CBSE Class 9 Hindi NCERT Solutions: ल्हासा की ओर

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सीबीएसई कक्षा 9 हिंदी (पाठ्यक्रम अ) के अध्याय 2, राहुल संकृत्यायन द्वारा लिखित 'ल्हासा की ओर' के लिए विस्तृत समाधान प्रस्तुत हैं। यह अध्याय तिब्बत की यात्रा के दौरान लेखक के अनुभवों का वर्णन करता है, जिसमें उस समय के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश, भौगोलिक विशेषताओं और व्यक्तिगत विचारों का चित्रण है। समाधानों में पाठ की व्याख्या, पाठ के अंत में दिए गए प्रश्नों के उत्तर और यात्रा के ऐतिहासिक संदर्भ पर प्रकाश डाला गया है। इनका उद्देश्य छात्रों को पाठ की बारीकियों को समझने, उनकी बोधगम्यता को बेहतर बनाने और परीक्षा की तैयारी में सहायता करना है। ये स्पष्ट और संक्षिप्त उत्तर प्रदान करते हैं।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 9
Subjectहिंदी
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter2. राहुल संकृत्यायन - ल्हासा की ओर

Chapter summary

NCERT Solutions for Class 9 Hindi (Course A), Chapter 2, 'ल्हासा की ओर' by Rahul Sankrityayan. This chapter focuses on the author's first journey to Tibet and his observations about the land, people, and customs. The solutions cover key aspects like the travelogue's narrative, the author's experiences with different social classes, and the historical context of Tibet during that period. They aim to provide a clear understanding of the text and aid in exam preparation.

Learning outcomes

  • Understand the narrative and experiences of Rahul Sankrityayan's journey to Tibet.
  • Analyze the socio-cultural observations made during the travel.
  • Identify key geographical and historical details mentioned in the chapter.
  • Grasp the author's perspective on the people and customs of Tibet.
  • Improve Hindi reading comprehension and analytical skills.

Topics covered

Paper topics

  • Rahul Sankrityayan's journey to Tibet
  • Travelogue writing
  • Socio-cultural observations in Tibet
  • Tibetan landscape and geography
  • Customs and traditions of Tibet
  • Historical context of Tibet
  • Author's personal experiences and reflections
  • Language and communication challenges
  • Comparison of different regions of Tibet
  • Significance of the journey

Important topics

  • Rahul Sankrityayan's first journey to Tibet
  • Observations on Tibetan society and customs
  • Description of the challenging terrain
  • Author's perspective on the people
  • The significance of the journey as a travelogue

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

लेखक के अनुसार जीवन में 'सुख' से क्या अभिप्राय है?
Solution: लेखक के अनुसार, आज के समय में 'सुख' की परिभाषा बदल गई है। पहले सुख का अर्थ केवल शारीरिक और मानसिक आराम देने वाली वस्तुओं या साधनों से लिया जाता था, लेकिन अब लोग उपभोग की वस्तुओं को प्राप्त करने और उनका आनंद लेने को ही सुख मानने लगे हैं। यह एक नवीन व्याख्या है जहाँ सुख को भौतिक वस्तुओं के उपभोग से जोड़ा गया है।

प्रश्न 2

आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर रही है?
Solution: आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाल रही है। इसके कारण हमारी अपनी सांस्कृतिक पहचान, परम्पराएँ और आस्थाएँ कमज़ोर पड़ रही हैं। सामाजिक संबंध भी संकुचित हो रहे हैं और मन में अशांति व आक्रोश बढ़ रहा है। विज्ञापनों के प्रभाव में आकर हम वही चीज़ें खरीदते, खाते-पीते और पहनते हैं जो हमें विज्ञापन दिखाते हैं, जिससे हम धीरे-धीरे इन उत्पादों के दास बनते जा रहे हैं। इससे नैतिक मर्यादाएँ समाप्त हो रही हैं और मनुष्य स्वार्थी व आत्म-केंद्रित होता जा रहा है, जिससे विकास का लक्ष्य भी दूर होता जा रहा है।

प्रश्न 3

गाँधी जी ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है?
Solution: गाँधी जी सामाजिक मर्यादा, नीति और नैतिकता के पक्षधर थे। वे चाहते थे कि लोग सदाचारी और संयमी बनें, जिससे आपसी प्रेम और भाईचारा बढ़े। इसके विपरीत, उपभोक्तावादी संस्कृति भोग-विलास और होड़ को बढ़ावा देती है, जिससे नैतिकता और मर्यादा का ह्रास होता है। गाँधी जी चाहते थे कि भारतीय अपनी मौलिकता और संस्कृति पर कायम रहें, लेकिन उपभोक्ता संस्कृति से हमारी सांस्कृतिक पहचान खो रही है। मनुष्य स्वार्थ-केंद्रित हो रहा है, जो समाज के लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंकि यह हमें सामाजिक पतन की ओर ले जा रही है।

