कक्षा 11 जीव विज्ञान: प्राणि जगत NCERT समाधान

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यह समाधान कक्षा 11 जीव विज्ञान के अध्याय 4, 'प्राणि जगत' के लिए एक व्यापक मार्गदर्शिका प्रदान करता है। इसमें प्राणियों के वर्गीकरण के लिए आवश्यक मूलभूत लक्षणों की पहचान, वर्गीकरण के विभिन्न चरणों और देहगुहा व प्रगुहा के महत्व पर चर्चा की गई है। समाधान अंतःकोशिकीय और बाह्यकोशिकीय पाचन के बीच अंतर, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिवर्धन के बीच भिन्नता, और परजीवी प्लेटीहेल्मिंथीज के विशिष्ट लक्षणों को स्पष्ट करते हैं। इसके अतिरिक्त, आर्थ्रोपोडा के विशाल वर्ग होने के कारणों और जल संवहन तंत्र के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया है। अंत में, यह समझाया गया है कि सभी कशेरुकी रज्जुकी क्यों होते हैं, लेकिन सभी रज्जुकी कशेरुकी क्यों नहीं होते। ये समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण अवधारणाओं को समझने और याद रखने में मदद करेंगे।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 11
Subjectजीव विज्ञान
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter4. प्राणि जगत

Chapter summary

कक्षा 11 जीव विज्ञान के अध्याय 4 'प्राणि जगत' के लिए NCERT समाधान प्राणियों के वर्गीकरण की मूलभूत अवधारणाओं को कवर करते हैं। इसमें वर्गीकरण के लिए आवश्यक लक्षणों, देहगुहा और प्रगुहा के प्रकारों, पाचन के विभिन्न तरीकों (अंतःकोशिकीय बनाम बाह्यकोशिकीय), और परिवर्धन के प्रकारों (प्रत्यक्ष बनाम अप्रत्यक्ष) पर ध्यान केंद्रित किया गया है। समाधान परजीवी प्लेटीहेल्मिंथीज, आर्थ्रोपोडा और इकाइनोडर्मेटा जैसे प्रमुख प्राणी समूहों की विशेषताओं को भी स्पष्ट करते हैं, साथ ही कशेरुकी और रज्जुकी के बीच संबंध की व्याख्या करते हैं।

Learning outcomes

  • प्राणियों के वर्गीकरण के लिए मूलभूत लक्षणों के महत्व को समझना।
  • संगठन के विभिन्न स्तरों और पैटर्न की पहचान करना।
  • देहगुहा और प्रगुहा के आधार पर प्राणियों का वर्गीकरण करना।
  • अंतःकोशिकीय और बाह्यकोशिकीय पाचन के बीच अंतर स्पष्ट करना।
  • प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिवर्धन के बीच भिन्नता को समझना।
  • प्रमुख प्राणी समूहों जैसे प्लेटीहेल्मिंथीज, आर्थ्रोपोडा और इकाइनोडर्मेटा की विशेषताओं का वर्णन करना।
  • कशेरुकी और रज्जुकी के बीच संबंध को सिद्ध करना।

Topics covered

Paper topics

  • प्राणियों का वर्गीकरण
  • वर्गीकरण के मूलभूत लक्षण
  • संगठन के स्तर
  • सममिति
  • द्विकोरिक और त्रिकोरिक संगठन
  • देहगुहा और प्रगुहा (एसीलोमेट, स्यूडोसीलोमेटा, सीलोमेटा)
  • खण्डीभवन
  • पाचन (अंतःकोशिकीय और बाह्यकोशिकीय)
  • परिवर्धन (प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष)
  • प्लेटीहेल्मिंथीज के लक्षण
  • आर्थ्रोपोडा की विशेषताएँ
  • कॉर्डेटा और कशेरुकी संबंध

Important topics

  • वर्गीकरण के मूलभूत लक्षण
  • देहगुहा और प्रगुहा के आधार पर वर्गीकरण
  • अंतःकोशिकीय बनाम बाह्यकोशिकीय पाचन
  • प्रत्यक्ष बनाम अप्रत्यक्ष परिवर्धन
  • आर्थ्रोपोडा की प्रमुख विशेषताएँ
  • कॉर्डेटा और कशेरुकी संबंध

