कक्षा 10 हिंदी NCERT समाधान: पाठ 11 बालगोबिन भगत
यह पृष्ठ कक्षा 10 हिंदी की पाठ्यपुस्तक के पाठ 11 'बालगोबिन भगत' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। बालगोबिन भगत एक असाधारण चरित्र थे जो गृहस्थ होते हुए भी साधु जैसा जीवन जीते थे। समाधान उनके जीवन दर्शन, कबीर के प्रति उनकी गहरी आस्था, उनके संगीत की मोहक शक्ति और सामाजिक रूढ़ियों के प्रति उनके विद्रोही दृष्टिकोण पर प्रकाश डालते हैं। इसमें उनके पुत्र की मृत्यु पर उनकी प्रतिक्रिया, पुत्रवधू के प्रति उनका प्रेम और उनकी दिनचर्या जैसे मार्मिक प्रसंगों का विश्लेषण शामिल है। ये समाधान छात्रों को बालगोबिन भगत के चरित्र की गहराई को समझने और परीक्षा की तैयारी में मदद करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 10 |
| Subject | हिंदी |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 11 बालगोबिन भगत |
Chapter summary
कक्षा 10 हिंदी के पाठ 11 'बालगोबिन भगत' के ये NCERT समाधान बालगोबिन भगत के अनूठे चरित्र का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। समाधान बताते हैं कि कैसे एक गृहस्थ होते हुए भी वे साधु के समान जीवन जीते थे, कबीर के सिद्धांतों का पालन करते थे, और अपनी कमाई को ईश्वर को समर्पित करते थे। इसमें उनके पुत्र की मृत्यु पर उनकी असाधारण प्रतिक्रिया, पुत्रवधू के प्रति उनका प्रेमपूर्ण व्यवहार और उनकी दिनचर्या के बारे में विस्तार से बताया गया है। यह समाधान छात्रों को पाठ के मुख्य संदेशों और भगत के आदर्शवादी जीवन को समझने में सहायता करते हैं।
Learning outcomes
- बालगोबिन भगत के गृहस्थ होते हुए भी साधु जैसा आचरण क्यों था, यह समझना।
- बालगोबिन भगत की कबीर के प्रति गहरी श्रद्धा के विभिन्न रूपों को पहचानना।
- बालगोबिन भगत द्वारा पुत्र की मृत्यु पर व्यक्त की गई भावनाओं का विश्लेषण करना।
- बालगोबिन भगत के व्यक्तित्व, वेशभूषा और दिनचर्या का वर्णन करना।
- बालगोबिन भगत के संगीत की विशेषताएँ और उसका प्रभाव समझना।
- सामाजिक मान्यताओं के प्रति बालगोबिन भगत के दृष्टिकोण का मूल्यांकन करना।
- मोह और प्रेम के बीच अंतर को भगत के जीवन की घटना से स्पष्ट करना।
Topics covered
Paper topics
- बालगोबिन भगत का चरित्र चित्रण
- गृहस्थ और साधु का अंतर
- कबीर के प्रति श्रद्धा
- भक्ति संगीत और उसका प्रभाव
- सामाजिक रूढ़ियों का खंडन
- पुत्र की मृत्यु पर प्रतिक्रिया
- पुत्रवधू के प्रति प्रेम
- बालगोबिन भगत की दिनचर्या
- मोह और प्रेम का अंतर
- साधु की पहचान
- कृषि संस्कृति का चित्रण
- बालगोबिन भगत का व्यवहार
Important topics
- बालगोबिन भगत का साधु जैसा आचरण
- कबीर के सिद्धांतों का पालन
- पुत्र की मृत्यु पर उत्सव मनाना
- सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देना
- बालगोबिन भगत का संगीत
- पुत्रवधू के प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार
- मोह और प्रेम में अंतर
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
बालगोबिन भगत एक गृहस्थ होते हुए भी साधु के समान जीवन व्यतीत करते थे। उनकी साधुता निम्नलिखित चारित्रिक विशेषताओं में प्रकट होती है:
- ईश्वर के प्रति समर्पण: वे अपना जीवन पूरी तरह से ईश्वर ('साहब') को समर्पित कर चुके थे। वे स्वयं को ईश्वर का बंदा मानते थे और अपनी सारी कमाई को ईश्वर की संपत्ति समझते थे।
- सादगीपूर्ण जीवन: वे अपनी फसलों को पहले कबीर मठ (साहब का दरबार) ले जाते थे और वहाँ से प्रसाद रूप में जो मिलता था, उसी में अपना गुजारा करते थे। वे सांसारिक मोह-माया से दूर थे।
- ईमानदारी और खरा व्यवहार: वे कभी झूठ नहीं बोलते थे, किसी से झगड़ा नहीं करते थे, और किसी की वस्तु बिना पूछे नहीं लेते थे। यहाँ तक कि वे किसी के खेत में भी शौच के लिए नहीं जाते थे।
- आध्यात्मिक तल्लीनता: वे अपना तन-मन प्रभु-भक्ति और भजन-कीर्तन में लगाए रखते थे।
- मृत्यु को उत्सव मानना: वे मृत्यु को आत्मा का परमात्मा से मिलन मानते थे और इसे दुख की बजाय उत्सव के रूप में मनाते थे।
इन गुणों के कारण, एक गृहस्थ होने के बावजूद, बालगोबिन भगत सच्चे साधु कहलाते थे।
प्रश्न 2
भगत की पुत्रवधू उन्हें अकेले नहीं छोड़ना चाहती थी क्योंकि वह जानती थी कि भगत जी संसार में अकेले हैं। उनके इकलौते पुत्र की मृत्यु हो चुकी थी और वे स्वयं वृद्ध थे। भगत जी का संसार में किसी विशेष रुचि नहीं थी और वे अपने खान-पान व स्वास्थ्य का ध्यान रखने में भी असमर्थ थे। पुत्रवधू सेवा-भाव से उनके चरणों की छाया में रहकर उनकी देखभाल करना चाहती थी, उनके लिए भोजन और दवा का प्रबंध करना चाहती थी, ताकि वे अकेलेपन और उपेक्षा का शिकार न हों।
प्रश्न 3
बालगोबिन भगत ने अपने पुत्र की मृत्यु को ईश्वर की इच्छा मानकर उसका सम्मान किया। उन्होंने इस मृत्यु को आत्मा और परमात्मा का शुभ मिलन माना और इसे एक उत्सव के रूप में मनाया। उन्होंने पुत्र के शव को सफेद वस्त्र से ढँककर फूलों से सजाया, सिरहाने दीपक जलाया और फिर खँजड़ी की ताल पर प्रभु-भक्ति के गीत गाने लगे। वे इस भक्ति-गान में इतने तल्लीन हो गए कि विलाप करती हुई अपनी पुत्रवधू को भी शोक न मनाने और उत्सव मनाने के लिए कहा।
प्रश्न 4
बालगोबिन भगत साठ वर्ष से कुछ अधिक आयु के, मँझोले कद के गोरे-चिट्टे व्यक्ति थे। उनके बाल सफेद हो चुके थे और उनका चेहरा सफेद बालों के कारण सदा चमकता रहता था। वे लंबी दाढ़ी या जटाएँ नहीं रखते थे। उनकी वेशभूषा अत्यंत सादगीपूर्ण थी: वे कमर में लंगोटी-सी पहनते थे और सिर पर कबीरपंथियों की तरह एक कनफटी टोपी धारण करते थे। सर्दियों में वे एक काला कंबल ओढ़ लेते थे। उनके माथे पर नाक के एक किनारे तक फैला हुआ रामानंदी चंदन का टीका लगा रहता था और गले में तुलसी की माला सुशोभित रहती थी।
उनका व्यक्तित्व एक गायक भक्त जैसा था। वे सदा खँजड़ी की लय पर प्रभु-भक्ति के गीत गाते रहते थे। उनकी तल्लीनता और संगीत सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती थी।
प्रश्न 5
बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के लिए आश्चर्य का विषय थी क्योंकि वे अत्यंत सरल, सादगीपूर्ण और निस्वार्थ जीवन जीते थे। उनकी दिनचर्या के कुछ विशेष पहलू थे:
- अत्यधिक परहेज: वे किसी की वस्तु बिना पूछे छूते तक नहीं थे और न ही किसी के खेत में शौच आदि के लिए जाते थे। उनका यह खरा व्यवहार लोगों को चकित करता था।
- भोर का स्नान: वे प्रतिदिन भोर में उठकर दो मील दूर नदी में स्नान करने जाते थे।
