कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान: बाजार में एक कमीज - NCERT समाधान
यह पृष्ठ कक्षा 7 के सामाजिक विज्ञान विषय के अध्याय 9, 'बाजार में एक कमीज' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। यह अध्याय बताता है कि कैसे एक साधारण कमीज बाजार में विभिन्न चरणों से गुजरती है, जिसमें कपास की खेती से लेकर अंतिम उपभोक्ता तक की यात्रा शामिल है। समाधानों में कपास किसानों, व्यापारियों, बुनकरों और निर्यातकों के बीच के संबंधों और निर्भरताओं पर प्रकाश डाला गया है। यह अध्याय बाजार में उत्पादन की श्रृंखला, विभिन्न हितधारकों की भूमिकाओं और छोटे उत्पादकों के सामने आने वाली चुनौतियों, जैसे कि ऋण और उचित मूल्य प्राप्त करने में कठिनाई, की पड़ताल करता है। यह इरोड जैसे कपड़ा बाजारों की कार्यप्रणाली और दादन व्यवस्था की अवधारणा को भी स्पष्ट करता है। ये समाधान छात्रों को बाजार की अर्थव्यवस्था की जटिलताओं, मूल्य निर्धारण की गतिशीलता और उत्पादन श्रृंखला में शक्ति असंतुलन को समझने में मदद करते हैं। परीक्षा की तैयारी के लिए, ये समाधान प्रमुख अवधारणाओं की स्पष्ट समझ प्रदान करते हैं और छात्रों को बाजार तंत्र के बारे में आलोचनात्मक रूप से सोचने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 7 |
| Subject | सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 9. बाजार में एक कमीज |
Chapter summary
कक्षा 7 के सामाजिक विज्ञान के अध्याय 9 'बाजार में एक कमीज' के लिए NCERT समाधान, बाजार में उत्पादन की श्रृंखला को समझने पर केंद्रित हैं। यह अध्याय कपास के खेत से लेकर तैयार कमीज तक की यात्रा का अनुसरण करता है, जिसमें किसानों, व्यापारियों, बुनकरों और निर्यातकों की भूमिकाओं और उनके आपसी संबंधों का विश्लेषण किया गया है। समाधानों में छोटे किसानों द्वारा सामना की जाने वाली कठिनाइयों, जैसे ऋण और कम मूल्य निर्धारण, और बुनकरों की व्यापारियों पर निर्भरता को स्पष्ट किया गया है। यह इरोड जैसे कपड़ा बाजारों की कार्यप्रणाली और दादन व्यवस्था की अवधारणा को भी समझाता है।
Learning outcomes
- बाजार में उत्पादन की श्रृंखला के विभिन्न चरणों को समझना।
- किसानों, व्यापारियों, बुनकरों और निर्यातकों की भूमिकाओं और उनके बीच संबंधों का विश्लेषण करना।
- छोटे उत्पादकों के सामने आने वाली चुनौतियों, जैसे ऋण और उचित मूल्य प्राप्त करने में कठिनाई, को पहचानना।
- इरोड जैसे कपड़ा बाजारों की कार्यप्रणाली को समझना।
- दादन व्यवस्था की अवधारणा को स्पष्ट करना।
- बाजार में मूल्य निर्धारण और शक्ति असंतुलन के बारे में आलोचनात्मक रूप से सोचना।
Topics covered
Paper topics
- बाजार में उत्पादन की श्रृंखला
- कपास की खेती और किसान
- व्यापारी और उनकी भूमिका
- बुनकर और उनकी निर्भरता
- इरोड कपड़ा बाजार
- दादन व्यवस्था
- निर्यात और विदेशी खरीदार
- उत्पादक और उपभोक्ता
- ऋण और ब्याज दरें
- बाजार में मूल्य निर्धारण
- सहकारी संस्थाएं
- उत्पादन श्रृंखला में शक्ति असंतुलन
Important topics
- बाजार में उत्पादन की श्रृंखला
- किसानों और बुनकरों की समस्याएं
- व्यापारियों और निर्यातकों की भूमिका
- दादन व्यवस्था
- विदेशी खरीदारों की अपेक्षाएं
- उत्पादन श्रृंखला में शक्ति असंतुलन
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Questions and Solutions
1. क्या स्वप्ना को रूई का उचित मूल्य प्राप्त हुआ?
