CBSE Class 10 Manika Chapter 1: Vaangmay Tapah NCERT Solutions
This chapter, 'Vaangmay Tapah' (Literary Penance), from CBSE Class 10 Manika (Part 2) in Hindi, introduces students to the concept of literary devotion through Sanskrit shlokas. The NCERT Solutions provide detailed explanations of two powerful prayers to Goddess Saraswati. The first shloka, 'Sharda Shardambhojavadana', is a beautiful invocation seeking her presence in our speech. The second, 'Apurvah Ko'pi Kosho', highlights the unique nature of knowledge as a treasure that grows when shared and diminishes when hoarded. These solutions offer Hindi translations, prose order (anvay), word meanings, grammar explanations (sandhi, suffixes, compounds), and question-answering exercises, making them an invaluable resource for students to grasp the essence of these verses and prepare effectively for their exams.
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 10 |
| Subject | Manika |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | Chapter 1 |
Chapter summary
Chapter 1 of CBSE Class 10 Manika, titled 'Vaangmay Tapah', focuses on two key Sanskrit shlokas dedicated to Goddess Saraswati. The NCERT Solutions break down these verses, providing Hindi translations, prose order, detailed word meanings in Sanskrit, Hindi, and English, and explanations of grammatical concepts like sandhi, suffixes, and compounds. Exercises include filling in blanks and selecting appropriate words, aiding students in understanding the nuances of the language and the philosophical messages about knowledge and devotion.
Learning outcomes
- Understand the meaning and significance of the invocation to Goddess Saraswati in the first shloka.
- Analyze the concept of knowledge as an inexhaustible treasure in the second shloka.
- Translate Sanskrit shlokas into Hindi.
- Identify and explain Sanskrit grammatical elements like sandhi, suffixes, and compounds.
- Answer questions based on the provided shlokas and their translations.
- Appreciate the role of literature and knowledge as a form of penance.
Topics covered
Paper topics
- Invocation to Goddess Saraswati
- Nature of Knowledge
- Sanskrit Shlokas
- Hindi Translation
- Anvay (Prose Order)
- Sanskrit Word Meanings
- Sandhi (Vowel and Consonant)
- Suffixes (Taddhita)
- Compounds (Samas)
- Question Answering
- Grammar Exercises
- Literary Penance
Important topics
- Meaning of the first shloka (Invocation)
- Meaning of the second shloka (Nature of Knowledge)
- Sandhi rules applied in the chapter
- Understanding 'Anvay'
- Vocabulary: Key Sanskrit words and their meanings
- Concept of knowledge as a growing treasure
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
(i) सर्वदा का अस्ति ?
(ii) सरस्वती कीदृशी अस्ति ?
Solution:
यह प्रश्न पहले श्लोक से संबंधित है।
(i) सर्वदा का अस्ति ?
इस प्रश्न का उत्तर श्लोक के अन्वय और शब्दार्थों से मिलता है। 'सर्वदा' का अर्थ है 'सब कुछ देने वाली'। श्लोक के अनुसार, 'सर्वदा' सरस्वती हैं।
उत्तर: सर्वदा सरस्वती अस्ति।
(ii) सरस्वती कीदृशी अस्ति ?
श्लोक में सरस्वती का वर्णन 'शारदाम्भोजवदना' के रूप में किया गया है, जिसका अर्थ है 'शरद ऋतु में खिले हुए कमल के समान मुखवाली'।
उत्तर: सरस्वती शारदाम्भोजवदना अस्ति।
प्रश्न 2
प्रश्ननिर्माणम्-स्थूलपदानि आश्रितस्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
(क) शारदा सर्वदा सन्निधिं क्रियात्।
(ख) शारदा वदनाम्बुजे सन्निधिक्रियात्।
(ग) सर्वदा शारदा मुखकमले निवासं क्रियात्।
(घ) शारदा अस्माकं वदनाम्बुजे निवासं कुर्यात।
Solution:
यह प्रश्न स्थूल (बोल्ड) पदों के स्थान पर उपयुक्त प्रश्नवाचक शब्द चुनकर प्रश्न बनाने का अभ्यास है। दिए गए उत्तरों के आधार पर हम प्रत्येक वाक्य के लिए सही प्रश्नवाचक शब्द का चयन करेंगे।
(क) शारदा सर्वदा सन्निधिं क्रियात्।
यहाँ 'सर्वदा' (कब) के स्थान पर प्रश्नवाचक शब्द आएगा। उपयुक्त विकल्प 'कदा' है।
प्रश्न: शारदा कदा सन्निधिं क्रियात्?