प्रश्न 4.1

आशय स्पष्ट कीजिए: जाने-अनजाने आज के माहौल में आपका चरित्र भी बदल रहा है और आप उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं।
Solution: इस कथन का आशय है कि उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रभाव हमारे चरित्र पर अनजाने में ही पड़ता है। हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उत्पादों का उपभोग करते-करते न केवल उनके गुलाम बन जाते हैं, बल्कि उन्हें प्राप्त करना ही अपने जीवन का मुख्य लक्ष्य मानने लगते हैं। हम उपभोग को ही सुख समझने लगते हैं और इस प्रकार अनजाने में ही हमारा चरित्र बदल जाता है और हम उत्पादों के प्रति समर्पित हो जाते हैं।

प्रश्न 4.2

आशय स्पष्ट कीजिए: प्रतिष्ठा के अनेक रूप होते हैं, चाहे वे हास्यास्पद ही क्यों न हो।
Solution: इस कथन का अर्थ है कि सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के तरीके अनेक और कभी-कभी बहुत विचित्र हो सकते हैं। लोग अपनी सामाजिक स्थिति को ऊँचा दिखाने के लिए ऐसे कार्य करते हैं जो हास्यास्पद या हँसी के पात्र लगते हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका में लोग जीवित रहते हुए ही अपने अंतिम संस्कार और विश्राम स्थल के लिए अच्छी व्यवस्था कर लेते हैं, जो कि एक हास्यास्पद प्रतिष्ठा का उदाहरण है।

प्रश्न 5

कोई वस्तु हमारे लिए उपयोगी हो या न हो, लेकिन टी.वी. पर विज्ञापन देख कर हम उसे खरीदने के लिए अवश्य लालायित होते हैं। क्यों?
Solution: हम टीवी पर विज्ञापन देखकर अनुपयोगी वस्तुओं को भी खरीदने के लिए लालायित हो जाते हैं क्योंकि विज्ञापनों का प्रभाव बहुत आकर्षक और सम्मोहक होता है। विज्ञापनकर्ता अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों, लुभावने दृश्यों और ध्वनियों का प्रयोग करते हैं। अक्सर वे प्रसिद्ध फिल्मी चेहरों का सहारा लेते हैं, जिससे दर्शक उन उत्पादों के प्रति आकर्षित हो जाते हैं। यह विज्ञापन हमारे मन में भ्रम पैदा करते हैं और हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि वह वस्तु हमारे लिए आवश्यक है, भले ही वह वास्तव में उपयोगी न हो।

प्रश्न 6

आपके अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार वस्तु की गुणवत्ता होनी चाहिए या उसका विज्ञापन? तर्क देकर स्पष्ट करें।
Solution: मेरे अनुसार, वस्तुओं को खरीदने का आधार हमेशा उनकी गुणवत्ता होनी चाहिए, न कि केवल विज्ञापन। इसके कई कारण हैं:
  1. अधिकांश विज्ञापन भ्रामक होते हैं और वे वस्तुओं के प्रति झूठा आकर्षण पैदा करते हैं।
  2. कई विज्ञापन आकर्षक दृश्यों का उपयोग करके कम गुणवत्ता वाली वस्तुओं का प्रचार करते हैं। हम बाहरी चमक-दमक में फँसकर वस्तु की असलियत को नहीं पहचान पाते।
  3. केवल विज्ञापनों के आधार पर हम किसी वस्तु के वास्तविक गुण-दोष को नहीं जान सकते। गुणवत्ता ही वस्तु की उपयोगिता और टिकाऊपन सुनिश्चित करती है।
इसलिए, विज्ञापन के बजाय वस्तु की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए।

