CBSE Class 12 Hindi Aroh: Chapter 12 'Bazaar Darshan' NCERT Solutions

NCERT Solutions PDF Class 12 PDF

This section provides detailed NCERT Solutions for Chapter 12, 'Bazaar Darshan', from the CBSE Class 12 Hindi Aroh textbook. The chapter, authored by Jainendra Kumar, delves into the psychological impact of the market on consumers. It explores how the allure of the market can lead to unnecessary purchases and dissatisfaction, contrasting this with the idea of using the market wisely based on genuine needs. The solutions explain the concepts of consumerism, the 'power of purchasing' versus actual need, and the manipulative tactics of advertising. It also touches upon the economic philosophy that prioritizes market growth over ethical considerations. These solutions are designed to help students understand the nuances of consumer behavior and the societal implications of a market-driven economy, aiding in their exam preparation.

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
SubjectHindi Aroh
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
ChapterChapter 12

Chapter summary

Chapter 12, 'Bazaar Darshan' by Jainendra Kumar, critically examines the influence of the market on human desires and behavior. The NCERT Solutions cover the author's insights into how the market's 'magic' can enslave individuals, leading to a cycle of greed and dissatisfaction if not approached with a clear understanding of one's needs. The solutions clarify the difference between genuine necessity and impulse buying, driven by the 'heat of the money' and the market's seductive displays.

Learning outcomes

  • Understand the concept of 'Bazaar Darshan' and its implications.
  • Analyze the psychological effects of market advertising and allure.
  • Differentiate between genuine needs and manufactured desires.
  • Evaluate the economic philosophy presented in the chapter.
  • Recognize the role of 'money power' in consumer behavior.
  • Appreciate the author's critique of consumerism.

Topics covered

Paper topics

  • Bazaar Darshan (Market Vision)
  • Consumerism
  • Market Psychology
  • Needs vs. Wants
  • The Power of Money
  • Economic Philosophy
  • Jainendra Kumar's Writing Style
  • Critique of Modern Markets
  • Advertising Influence
  • Self-Control in Shopping

Important topics

  • The manipulative power of the market
  • Distinguishing between genuine needs and desires
  • The role of 'money power' in purchasing decisions
  • Author's critique of market-centric economics
  • The concept of 'want' versus 'lack'

PDF preview

Read page by page below. PDF is streamed from the official NCERT website — no download button on this page.

Loading document …
Page of
Loading page …

Questions and Solutions

लेखक परिचय

जैनेंद्र कुमार का जीवन परिचय, उनकी प्रमुख रचनाएँ और साहित्यिक विशेषताएँ बताइए।

जीवन परिचय: प्रसिद्ध उपन्यासकार जैनेंद्र कुमार का जन्म सन 1905 ई॰ में अलीगढ़ में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो जाने के कारण उनके मामा ने उनका पालन-पोषण किया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा हस्तिनापुर के गुरुकुल में हुई और उच्च शिक्षा उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय, बनारस से ग्रहण की। 1921 ई॰ में गांधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य करने लगे। साहित्य के क्षेत्र में उनकी सेवाओं के लिए उन्हें 1984 ई॰ में 'भारत-भारती' सम्मान, भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनका निधन सन 1990 में दिल्ली में हुआ।

प्रमुख रचनाएँ:

  • उपन्यास: परख, अनाम स्वामी, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी, जयवर्दधन, मुक्तिबोध।
  • कहानी-संग्रह: वातायन, एक रात, दो चिड़ियाँ, फाँसी, नीलम देश की राजकन्या, पाजेब।
  • निबंध-संग्रह: प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, पूर्वोदय, साहित्य का श्रेय और प्रेय, सोच-विचार, समय और हम।

