कक्षा 11 अर्थशास्त्र: उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण - NCERT समाधान

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यह समाधान पृष्ठ कक्षा 11 अर्थशास्त्र के अध्याय 3, 'उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण: एक समीक्षा' पर केंद्रित है। यह 1991 के भारत के आर्थिक सुधारों के कारणों, विश्व व्यापार संगठन (WTO) की सदस्यता के महत्व, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की वित्तीय क्षेत्र में बदलती भूमिका, और मौद्रिक नियंत्रण के विभिन्न उपकरणों जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल करता है। समाधानों में रुपये के अवमूल्यन की अवधारणा और व्यापार में प्रशुल्क एवं अप्रशुल्क अवरोधकों के बीच अंतर को भी स्पष्ट किया गया है। ये विस्तृत और स्पष्टीकरण युक्त समाधान छात्रों को इन जटिल आर्थिक अवधारणाओं को गहराई से समझने और परीक्षा की तैयारी में सहायता करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 11
Subjectभारतीय अर्थव्यवस्था का विकास
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter3. उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण एक समीक्षा

Chapter summary

कक्षा 11 अर्थशास्त्र के अध्याय 3 के ये NCERT समाधान 'उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण: एक समीक्षा' विषय पर केंद्रित हैं। ये समाधान 1991 में भारत द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधारों के पीछे के कारणों, जैसे कि भुगतान संतुलन संकट और राजकोषीय घाटा, की पड़ताल करते हैं। यह विश्व व्यापार संगठन (WTO) के सदस्य होने की अनिवार्यता और वित्तीय क्षेत्र में RBI की भूमिका के परिवर्तन पर भी प्रकाश डालता है। इसके अतिरिक्त, समाधान व्यावसायिक बैंकों पर RBI के नियंत्रण के तरीकों और रुपये के अवमूल्यन के प्रभाव को समझाते हैं, साथ ही युक्तियुक्त विक्रय, द्विपक्षीय व्यापार और प्रशुल्क अवरोधकों जैसे महत्वपूर्ण भेद भी स्पष्ट करते हैं।

Learning outcomes

  • 1991 में भारत में आर्थिक सुधारों की आवश्यकता को समझना।
  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) की सदस्यता के महत्व का विश्लेषण करना।
  • वित्तीय क्षेत्र में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की भूमिका में परिवर्तन को स्पष्ट करना।
  • व्यावसायिक बैंकों पर RBI द्वारा लागू किए जाने वाले नियंत्रण तंत्रों की पहचान करना।
  • रुपये के अवमूल्यन के अर्थ और उसके व्यापार पर प्रभाव को समझाना।
  • विभिन्न प्रकार के व्यापारिक विक्रय और व्यापार अवरोधकों के बीच अंतर करना।

Topics covered

Paper topics

  • आर्थिक सुधारों की आवश्यकता
  • 1991 की नई आर्थिक नीति
  • भुगतान संतुलन संकट
  • विदेशी मुद्रा भंडार
  • मुद्रास्फीति
  • सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSUs)
  • विश्व व्यापार संगठन (WTO)
  • वित्तीय क्षेत्र सुधार
  • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI)
  • नकद आरक्षित अनुपात (CRR)
  • वैधानिक तरलता अनुपात (SLR)
  • बैंक दर
  • रुपये का अवमूल्यन
  • युक्तियुक्त विक्रय
  • अल्पांश विक्रय
  • द्विपक्षीय व्यापार
  • बहुपक्षीय व्यापार
  • प्रशुल्क अवरोधक
  • अप्रशुल्क अवरोधक

Important topics

  • 1991 के आर्थिक सुधारों के कारण और उद्देश्य
  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) की भूमिका और महत्व
  • वित्तीय क्षेत्र में RBI की नियंत्रक से सुविधाप्रदाता भूमिका में परिवर्तन
  • रुपये के अवमूल्यन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
  • प्रशुल्क और अप्रशुल्क अवरोधकों के बीच अंतर

