CBSE Class 12 Sanskrit Chapter 2: सूर्यः एव प्रकृतेः आधारः NCERT Solutions

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This chapter, 'सूर्यः एव प्रकृतेः आधारः' (The Sun is the Basis of Nature), from CBSE Class 12 Sanskrit, delves into the profound significance of the Sun as the fundamental source of life and cosmic order. The solutions explain how the Sun governs celestial movements, seasons, and the very existence of flora and fauna. It highlights the Sun's veneration in ancient scriptures like the Vedas and Upanishads, and its poetic depiction in texts like 'Shivrajvijay'. These solutions provide a clear understanding of the Sanskrit text, its vocabulary, and the philosophical concepts related to the Sun's role in the universe, aiding students in their exam preparation by clarifying complex ideas and language.

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
SubjectSanskrit
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
ChapterChapter 2

Chapter summary

Chapter 2, 'सूर्यः एव प्रकृतेः आधारः', focuses on the Sun's indispensable role in nature and the cosmos. The NCERT Solutions cover the Sun's function in governing day and night, seasons, and the cycle of life. It explores the Sun's depiction in ancient Indian literature and philosophy, emphasizing its importance as the sustainer of all existence. The solutions aim to enhance students' comprehension of the Sanskrit text and its underlying scientific and spiritual significance.

Learning outcomes

  • Understand the Sun's central role in nature and the universe.
  • Learn about the Sun's influence on seasons, day, and night.
  • Explore the Sun's significance in Vedic and Upanishadic literature.
  • Analyze the poetic descriptions of the Sun in Sanskrit texts.
  • Grasp the meaning of key Sanskrit vocabulary related to the Sun.

Topics covered

Paper topics

  • सूर्य का महत्व
  • प्रकृति में सूर्य की भूमिका
  • ऋतु परिवर्तन का कारण
  • दिन-रात का चक्र
  • वैदिक साहित्य में सूर्य
  • उपनिषदों में सूर्य
  • शिवराज विजय में सूर्योदय वर्णन
  • सूर्य के पर्यायवाची और विशेषण
  • ब्रह्मांड में सूर्य की स्थिति
  • वनस्पतियों और जीवन पर सूर्य का प्रभाव

Important topics

  • सूर्य का प्रकृति में आधारभूत महत्व
  • सूर्य द्वारा ऋतुओं और दिन-रात का नियंत्रण
  • प्राचीन ग्रंथों में सूर्य का वर्णन
  • सूर्य के विभिन्न काव्यात्मक और वैज्ञानिक पहलू

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Questions and Solutions

पाठ का परिचय

क्या आप जानते हैं कि हमारी सृष्टि का आधार क्या है? किसके चारों ओर यह पृथ्वी सदा घूमती है? निश्चय से सूर्य ही। नहीं तो आधार-रहित होने पर पृथ्वी आकाश में कैसे टिक सकती है और कैसे ऋतुओं और दिन-रात में परिवर्तन हो सकता है? सूर्य के बिना वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों का भी अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। वेदों में और उपनिषदों में भी सर्वत्र ही सूर्य की महत्ता का वर्णन किया गया है। शिवराज विजय के आरम्भ में भी सूर्योदय का सुन्दर, अद्भुत, विज्ञानसंगत वर्णन मिलता है जिसके बारे में हम यहाँ इस पाठ में पढ़ेंगे। शिवराज विजय में अपनी पत्तों की बनी कुटिया से निकल कर गुरू-सेवा में प्रवीण ब्रह्मचारी उदित हो रहे सूर्य को प्रणाम करता हुआ जिस तरह उसकी महिमा का वर्णन करता है, वह निश्चित रूप से न केवल ज्ञानवर्धक है अपितु भाषा के सौन्दर्य का भी उत्तम उदाहरण है।

Solution:

यह खंड पाठ 'सूर्यः एव प्रकृतेः आधारः' का परिचय प्रस्तुत करता है। यह बताता है कि सूर्य ही हमारी सृष्टि का मूल आधार है, जिसके चारों ओर पृथ्वी घूमती है। सूर्य के बिना पृथ्वी का अस्तित्व और ऋतुओं तथा दिन-रात का परिवर्तन संभव नहीं है। पाठ में सूर्य के महत्व को वेदों, उपनिषदों और 'शिवराज विजय' जैसे ग्रंथों के माध्यम से समझाया गया है। विशेष रूप से, 'शिवराज विजय' में सूर्योदय के वर्णन का उल्लेख किया गया है, जो न केवल ज्ञानवर्धक है बल्कि भाषा के सौंदर्य का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। ब्रह्मचारी द्वारा सूर्य की महिमा का वर्णन इस पाठ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सूर्य का वर्णन (भाग 1)

पूर्व दिशा में भगवान् सूर्य का यह लाल प्रकाश है। ये भगवान् (सूर्य) आकाशमण्डल के रत्न हैं, नक्षत्र समूह के सम्राट हैं, इन्द्र की पूर्व दिशा के कर्णाभूषण (कुण्डल) हैं, ब्रह्माण्ड रूपी घर के दीपक हैं, चक्रवों के समूह के प्रिय हैं, भौंरों के समूह के आश्रय हैं। सब व्यवहारों के व्यवस्थापक हैं तथा दिन के स्वामी हैं।

Solution:

इस गद्यांश में सूर्य के विभिन्न रूपों और महत्व का काव्यात्मक वर्णन किया गया है। सूर्य को पूर्व दिशा में लाल प्रकाश के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसे आकाशमण्डल का 'मणि' (रत्न) कहा गया है, जो उसकी अनमोलता को दर्शाता है। नक्षत्रों के समूह का 'चक्रवर्ती' (सम्राट) कहकर उसकी सर्वोच्चता बताई गई है। इन्द्र की दिशा (पूर्व) का 'कुण्डल' (कर्णाभूषण) कहकर उसकी शोभा और दिशा-निर्धारण में भूमिका का संकेत दिया गया है। ब्रह्माण्ड रूपी घर के 'दीपक' के रूप में वह प्रकाश और ज्ञान का स्रोत है। चक्रवाक पक्षियों के समूह का 'प्रिय' और भौंरों के समूह का 'आश्रय' कहकर वह प्राणियों के जीवन से उसके जुड़ाव को दर्शाता है। अंत में, उसे सभी 'व्यवहारों' (कार्यों) का 'सूत्रधार' (व्यवस्थापक) और दिन का 'इन' (स्वामी) कहा गया है, जो उसके सार्वभौमिक नियंत्रण को स्पष्ट करता है।

सूर्य का वर्णन (भाग 2)

यही (सूर्य) दिन-रात को उत्पन्न करता है। यही वर्ष को बारह भागों में विभक्त करता है। यही छः ऋतुओं का कारण है। यही उत्तरायण और दक्षिणायन को स्वीकार करता है। इसी के द्वारा युगों के भेद उत्पन्न हुए हैं। इसी के द्वारा कल्पों के भेद हुए हैं। इसी का आश्रय लेकर परमेष्ठी (ब्रह्मा) की परार्द्ध (अत्यंत दीर्घ काल) की गणना होती है। वेद इसके स्तुतिगान करने वाले हैं। गायत्री (मन्त्र) इसी का गान करती है। यह श्रीरामचन्द्र के कुल का मूल है। यह सम्पूर्ण विश्व के लिए वन्दनीय है।

Solution:

यह गद्यांश सूर्य की काल-गणना और सृष्टि-चक्र में उसकी भूमिका को विस्तार से बताता है। सूर्य ही 'अहोरात्र' (दिन और रात) को उत्पन्न करता है, जो समय की मूल इकाई है। वह 'वत्सर' (वर्ष) को बारह महीनों में विभाजित करता है, जिससे कैलेंडर और समय का निर्धारण होता है। सूर्य ही छह 'ऋतुओं' (वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर) का मूल कारण है, जो प्रकृति में परिवर्तन लाती हैं। सूर्य की गति के आधार पर ही 'उत्तरायण' (जब सूर्य उत्तर की ओर बढ़ता है) और 'दक्षिणायन' (जब सूर्य दक्षिण की ओर बढ़ता है) का विभाजन होता है। युगों (जैसे सत्ययुग, त्रेतायुग आदि) और कल्पों (ब्रह्मा के एक दिन-रात) जैसे अत्यंत दीर्घ कालों की गणना भी सूर्य पर ही आधारित है। यहाँ तक कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा की 'परार्द्ध' जैसी विशाल गणना भी सूर्य पर निर्भर करती है। वेदों और गायत्री मंत्र का सूर्य की स्तुति करना उसके आध्यात्मिक महत्व को दर्शाता है। अंत में, श्रीरामचन्द्र के कुल का मूल और सम्पूर्ण विश्व के लिए वन्दनीय कहकर सूर्य की महत्ता को चरम पर पहुंचाया गया है।

Common mistakes

  • Misinterpreting the complex Sanskrit vocabulary.
  • Failing to connect the scientific and philosophical aspects of the Sun's role.
  • Overlooking the literary beauty in the descriptions of the Sun.

Revision tips

  • Focus on understanding the core message about the Sun's importance.
  • Memorize key Sanskrit terms and their meanings related to the Sun.
  • Practice translating the descriptive passages to grasp their essence.
  • Relate the textual information to basic astronomical and seasonal cycles.

Practice MCQs

Q1. पाठ के अनुसार, सृष्टि का आधार किसे माना गया है?

Q2. सूर्य के बिना किसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा?

Q3. शिवराज विजय के आरम्भ में किसका वर्णन मिलता है?

Q4. सूर्य को आकाशमण्डल का क्या कहा गया है?

Q5. सूर्य किस-किस के परिवर्तन का कारण है?

Frequently asked questions

यह पाठ 'सूर्यः एव प्रकृतेः आधारः' किस कक्षा और विषय के लिए है?

यह पाठ CBSE कक्षा 12 संस्कृत के लिए है।

इस पाठ का मुख्य विषय क्या है?

इस पाठ का मुख्य विषय प्रकृति और ब्रह्मांड में सूर्य के मौलिक महत्व को समझाना है।

पाठ में सूर्य को किन-किन उपाधियों से संबोधित किया गया है?

पाठ में सूर्य को आकाशमण्डल का रत्न, नक्षत्र समूह का सम्राट, ब्रह्माण्ड रूपी घर का दीपक, दिन का स्वामी आदि उपाधियों से संबोधित किया गया है।

सूर्य के बिना किनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा?

पाठ के अनुसार, सूर्य के बिना वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

यह पाठ छात्रों की परीक्षा तैयारी में कैसे मदद करेगा?

यह पाठ संस्कृत पाठ की गहन समझ, शब्दावली और सूर्य के महत्व से संबंधित दार्शनिक अवधारणाओं को स्पष्ट करके परीक्षा की तैयारी में मदद करता है।

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