- प्रभाती गायन: स्नान के बाद वापसी पर वे गाँव के बाहर पोखर के किनारे बैठकर प्रभु-भक्ति के गीत (प्रभाती) गाते थे।
उनकी यह अनुशासित, सादगीपूर्ण और आध्यात्मिक दिनचर्या लोगों के लिए कौतूहल का विषय थी।
प्रश्न 6
बालगोबिन भगत का गायन अत्यंत मधुर और प्रभावशाली था। उनके संगीत की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं:
- भक्तिपूर्ण मस्ती: वे प्रभु-भक्ति के मस्ती-भरे गीत गाते थे, जिनमें सच्ची लगन और तल्लीनता होती थी।
- मोहक स्वर: उनका स्वर इतना मोहक, ऊँचा और आरोही होता था कि सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
- जादुई प्रभाव: उनके संगीत का जादुई प्रभाव वातावरण पर छा जाता था। औरतें उनके गीतों को गुनगुनाने लगती थीं, किसान खेतों में एक विशेष लय में काम करने लगते थे, और हल चलाने वालों के पैर संगीत की थाप पर चलने लगते थे।
- अडिगता: घनघोर सर्दी या गर्मियों की उमस भी उन्हें अपने गायन से डिगा नहीं पाती थी।
इस प्रकार, उनका संगीत लोगों के मन पर गहरा प्रभाव डालता था।
प्रश्न 7
बालगोबिन भगत प्रचलित सामाजिक मान्यताओं को नहीं मानते थे, इसके प्रमाण उनके जीवन के कुछ मार्मिक प्रसंगों से मिलते हैं:
- पुत्र की चिता को पतोहू से आग दिलवाना: समाज में यह मान्यता थी कि पुत्र की चिता को पत्नी या पुत्रवधू आग नहीं दे सकती। बालगोबिन भगत ने इस मान्यता को तोड़ते हुए अपने पुत्र की चिता को अपनी पुत्रवधू के हाथों से ही आग दिलवाई।
- पुत्रवधू का पुनर्विवाह: पुत्र की मृत्यु के बाद समाज की मान्यता थी कि पुत्रवधू को विधवा बनकर सास-ससुर की सेवा करनी चाहिए। परंतु भगत ने अपनी पुत्रवधू के भविष्य की चिंता करते हुए, उसे उसके भाइयों के साथ भेजकर उसके पुनर्विवाह की व्यवस्था की।
- मृत्यु पर शोक न मनाना: पुत्र की मृत्यु पर समाज शोक मनाता है, परंतु भगत ने इसे आत्मा-परमात्मा का मिलन मानकर उत्सव मनाया और प्रभु-भक्ति के गीत गाए। उन्होंने अपनी पुत्रवधू को भी शोक न मनाने की सलाह दी।
इन प्रसंगों से स्पष्ट होता है कि भगत सामाजिक रूढ़ियों से बंधे नहीं थे, बल्कि अपने अंतर्मन की आवाज पर चलते थे।
प्रश्न 8
आषाढ़ का महीना आते ही धान की रोपाई का काम शुरू हो जाता था। जब बालगोबिन भगत खेतों में एक-एक उँगली से धान के पौधों को पंक्तिबद्ध करके रोप रहे होते थे, तब वे एक विशेष मस्ती भरे स्वर में गाते थे। उनके गीत का स्वर इतना मनमोहक, ऊँचा और आरोही होता था कि मानो सीधे परमात्मा को पुकार रहा हो।
इस स्वर लहर के प्रभाव से:
- खेतों में उछल-कूद मचाते बच्चे भी मस्ती में आ जाते थे।
- मेड़ पर बैठी औरतें भी उनके गीत को गुनगुनाने लगती थीं।
- किसानों की उँगलियाँ संगीत की लय पर तेजी से चलने लगती थीं।
- हल चलाने वाले किसानों के पैर भी संगीत की थाप पर थिरकने लगते थे।
इस प्रकार, भगत की स्वर-लहरियाँ पूरे माहौल को एक जादुई उल्लास और स्फूर्ति से भर देती थीं, जिससे धान रोपाई का श्रम भी आनंददायक बन जाता था।
प्रश्न 9
बालगोबिन भगत कबीर के प्रति असीम श्रद्धा रखते थे, जो उनके आचरण और जीवनशैली में विभिन्न रूपों में प्रकट होती थी:
- कबीर के आदेशों का पालन: भगत ने स्वयं को कबीर-पंथ के प्रति समर्पित कर दिया था और वे कबीर के उपदेशों के अनुसार ही अपना जीवन जीते थे। कबीर की तरह उन्होंने गृहस्थी में रहते हुए भी सांसारिक आकर्षणों से दूरी बनाए रखी और आडंबर-रहित जीवन जिया।
- ईश्वर को सर्वोपरि मानना: उन्होंने अपनी खेती की सारी उपज को ईश्वर (कबीर) की संपत्ति माना। वे उसे कबीर मठ में अर्पित करते थे और प्रसाद रूप में मिले अंश से ही अपना गुजारा करते थे।
- व्यवहार में खरापन: कबीर की तरह ही भगत भी अपने व्यवहार में अत्यंत खरे, ईमानदार और साफ़ थे। वे किसी से झगड़ा नहीं करते थे और न ही किसी की वस्तु का अनादर करते थे।
- आत्मा की आवाज़ पर चलना: कबीर ने बाहरी आडंबरों पर चोट की और मनुष्य को अपनी आत्मा की आवाज़ सुनने की प्रेरणा दी। भगत ने भी कबीर के अनुसार वही किया जो उन्हें उचित और हितकारी लगा।
- नश्वरता को स्वीकारना: कबीर मनुष्य-शरीर को नश्वर मानते थे और जीवन को प्रभु-भक्ति में लगाने की सीख देते थे। भगत ने इस सिद्धांत को पूरी तरह अपनाया और अपने पुत्र की मृत्यु को भी उत्सव के रूप में मनाया।
प्रश्न 10
मेरी दृष्टि में, बालगोबिन भगत की कबीर पर अगाध श्रद्धा के निम्नलिखित कारण रहे होंगे:
- समान विचारधारा: भगत स्वयं एक सरल-हृदय और सच्चे व्यक्ति थे। उन्हें कबीर के विचारों में वही सच्चाई और सरलता दिखाई दी होगी जो उनके अपने स्वभाव से मेल खाती थी।
- कबीर के संदेश की प्रासंगिकता: कबीर का संदेश आडंबर-रहित, सादगीपूर्ण और भक्तिमय जीवन जीने का था, जो भगत के जीवन-दर्शन के अनुरूप था।
- कबीर की वाणी का प्रभाव: कबीर की साफ़ और सीधी वाणी में कही गई बातें भगत के सच्चे हृदय में गहराई तक उतर गई होंगी।
- गुरु-शिष्य संबंध की स्थापना: भगत ने कबीर के उपदेशों को आत्मसात कर उन्हें अपना गुरु मान लिया होगा और अपने जीवन को उन्हीं के अनुसार ढाल लिया होगा।
इस प्रकार, कबीर के विचारों की पवित्रता और भगत के सच्चे हृदय ने मिलकर उनकी अगाध श्रद्धा को जन्म दिया होगा।
प्रश्न 11
भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहाँ का जीवन काफी हद तक वर्षा पर निर्भर करता है। आषाढ़ का महीना वर्षा ऋतु के आगमन का प्रतीक है। इस महीने के आते ही:
- कृषि कार्य का आरंभ: वर्षा होने से खेतों में धान रोपने का महत्वपूर्ण कार्य शुरू होता है। किसान साल भर इसी समय का इंतजार करते हैं।
- प्रकृति का उल्लास: चारों ओर हरियाली छा जाती है और प्रकृति जीवंत हो उठती है, जिससे वातावरण में एक नया उत्साह आ जाता है।
- सामुदायिक सहभागिता: बच्चे गीली मिट्टी में खेलकर आनंद लेते हैं, औरतें किसानों के लिए नाश्ता लेकर आती हैं और सहयोग करती हैं, और किसान दिन भर खेतों में बुवाई करते हैं।
- आशा का संचार: वर्षा और बुवाई से अच्छी फसल की आशा जागृत होती है, जो ग्रामीणों के लिए उल्लास का सबसे बड़ा कारण है।
इन सब कारणों से आषाढ़ मास के चढ़ते ही गाँव का सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश उल्लास और उमंग से भर जाता है।
प्रश्न 12
यह कथन बिल्कुल सही है कि बालगोबिन भगत की वेशभूषा (कम कपड़े पहनना, लंगोटी, कनफटी टोपी, चंदन का टीका, तुलसी की माला) देखकर उन्हें साधु माना जा सकता है, परंतु उनकी असली साधुता उनके व्यवहार में थी।
क्या साधु की पहचान पहनावे से होनी चाहिए?
