CBSE Class 12 Hindi Aroh: Chapter 17 'शिरीष के फूल' NCERT Solutions
CBSE Class 12 Hindi Aroh Chapter 17, 'शिरीष के फूल' (Shirish Ke Phool), explores the profound symbolism of the Shirish flower. This chapter delves into themes of resilience, endurance, and the human spirit's capacity to flourish even in challenging circumstances. It highlights the flower's distinctive qualities, its historical and literary importance in India, and draws insightful connections between its life cycle and the human experience. The solutions offer a comprehensive understanding of the author's reflections on life, nature, and societal norms. This resource is invaluable for students seeking to grasp the chapter's intricate concepts and prepare effectively for examinations. It provides a clear, structured method for studying the text, enhancing comprehension and facilitating thorough revision.
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 12 |
| Subject | Hindi Aroh |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | Chapter 17 |
Chapter summary
Chapter 17, 'शिरीष के फूल' (Shirish Ke Phool), from the CBSE Class 12 Hindi Aroh textbook, focuses on the symbolic representation of the Shirish flower. The solutions explore the flower's remarkable ability to bloom and survive in harsh conditions, symbolizing human resilience and the will to live. It discusses the flower's literary and cultural significance, contrasting its ephemeral beauty with its enduring nature. The chapter also touches upon philosophical aspects of life, death, and detachment, drawing parallels with historical figures and societal observations. These NCERT solutions provide a clear breakdown of the text's meaning and underlying messages.
Learning outcomes
- Understand the symbolic meaning of the Shirish flower in the context of human life and resilience.
- Analyze the author's philosophical observations on life, nature, and societal values.
- Explore the cultural and literary significance of the Shirish flower in Indian tradition.
- Grasp the author's perspective on enduring hardship and maintaining composure amidst challenges.
- Appreciate the author's writing style and his ability to connect nature's phenomena with human experiences.
Topics covered
Paper topics
- शिरीष के फूल का परिचय
- लेखक का जीवन परिचय (हजारी प्रसाद द्विवेदी)
- शिरीष की विशेषताएँ (कठोरता, कोमलता, जीजीविषा)
- प्रकृति और मनुष्य का संबंध
- सांस्कृतिक और साहित्यिक महत्व
- मध्यकालीन इतिहास का संदर्भ
- जीवन के सत्य (वृद्धावस्था, मृत्यु)
- अनासक्ति और कर्मठता का भाव
- लेखक की भाषा-शैली
- पाठ का प्रतिपाद्य
- पाठ का सारांश
Important topics
- शिरीष के फूल की जीजीविषा और उसका प्रतीकात्मक अर्थ
- लेखक की प्रकृति और मनुष्य के जीवन के बीच तुलना
- कठोर परिस्थितियों में अविचल रहने का संदेश
- सांस्कृतिक और साहित्यिक संदर्भों की व्याख्या
- लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी की जीवन-शैली और विचार
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Questions and Solutions
लेखक परिचय
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म सन 1907 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के आरत दूबे का छपरा नामक गाँव में हुआ था। उन्होंने काशी के संस्कृत महाविद्यालय से शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण की और सन 1930 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद, वे शांतिनिकेतन चले गए, जहाँ वे 1950 तक हिंदी भवन के निदेशक रहे। तत्पश्चात, वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने और फिर सन 1960 में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में हिंदी विभागाध्यक्ष का पद संभाला। उन्हें उनकी पुस्तक 'आलोक पर्व' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लखनऊ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की मानद उपाधि प्रदान की और भारत सरकार ने पद्मभूषण से अलंकृत किया। द्विवेदी जी संस्कृत, प्राकृत, बांग्ला आदि भाषाओं के गहन ज्ञाता थे और दर्शन, संस्कृति, धर्म जैसे विषयों में उनकी विशेष रुचि थी। उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति की गहरी समझ और विषय-वैविध्य के दर्शन होते हैं। वे परंपरा और आधुनिक प्रगतिशील मूल्यों के समन्वय में विश्वास रखते थे। उनका निधन सन 1979 में हुआ।
प्रमुख रचनाएँ:
- निबंध-संग्रह: अशोक के फूल, कल्पलता, विचार और वितर्क, कुटज, विचार-प्रवाह, आलोक-पर्व, प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद।
- उपन्यास: बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचंद्रलेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा।