(ख) शारदा वदनाम्बुजे सन्निधिक्रियात्।
यहाँ 'वदनाम्बुजे' (मुख रूपी कमल में) के स्थान पर प्रश्नवाचक शब्द आएगा। यह स्थान का बोध कराता है, इसलिए 'कुत्र' उपयुक्त है।
प्रश्न: शारदा कुत्र सन्निधिक्रियात्?
(ग) सर्वदा शारदा मुखकमले निवासं क्रियात्।
यहाँ 'शारदा' (सरस्वती) के स्थान पर प्रश्नवाचक शब्द आएगा। यह कर्ता (कौन) का बोध कराता है, इसलिए 'का' उपयुक्त है।
प्रश्न: का मुखकमले निवासं क्रियात्?
(घ) शारदा अस्माकं वदनाम्बुजे निवासं कुर्यात।
यहाँ 'अस्माकं' (हमारे) के स्थान पर प्रश्नवाचक शब्द आएगा। यह संबंध कारक (किसके) का बोध कराता है, इसलिए 'केषाम्' उपयुक्त है।
प्रश्न: शारदा केषाम् वदनाम्बुजे निवासं कुर्यात?
दिए गए उत्तरों के अनुसार सही विकल्प हैं:
(क) कदा (ख) कुत्र (ग) का (घ) केषाम्।
प्रश्न 3
विपर्ययचयनम्-
(i) सर्वदा - दूरम्
(ii) सन्निधं – सर्वग्रहीता
(iii) सर्वदा – कदाचित्
Solution:
यह प्रश्न विपरीतार्थक (विलोम) शब्दों का चयन करने का अभ्यास है। हमें दिए गए शब्दों के सही विलोम शब्द का चयन करना है।
(i) सर्वदा
यहाँ 'सर्वदा' (हमेशा) का विलोम शब्द चुनना है। दिए गए विकल्पों में 'कदाचित्' (कभी-कभी) सही विलोम है। 'दूरम्' (दूर) स्थान का बोधक है और 'सर्वग्रहीता' (सब कुछ लेने वाली) एक विशेषण है।
सही विलोम: कदाचित्
(ii) सन्निधं
यहाँ 'सन्निधं' (निकटता, समीप) का विलोम शब्द चुनना है। दिए गए विकल्पों में 'दूरम्' (दूर) सही विलोम है।
सही विलोम: दूरम्
(iii) सर्वदा
यह पुनः 'सर्वदा' का विलोम पूछ रहा है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, 'कदाचित्' सही विलोम है। यहाँ दिए गए विकल्पों में 'सर्वग्रहीता' और 'कदाचित्' का क्रम बदला हुआ प्रतीत होता है, लेकिन यदि हम मूल प्रश्न के अनुसार चलें तो 'सर्वदा' का विलोम 'कदाचित्' है। यदि प्रश्न का आशय 'सर्वग्रहीता' का विलोम पूछना होता, तो वह 'किंचित्दात्री' या ऐसा कुछ होता। दिए गए उत्तरों के अनुसार, यह क्रम है: (i) कदाचित् (ii) दूरम् (iii) सर्वग्रहीता। यह संभवतः एक त्रुटि है या 'सर्वदा' का एक अप्रचलित विलोम 'सर्वग्रहीता' माना गया है, जो कि व्याकरणिक रूप से सही नहीं लगता। हम दिए गए उत्तरों के क्रम का पालन करेंगे।
दिए गए उत्तरों के अनुसार क्रम:
(i) कदाचित् (सर्वदा का विलोम)
(ii) दूरम् (सन्निधं का विलोम)
(iii) सर्वग्रहीता (यह संभवतः 'सर्वदा' का विलोम नहीं है, बल्कि किसी अन्य शब्द का विलोम या कोई अन्य अर्थ हो सकता है, या प्रश्न/विकल्प में त्रुटि है। दिए गए उत्तरों के क्रम के अनुसार, यह अंतिम विकल्प है।)
प्रश्न 4
भावार्थ लेखनम्-
शरद ऋतौ विकसितं कमलम् इव मुखवती सर्वदात्री सरस्वती अस्माकं मुखकमलस्य समीपम् सदैव सत् निधिरूपे निवासं कुर्यात्।
Solution:
यह प्रश्न दूसरे श्लोक के भावार्थ को स्थूल पदों के आधार पर लिखने का अभ्यास है। हमें दिए गए स्थूल पदों को सही स्थान पर रखकर भावार्थ को पूरा करना है।
मूल श्लोक है: अपूर्वः कोऽपि कोशोऽयं विद्यते तव भारति! व्ययतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति सञ्चयात्॥