नहीं, केवल पहनावे के आधार पर किसी को साधु नहीं माना जाना चाहिए। साधु का वेश धारण करने वाले कई लोग ढोंगी हो सकते हैं जो सांसारिक सुखों का उपभोग करते हैं। पहनावा बाहरी आवरण मात्र है।
साधु की सच्ची पहचान के आधार:
किसी व्यक्ति के साधु होने की सच्ची पहचान उसके व्यवहार और चरित्र से होती है। निम्नलिखित आधारों पर यह सुनिश्चित किया जा सकता है:
- आध्यात्मिक निष्ठा: सच्चा साधु अपना ध्यान सांसारिक मोह-माया की बजाय प्रभु-भक्ति और आध्यात्मिक साधना में लगाता है।
- व्यवहार में सादगी और सच्चाई: वह अत्यंत सादा, खरा, ईमानदार और आडंबरहीन होता है।
- अनासक्ति: वह किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति अत्यधिक मोह नहीं रखता और अपनी कमाई को भी ईश्वर की देन मानता है।
- अहिंसा और परोपकार: वह किसी से झगड़ा नहीं करता, किसी को हानि नहीं पहुँचाता और दूसरों का हित चाहता है।
- त्याग की भावना: वह सांसारिक सुखों का त्याग कर देता है और संतोषी जीवन जीता है।
बालगोबिन भगत में ये सभी गुण विद्यमान थे, जो उन्हें सच्चा साधु बनाते थे, न कि केवल उनकी वेशभूषा।
प्रश्न 13
मोह और प्रेम में निश्चित रूप से अंतर होता है। मोह में व्यक्ति अपने स्वार्थ और सुख की चिंता करता है, जबकि प्रेम में वह दूसरे व्यक्ति के हित और कल्याण को प्राथमिकता देता है। बालगोबिन भगत के जीवन की एक घटना इस कथन को सत्य सिद्ध करती है:
घटना: पुत्रवधू के प्रति व्यवहार
बालगोबिन भगत के इकलौते पुत्र की मृत्यु हो गई थी। उनकी पुत्रवधू अत्यंत सुशील और सेवाभावी थी। यदि भगत उसे अपनी सेवा के लिए अपने पास रख लेते, तो यह उनका पुत्र के प्रति मोह कहलाता, क्योंकि वह अपनी सुविधा और अकेलेपन को दूर करने के लिए उसे रोकते।
परंतु भगत ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने पुत्रवधू के भविष्य की चिंता की। वे जानते थे कि यदि वह अविवाहित रहती है, तो उसका जीवन कष्टमय हो सकता है। इसलिए, उन्होंने पुत्रवधू के भाइयों को बुलाकर उसे पुनर्विवाह करने का आदेश दिया। यह कार्य भगत के स्वार्थ पर आधारित नहीं था, बल्कि पुत्रवधू के हित और कल्याण की भावना से प्रेरित था।
इस प्रकार, पुत्रवधू को पुनर्विवाह के लिए भेजकर बालगोबिन भगत ने यह सिद्ध किया कि उनका व्यवहार मोह नहीं, बल्कि सच्चा प्रेम था, जिसमें वे दूसरे के हित को अपने से ऊपर रखते थे।
Common mistakes
- साधु की पहचान केवल पहनावे से करना।
- बालगोबिन भगत की मृत्यु पर प्रतिक्रिया को सामान्य शोक समझना।
- पुत्रवधू के प्रति भगत के व्यवहार को मोह समझना।
- बालगोबिन भगत की दिनचर्या को सामान्य गृहस्थी का हिस्सा मानना।
Revision tips
- बालगोबिन भगत के चरित्र की उन विशेषताओं को सूचीबद्ध करें जो उन्हें 'साधु' बनाती हैं।
- उन प्रसंगों को याद करें जहाँ भगत ने सामाजिक मान्यताओं को चुनौती दी।
- भगत के संगीत और उसकी प्रभावशीलता पर ध्यान केंद्रित करें।
- पुत्र की मृत्यु पर भगत की प्रतिक्रिया और उसके पीछे के दर्शन को समझें।
- कबीर के प्रति भगत की आस्था को दर्शाने वाले वाक्यों को रेखांकित करें।
Practice MCQs
Q1. बालगोबिन भगत अपनी कमाई का कितना हिस्सा 'साहब' के दरबार में ले जाते थे?
