कक्षा 11 जीव विज्ञान अध्याय 19: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन - NCERT समाधान
यह पृष्ठ कक्षा 11 जीव विज्ञान के अध्याय 19, 'उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रदान करता है। इसमें गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR), इसकी स्वनियमन क्रियाविधि, मूत्रण प्रतिवर्ती क्रिया, और हेनले लूप तथा वासा रेक्टा द्वारा मूत्र सांद्रण में प्रतिधारा क्रियाविधि की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है। समाधानों में यकृत, फुफ्फुस और त्वचा जैसे सहायक उत्सर्जी अंगों के कार्यों का भी वर्णन है। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर स्पष्ट और संक्षिप्त तरीके से दिया गया है, जिससे छात्रों को इन जटिल अवधारणाओं को समझने में मदद मिलेगी। ये समाधान परीक्षा की तैयारी और पुनरीक्षण के लिए एक उत्कृष्ट संसाधन हैं, जो छात्रों को उत्सर्जन तंत्र की कार्यप्रणाली की गहरी समझ प्रदान करते हैं।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 11 |
| Subject | जीव विज्ञान |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 19. उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन |
Chapter summary
कक्षा 11 जीव विज्ञान के अध्याय 19 के ये NCERT समाधान उत्सर्जी उत्पादों और उनके निष्कासन की प्रक्रिया पर केंद्रित हैं। इसमें गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) की परिभाषा और स्वनियमन, मूत्रण की प्रतिवर्ती प्रकृति, और हेनले लूप व वासा रेक्टा की प्रतिधारा क्रियाविधि द्वारा मूत्र के सांद्रण की विस्तृत व्याख्या शामिल है। समाधान यकृत, फेफड़ों और त्वचा की उत्सर्जन में भूमिका पर भी प्रकाश डालते हैं। यह अध्याय उत्सर्जन तंत्र की जटिलताओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
Learning outcomes
- गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) को परिभाषित करना और उसके सामान्य मान को समझना।
- GFR की स्वनियमन क्रियाविधि को समझाना।
- मूत्रण प्रतिवर्ती क्रिया की प्रकृति को पहचानना।
- प्रतिधारा क्रियाविधि द्वारा मूत्र सांद्रण की प्रक्रिया का वर्णन करना।
- उत्सर्जन में यकृत, फुफ्फुस और त्वचा की भूमिका का विश्लेषण करना।
Topics covered
Paper topics
- उत्सर्जी उत्पाद
- उत्सर्जन की प्रक्रिया
- गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR)
- GFR का स्वनियमन
- मूत्रण
- हेनले लूप
- वासा रेक्टा
- प्रतिधारा क्रियाविधि
- मूत्र का सांद्रण
- यकृत का उत्सर्जन में योगदान
- फुफ्फुस का उत्सर्जन में योगदान
- त्वचा का उत्सर्जन में योगदान
Important topics
- गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) और स्वनियमन
- प्रतिधारा क्रियाविधि द्वारा मूत्र सांद्रण
- हेनले लूप और वासा रेक्टा की भूमिका
- यकृत, फुफ्फुस और त्वचा के उत्सर्जी कार्य
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
प्रश्न 2
प्रश्न 3
(अ) मूत्रण प्रतिवर्ती क्रिया द्वारा होता है।
(ब) ए०डी०एच० मूत्र को अल्पपरासरणी बनाते हुए जल के निष्कासन में सहायक होता है।
(स) बोमेन संपुट में रक्त प्लाज्मा से प्रोटीन रहित तरल निस्यंदित होता है।
(द) हेनले लूप मूत्र के सांद्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(य) समीपस्थ संवलित नलिका (PCT) में ग्लूकोस सक्रिय रूप से पुनः अवशोषित होता है।
- (अ) सही - मूत्रण एक प्रतिवर्ती क्रिया है।
- (ब) गलत - ADH (एंटी-डाययूरेटिक हार्मोन) मूत्र को सांद्रित (हाइपरटोनिक) बनाता है, जिससे जल का पुनःअवशोषण बढ़ता है, न कि अल्पपरासरणी बनाकर जल के निष्कासन में सहायता करता है।
- (स) सही - बोमेन संपुट में रक्त प्लाज्मा का केवल तरल भाग (प्रोटीन और रक्त कोशिकाएं छोड़कर) निस्यंदित होता है।
- (द) सही - हेनले लूप वृक्क मध्यांश में परासरणीयता प्रवणता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो मूत्र सांद्रण के लिए आवश्यक है।