नहीं, स्वप्ना को अपनी रूई का उचित मूल्य प्राप्त नहीं हुआ। इसका मुख्य कारण यह था कि उसने एक स्थानीय व्यापारी से 2500 रुपये का कर्ज ऊँची ब्याज दर पर लिया था। इस कर्ज के बदले में, व्यापारी ने स्वप्ना से यह शर्त मनवा ली थी कि वह अपनी सारी पैदा की हुई रूई उसी को बेचेगी। व्यापारी ने स्वप्ना को प्रति क्विंटल 1500 रुपये की दर से रूई के 6000 रुपये दिए, जबकि उस समय रूई का बाजार भाव 1800 रुपये प्रति क्विंटल था। इस प्रकार, कर्ज की मजबूरी के कारण स्वप्ना को अपनी फसल का नुकसान उठाना पड़ा।
2. व्यापारी ने स्वप्ना को कम मूल्य क्यों दिया?
व्यापारी ने स्वप्ना को कम मूल्य इसलिए दिया क्योंकि स्वप्ना ने व्यापारी से ऊँची ब्याज दर पर 2500 रुपये का कर्ज लिया हुआ था। इस कर्ज के बदले में, व्यापारी ने स्वप्ना से यह वादा ले लिया था कि वह अपनी सारी रूई उसी को बेचेगी। इस मजबूरी का फायदा उठाते हुए, व्यापारी ने स्वप्ना को बाजार भाव से कम कीमत पर उसकी रूई खरीदने की पेशकश की, और स्वप्ना को वह स्वीकार करना पड़ा।
3. आपके विचार से बड़े किसान अपनी रूई कहाँ बेचेंगे? उनकी स्थिति किस प्रकार स्वप्ना से भिन्न है?
बड़े किसान अपनी रूई को मंडी में बेचेंगे जहाँ उन्हें अपनी फसल का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना होती है। बड़े किसानों की स्थिति स्वप्ना से भिन्न होती है क्योंकि वे आमतौर पर कर्ज के जाल में नहीं फंसे होते हैं और उन्हें अपनी उपज बेचने के लिए किसी विशेष व्यापारी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। वे अपनी रूई को सबसे अधिक बोली लगाने वाले को बेचने के लिए स्वतंत्र होते हैं, जिससे उन्हें अपनी मेहनत का उचित लाभ मिल पाता है।
4. इरोड के कपड़ा बाजार में निम्नलिखित लोग क्या काम कर रहे हैं-व्यापारी, बुनकर, निर्यातक?
इरोड के कपड़ा बाजार में विभिन्न लोग अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं:
- व्यापारी: इरोड के कपड़ा बाजार में कई तरह के व्यापारी होते हैं। कुछ व्यापारी आस-पास के गाँवों से बुनकरों द्वारा बनाए गए कपड़े खरीदते हैं। वे इन कपड़ों को इकट्ठा करते हैं और फिर उन्हें अन्य बड़े शहरों के व्यापारियों या निर्यातकों को बेचते हैं। वे बाजार में कपड़े की खरीद-बिक्री का मुख्य माध्यम होते हैं।
- बुनकर: बुनकर कपड़ा बनाने का काम करते हैं। वे अक्सर व्यापारियों से सूत प्राप्त करते हैं और उनके द्वारा दिए गए ऑर्डर के अनुसार कपड़ा बुनते हैं। बाजार के दिनों में, वे अपना तैयार कपड़ा व्यापारियों को बेचने के लिए लाते हैं।
- निर्यातक: इरोड के व्यापारी, बुनकरों द्वारा बनाए गए कपड़े को दिल्ली जैसे शहरों में स्थित वस्त्र निर्यात करने वाले कारखानों को भेजते हैं। ये कारखाने उस कपड़े का उपयोग कमीजें बनाने के लिए करते हैं, जिन्हें बाद में विदेशी खरीदारों को निर्यात किया जाता है। इस प्रकार, निर्यातक उत्पादन श्रृंखला को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ते हैं।
5. बुनकर, व्यापारियों पर किस-किस तरह से निर्भर हैं?