और इसका भावार्थ है: हे सरस्वती! आपका यह कोष कोई अपूर्व (कोष) है, जो व्यय करने से निरन्तर बढ़ता है और एकत्रित करने से क्षीणता को प्राप्त होता है।
यहाँ दिए गए वाक्य में स्थूल पद 'कमलम्' और 'सर्वदात्री' हैं। यह वाक्य पहले श्लोक के भावार्थ का हिस्सा प्रतीत होता है, न कि दूसरे श्लोक का।
यदि हम पहले श्लोक के भावार्थ को देखें: "शरद ऋतु में खिले हुए कमल के समान मुखवाली सब कुछ देने वाली सरस्वती हमारे मुख रूपी कमल में सदैव श्रेष्ठ कोष के रूप में समीप निवास करें।"
तो दिए गए वाक्य में स्थूल पदों का प्रयोग इस प्रकार होगा:
शरद ऋतौ विकसितं कमलम् इव मुखवती सर्वदात्री सरस्वती अस्माकं मुखकमलस्य समीपम् सदैव सत् निधिरूपे निवासं कुर्यात्।
यहाँ 'कमलम्' का प्रयोग 'शारदाम्भोजवदना' (कमल के समान मुखवाली) के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए किया गया है, और 'सर्वदात्री' का प्रयोग 'सर्वदा' (सब कुछ देने वाली) के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए किया गया है।
यह वाक्य पहले श्लोक के भावार्थ का एक विस्तृत रूप है।
प्रश्न 5
अपूर्वः कोऽपि कोशोऽयं विद्यते तव भारति! व्ययतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति सञ्चयात्॥ 2॥
(क) तव अयम् कोश: क: अपि
(ख) ..... विद्यते।
(ग) ..... वृद्धिम्
(घ) सञ्चयात् ..... आयाति।
Solution:
यह प्रश्न दूसरे श्लोक के अन्वय (गद्य क्रम) को पूरा करने का अभ्यास है। हमें मञ्जूषा से उपयुक्त शब्दों को चुनकर रिक्त स्थानों की पूर्ति करनी है।
श्लोक: अपूर्वः कोऽपि कोशोऽयं विद्यते तव भारति! व्ययतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति सञ्चयात्॥
अन्वय का उद्देश्य श्लोक के शब्दों को गद्य के सामान्य क्रम में व्यवस्थित करना है ताकि अर्थ समझना आसान हो जाए।
मञ्जूषा: भारति !, अपूर्वः, आयाति, क्षयम्
अब हम रिक्त स्थानों को भरते हैं:
(क) तव अयम् कोश: क: अपि
यहाँ 'अपूर्वः' शब्द आएगा, जो 'कोशः' का विशेषण है।
अन्वय: तव अयम् कोश: क: अपि अपूर्वः
(ख) ..... विद्यते।
यहाँ 'विद्यते' क्रियापद से पहले कर्ता 'कोशः' और उसके विशेषण आएंगे।
अन्वय: अपूर्वः कोऽपि कोशोऽयं विद्यते।
(ग) ..... वृद्धिम्
यहाँ 'व्ययतः' (खर्च करने से) के बाद क्रिया 'वृद्धिम् आयाति' आएगी।
अन्वय: व्ययत: वृद्धिम् आयाति
(घ) सञ्चयात् ..... आयाति।
यहाँ 'सञ्चयात्' (इकट्ठा करने से) के बाद 'क्षयम्' (कमी) और फिर क्रिया 'आयाति' आएगी।
अन्वय: सञ्चयात् क्षयम् आयाति।
पूर्ण अन्वय:
भारति !, तव अयम् कोश: क: अपि अपूर्वः विद्यते। व्ययत: वृद्धिम् आयाति सञ्चयात् क्षयम् आयाति।
दिए गए उत्तरों के अनुसार सही विकल्प हैं:
(i) भारति! (ii) अपूर्व: (iii) आयाति (iv) क्षयम्
यह ध्यान देने योग्य है कि दिए गए उत्तरों का क्रम और अन्वय के रिक्त स्थानों का क्रम थोड़ा भिन्न है, लेकिन मञ्जूषा के शब्द सही भरे गए हैं।
Common mistakes
- Confusing similar-sounding Sanskrit words.