प्रश्न 7

पाठ के आधार पर आज के उपभोक्तावादी युग में पनप रही "दिखावे की संस्कृति" पर विचार व्यक्त कीजिए।
Solution: आज के उपभोक्तावादी युग में 'दिखावे की संस्कृति' बहुत तेज़ी से पनप रही है। लोग खुद को आधुनिक और विशिष्ट दिखाने के लिए महँगे सौंदर्य प्रसाधन, गैजेट्स, कपड़े आदि खरीदते हैं। समाज में लोगों की हैसियत इन्हीं चीज़ों से आँकी जाती है। यहाँ तक कि लोग मरने के बाद अपनी कब्र पर भी लाखों खर्च करते हैं ताकि दुनिया में अपनी हैसियत का प्रदर्शन कर सकें। इस दिखावे की संस्कृति के कई दुष्परिणाम हैं: यह हमारे चरित्र को बदल रही है, हमारी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को कमज़ोर कर रही है, सामाजिक संबंधों को संकुचित कर रही है, और मन में अशांति व आक्रोश बढ़ा रही है। व्यक्तिवाद, स्वार्थ और भोगवाद जैसी कुप्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं, जो समाज के लिए हानिकारक हैं।

प्रश्न 8

आज की उपभोक्ता संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को किस प्रकार प्रभावित कर रही है? अपने अनुभव के आधार पर एक अनुच्छेद लिखिए।
Solution: आज की उपभोक्ता संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को काफी हद तक प्रभावित कर रही है। त्योहार अब केवल पारंपरिक रस्मों और पारिवारिक मिलन के अवसर न रहकर, बाज़ारवाद और दिखावे का माध्यम बनते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, दिवाली पर लोग महंगे उपहारों और सजावट की वस्तुओं की होड़ में लगे रहते हैं, जो शायद त्योहार की मूल भावना से दूर है। होली पर रासायनिक रंगों का प्रयोग और गणेश चतुर्थी या दुर्गा पूजा पर विशाल पंडालों और मूर्तियों पर होने वाला अत्यधिक खर्च भी उपभोक्ता संस्कृति का ही प्रभाव है। लोग त्योहारों को मनाने के बजाय, उन्हें एक 'इवेंट' की तरह मनाने लगे हैं, जहाँ प्रदर्शन और खर्च को अधिक महत्व दिया जाता है। इससे हमारे पारंपरिक रीति-रिवाज और त्योहारों की सादगी और उनका वास्तविक अर्थ कहीं खोता जा रहा है।

Common mistakes

  • Confusing the sequence of events during the journey.
  • Misinterpreting the author's observations about Tibetan society.
  • Overlooking the historical context of the journey.
  • Difficulty in understanding the significance of specific places or encounters.

Revision tips

  • Read the chapter thoroughly to understand the sequence of events.
  • Focus on the author's descriptions of places, people, and customs.
  • Pay attention to the historical context provided in the chapter.
  • Review the answers to the questions to reinforce understanding of key themes.
  • Try to visualize the journey based on the author's vivid descriptions.

Practice MCQs

Q1. राहुल संकृत्यायन ने अपनी पहली तिब्बत यात्रा किस वेश में की थी?

Q2. ल्हासा की ओर पाठ में लेखक का मित्र कौन था जो सैनिक वेश में था?

Q3. तिब्बत में यात्रियों के लिए किस चीज़ की व्यवस्था नहीं थी?

Q4. लेखक ने तिब्बत में सबसे खतरनाक स्थान किसे बताया है?

Q5. सुमति किस जाति का था?

Frequently asked questions

यह पाठ किस बारे में है?

यह पाठ राहुल संकृत्यायन की तिब्बत की पहली यात्रा का वर्णन है, जिसमें उन्होंने वहाँ के सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिवेश का चित्रण किया है।

लेखक ने तिब्बत यात्रा किस वेश में की थी?

लेखक ने अपनी पहली तिब्बत यात्रा एक भिखमंगे के वेश में की थी।

पाठ में किन मुख्य स्थानों का वर्णन है?

पाठ में तिब्बत के कई स्थानों जैसे थं.गला, डाँडा, ल्हासा आदि का वर्णन है, साथ ही वहाँ के पहाड़ी दर्रों और गाँवों का भी जिक्र है।

सुमति कौन था और उसका लेखक से क्या संबंध था?

सुमति लेखक का मित्र था, जो भोटिया जाति का था और लेखक के साथ यात्रा में शामिल था।

तिब्बत की यात्रा में लेखक को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?

लेखक को ऊँचे दर्रों, खराब रास्तों, भिखमंगों के वेश में यात्रा करने और स्थानीय लोगों के व्यवहार जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

यह पाठ हमें क्या सिखाता है?

यह पाठ हमें विभिन्न संस्कृतियों को समझने, यात्रा के अनुभवों से सीखने और यात्रा वृत्तांत की शैली से परिचित होने का अवसर देता है।

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