देशों के साथ गठबंधन महाशक्तियों को अपने नए हथियारों का परीक्षण करने या अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करने के अवसर भी प्रदान करते थे।
संक्षेप में, छोटे देशों के साथ सैन्य गठबंधन महाशक्तियों को अपनी वैश्विक पहुँच, शक्ति और सुरक्षा को बढ़ाने का एक प्रभावी माध्यम प्रदान करते थे।
Common mistakes
- शीत युद्ध को दो महाशक्तियों के बीच प्रत्यक्ष युद्ध समझना।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्यों को केवल 'तटस्थता' तक सीमित समझना।
- सैन्य गठबंधनों के सदस्य देशों पर पड़ने वाले दायित्वों को अनदेखा करना।
- महाशक्तियों द्वारा परमाणु हथियारों के प्रसार में सहायता को सही मानना।
Revision tips
- प्रत्येक प्रश्न के उत्तर को ध्यान से पढ़ें और मुख्य बिंदुओं को नोट करें।
- शीत युद्ध से संबंधित प्रमुख देशों और उनके गुटों के जुड़ाव को याद करें।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सिद्धांतों और उद्देश्यों को समझें।
- हथियारों की दौड़ और नियंत्रण के कारणों के बीच संबंध स्थापित करें।
Practice MCQs
Q1. शीत युद्ध के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन गलत है?
Explanation: शीत युद्ध के दौरान, अमेरिका और सोवियत संघ सीधे सैन्य संघर्षों में शामिल नहीं हुए, बल्कि उन्होंने प्रॉक्सी युद्धों और अप्रत्यक्ष टकराव का सहारा लिया।
Q2. निम्नलिखित में से कौन सा कथन गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मुख्य उद्देश्यों में से एक नहीं था?
Explanation: गुटनिरपेक्ष आंदोलन का उद्देश्य केवल तटस्थ रहना नहीं था, बल्कि सक्रिय रूप से वैश्विक शांति और विकास में योगदान देना भी था, जिसमें आर्थिक असमानताओं को दूर करना शामिल था।
Q3. सैन्य गठबंधन के सदस्य देशों के लिए यह आवश्यक था कि वे:
Explanation: सैन्य गठबंधनों में सदस्य देशों से अक्सर यह अपेक्षा की जाती थी कि वे अपने भू-भाग पर महाशक्तियों को सैन्य अड्डे स्थापित करने की अनुमति दें।
Q4. निम्नलिखित में से कौन सा देश शीत युद्ध के दौरान साम्यवादी गुट का हिस्सा था?
Explanation: पोलैंड, पूर्वी यूरोप का एक देश होने के नाते, शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के नेतृत्व वाले साम्यवादी गुट का एक प्रमुख सदस्य था।
Q5. शीत युद्ध के दौरान हथियारों की दौड़ के साथ-साथ हथियारों पर नियंत्रण के विकास का मुख्य कारण क्या था?
Explanation: हथियारों की दौड़ और नियंत्रण दोनों ही महाशक्तियों के बीच वैश्विक आधिपत्य और प्रभाव स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा का परिणाम थे।
Frequently asked questions
शीत युद्ध का दौर क्या था?
शीत युद्ध का दौर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद (लगभग 1945 से 1991 तक) संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ तथा उनके सहयोगियों के बीच चले भू-राजनीतिक तनाव और वैचारिक संघर्ष का काल था। यह प्रत्यक्ष सैन्य टकराव के बजाय राजनीतिक, आर्थिक और प्रचार युद्ध के रूप में लड़ा गया था।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मुख्य उद्देश्य थे: उपनिवेशवाद से मुक्त हुए देशों को स्वतंत्र नीतियां अपनाने में मदद करना, किसी भी सैन्य गठबंधन में शामिल होने से इनकार करना, और वैश्विक शांति व आर्थिक समानता को बढ़ावा देना।
महाशक्तियों ने छोटे देशों के साथ सैन्य गठबंधन क्यों बनाए?
महाशक्तियों ने छोटे देशों के साथ सैन्य गठबंधन इसलिए बनाए ताकि वे अपने भू-क्षेत्र का उपयोग सैन्य अड्डों के लिए कर सकें, अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर सकें, और वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी स्थिति मजबूत कर सकें।
शीत युद्ध के दौरान कौन से देश किस गुट से जुड़े थे?
मुख्य रूप से, अमेरिका के नेतृत्व वाला पूंजीवादी गुट (जैसे फ्रांस, जापान) और सोवियत संघ के नेतृत्व वाला साम्यवादी गुट (जैसे पोलैंड, उत्तरी कोरिया) थे। भारत, नाइजीरिया, श्रीलंका जैसे कई देश गुटनिरपेक्ष थे।
हथियारों की दौड़ और हथियारों पर नियंत्रण के बीच क्या संबंध था?
शीत युद्ध के दौरान महाशक्तियों के बीच अविश्वास और प्रतिस्पर्धा के कारण हथियारों की दौड़ बढ़ी। इसी दौड़ के विनाशकारी परिणामों को देखते हुए, उन्होंने परमाणु युद्ध के खतरे को कम करने के लिए हथियारों पर नियंत्रण के लिए संधियाँ भी कीं।
यह समाधान कक्षा 12 के छात्रों के लिए कैसे उपयोगी है?
यह समाधान "शीत युद्ध का दौर" अध्याय के सभी प्रश्नों के विस्तृत और स्पष्ट उत्तर प्रदान करता है, जिससे छात्रों को विषय की गहरी समझ विकसित करने और परीक्षा की तैयारी में मदद मिलती है।
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