कक्षा 12 संस्कृत: पाठ 6 सुधामुचः वाचः NCERT समाधान

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यह पृष्ठ सीबीएसई कक्षा 12 संस्कृत के लिए 'सुधामुचः वाचः' (अमृत बरसाने वाली वाणी) नामक पाठ के NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। इस पाठ में संस्कृत साहित्य के कुछ अनमोल सुभाषितों का संकलन है, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। समाधानों में प्रत्येक श्लोक का विस्तृत अन्वय, शब्दार्थ, भावार्थ और व्याख्या शामिल है, जिससे छात्रों को श्लोकों के गहरे अर्थ को समझने में मदद मिलती है। यह पाठ हमें सिखाता है कि कैसे मधुर वाणी, परोपकार, दान और अग्नि में दी गई आहुति स्थायी महत्व रखती है, जबकि शिक्षा और भौतिक वस्तुएं समय के साथ क्षीण हो सकती हैं। अंत में, यह श्लोक बताता है कि जिस प्रकार सोने को चार कसौटियों पर परखा जाता है, उसी प्रकार मनुष्य को त्याग, शील, गुण और कर्म से आंका जाता है। ये समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी में श्लोकों की गहन समझ विकसित करने में सहायक होंगे।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
SubjectSanskrit
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
ChapterChapter 6

Chapter summary

कक्षा 12 संस्कृत के पाठ 6 'सुधामुचः वाचः' के लिए NCERT समाधान यहाँ दिए गए हैं। यह पाठ संस्कृत के सुभाषितों पर केंद्रित है, जो जीवन के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। समाधानों में श्लोकों का अन्वय, शब्दार्थ, भावार्थ और विस्तृत व्याख्या शामिल है, जो छात्रों को श्लोकों के अर्थ और महत्व को समझने में मदद करते हैं। पाठ परोपकार, दान और अच्छे कर्मों की महत्ता पर जोर देता है।

Learning outcomes

  • श्लोक 1 का अन्वय, शब्दार्थ और भावार्थ समझना।
  • परोपकार, मधुर वाणी और प्रसन्न मुख वाले व्यक्तियों के महत्व को समझना।
  • श्लोक 2 का अन्वय, शब्दार्थ और भावार्थ समझना।
  • समय के साथ शिक्षा और भौतिक वस्तुओं के क्षय होने तथा दान और आहुति के स्थायी महत्व को समझना।
  • श्लोक 3 का अन्वय, शब्दार्थ और भावार्थ समझना।
  • मनुष्य के परीक्षण के चार आधारों - त्याग, शील, गुण और कर्म को समझना।

Topics covered

Paper topics

  • सुभाषितों का महत्व
  • मधुर वाणी का प्रभाव
  • परोपकार की महिमा
  • दान और आहुति का स्थायी महत्व
  • शिक्षा का क्षय
  • सोने की परख
  • मनुष्य के परीक्षण के आधार
  • संस्कृत साहित्य
  • श्लोक व्याख्या
  • अन्वय
  • शब्दार्थ
  • भावार्थ

Important topics

  • परोपकार और मधुर वाणी का महत्व
  • दान और आहुति की स्थायी महत्ता
  • मनुष्य के परीक्षण के चार आधार (त्याग, शील, गुण, कर्म)
  • श्लोकों का अन्वय और भावार्थ समझना

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Questions and Solutions

श्लोक 1

वदनं प्रसादसदनं सदयं हृदयं सुधामुचो वाचः। करणं परोपकरणं येषां केषां न ते वन्द्याः ।।
Solution:

यह श्लोक उन महान व्यक्तियों का वर्णन करता है जो अपने गुणों से सभी के लिए वंदनीय होते हैं।

अन्वयः - येषाम् वदनम् प्रसादसदनम्, हृदयम् सदयम्, वाचः सुधामुचः, करणम् परोपकरणम्, ते केषाम् न वन्द्याः?