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

भारत में आर्थिक सुधार क्यों आरंभ किए गए?
Solution: भारत में आर्थिक सुधारों की शुरुआत मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से की गई थी:
  1. आर्थिक संकट: 1991 में भारत एक गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा था। देश का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि वह केवल तीन सप्ताह के आयात का भुगतान करने में सक्षम था।
  2. राजकोषीय घाटा और ऋण: सरकारी व्यय, विशेष रूप से सरकारी राजस्व से अधिक होने के कारण, भारी उधारी को जन्म दिया। 1991 में राष्ट्रीय ऋण सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GDP) का लगभग 60% था, और सरकार ब्याज का भुगतान करने में भी कठिनाई महसूस कर रही थी। इसका एक प्रमुख कारण सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के अक्षम प्रबंधन को माना गया।
  3. बढ़ती मुद्रास्फीति: खाड़ी युद्ध जैसे बाहरी कारकों के कारण कीमतों में तेजी से वृद्धि हुई, जिससे मुद्रास्फीति की दर दोहरे अंकों (लगभग 12% प्रति वर्ष) तक पहुँच गई, जिसने संकट को और बढ़ा दिया।
  4. सार्वजनिक क्षेत्र की अक्षमता: कई सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम खराब प्रबंधन के कारण घाटे में चल रहे थे, जिससे राष्ट्रीय संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग नहीं हो पा रहा था।
इन गंभीर आर्थिक चुनौतियों के जवाब में, सरकार ने 1991 में नई आर्थिक नीति की घोषणा की, जिसमें उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण पर जोर दिया गया।

प्रश्न 2

विश्व व्यापार संगठन का सदस्य होना क्यों आवश्यक है?
Solution: विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य होना किसी भी देश के लिए कई कारणों से आवश्यक है, विशेषकर एक वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था में:
  1. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भागीदारी: WTO सदस्य देशों को वैश्विक व्यापार प्रणाली के नियमों के तहत व्यापार करने का अवसर प्रदान करता है। इसके बिना, एक देश अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लाभों से वंचित रह सकता है।
  2. मुक्त व्यापार को बढ़ावा: WTO का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच व्यापार बाधाओं (जैसे टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाएं) को कम करना और मुक्त तथा निष्पक्ष व्यापार को बढ़ावा देना है।
  3. ऋण प्राप्ति में सहायक: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसे अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से ऋण प्राप्त करने के लिए अक्सर WTO का सदस्य होना एक शर्त होती है। ये संस्थान सदस्य देशों को आर्थिक स्थिरता और विकास के लिए सहायता प्रदान करते हैं।
  4. वैश्विक अर्थव्यवस्था का लाभ: WTO का सदस्य बनकर, एक देश वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं, निवेश प्रवाह और तकनीकी हस्तांतरण का लाभ उठा सकता है, जो आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।
संक्षेप में, WTO की सदस्यता एक देश को वैश्विक व्यापार का लाभ उठाने और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में एकीकरण के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 3

भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तीय क्षेत्र में नियंत्रक की भूमिका से स्वयं को सुविधाप्रदाता की भूमिका अदा करने में क्यों परिवर्तित किया?
Solution: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने वित्तीय क्षेत्र में अपनी भूमिका को 'नियंत्रक' से 'सुविधाप्रदाता' में परिवर्तित किया, जिसका मुख्य कारण उदारीकरण की नीतियों का लागू होना और बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा थी।

पहले, एक नियंत्रक के रूप में, RBI ब्याज दरों को स्वयं तय करता था और वाणिज्यिक बैंकों के प्रबंधन संबंधी निर्णयों पर सीधा नियंत्रण रखता था। यह दृष्टिकोण तब प्रभावी था जब अर्थव्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप अधिक था।

उदारीकरण के बाद, अर्थव्यवस्था को अधिक बाजार-उन्मुख बनाया गया। इस परिवर्तन के साथ, RBI ने अपनी भूमिका को सुविधाप्रदाता के रूप में अपनाया। इस नई भूमिका में:

  • ब्याज दरों का निर्धारण: RBI ने ब्याज दरों को बाजार की शक्तियों (मांग और आपूर्ति) द्वारा निर्धारित होने के लिए स्वतंत्र कर दिया।
  • बैंकों को स्वायत्तता: वाणिज्यिक बैंकों को उनके प्रबंधन और निवेश निर्णयों में अधिक स्वतंत्रता दी गई।
  • प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा: उदारीकरण के कारण बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ी। बैंकों को इस प्रतिस्पर्धी माहौल में प्रभावी ढंग से कार्य करने और बेहतर सेवाएं प्रदान करने के लिए, उन्हें अधिक परिचालन स्वायत्तता देना आवश्यक हो गया।
इस प्रकार, RBI ने बैंकों को बाजार में अधिक कुशल और प्रतिस्पर्धी बनने में मदद करने के लिए एक सुविधाप्रदाता की भूमिका निभाई।

प्रश्न 4

रिज़र्व बैंक व्यावसायिक बैंकों पर किस प्रकार नियंत्रण रखता है?
Solution: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) व्यावसायिक बैंकों की गतिविधियों को नियंत्रित करने और मौद्रिक नीति को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए विभिन्न उपकरणों का उपयोग करता है। मुख्य नियंत्रण तंत्र इस प्रकार हैं:
  1. नकद आरक्षित अनुपात (CRR): RBI यह निर्धारित करता है कि प्रत्येक व्यावसायिक बैंक को अपनी कुल जमा राशि का एक निश्चित न्यूनतम प्रतिशत RBI के पास नकद के रूप में रखना होगा। यह अनुपात बैंकों की ऋण देने की क्षमता को नियंत्रित करता है।
  2. वैधानिक तरलता अनुपात (SLR): RBI यह भी निर्धारित करता है कि बैंकों को अपनी कुल जमा राशि का एक न्यूनतम प्रतिशत नकद, सोने या अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियों के रूप में अपने पास तरल परिसंपत्तियों के रूप में रखना होगा। यह बैंकों की तरलता और ऋण देने की क्षमता को प्रभावित करता है।
  3. बैंक दर: यह वह ब्याज दर है जिस पर RBI व्यावसायिक बैंकों के विनिमय बिलों को छूट देता है या उन्हें दीर्घकालिक ऋण प्रदान करता है। बैंक दर में परिवर्तन से बैंकों के लिए धन की लागत प्रभावित होती है, जो अंततः उनकी ऋण देने की दरों को भी प्रभावित करती है।
इन उपकरणों के माध्यम से, RBI अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति और ऋण की उपलब्धता को नियंत्रित करता है, जिससे मूल्य स्थिरता और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है।

प्रश्न 5

रुपयों के अवमूल्यन से आप क्या समझते हैं?
Solution: रुपयों का अवमूल्यन (Devaluation) एक ऐसी स्थिति है जब किसी देश का मौद्रिक प्राधिकरण (जैसे RBI) जानबूझकर अपनी मुद्रा के आधिकारिक विनिमय दर को अन्य देशों की मुद्राओं की तुलना में कम कर देता है। यह बाजार की शक्तियों के कारण होने वाले मूल्यह्रास (Depreciation) से भिन्न है।

अवमूल्यन के मुख्य परिणाम इस प्रकार होते हैं:

  • आयात महंगे हो जाते हैं: चूँकि एक रुपये में अब कम विदेशी मुद्रा खरीदी जा सकती है, इसलिए विदेशों से आयात की जाने वाली वस्तुएं और सेवाएं महंगी हो जाती हैं।
  • निर्यात सस्ते हो जाते हैं: विदेशी खरीदारों के लिए, भारतीय रुपये में भुगतान की जाने वाली वस्तुएं और सेवाएं सस्ती हो जाती हैं, क्योंकि उन्हें अपनी मुद्रा के बदले अधिक भारतीय रुपये मिलते हैं।
इस प्रकार, अवमूल्यन का उद्देश्य आमतौर पर निर्यात को बढ़ावा देना और आयात को हतोत्साहित करना होता है, जिससे देश के व्यापार संतुलन (आयात और निर्यात के बीच का अंतर) को सुधारने में मदद मिलती है।