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

यदि प्राणियों के वर्गीकरण के लिए मूलभूत लक्षण ज्ञात न हों तो प्राणियों के वर्गीकरण में आप क्या परेशानियाँ महसूस करेंगे?
Solution: यदि प्राणियों के वर्गीकरण के लिए मूलभूत लक्षण ज्ञात नहीं होते, तो निम्नलिखित परेशानियाँ उत्पन्न होतीं:
  1. सभी जीवों का पृथक रूप से अध्ययन करना संभव नहीं होता, जिससे वर्गीकरण अव्यवहारिक हो जाता।
  2. जीवों के बीच उनके विकासवादी संबंधों और समानता-भिन्नताओं को स्थापित करना अत्यंत कठिन हो जाता।
  3. किसी एक वर्ग के केवल एक या दो जीवों के अध्ययन से उस वर्ग के सभी जंतुओं के बारे में सामान्य जानकारी प्राप्त करना संभव नहीं होता।
  4. विभिन्न प्राणी समूहों के विकासवादी इतिहास और उनके एक-दूसरे से संबंध को समझना मुश्किल होता, जिससे नई जंतु जातियों के विकास को समझना भी कठिन हो जाता।

प्रश्न 2

यदि आपको एक नमूना (specimen) दे दिया जाये तो वर्गीकरण हेतु आप क्या कदम अपनाएँगे?
Solution: यदि मुझे एक प्राणी का नमूना दिया जाए, तो उसके वर्गीकरण के लिए मैं निम्नलिखित कदम उठाऊँगा:
  1. संगठन का स्तर (Levels of Organisation): सबसे पहले, मैं यह निर्धारित करूँगा कि प्राणी कोशिकीय स्तर (जैसे स्पंज), कोशिकीय-ऊतक स्तर (जैसे सीलेंटरेटा), ऊतक-अंग स्तर (जैसे प्लेटीहेल्मिंथीज), या अंग-तंत्र स्तर (जैसे एनेलिडा से कॉर्डेटा) पर संगठित है।
  2. संगठन का पैटर्न (Patterns of Organisation): मैं यह देखूँगा कि संगठन का पैटर्न अपूर्ण पाचन तंत्र (जैसे सीलेंटरेटा) वाला है या पूर्ण पाचन तंत्र (मुँह से गुदा तक) वाला।
  3. सममिति (Symmetry): प्राणी की सममिति का अध्ययन करूँगा – क्या वह अरीय सममित (radial symmetry) है (जैसे स्टारफिश), या द्विपार्श्व सममित (bilateral symmetry) है (जैसे केंचुआ, मनुष्य)।
  4. द्विकोरिक तथा त्रिकोरिक संगठन (Diploblastic and Triploblastic Organisation): मैं यह जाँचूँगा कि प्राणी में भ्रूणीय विकास के दौरान केवल दो जनन स्तर (एक्टोडर्म और एंडोडर्म) होते हैं (द्विकोरिक) या तीन जनन स्तर (एक्टोडर्म, मीसोडर्म और एंडोडर्म) होते हैं (त्रिकोरिक)।
  5. देहगुहा (Body Cavity): मैं यह निर्धारित करूँगा कि प्राणी में देहगुहा (body cavity) उपस्थित है या अनुपस्थित।
  6. प्रगुहा (Coelom): यदि देहगुहा उपस्थित है, तो मैं जाँचूँगा कि वह मीसोडर्म से स्तरित है (सच्ची प्रगुहा या सीलोम) या नहीं (कूटगुहा या स्यूडोसीलोम)।
  7. खण्डीभवन (Segmentation): मैं यह देखूँगा कि प्राणी का शरीर बाह्य या आंतरिक रूप से खंडों में विभाजित है या नहीं (जैसे केंचुए में)।
इन लक्षणों के आधार पर, मैं प्राणी को उसके उपयुक्त संघ (phylum) और वर्ग (class) में वर्गीकृत करने का प्रयास करूँगा।