बुनकर कई महत्वपूर्ण तरीकों से व्यापारियों पर निर्भर होते हैं:
- कच्चा माल (सूत): बुनकरों को कपड़ा बुनने के लिए सूत की आवश्यकता होती है, जो वे अक्सर व्यापारियों से प्राप्त करते हैं।
- ऑर्डर और उत्पादन: बुनकर व्यापारियों द्वारा दिए गए ऑर्डर के अनुसार ही कपड़ा बनाते हैं। व्यापारी उन्हें बताते हैं कि किस प्रकार का और कितना कपड़ा चाहिए।
- वित्तीय सहायता (ऋण): बुनकरों को अक्सर करघे खरीदने या अन्य जरूरतों के लिए व्यापारियों से ऊँची ब्याज दर पर ऋण लेना पड़ता है। एक करघे की कीमत लगभग 20,000 रुपये हो सकती है, जिसे खरीदने के लिए उन्हें वित्तीय सहायता की आवश्यकता होती है।
- तैयार माल की बिक्री: बुनकर अपना तैयार कपड़ा व्यापारियों को ही बेचते हैं, क्योंकि उनके पास सीधे उपभोक्ताओं या बड़े बाजारों तक पहुँचने के साधन सीमित होते हैं।
6. यदि बुनकर खुद सूत खरीदकर बने हुए कपड़े बेचते हैं, तो उन्हें तीन गुना ज्यादा कमाई होती है। क्या यह संभव है? चर्चा कीजिए।
यह सच है कि यदि बुनकर खुद सूत खरीदकर और फिर तैयार कपड़े सीधे बेचते हैं, तो उनकी कमाई तीन गुना तक बढ़ सकती है। हालांकि, यह उनके लिए संभव नहीं हो पाता है क्योंकि वे कई कारणों से व्यापारियों पर निर्भर रहते हैं। बुनकरों को अक्सर व्यापारियों से ही सूत मिलता है और उन्हें अपना तैयार कपड़ा भी व्यापारियों को ही बेचना पड़ता है। उनके पास यह जानने का कोई सीधा साधन नहीं होता कि वे किसके लिए कपड़ा बना रहे हैं और वह कपड़ा बाजार में किस कीमत पर बिकेगा। इस जानकारी और बाजार तक सीधी पहुँच की कमी के कारण, वे स्वतंत्र रूप से काम करके अधिक कमाई नहीं कर पाते हैं।
7. क्या इसी तरह की दादन व्यवस्था पापड़, बीड़ी और मसाले बनाने में भी देखने को मिलती है? अपने इलाके से इस संबंध में जानकारी इकट्ठी कीजिए।
हाँ, दादन व्यवस्था (जिसे 'कंट्रैक्ट फार्मिंग' या 'आउटसोर्सिंग' का एक रूप भी कह सकते हैं) पापड़, बीड़ी और मसाले जैसे कई अन्य उद्योगों में भी देखने को मिलती है। इस व्यवस्था में, व्यापारी या कंपनी कारीगरों को कच्चा माल (जैसे पापड़ के लिए आलू और अन्य सामग्री, बीड़ी के लिए पत्ता और धागा, या मसालों के लिए विभिन्न मसाले) उपलब्ध कराती है। कारीगर उस कच्चे माल का उपयोग करके उत्पाद (पापड़, बीड़ी, या मसाले) तैयार करते हैं और फिर उसे उसी व्यापारी को वापस दे देते हैं। व्यापारी उन्हें इस काम के लिए भुगतान करता है। यह व्यवस्था छोटे पैमाने पर उत्पादन और रोजगार सृजन में मदद करती है, लेकिन कारीगरों को अक्सर कम भुगतान मिलता है और वे व्यापारी पर निर्भर रहते हैं।
8. आपने अपने इलाके में सहकारी संस्थाओं के बारे में सुना होगा, जैसे-दूध, किराना, धान आदि के व्यवसाय में। पता लगाइए कि ये किसके लाभ के लिए स्थापित की गई थीं?