प्रश्न 6

इनमें भेद करें: (क) युक्तियुक्त और अल्पांश विक्रय (ख) द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार (ग) प्रशुल्क एवं अप्रशुल्क अवरोधक
Solution:

(क) युक्तियुक्त विक्रय (Disinvestment) और अल्पांश विक्रय (Partial Sale):

आधार युक्तियुक्त विक्रय (Disinvestment) अल्पांश विक्रय (Partial Sale)
अर्थ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सरकार की हिस्सेदारी को निजी क्षेत्र को बेचना। इसमें आमतौर पर 51% या उससे अधिक हिस्सेदारी बेची जाती है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में सरकार की हिस्सेदारी का एक छोटा हिस्सा (आमतौर पर 49% से कम) बेचना।
स्वामित्व का हस्तांतरण सार्वजनिक क्षेत्र का स्वामित्व निजी क्षेत्र को हस्तांतरित हो जाता है। स्वामित्व का नियंत्रण सरकार के पास ही रहता है क्योंकि 51% या उससे अधिक हिस्सेदारी सरकार के पास बनी रहती है।
उद्देश्य मुख्य रूप से घाटे वाले PSUs को पुनर्जीवित करना, संसाधनों का कुशल उपयोग सुनिश्चित करना और निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता का लाभ उठाना। मुख्य रूप से सार्वजनिक उपक्रमों के लिए धन जुटाना या उन्हें सूचीबद्ध करके पारदर्शिता बढ़ाना।

(ख) द्विपक्षीय व्यापार (Bilateral Trade) और बहुपक्षीय व्यापार (Multilateral Trade):

आधार द्विपक्षीय व्यापार (Bilateral Trade) बहुपक्षीय व्यापार (Multilateral Trade)
परिभाषा यह दो देशों के बीच होने वाला व्यापारिक समझौता या व्यापारिक संबंध है। यह दो से अधिक देशों के बीच होने वाला व्यापारिक समझौता या व्यापारिक संबंध है।
दायरा यह केवल शामिल दो देशों के हितों और लाभों पर केंद्रित होता है। यह सभी सदस्य देशों के लिए समान अवसर और नियम प्रदान करता है, जिससे एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय बाजार बनता है।
उदाहरण दो देशों के बीच एक विशेष व्यापार समझौता, जैसे कि एक देश दूसरे देश से निश्चित मात्रा में तेल खरीदने पर सहमत होता है। विश्व व्यापार संगठन (WTO) के तहत होने वाला व्यापार, जो कई देशों को शामिल करता है।

(ग) प्रशुल्क अवरोधक (Tariff Barriers) और अप्रशुल्क अवरोधक (Non-Tariff Barriers):

आधार प्रशुल्क अवरोधक (Tariff Barriers) अप्रशुल्क अवरोधक (Non-Tariff Barriers)
परिभाषा ये वे बाधाएं हैं जो आयातित वस्तुओं पर सीधे कर (जैसे सीमा शुल्क या आयात शुल्क) लगाकर लगाई जाती हैं। ये वे बाधाएं हैं जो करों के अलावा अन्य तरीकों से व्यापार को प्रतिबंधित करती हैं।
प्रकार आयात शुल्क, निर्यात शुल्क, टैरिफ दर कोटा। आयात कोटा (मात्रा की सीमा), लाइसेंसिंग आवश्यकताएं, मानक (गुणवत्ता, सुरक्षा), सब्सिडी, गैर-आर्थिक प्रतिबंध (जैसे प्रतिबंधात्मक सरकारी खरीद नीतियां)।
प्रभाव आयातित वस्तुओं की कीमत बढ़ाते हैं, जिससे घरेलू उद्योगों को संरक्षण मिलता है और आयात कम होते हैं। आयात की मात्रा को सीमित करते हैं, या आयात प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं, जिससे व्यापार में बाधा उत्पन्न होती है।