- आलोचना/साहित्य इतिहास: सूर साहित्य, कबीर, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, नाथ संप्रदाय, कालिदास की लालित्य योजना, हिंदी-साहित्य का आदिकाल, हिंदी-साहित्य की भूमिका, हिंदी-साहित्य : उद्भव और विकास।
- ग्रंथ-संपादन: संदेश-रासक, पृथ्वीराज रासो, नाथ-सिद्धों की बानियाँ।
- संपादन: विश्व भारती पत्रिका (शांतिनिकेतन)।
साहित्यिक विशेषताएँ
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्य भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का दर्पण है। वे अपने ज्ञान को बोध और पांडित्य की सहृदयता में ढालकर एक ऐसा रचना-संसार प्रस्तुत करते हैं, जो विचार की तीक्ष्णता, कथन की लालित्यपूर्ण शैली और संरचना की शास्त्रीयता का अद्भुत संगम है। उनकी रचनाओं में कबीर, रवींद्रनाथ टैगोर और तुलसीदास जैसे महान व्यक्तित्व एकाकार हो उठते हैं। उनके लेखन से फूटने वाली लोकधर्मी रोमैंटिक धारा उनके उच्च कृतित्व को सहज ग्राह्य बनाती है। उनकी सांस्कृतिक दृष्टि अत्यंत सशक्त है, जिसमें इस बात पर बल दिया गया है कि भारतीय संस्कृति किसी एक जाति की देन न होकर, समय-समय पर विभिन्न जातियों के श्रेष्ठ साधनांशों के मिलन से विकसित हुई है। इसकी मूल चेतना विराट मानवतावाद है।
भाषा-शैली
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की भाषा तत्सम शब्दों की प्रधानता वाली है। उनकी रचनाओं में पांडित्य प्रदर्शन की अपेक्षा सहजता और सरलता का भाव अधिक रहता है। उन्होंने तत्सम शब्दावली के साथ-साथ तद्भव, देशज, उर्दू-फ़ारसी आदि भाषाओं के शब्दों का भी कुशलतापूर्वक प्रयोग किया है। अपने निबंधों में उन्होंने विचारात्मक, भावात्मक और व्यंग्यात्मक शैलियों को अपनाया है, जिससे उनकी लेखन शैली अत्यंत प्रभावशाली और विविधपूर्ण बन जाती है।
प्रतिपादय
'शिरीष के फूल' नामक निबंध 'कल्पलता' नामक संग्रह से लिया गया है। इस निबंध का मुख्य प्रतिपाद्य यह है कि शिरीष का फूल, जो भयंकर आँधी, लू और प्रचंड गर्मी में भी अविचल रहकर कोमल पुष्पों का सौंदर्य बिखेरता है, वह मनुष्य की अजेय जीजीविषा (जीने की इच्छा) का प्रतीक है। लेखक इस फूल के माध्यम से यह स्थापित करना चाहता है कि अत्यधिक कोलाहल और संघर्ष के बीच भी धैर्यपूर्वक, लोकहित में और कर्तव्यशील बने रहना एक महान मानवीय मूल्य है। ऐसी भावधारा में बहते हुए लेखक को आत्मबल के महत्व को सिद्ध करने वाले गांधी जी की याद आती है, और वह गांधीवादी मूल्यों के अभाव की पीड़ा से भी व्यथित होता है। निबंध में शिरीष के फूल की कोमलता, उसके इतिहास, मध्यकालीन जीवन और सामंती वैभव के खोखलेपन को दर्शाया गया है। लेखक सच्चे कवि के उस तत्त्व-दर्शन को भी प्रस्तुत करता है, जिसमें योगी की अनासक्त शून्यता और प्रेमी की सरस पूर्णता एक साथ उपलब्ध होती है।
सारांश
लेखक शिरीष के वृक्षों के समूह के बीच बैठकर यह निबंध लिख रहा है। जेठ की भीषण गर्मी में जब धरती तप रही होती है, तब भी शिरीष का वृक्ष फूलों से लदा रहता है। लेखक बताता है कि बहुत कम फूल ऐसी गर्मी में खिल पाते हैं; जैसे अमलतास केवल पंद्रह-बीस दिन के लिए ही फूलता है, जिसे कबीरदास भी पसंद नहीं करते। इसके विपरीत, शिरीष वसंत में खिलकर भादों माह तक खिले रहते हैं। भयंकर गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच भी शिरीष का वृक्ष अवधूत की तरह जीवन की अजेयता का संदेश देता रहता है।
शिरीष के वृक्ष बड़े और छायादार होते हैं। पुराने समय के रईस लोग मंगलकारी वृक्षों में शिरीष को भी लगाते थे। वात्स्यायन के अनुसार, बगीचे के घने छायादार वृक्षों पर ही झूला डालना चाहिए। यद्यपि पुराने कवि बकुल के पेड़ पर झूला डालने की बात करते हैं, लेखक शिरीष को भी इसके लिए उपयुक्त मानता है।
शिरीष की डालें कुछ कमजोर होती हैं, लेकिन उन पर झूलने वालों का वजन भी सामान्यतः कम ही होता है। संस्कृत साहित्य में शिरीष के फूलों को अत्यंत कोमल माना गया है; कालिदास के अनुसार, वे केवल भौंरों के पैरों का दबाव ही सह सकते हैं, पक्षियों का नहीं। इसी आधार पर इन्हें कोमल समझा जाता है, पर लेखक इनके फलों की मजबूती पर भी ध्यान दिलाता है, जो तभी गिरते हैं जब उन्हें धक्का दिया जाता है। लेखक ऐसे नेताओं की याद करता है जो समय की पहचान नहीं करते और धक्का दिए जाने पर ही पद छोड़ते हैं। वह सोचता है कि पुराने समय की यह अधिकार-लिप्सा समय रहते सावधान क्यों नहीं होती। वृद्धावस्था और मृत्यु जगत के अटल सत्य हैं। शिरीष के फूलों को भी यह समझना चाहिए कि उनका झड़ना निश्चित है, पर वे सुनते नहीं। मृत्यु का देवता निरंतर प्रहार कर रहा है, जिसमें कमजोर समाप्त हो जाते हैं। यह प्राणधारा और काल के बीच का संघर्ष है, जिसमें हिलने-डुलने वाले कुछ समय के लिए बच सकते हैं, पर झड़ते ही मृत्यु निश्चित है।
लेखक को शिरीष का वृक्ष अवधूत के समान लगता है, जो हर स्थिति में स्थिर रहता है और भयंकर गर्मी में भी अपने लिए जीवन-रस ढूंढ लेता है। एक वनस्पतिशास्त्री के अनुसार, यह वृक्ष वायुमंडल से ही अपना रस खींच लेता है।
Common mistakes
- Misinterpreting the symbolic meaning of the Shirish flower.