- (य) सही - समीपस्थ संवलित नलिका (PCT) में ग्लूकोज और अमीनो एसिड जैसे पोषक तत्वों का लगभग पूरा अवशोषण सक्रिय परिवहन द्वारा होता है।
प्रश्न 4
क्रियाविधि का विवरण:
- परासरणीयता प्रवणता: वृक्क वल्कुट (cortex) में परासरणीयता लगभग 300 mOsmol/L होती है, जो मध्यांश की ओर बढ़ते हुए धीरे-धीरे बढ़ती है और सबसे भीतरी मध्यांश (inner medulla) में 1200-1400 mOsmol/L तक पहुँच जाती है। यह प्रवणता मुख्य रूप से सोडियम क्लोराइड (Na+ व Cl-) आयनों और यूरिया के कारण बनती है।
- हेनले लूप: हेनले लूप की अवरोही भुजा (descending limb) से जल का विसरण होता है, जिससे अंदर का तरल सांद्रित होता है। आरोही भुजा (ascending limb) से Na+ और Cl- आयन बाहर निकलते हैं, जिससे बाहर का तरल सांद्रित होता है और अंदर का तरल तनु होता है।
- वासा रेक्टा: वासा रेक्टा, जो हेनले लूप के समानांतर बहती है, इस परासरणीयता प्रवणता को बनाए रखने में मदद करती है। यह मध्यांश से लवणों को वापस रक्त में ले जाती है और जल को बाहर निकलने देती है, जिससे मध्यांश की उच्च परासरणीयता बनी रहती है।
- यूरिया की भूमिका: यूरिया भी मध्यांश की परासरणीयता को बढ़ाने में योगदान देता है। यह हेनले लूप के आरोही भाग से विसरित होकर संग्राहक नलिकाओं में प्रवेश करता है, जिसे बाद में संग्राहक नलिकाएं पुनः मध्यांश के ऊतक द्रव में छोड़ देती हैं।
- मूत्र सांद्रण: इस परासरणीयता प्रवणता के कारण, संग्राहक नलिकाएं (collecting ducts) जब मध्यांश से गुजरती हैं, तो जल का पुनःअवशोषण होता है। हार्मोन ADH (एंटी-डाययूरेटिक हार्मोन) इस जल पुनःअवशोषण को नियंत्रित करता है। जितना अधिक ADH होगा, उतना ही अधिक जल पुनःअवशोषित होगा और मूत्र उतना ही सांद्रित होगा।
संक्षेप में, प्रतिधारा क्रियाविधि जल की हानि को कम करके और वृक्क मध्यांश में उच्च परासरणीयता बनाए रखकर मूत्र को सांद्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
प्रश्न 5
- यकृत (Liver):
- यकृत अमोनिया (जो अत्यंत विषैला होता है) को यूरिया में परिवर्तित करता है, जो अमोनिया की तुलना में कम विषैला होता है। यह यूरिया रक्त द्वारा वृक्कों तक पहुँचाया जाता है और मूत्र के साथ उत्सर्जित हो जाता है।
- यकृत कोशिकाएं हीमोग्लोबिन के विखंडन से पित्त वर्णक (bile pigments) जैसे बिलीरुबिन (bilirubin) और बिलीवर्डिन (biliverdin) बनाती हैं।
- पित्त में कोलेस्ट्रॉल, स्टेरॉयड हार्मोन के निम्नीकृत उत्पाद और कुछ दवाएं जैसे उत्सर्जी पदार्थ भी होते हैं। ये पदार्थ पित्त के माध्यम से आंत में पहुँचते हैं और मल के साथ शरीर से बाहर निकाल दिए जाते हैं।
- फुफ्फुस (Lungs):
- फेफड़े श्वसन के दौरान उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड () को शरीर से बाहर निकालते हैं। प्रतिदिन लगभग 18 लीटर कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है।
- फेफड़े जलवाष्प () को भी बाहर निकालते हैं, खासकर जब हम गर्म या शुष्क वातावरण में सांस लेते हैं।
- त्वचा (Skin):
- त्वचा पसीने (sweat) के माध्यम से कुछ मात्रा में यूरिया, लवण (जैसे NaCl) और थोड़ी मात्रा में जल का उत्सर्जन करती है।
- पसीने का मुख्य कार्य शरीर के तापमान को नियंत्रित करना है, लेकिन यह एक सहायक उत्सर्जन अंग के रूप में भी कार्य करता है।
Common mistakes
- ADH के कार्य को गलत समझना (यह मूत्र को अल्पपरासरणी नहीं बनाता)।
- प्रतिधारा क्रियाविधि में आयनों और यूरिया की भूमिका को भ्रमित करना।
- सहायक उत्सर्जी अंगों के योगदान को कम आंकना।
Revision tips
- GFR और इसके नियमन से संबंधित मुख्य बिंदुओं को रेखांकित करें।
- प्रतिधारा क्रियाविधि के चित्र को समझें और उसके चरणों को याद करें।
- यकृत, फुफ्फुस और त्वचा के उत्सर्जी कार्यों की सूची बनाएं।
Practice MCQs
Q1. एक स्वस्थ व्यक्ति में गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) लगभग कितनी होती है?