Explanation: बालगोबिन भगत अपनी सारी कमाई को ईश्वर (साहब) का मानकर कबीर मठ में ले जाते थे और प्रसाद रूप में मिले से ही गुजारा करते थे।
Q2. बालगोबिन भगत ने अपने पुत्र की मृत्यु को किस रूप में मनाया?
Explanation: बालगोबिन भगत ने पुत्र की मृत्यु को आत्मा-परमात्मा का मिलन मानकर उत्सव की तरह मनाया।
Q3. बालगोबिन भगत की पुत्रवधू उन्हें अकेले क्यों नहीं छोड़ना चाहती थी?
Explanation: पुत्रवधू भगत के अकेलेपन और बुढ़ापे को देखकर उनकी सेवा करना चाहती थी, क्योंकि उन्हें अपने स्वास्थ्य की चिंता नहीं थी।
Q4. बालगोबिन भगत का माथे पर कैसा चंदन सुशोभित रहता था?
Explanation: बालगोबिन भगत के माथे पर रामानंदी चंदन सुशोभित रहता था, जो नाक के एक किनारे से शुरू होता था।
Q5. बालगोबिन भगत किस लोकगीत को गाते हुए धान की रोपाई करते थे?
Explanation: धान की रोपाई के समय बालगोबिन भगत 'सोहर' गाते थे, जिससे माहौल में उल्लास भर जाता था।
Frequently asked questions
बालगोबिन भगत कौन थे और वे साधु क्यों कहलाते थे?
बालगोबिन भगत एक गृहस्थ थे जो खेती-बाड़ी करते थे, लेकिन उनका आचरण, विचार और जीवन जीने का तरीका साधुओं जैसा था। वे अपना जीवन ईश्वर को समर्पित मानते थे, किसी से कुछ नहीं लेते थे, और मृत्यु को भी उत्सव मानते थे, इसलिए वे साधु कहलाते थे।
बालगोबिन भगत ने अपने पुत्र की मृत्यु पर क्या प्रतिक्रिया दी?
बालगोबिन भगत ने अपने पुत्र की मृत्यु को ईश्वर की इच्छा और आत्मा-परमात्मा का शुभ मिलन मानकर उत्सव की तरह मनाया। उन्होंने शोक मनाने की बजाय प्रभु-भक्ति के गीत गाए।
बालगोबिन भगत कबीर के प्रति अपनी श्रद्धा कैसे प्रकट करते थे?
वे स्वयं को कबीर-पंथ के प्रति समर्पित मानते थे, कबीर के आदेशों पर जीवन जीते थे, अपनी कमाई को ईश्वर की संपत्ति मानते थे, और कबीर की तरह ही व्यवहार में खरे और आडंबरहीन थे।
क्या बालगोबिन भगत सामाजिक मान्यताओं को मानते थे?
नहीं, बालगोबिन भगत प्रचलित सामाजिक मान्यताओं को नहीं मानते थे। उन्होंने अपने पुत्र की चिता को पतोहू से आग दिलवाई और पतोहू को पुनर्विवाह के लिए भेज दिया, जो तत्कालीन समाज की मान्यताओं के विरुद्ध था।
मोह और प्रेम में क्या अंतर है, इसे भगत के जीवन से कैसे समझा जा सकता है?
मोह स्वार्थ पर आधारित होता है, जबकि प्रेम प्रिय के हित को देखता है। भगत ने अपनी पतोहू को उसके भविष्य की चिंता करते हुए पुनर्विवाह के लिए भेजकर प्रेम का परिचय दिया, न कि मोह का।
बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के लिए आश्चर्य का विषय क्यों थी?
उनकी सादगी, निस्वार्थता, किसी की वस्तु बिना पूछे न लेना, और भोरकाल में उठकर नदी स्नान और फिर पोखर के किनारे बैठकर प्रभु-भक्ति के गीत गाना, ये सब बातें लोगों को आश्चर्यचकित करती थीं।
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