प्रश्न 3

देहगुहा एवं प्रगुहा का अध्ययन प्राणियों के वर्गीकरण में किस प्रकार सहायक होता है?
Solution: देहगुहा (body cavity) और प्रगुहा (coelom) का अध्ययन प्राणियों के वर्गीकरण में एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। यह वर्गीकरण में इसलिए सहायक होता है क्योंकि:
  1. प्रगुहा की उपस्थिति या अनुपस्थिति: देहभित्ति और आहारनाल के बीच खाली स्थान की उपस्थिति या अनुपस्थिति, और यदि उपस्थित है तो वह स्थान मीसोडर्म से कैसे स्तरित है, यह प्राणियों को वर्गीकृत करने का एक प्रमुख आधार है।
  2. वर्गीकरण के आधार:
    • सीलोमेटा (Coelomates): जिन जन्तुओं में देहगुहा मीसोडर्म से पूरी तरह स्तरित होती है, उन्हें सीलोमेटा कहा जाता है। इनमें पाचन तंत्र और शरीर भित्ति के बीच एक वास्तविक गुहा होती है। उदाहरण: एनेलिडा, मोलस्का, आर्थ्रोपोडा, इकाइनोडर्मेटा, हेमीकॉर्डेटा और कॉर्डेटा।
    • स्यूडोसीलोमेटा (Pseudocoelomates): कुछ जन्तुओं में देहगुहा मीसोडर्म द्वारा पूरी तरह स्तरित नहीं होती, बल्कि एक्टोडर्म और एंडोडर्म के बीच बिखरे हुए मीसोडर्मल ऊतकों के रूप में पाई जाती है। इस प्रकार की देहगुहा को कूटगुहा (pseudocoelom) कहते हैं। उदाहरण: एस्केल्मिंथीज (गोलकृमि)।
    • एसीलोमेट्स (Acoelomates): जिन जन्तुओं में देहगुहा पूर्ण रूप से अनुपस्थित होती है, उन्हें एसीलोमेट्स कहा जाता है। इनमें एक्टोडर्म और एंडोडर्म के बीच मीसोडर्मल कोशिकाएँ भरी रहती हैं। उदाहरण: प्लेटीहेल्मिंथीज (चपटे कृमि)।
इस प्रकार, प्रगुहा की प्रकृति (सच्ची, कूट या अनुपस्थित) प्राणियों के प्रमुख समूहों को अलग करने में मदद करती है।

प्रश्न 4

अन्तः कोशिकीय एवं बाह्य कोशिकीय पाचन में विभेद करें।
Solution: अन्तःकोशिकीय पाचन और बाह्य कोशिकीय पाचन के बीच मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं:

अन्तःकोशिकीय पाचन (Intracellular Digestion):

  • यह पाचन क्रिया कोशिका के अन्दर होती है।
  • खाद्य कण कोशिका के अन्दर लाइसोसोम जैसे कोशिकांगों में पहुँचते हैं, जहाँ पाचक एंजाइमों द्वारा उनका पाचन होता है।
  • इसमें केवल कुछ ही एंजाइम पाचन में भाग लेते हैं।
  • यह प्रक्रिया कम क्षमतायुक्त (less efficient) होती है, क्योंकि यह केवल छोटे खाद्य कणों के लिए ही संभव है।
  • उदाहरण: अमीबा (Amoeba) और अन्य एककोशिकीय जीव।

बाह्य कोशिकीय पाचन (Extracellular Digestion):

  • यह पाचन क्रिया कोशिका के बाहर, सामान्यतः एक पाचन तंत्र या आहारनाल (digestive tract) में होती है।
  • पाचक ग्रंथियाँ एंजाइमों को पाचन गुहा में स्रावित करती हैं, जहाँ भोजन का पाचन होता है।
  • इसमें बड़ी संख्या में पाचक ग्रंथियाँ और एंजाइम भाग लेते हैं।
  • यह प्रक्रिया अधिक क्षमतायुक्त (more efficient) होती है और बड़े खाद्य पदार्थों का पाचन संभव बनाती है।
  • उदाहरण: मनुष्य (Man), मेंढक, और अधिकांश बहुकोशिकीय जंतु।

प्रश्न 5

प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष परिवर्धन में क्या अन्तर है?
Solution: प्रत्यक्ष परिवर्धन (Direct Development) और अप्रत्यक्ष परिवर्धन (Indirect Development) के बीच मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं:

प्रत्यक्ष परिवर्धन (Direct Development):