Explanation: एक स्वस्थ व्यक्ति में गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) 125 मिलीलीटर प्रति मिनट या 180 लीटर प्रतिदिन होती है।
Q2. गुच्छीय आसन्न उपकरण (Juxtaglomerular apparatus) का मुख्य कार्य क्या है?
Explanation: गुच्छीय आसन्न उपकरण GFR में गिरावट होने पर रेनिन स्रावित करके GFR को सामान्य करने में मदद करता है, जिससे GFR का स्वनियमन होता है।
Q3. निम्नलिखित में से कौन सा कथन गलत है?
Explanation: ADH (एंटी-डाययूरेटिक हार्मोन) मूत्र को हाइपरटोनिक (सांद्रित) बनाता है, जिससे जल का पुनःअवशोषण बढ़ता है, न कि अल्पपरासरणी बनाकर जल निष्कासन में सहायता करता है।
Q4. प्रतिधारा क्रियाविधि का मुख्य उद्देश्य क्या है?
Explanation: प्रतिधारा क्रियाविधि, विशेष रूप से हेनले लूप और वासा रेक्टा में, वृक्क मध्यांश में परासरणीयता प्रवणता बनाए रखकर मूत्र को सांद्रित करने में मदद करती है।
Q5. यकृत का उत्सर्जन में क्या योगदान है?
Explanation: यकृत अमोनिया को कम हानिकारक यूरिया में परिवर्तित करता है और पित्त वर्णक जैसे बिलीरुबिन का निर्माण करता है, जो पित्त द्वारा उत्सर्जित होते हैं।
Frequently asked questions
कक्षा 11 जीव विज्ञान के अध्याय 19 में मुख्य रूप से किन विषयों को शामिल किया गया है?
इस अध्याय में मुख्य रूप से उत्सर्जी उत्पादों, उनके निष्कासन की विधियों, गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR), GFR के स्वनियमन, प्रतिधारा क्रियाविधि द्वारा मूत्र सांद्रण, और उत्सर्जन में यकृत, फुफ्फुस व त्वचा की भूमिका जैसे विषयों को शामिल किया गया है।
गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) क्या है और इसका सामान्य मान क्या है?
गुच्छीय निस्यंदन दर (GFR) वृक्कों द्वारा प्रति मिनट निस्यंदित की गई मूत्र की मात्रा है। एक स्वस्थ व्यक्ति में यह लगभग 125 ml/मिनट या 180 लीटर प्रतिदिन होती है।
प्रतिधारा क्रियाविधि मूत्र को सांद्रित करने में कैसे मदद करती है?
प्रतिधारा क्रियाविधि (हेनले लूप और वासा रेक्टा के माध्यम से) वृक्क मध्यांश में एक परासरणीयता प्रवणता बनाती है, जिससे संग्राहक नलिकाओं से जल का पुनःअवशोषण बढ़ता है और मूत्र सांद्रित होता है।
क्या मूत्रण एक स्वैच्छिक क्रिया है या अनैच्छिक?
मूत्रण एक प्रतिवर्ती क्रिया है, जिसका अर्थ है कि यह मुख्य रूप से अनैच्छिक रूप से नियंत्रित होती है, हालांकि इसे कुछ हद तक स्वैच्छिक नियंत्रण में भी लाया जा सकता है।
यकृत, फुफ्फुस और त्वचा उत्सर्जन में क्या भूमिका निभाते हैं?
यकृत अमोनिया को यूरिया में बदलता है और पित्त वर्णक उत्सर्जित करता है। फुफ्फुस कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प उत्सर्जित करते हैं। त्वचा पसीने के माध्यम से कुछ मात्रा में यूरिया, लवण और जल उत्सर्जित करती है।
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