- Misinterpreting the meaning of 'vyaya' (expenditure) and 'sanchaya' (accumulation) in the context of knowledge.
- Errors in identifying correct sandhi or suffixes.
- Difficulty in reconstructing the prose order (anvay) of Sanskrit sentences.
Revision tips
- Read the Hindi translation aloud to grasp the overall meaning of the shlokas.
- Memorize the key Sanskrit words and their meanings provided in the solutions.
- Practice reconstructing the 'anvay' (prose order) for each shloka.
- Attempt all the exercises, paying attention to the grammar explanations for sandhi and suffixes.
- Reflect on the philosophical message of the second shloka regarding the nature of knowledge.
Practice MCQs
Q1. पहले श्लोक में, सरस्वती से क्या प्रार्थना की गई है?
Explanation: पहले श्लोक में 'सर्वदा सर्वदाऽस्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात्' का अर्थ है कि सरस्वती हमारे मुख रूपी कमल में निवास करें।
Q2. दूसरे श्लोक के अनुसार, ज्ञान का कोष कैसा है?
Explanation: श्लोक 'व्ययतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति सञ्चयात्' बताता है कि ज्ञान का कोष व्यय करने से बढ़ता है और संचय करने से घटता है।
Q3. 'वदनाम्बुजे' शब्द में कौन सी संधि है?
Explanation: 'वदनाम्बुजे' का संधि-विच्छेद 'वदन + अम्बुजे' है, जो दीर्घ संधि का उदाहरण है।
Q4. दूसरे श्लोक में 'भारति' किसे संबोधित किया गया है?
Explanation: 'भारति' शब्द का प्रयोग यहाँ ज्ञान की देवी, सरस्वती के लिए किया गया है।
Q5. किस शब्द का अर्थ 'हमेशा' या 'सदैव' है?
Explanation: दिए गए शब्दार्थों के अनुसार, 'सर्वदा' का अर्थ 'सदैव' या 'हमेशा' होता है।
Frequently asked questions
यह NCERT समाधान किस कक्षा और विषय के लिए हैं?
यह NCERT समाधान CBSE कक्षा 10 की 'मणिका' (भाग 2) पुस्तक के अध्याय 1, 'वाङ्मय तपः' के लिए हैं।
अध्याय 1 'वाङ्मय तपः' में मुख्य रूप से किन विषयों को शामिल किया गया है?
इस अध्याय में देवी सरस्वती को समर्पित दो संस्कृत श्लोकों का हिंदी अनुवाद, अन्वय, शब्दार्थ और व्याकरणिक विश्लेषण शामिल है। यह ज्ञान के स्वरूप पर भी प्रकाश डालता है।
क्या इन समाधानों में व्याकरणिक स्पष्टीकरण शामिल हैं?
हाँ, इन समाधानों में संधि-विच्छेद, प्रत्यय और समास जैसे व्याकरणिक पहलुओं को समझाया गया है।
श्लोक 'अपूर्वः कोऽपि कोशोऽयं...' का क्या अर्थ है?
इस श्लोक का अर्थ है कि ज्ञान का कोष अद्वितीय है, जो व्यय करने से बढ़ता है और संचय करने से घटता है।
इन समाधानों का उपयोग परीक्षा की तैयारी के लिए कैसे किया जा सकता है?
ये समाधान श्लोकों को समझने, शब्दार्थ याद करने, व्याकरण का अभ्यास करने और प्रश्नों के उत्तर देने में मदद करते हैं, जो परीक्षा की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण हैं।
क्या श्लोकों का हिंदी अनुवाद प्रदान किया गया है?
हाँ, प्रत्येक श्लोक का विस्तृत हिंदी अनुवाद प्रदान किया गया है ताकि छात्र आसानी से उसका अर्थ समझ सकें।
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