  • इस प्रकार के परिवर्धन में, जन्म के समय शिशु (young one) अपने वयस्क रूप के समान ही दिखाई देते हैं।
  • इनमें कोई मध्यवर्ती लार्वा अवस्था (larval stage) नहीं पाई जाती है।
  • विकास सीधे वयस्क रूप में होता है।
  • उदाहरण: हाइड्रा, केंचुआ, मनुष्य और अन्य स्तनधारी।

अप्रत्यक्ष परिवर्धन (Indirect Development):

  • इस प्रकार के परिवर्धन में, जन्म के समय शिशु (लार्वा) अपने वयस्क रूप से काफी भिन्न होते हैं।
  • वयस्क बनने से पहले शिशु एक या अधिक मध्यावस्थाओं (intermediate stages) से गुजरता है, जिन्हें लार्वा (larva) कहा जाता है।
  • लार्वा कायान्तरण (metamorphosis) की प्रक्रिया द्वारा वयस्क में परिवर्तित होता है।
  • उदाहरण: मेंढक (लार्वा - टैडपोल), घरेलू मक्खी, रेशमकीट, तिलचट्टा।

प्रश्न 6

परजीवी प्लेटीहेल्मिंथीज के विशेष लक्षण बताइए।
Solution: परजीवी प्लेटीहेल्मिंथीज (Parasitic Platyhelminthes), जिन्हें चपटे कृमि भी कहा जाता है, के विशेष लक्षण निम्नलिखित हैं:
  1. टेगुमेन्ट (Tegument): इनके शरीर पर टेगुमेन्ट नामक एक मोटी सुरक्षात्मक परत होती है, जो पोषक के पाचन रस से इनकी रक्षा करती है।
  2. चूषक और अंकुश (Suckers and Hooks): पोषक के शरीर में चिपकने के लिए इनके मुख या शरीर पर चूषक (suckers) पाए जाते हैं। कई परजीवियों में पोषक के ऊतकों से जुड़ने के लिए कंटक या अंकुश (spines or hooks) भी उपस्थित होते हैं।
  3. चलन अंगों का अभाव: परजीवी जीवन शैली के कारण इनमें चलन अंग (locomotory organs) अनुपस्थित होते हैं, क्योंकि इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की आवश्यकता नहीं होती।
  4. अवशोषण: कुछ चपटे कृमि अपना भोजन सीधे अपने पोषक से अपने शरीर की सतह (टेगुमेन्ट) द्वारा अवशोषित करते हैं, जिससे पाचन तंत्र की आवश्यकता कम हो जाती है।
  5. विकसित जनन तंत्र: परजीवी प्लेटीहेल्मिंथीज में जनन तंत्र (reproductive system) अत्यंत विकसित होता है, क्योंकि उन्हें अपने जीवन चक्र को पूरा करने के लिए बड़ी संख्या में संतानें उत्पन्न करनी पड़ती हैं।
  6. अवायवीय श्वसन: कई परजीवी प्लेटीहेल्मिंथीज अपने पोषक के शरीर के अंदर ऑक्सीजन की कमी वाले वातावरण में रहते हैं, इसलिए उनमें अवायवीय श्वसन (anaerobic respiration) पाया जाता है।