साहित्यिक विशेषताएँ: हिंदी कथा साहित्य में प्रेमचंद के बाद जैनेंद्र कुमार को एक महत्वपूर्ण कथाकार के रूप में जाना जाता है। उन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों के माध्यम से हिंदी में मनोवैज्ञानिक कथा-धारा का प्रवर्तन किया। वे एक गंभीर चिंतक थे जिन्होंने सरल और अनौपचारिक शैली में समाज, राजनीति, अर्थनीति और दर्शन से जुड़े गहन प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास किया। गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित होकर उन्होंने सत्य, अहिंसा, आत्मसमर्पण जैसे सिद्धांतों को अपनी रचनाओं में प्रमुखता से व्यक्त किया। उनकी भाषा-शैली अत्यंत सरल, सहज और भावानुकूल है, जिसमें तत्सम शब्दों के साथ-साथ तद्भव और उर्दू-फ़ारसी के शब्दों का भी सहजता से प्रयोग हुआ है।

पाठ का प्रतिपाद्य एवं सारांश

'बाजार दर्शन' पाठ का प्रतिपाद्य (मुख्य विचार) और सारांश अपने शब्दों में लिखिए।

प्रतिपाद्य: 'बाजार दर्शन' निबंध का मुख्य विचार यह है कि बाजार की चकाचौंध और जादुई आकर्षण मनुष्य को किस प्रकार अपनी गिरफ्त में ले लेता है और उसे अनावश्यक खरीदारी के लिए प्रेरित करता है। लेखक जैनेन्द्र कुमार इस निबंध में उपभोक्तावाद और बाजारवाद के दुष्परिणामों पर प्रकाश डालते हैं। वे बताते हैं कि यदि हम अपनी वास्तविक आवश्यकताओं को समझकर बाजार का उपयोग करें तो उससे लाभ उठा सकते हैं, अन्यथा बाजार की चमक-दमक में फंसकर हम असंतोष, तृष्णा और ईर्ष्या से ग्रसित होकर अपना सर्वनाश कर सकते हैं। लेखक ने दार्शनिक और किस्सागो शैली का प्रयोग करते हुए यह स्पष्ट किया है कि केवल बाजार का पोषण करने वाला अर्थशास्त्र एक प्रकार का अनीतिशास्त्र है।

सारांश: लेखक अपने एक मित्र का अनुभव बताते हैं कि कैसे वह मित्र बाजार में एक मामूली सी चीज खरीदने गया था, लेकिन वापस ढेर सारे सामान के बंडलों के साथ लौटा। जब लेखक ने कारण पूछा तो मित्र ने अपनी पत्नी को दोषी ठहराया। लेखक के अनुसार, पुरुष अक्सर अपनी पत्नी की ओट लेकर खरीदारी की जिम्मेदारी से बचते हैं। इस खरीदारी में 'पैसे की गर्मी' यानी अधिक पैसा होने का एहसास भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पैसे की क्रय शक्ति का उपयोग करने से व्यक्ति को एक प्रकार का 'पावर' महसूस होता है। कुछ लोग पैसे को जोड़कर भी गर्व महसूस करते हैं। मित्र ने बताया कि उसका सारा पैसा खर्च हो गया था और उसकी अधिकतर खरीद उसकी जरूरत के अनुपात से नहीं, बल्कि उसकी क्रय शक्ति के अनुपात से हुई थी।

लेखक आगे बताते हैं कि फालतू चीजों की खरीद का एक प्रमुख कारण बाजार का आकर्षण है, जिसे मित्र ने 'शैतान का जाल' कहा है। यह इतना आकर्षक होता है कि इसमें वही व्यक्ति नहीं फंसता जो बेहया हो। बाजार अपने रूप-जाल में सबको उलझा लेता है। इसका आमंत्रण मूक होता है, लेकिन यह इच्छा जगाता है। हर व्यक्ति को किसी न किसी चीज की कमी महसूस होने लगती है, और यह चाह या अभाव मनुष्य को पागल कर देता है। अंततः, असंतोष, तृष्णा और ईर्ष्या से मनुष्य सदा के लिए बेकार हो जाता है।