Common mistakes

  • आर्थिक सुधारों के कारणों को केवल एक कारक तक सीमित समझना।
  • WTO की भूमिका को केवल ऋण प्राप्त करने तक सीमित मानना।
  • RBI की नियंत्रक और सुविधाप्रदाता भूमिकाओं के बीच अंतर को स्पष्ट न कर पाना।
  • अवमूल्यन और विस्फीति के बीच भ्रमित होना।
  • प्रशुल्क और अप्रशुल्क अवरोधकों के बीच के सूक्ष्म अंतर को न समझ पाना।

Revision tips

  • आर्थिक सुधारों के पीछे के बहुआयामी कारणों को सूचीबद्ध करें।
  • WTO की सदस्यता के लाभों और सीमाओं पर एक संक्षिप्त नोट तैयार करें।
  • RBI की बदलती भूमिका को दर्शाने वाले प्रमुख नीतिगत परिवर्तनों को याद करें।
  • अवमूल्यन के प्रभाव को आयात और निर्यात के संदर्भ में समझें।
  • भेदभाव वाले प्रश्नों के उत्तरों के लिए एक तुलनात्मक तालिका बनाएं।

Practice MCQs

Q1. 1991 में भारत में आर्थिक सुधारों की शुरुआत का मुख्य कारण क्या था?

Q2. विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सदस्य होना क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?

Q3. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 'नियंत्रक' से 'सुविधाप्रदाता' की भूमिका में परिवर्तन क्यों किया?

Q4. रुपये के अवमूल्यन का सीधा प्रभाव क्या होता है?

Q5. निम्नलिखित में से कौन सा एक 'अप्रशुल्क अवरोधक' का उदाहरण है?

Frequently asked questions

कक्षा 11 अर्थशास्त्र के अध्याय 3 में मुख्य रूप से किन विषयों को शामिल किया गया है?

अध्याय 3 मुख्य रूप से 1991 में भारत में शुरू किए गए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) की नीतियों की समीक्षा करता है। इसमें आर्थिक सुधारों के कारण, विश्व व्यापार संगठन (WTO) की भूमिका, वित्तीय क्षेत्र में RBI के परिवर्तन, और व्यापार से संबंधित विभिन्न अवधारणाएं जैसे अवमूल्यन और व्यापार अवरोधक शामिल हैं।

आर्थिक सुधारों के लिए 1991 का संकट क्यों महत्वपूर्ण था?

1991 में भारत एक गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा था, जिसमें विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम हो गया था और सरकारी खजाने पर भारी कर्ज था। इस संकट ने सरकार को व्यापक आर्थिक सुधारों को लागू करने के लिए प्रेरित किया।

WTO का सदस्य होने से भारत को क्या लाभ हुआ?

WTO का सदस्य होने से भारत को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अधिक अवसर मिले, व्यापार बाधाएं कम हुईं, और वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण को बढ़ावा मिला। यह IMF और विश्व बैंक से ऋण प्राप्त करने की एक शर्त भी थी।

RBI की 'सुविधाप्रदाता' भूमिका से क्या तात्पर्य है?

RBI की 'सुविधाप्रदाता' भूमिका का अर्थ है कि वह अब बैंकों के लिए नियम बनाने और उन्हें नियंत्रित करने के बजाय, बाजार को सुचारू रूप से चलाने में सहायता करता है। इसमें ब्याज दरों को बाजार के अनुरूप निर्धारित होने देना और बैंकों को अधिक परिचालन स्वतंत्रता देना शामिल है।

रुपये के अवमूल्यन का भारतीय निर्यातकों पर क्या प्रभाव पड़ता है?

रुपये के अवमूल्यन से भारतीय निर्यात सस्ते हो जाते हैं, जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उनकी मांग बढ़ सकती है और निर्यातकों को लाभ हो सकता है।

प्रशुल्क और अप्रशुल्क अवरोधकों में मुख्य अंतर क्या है?

प्रशुल्क अवरोधक वे होते हैं जो आयातित वस्तुओं पर सीधे कर (जैसे सीमा शुल्क) लगाते हैं, जबकि अप्रशुल्क अवरोधक वे होते हैं जो मात्रात्मक प्रतिबंध (जैसे कोटा), लाइसेंसिंग या मानकों के माध्यम से व्यापार को बाधित करते हैं।

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