प्रश्न 7

आर्थ्रोपोडा प्राणी समूह का सबसे बड़ा वर्ग है। इस कथन के प्रमुख कारण बताइए।
Solution: आर्थ्रोपोडा (Arthropoda) प्राणी जगत का सबसे बड़ा संघ (phylum) है, जिसके सदस्य (विशेषकर कीट वर्ग) पृथ्वी पर सबसे अधिक संख्या में पाए जाते हैं। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
  1. क्युटिकल (Cuticle) की उपस्थिति: इनके शरीर पर काइटिन (chitin) का बना एक कठोर बाह्यकंकाल (exoskeleton) होता है, जिसे क्युटिकल कहते हैं। यह सुरक्षा प्रदान करता है और निर्जलीकरण से बचाता है।
  2. विकसित पेशी तंत्र और गमन: संधियुक्त उपांगों (jointed appendages) के साथ एक सुविकसित पेशी तंत्र पाया जाता है, जो विभिन्न प्रकार के गमन (चलना, उड़ना, तैरना) में सहायक होता है।
  3. श्वसन की दक्षता: कीटों में श्वास नलियों (tracheae) का एक विकसित तंत्र होता है, जो सीधे ऊतकों तक ऑक्सीजन पहुँचाता है, जिससे श्वसन अत्यंत कुशल होता है।
  4. अनुकूलनीय उपांग: संधियुक्त उपांग विभिन्न कार्यों जैसे चलने, पकड़ने, चबाने, सूंघने, देखने आदि के लिए अनुकूलित होते हैं, जिससे वे विभिन्न वातावरणों में सफलतापूर्वक रह पाते हैं।
  5. विकसित तंत्रिका तंत्र और संवेदी अंग: आर्थ्रोपोडा में एक सुविकसित तंत्रिका तंत्र (nervous system) और जटिल संवेदी अंग (sense organs) जैसे संयुक्त आँखें (compound eyes) और एंटीना पाए जाते हैं, जो उन्हें अपने पर्यावरण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाते हैं।
  6. संचार के लिए फेरोमोन्स: कई आर्थ्रोपोड संचार के लिए फेरोमोन्स (pheromones) का उपयोग करते हैं, जो उन्हें साथी खोजने, खतरे की चेतावनी देने या भोजन का पता लगाने में मदद करते हैं।
  7. विविध आवासों में निवास: इन अनुकूलनों के कारण, आर्थ्रोपोडा स्थलीय, जलीय और वायवीय वातावरण सहित लगभग सभी प्रकार के आवासों में पाए जाते हैं।

प्रश्न 8

जल संवहन तन्त्र किस वर्ग का मुख्य लक्षण है?
Solution: जल संवहन तन्त्र (Water vascular system) (c) इकाइनोडर्मेटा (Echinodermata) वर्ग का मुख्य लक्षण है। यह तंत्र प्रचलन, श्वसन, भोजन पकड़ने और उत्सर्जन जैसे कार्यों में सहायता करता है।

प्रश्न 9

सभी कशेरुकी (vertebrates) रज्जुकी (chordates) हैं लेकिन सभी रज्जुकी कशेरुकी नहीं हैं। इस कथन को सिद्ध कीजिए।
Solution: इस कथन को निम्नलिखित बिंदुओं से सिद्ध किया जा सकता है:
  1. रज्जुकी (Chordates) के लक्षण: रज्जुकी संघ के सभी सदस्यों में जीवन की किसी न किसी अवस्था में निम्नलिखित चार लक्षण पाए जाते हैं:
    • पृष्ठ रज्जु (Notochord)
    • पृष्ठीय खोखली तंत्रिका रज्जु (Dorsal hollow nerve cord)
    • क्लोम छिद्र (Pharyngeal gill slits)
    • पश्च गुदा पूंछ (Post-anal tail)
  2. कॉर्डेटा का विभाजन: कॉर्डेटा संघ को मुख्य रूप से दो उपसंघों में विभाजित किया गया है:
    • प्रोटोकॉर्डेटा (Protochordata): इनमें पृष्ठ रज्जु तो होती है, लेकिन कशेरुकाओं (vertebrae) का अभाव होता है। इसके अंतर्गत यूरोकॉर्डेटा (जैसे एम्फिऑक्सस का लार्वा) और सेफैलोकॉर्डेटा (जैसे एम्फिऑक्सस) आते हैं।
    • कशेरुकी (Vertebrata): इस उपसंघ के सदस्यों में पृष्ठ रज्जु के स्थान पर एक उपास्थिल या अस्थिल मेरुदंड (vertebral column) विकसित हो जाता है। कशेरुकी में उपरोक्त चारों कॉर्डेट लक्षण पाए जाते हैं।
  3. निष्कर्ष: चूँकि प्रोटोकॉर्डेटा और कशेरुकी दोनों कॉर्डेटा संघ के अंतर्गत आते हैं, इसलिए सभी कशेरुकी रज्जुकी (कॉर्डेट्स) होते हैं क्योंकि उनमें पृष्ठ रज्जु (या उसका व्युत्पन्न मेरुदंड) पाया जाता है। हालाँकि, प्रोटोकॉर्डेटा में मेरुदंड का अभाव होता है, इसलिए वे रज्जुकी तो हैं, पर कशेरुकी नहीं हैं। इस प्रकार, यह सिद्ध होता है कि सभी कशेरुकी रज्जुकी हैं, परन्तु सभी रज्जुकी कशेरुकी नहीं हैं।