शब्दार्थः

  • वदनम् - मुख
  • प्रसादसदनम् - प्रसन्नता का घर
  • सदयम् - दया से युक्त
  • हृदयम् - मन
  • सुधामुचः - अमृत बरसाने वाली
  • वाचः - वाणी
  • करणम् - कार्य
  • परोपकरणम् - दूसरों की भलाई करना
  • येषाम् - जिनका
  • ते - वे
  • केषाम् न - किसके लिए नहीं
  • वन्द्याः - वंदना के योग्य, प्रशंसनीय

भावार्थ - जिन लोगों का मुख प्रसन्नता का निवास स्थान है, हृदय दया से भरा है, वाणियाँ अमृत बरसाती रहती हैं, और जिनका कार्य दूसरों की भलाई करना है, वे लोग भला किसके द्वारा वंदनीय (प्रशंसनीय) नहीं हैं? अर्थात्, वे सभी के द्वारा सदा वंदना के योग्य हैं।

व्याख्या - इस श्लोक में ऐसे व्यक्तियों की प्रशंसा की गई है जिनका जीवन परोपकार के लिए समर्पित होता है। उनका मुख हमेशा प्रसन्न रहता है, जो उनके आंतरिक सुख को दर्शाता है। उनका हृदय करुणा और दया से परिपूर्ण होता है। वे जो भी बोलते हैं, वह अमृत के समान मधुर और कल्याणकारी होता है। उनका मुख्य कर्म दूसरों की सहायता करना है। ऐसे गुणवान व्यक्ति सभी के द्वारा पूजनीय और प्रशंसनीय होते हैं।

श्लोक 2

शिक्षा क्षयं गच्छति कालपर्ययात् सुबद्धमूला निपतन्ति पादपाः। जलं जलस्थानगतं च शुष्यति हुतं च दत्तं च सदैव तिष्ठति ।।
Solution:

यह श्लोक समय के परिवर्तनशील स्वभाव और कुछ कार्यों के स्थायी महत्व को दर्शाता है।

अन्वयः – कालपर्ययात् शिक्षा क्षयम् गच्छति । सुबद्धमूलाः पाद्पाः निपतन्ति । जलस्थानगतम् जलम् च शुष्यति । हुतम् च दत्तम् च सदैव तिष्ठति।

शब्दार्थः

  • कालपर्ययात् - समय के बीत जाने पर
  • शिक्षा - ज्ञान, विद्या
  • क्षयम् गच्छति - नष्ट हो जाती है, कम हो जाती है
  • सुबद्धमूलाः - मजबूत जड़ों वाले
  • पादपाः - वृक्ष
  • निपतन्ति - गिर जाते हैं
  • जलस्थानगतम् - जल के स्थान तक पहुँचा हुआ (जल स्रोत)
  • शुष्यति - सूख जाता है
  • हुतम् - अग्नि में दी गई आहुति
  • दत्तम् - दिया गया दान
  • सदैव तिष्ठति - हमेशा रहता है, स्थायी रहता है

भावार्थ - समय के बीत जाने पर शिक्षा भी धीरे-धीरे विस्मृत हो जाती है। मजबूत जड़ों वाले वृक्ष भी (समय या अन्य कारणों से) गिर जाते हैं। जल के स्रोत भी (कभी-कभी) सूख जाते हैं। परन्तु, अग्नि में दी गई आहुति और किया गया दान सदा के लिए बना रहता है।

व्याख्या - यह श्लोक हमें सिखाता है कि संसार में सब कुछ परिवर्तनशील है। ज्ञान या शिक्षा भी समय के साथ भूल जाती है। प्रकृति में भी परिवर्तन आते हैं; मजबूत वृक्ष भी अंततः नष्ट हो जाते हैं और जल स्रोत भी सूख सकते हैं। लेकिन, जो कार्य ईश्वर के लिए या परोपकार के लिए किए जाते हैं, जैसे यज्ञ में दी गई आहुति और दूसरों को दिया गया दान, उनका प्रभाव स्थायी होता है। ये कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते और उनका पुण्यफल सदैव बना रहता है।

श्लोक 3

यथा चतुर्भिः कनकम् परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः। तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा ।।
Solution:

यह श्लोक मनुष्य के चरित्र और गुणों को परखने की विधि बताता है, जिसकी तुलना सोने की परख से की गई है।

अन्वयः – यथा निघर्षण-छेदन-ताप-ताडनैः चतुर्भिः कनकम् परीक्ष्यते तथा त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा (इति) चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते ।