लेखक अपने दूसरे मित्र का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि वह मित्र दोपहर से पहले बाजार गया और शाम तक खाली हाथ लौट आया। उसने बताया कि बाजार में सब कुछ खरीदने योग्य था, पर वह कुछ भी नहीं ले पाया क्योंकि एक वस्तु खरीदने का मतलब था दूसरी को छोड़ देना। यदि व्यक्ति को अपनी चाह का पता न हो, तो बाजार की अनगिनत चाहतें उसे घेर लेती हैं और वह कोई निर्णय नहीं ले पाता। लेखक के अनुसार, बाजार का यह रूप का जादू तभी असर करता है जब जेब भरी हो और मन खाली हो, या फिर जब मन खाली हो और जेब भरी हो। खाली मन को बाजार की चीजें निमंत्रण देती हैं और सब कुछ खरीदने का मन करता है।

Common mistakes

  • Confusing the 'heat of money' with genuine need.
  • Falling prey to market's allure without self-control.
  • Attributing all impulse buying solely to spouses.
  • Failing to distinguish between wanting and needing.
  • Overestimating purchasing power without considering necessity.

Revision tips

  • Focus on the author's distinction between 'want' and 'need'.
  • Analyze the examples of the two friends to understand different market responses.
  • Consider the author's critique of an economy that only serves the market.
  • Reflect on personal experiences with impulse buying and market influence.
  • Understand the concept of 'money power' and its psychological effects.

Practice MCQs

Q1. लेखक के अनुसार, बाजार की कौन सी शक्ति मनुष्य को अपना गुलाम बना लेती है?

Q2. लेखक के मित्र ने बाजार से लौटते समय बहुत सारा सामान खरीदा, इसका मुख्य कारण क्या था?

Q3. लेखक किस प्रकार के अर्थशास्त्र को अनीतिशास्त्र बताता है?

Q4. बाजार का आमंत्रण कैसा होता है, जो इच्छा जगाता है?

Q5. लेखक के दूसरे मित्र का बाजार से खाली हाथ लौटने का क्या कारण था?

Frequently asked questions

यह 'बाजार दर्शन' पाठ किस बारे में है?

'बाजार दर्शन' पाठ लेखक जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखा गया है, जिसमें वे बाजार के जादुई प्रभाव, उपभोक्तावाद, और मनुष्य की आवश्यकताओं व इच्छाओं के बीच के अंतर पर विचार करते हैं।

लेखक के अनुसार, बाजार का मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?

लेखक के अनुसार, बाजार की जादुई ताकत मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित करके उसे अपना गुलाम बना लेती है, जिससे वह अपनी वास्तविक जरूरतों से हटकर अनावश्यक चीजें खरीदने लगता है।

पैसे की गर्मी (मनी-बैग) का क्या अर्थ है?

पैसे की गर्मी का अर्थ है कि जब व्यक्ति के पास अधिक पैसा होता है, तो वह अपनी क्रय शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए या अनावश्यक चीजें खरीदने के लिए प्रेरित होता है, भले ही उसकी जरूरत न हो।

लेखक ने किस प्रकार के अर्थशास्त्र को अनीतिशास्त्र कहा है?

लेखक ने उस अर्थशास्त्र को अनीतिशास्त्र कहा है जो केवल बाजार को बढ़ावा देने और वस्तुओं को बेचने पर केंद्रित होता है, न कि मानवीय आवश्यकताओं और कल्याण पर।

बाजार का आमंत्रण कैसा होता है?

लेखक के अनुसार, बाजार का आमंत्रण मूक होता है, जिसमें कोई आग्रह नहीं होता, लेकिन यह व्यक्ति के मन में चीजों को पाने की तीव्र इच्छा जगा देता है।

यह समाधान छात्रों की परीक्षा तैयारी में कैसे मदद करेंगे?

ये समाधान 'बाजार दर्शन' पाठ की गहरी समझ प्रदान करते हैं, जिसमें लेखक के विचारों, उपभोक्तावाद के प्रभावों और नैतिक पहलुओं का विश्लेषण शामिल है, जो परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक होंगे।

Content reviewed by the NCERT Help team. Editorial Team and update policy

NCERT Solutions PDF PDF on NCERT Help. URL unchanged for search indexing.