Common mistakes

  • वर्गीकरण के लिए मूलभूत लक्षणों को अनदेखा करना।
  • देहगुहा और प्रगुहा के बीच के अंतर को समझने में भ्रम।
  • पाचन और परिवर्धन के प्रकारों को गलत तरीके से परिभाषित करना।
  • विभिन्न प्राणी समूहों की विशिष्ट विशेषताओं को याद रखने में कठिनाई।

Revision tips

  • वर्गीकरण के लिए आवश्यक सभी मूलभूत लक्षणों की एक सूची बनाएं।
  • देहगुहा, प्रगुहा, पाचन और परिवर्धन के प्रकारों के बीच अंतर को सारणीबद्ध रूप में याद करें।
  • प्रत्येक प्रमुख प्राणी समूह (जैसे प्लेटीहेल्मिंथीज, आर्थ्रोपोडा) की मुख्य विशेषताओं को रेखांकित करें।
  • कशेरुकी और रज्जुकी के बीच संबंध को समझाने वाले तर्क को समझें और अभ्यास करें।

Practice MCQs

Q1. यदि प्राणियों के वर्गीकरण के लिए मूलभूत लक्षण ज्ञात न हों, तो कौन सी समस्या उत्पन्न नहीं होगी?

Q2. निम्नलिखित में से कौन सा वर्गीकरण का एक महत्वपूर्ण आधार है?

Q3. जिन जन्तुओं में देहगुहा मीसोडर्म द्वारा स्तरित होती है, उन्हें क्या कहते हैं?

Q4. निम्नलिखित में से किसमें अंतःकोशिकीय पाचन होता है?

Q5. अप्रत्यक्ष परिवर्धन में क्या पाया जाता है?

Q6. जल संवहन तन्त्र किस प्राणी समूह का मुख्य लक्षण है?

Frequently asked questions

प्राणियों के वर्गीकरण में मूलभूत लक्षणों का क्या महत्व है?

मूलभूत लक्षण, जैसे संगठन का स्तर, सममिति, देहगुहा आदि, प्राणियों को व्यवस्थित रूप से वर्गीकृत करने और उनके बीच संबंधों को समझने के लिए आवश्यक हैं। इनके बिना, सभी जीवों का अध्ययन अव्यवहारिक हो जाएगा।

देहगुहा और प्रगुहा के आधार पर प्राणियों को कैसे वर्गीकृत किया जाता है?

प्राणियों को देहगुहा की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर तीन समूहों में बांटा जाता है: एसीलोमेट (देहगुहा अनुपस्थित), स्यूडोसीलोमेटा (कूटगुहा उपस्थित) और सीलोमेटा (सच्ची देहगुहा उपस्थित)।

अंतःकोशिकीय और बाह्यकोशिकीय पाचन में मुख्य अंतर क्या है?

अंतःकोशिकीय पाचन कोशिका के अंदर होता है, जबकि बाह्यकोशिकीय पाचन कोशिका के बाहर, जैसे कि आहारनाल में, होता है। बाह्यकोशिकीय पाचन अधिक कुशल होता है।

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिवर्धन में क्या भिन्नता है?

प्रत्यक्ष परिवर्धन में शिशु सीधे वयस्क के समान दिखते हैं और कोई लार्वा अवस्था नहीं होती। अप्रत्यक्ष परिवर्धन में, लार्वा अवस्था पाई जाती है जो वयस्क से भिन्न होती है।

सभी कशेरुकी रज्जुकी क्यों होते हैं?

सभी कशेरुकी (Vertebrates) में पृष्ठ रज्जु (notochord) भ्रूणीय अवस्था में पाई जाती है, जो बाद में मेरुदंड में विकसित होती है। पृष्ठ रज्जु की उपस्थिति ही उन्हें रज्जुकी (Chordates) बनाती है।

सभी रज्जुकी कशेरुकी क्यों नहीं होते?

कुछ रज्जुकी, जैसे यूरोकॉर्डेटा और सेफैलोकॉर्डेटा (प्रोटोकॉर्डेटा), में वयस्क अवस्था में मेरुदंड का विकास नहीं होता है, इसलिए वे कशेरुकी नहीं कहलाते, यद्यपि उनमें पृष्ठ रज्जु पाई जाती है।

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