शब्दार्थः

  • यथा - जैसे
  • चतुर्भिः - चार प्रकार से
  • कनकम् - सोना
  • परीक्ष्यते - परखा जाता है
  • निघर्षण - घिसकर
  • छेदन - काटकर
  • ताप - तपाकर
  • ताडनैः - पीटकर
  • तथा - वैसे ही
  • पुरुषः - मनुष्य
  • त्यागेन - त्याग से
  • शीलेन - चरित्र से
  • गुणेन - गुण से
  • कर्मणा - कर्म से

भावार्थ - जैसे सोने को घिसकर, काटकर, तपाकर और पीटकर - इन चार प्रकारों से परखा जाता है, वैसे ही मनुष्य को भी त्याग, शील (चरित्र), गुण और कर्म - इन चार प्रकारों से परखा जाता है।

व्याख्या - इस श्लोक में मनुष्य के वास्तविक मूल्य को आंकने के मापदंड बताए गए हैं। जिस प्रकार शुद्ध सोने की पहचान के लिए उसे विभिन्न विधियों से परखा जाता है, उसी प्रकार एक मनुष्य के चरित्र की परीक्षा भी चार मुख्य आधारों पर होती है: पहला, उसका त्याग (दूसरों के लिए कुछ छोड़ने की क्षमता); दूसरा, उसका शील (अच्छा और सदाचारी चरित्र); तीसरा, उसके गुण (सद्गुण); और चौथा, उसके कर्म (उसके कार्य)। इन चार कसौटियों पर खरा उतरने वाला व्यक्ति ही वास्तव में महान और प्रशंसनीय होता है।

Common mistakes

  • श्लोकों के शब्दार्थों को समझने में कठिनाई।
  • अन्वय को सही क्रम में न लगा पाना।
  • भावार्थ और व्याख्या को श्लोक के मूल अर्थ से जोड़ न पाना।
  • श्लोक में प्रयुक्त व्याकरणिक रूपों को पहचानने में त्रुटि।

Revision tips

  • प्रत्येक श्लोक के शब्दार्थों को कंठस्थ करें।
  • अन्वय को ध्यान से पढ़ें और समझें कि श्लोक के शब्दों को किस क्रम में रखा गया है।
  • भावार्थ और व्याख्या को अपने शब्दों में लिखने का अभ्यास करें।
  • श्लोकों में निहित शिक्षाओं को अपने जीवन से जोड़ने का प्रयास करें।

Practice MCQs

Q1. प्रथम श्लोक के अनुसार, वंदनीय व्यक्ति कौन है?

Q2. द्वितीय श्लोक के अनुसार, समय के साथ क्या क्षीण हो जाता है?

Q3. द्वितीय श्लोक में किसे स्थायी बताया गया है?

Q4. सोने को परखने के लिए किन चार विधियों का प्रयोग किया जाता है?

Q5. मनुष्य को किन चार गुणों के आधार पर परखा जाता है?

Frequently asked questions

यह पाठ 'सुधामुचः वाचः' किस बारे में है?

यह पाठ संस्कृत के सुभाषितों (सुंदर वचनों) का संकलन है, जो जीवन के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इसमें मधुर वाणी, परोपकार, दान और अच्छे कर्मों के महत्व पर जोर दिया गया है।

कक्षा 12 संस्कृत के लिए इन समाधानों का क्या महत्व है?

ये समाधान छात्रों को पाठ 'सुधामुचः वाचः' के श्लोकों के अर्थ, अन्वय, भावार्थ और व्याख्या को गहराई से समझने में मदद करते हैं, जो परीक्षा की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

श्लोक 2 में किन चीजों को स्थायी बताया गया है?

श्लोक 2 के अनुसार, अग्नि में दी गई आहुति (हुत) और दान (दत्त) ही स्थायी हैं, जो समय के साथ नष्ट नहीं होते।

मनुष्य को किन चार आधारों पर परखा जाता है?

जिस प्रकार सोने को चार विधियों से परखा जाता है, उसी प्रकार मनुष्य को उसके त्याग, शील (चरित्र), गुण और कर्म के आधार पर परखा जाता है।

क्या इन समाधानों में श्लोकों का व्याकरणिक विश्लेषण भी शामिल है?

समाधानों में मुख्य रूप से श्लोकों का अन्वय, शब्दार्थ, भावार्थ और व्याख्या शामिल है। व्याकरणिक विश्लेषण सीधे तौर पर विस्तृत नहीं है, लेकिन अन्वय को समझने से व्याकरणिक संरचना का बोध होता है।

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