- Overlooking the philosophical depth of the author's observations.
- Failing to connect the flower's characteristics with human resilience.
- Not understanding the cultural references made in the text.
Revision tips
- Read the chapter thoroughly to understand the author's perspective on the Shirish flower.
- Focus on the symbolic meanings attributed to the flower and its relevance to human life.
- Analyze the author's comparisons between the flower's endurance and human resilience.
- Pay attention to the literary and cultural references made throughout the chapter.
- Use these solutions to clarify any doubts and reinforce your understanding of the key themes.
Practice MCQs
Q1. लेखक किस ऋतु में शिरीष के फूल पर निबंध लिख रहा है?
Explanation: लेखक जेठ की भीषण गर्मी में शिरीष के फूलों के बारे में लिख रहा है, जो ग्रीष्म ऋतु का समय है।
Q2. शिरीष के फूल की कौन सी विशेषता लेखक को सबसे अधिक प्रभावित करती है?
Explanation: लेखक शिरीष की अजेय जीजीविषा और प्रचंड गर्मी व लू में भी अविचल रहने की क्षमता से प्रभावित है।
Q3. संस्कृत साहित्य में शिरीष के फूलों को कैसा माना गया है?
Explanation: कालिदास के अनुसार, शिरीष के फूल इतने कोमल होते हैं कि वे केवल भौंरों के पैरों का ही दबाव सहन कर पाते हैं।
Q4. लेखक शिरीष के वृक्ष को किसके समान मानता है?
Explanation: लेखक शिरीष को अवधूत की तरह मानता है, जो हर परिस्थिति में अविचल रहता है और जीवन का रस ढूंढ लेता है।
Q5. शिरीष के फूलों को कब तक खिले रहने की विशेषता है?
Explanation: शिरीष के फूल वसंत में खिलते हैं और भादों माह तक खिले रहते हैं, जो इसकी दीर्घायु को दर्शाता है।
Frequently asked questions
यह NCERT समाधान किस कक्षा और विषय के लिए है?
यह NCERT समाधान CBSE कक्षा 12 के हिंदी आरोह (Hindi Aroh) विषय के लिए है, विशेष रूप से अध्याय 17 'शिरीष के फूल' पर केंद्रित है।
'शिरीष के फूल' पाठ का मुख्य विषय क्या है?
पाठ का मुख्य विषय शिरीष के फूल की असाधारण सहनशीलता और जीजीविषा है, जो लेखक को कठोर परिस्थितियों में भी अविचल रहने और जीवन का रस ढूंढने की प्रेरणा देती है। यह पाठ प्रकृति के माध्यम से जीवन के गहन सत्यों को भी उजागर करता है।
लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने शिरीष के फूल की तुलना किससे की है?
लेखक ने शिरीष के फूल की तुलना एक अवधूत से की है, जो हर परिस्थिति में शांत और अविचल रहता है, तथा जीवन के रस को सोखता रहता है।
क्या यह समाधान परीक्षा की तैयारी में मदद करेगा?
हाँ, यह समाधान पाठ के सारांश, प्रतिपाद्य और महत्वपूर्ण बिंदुओं को स्पष्ट करता है, जिससे छात्रों को परीक्षा की तैयारी में मदद मिलेगी।
पाठ में शिरीष के फूलों को कोमल क्यों कहा गया है?
संस्कृत साहित्य के अनुसार, शिरीष के फूल इतने कोमल माने जाते हैं कि वे केवल भौंरों के पैरों का ही दबाव सहन कर सकते हैं, पक्षियों के पैरों का नहीं। हालाँकि, लेखक इसके फलों की मजबूती पर भी ध्यान दिलाता है।
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