सहकारी संस्थाएं मुख्य रूप से अपने सदस्यों के सामूहिक लाभ के लिए स्थापित की जाती हैं। उदाहरण के लिए, यदि आपके इलाके में दूध की सहकारी संस्था है, तो यह उन दूध उत्पादकों (किसानों) के लाभ के लिए बनाई गई है जो इसके सदस्य हैं। ये संस्थाएं सदस्यों से उत्पाद (जैसे दूध, किराना का सामान, या धान) एकत्रित करती हैं और फिर उन्हें बड़े बाजारों या सरकारी एजेंसियों को बेचती हैं। इस सामूहिक बिक्री से सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से बेचने की तुलना में बेहतर मूल्य और लाभ मिलता है। इसी तरह, किसान भाई मिलकर धान या किराना इकट्ठा करके सरकारी बाजार समितियों में बेचते हैं, जिससे उन्हें बेहतर दाम मिल पाता है।
9. विदेशों में खरीदार वस्त्र निर्यात करने वालों से क्या-क्या अपेक्षाएँ रखते हैं? वस्त्र निर्यातक इन शर्तो को क्यों स्वीकार कर लेते हैं?
विदेशों में, विशेष रूप से अमेरिका और यूरोप के बड़े स्टोर्स की श्रृंखला चलाने वाले खरीदार, वस्त्र निर्यातकों से कई सख्त अपेक्षाएँ रखते हैं:
- न्यूनतम मूल्य: वे माल को सबसे कम संभव कीमत पर खरीदना चाहते हैं।
- उच्चतम गुणवत्ता: वे उत्पाद की गुणवत्ता में किसी भी तरह की कमी बर्दाश्त नहीं करते और उच्चतम स्तर की गुणवत्ता की मांग करते हैं।
- समय पर डिलीवरी: उन्हें माल बिल्कुल समय पर चाहिए होता है।
- सख्त ऐतराज: यदि माल में थोड़ी सी भी खराबी हो या डिलीवरी में जरा भी विलंब हो, तो वे बहुत सख्त आपत्ति जताते हैं।
वस्त्र निर्यातक इन शर्तों को इसलिए स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि ये खरीदार बहुत शक्तिशाली होते हैं और उनके पास बड़ी मात्रा में ऑर्डर देने की क्षमता होती है। यदि निर्यातक इन शर्तों को पूरा नहीं करते हैं, तो वे इन बड़े खरीदारों को खो सकते हैं, जिससे उनके व्यवसाय पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए, वे इन शक्तिशाली ग्राहकों की मांगों को पूरा करने की पूरी कोशिश करते हैं ताकि वे व्यापार जारी रख सकें।
10. वस्त्र निर्यातक विदेशी खरीदारों की शर्तों को किस प्रकार पूरा करते हैं?
वस्त्र निर्यातक विदेशी खरीदारों की सख्त शर्तों को पूरा करने के लिए कई तरीके अपनाते हैं:
- न्यूनतम कीमत पर वस्त्र उपलब्ध कराना: निर्यातक उत्पादन लागत को कम करने और प्रतिस्पर्धी मूल्य प्रदान करने का प्रयास करते हैं। वे अक्सर बुनकरों और अन्य आपूर्तिकर्ताओं से कम कीमत पर माल खरीदने की कोशिश करते हैं।
- उच्च गुणवत्ता पर ध्यान देना: वे यह सुनिश्चित करते हैं कि उत्पादित वस्त्रों की गुणवत्ता विदेशी खरीदारों की अपेक्षाओं के अनुरूप हो। इसके लिए वे उत्पादन प्रक्रिया के हर चरण में गुणवत्ता नियंत्रण बनाए रखते हैं।
- समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करना: वे उत्पादन और परिवहन की योजना इस तरह से बनाते हैं कि माल निर्धारित समय सीमा के भीतर खरीदार तक पहुँच जाए। इसमें उत्पादन में तेजी लाना और कुशल लॉजिस्टिक्स का उपयोग करना शामिल हो सकता है।
- उत्पादन प्रक्रिया का प्रबंधन: वे बुनकरों और कारखानों के साथ मिलकर काम करते हैं ताकि उत्पादन सुचारू रूप से चले और गुणवत्ता व समय-सीमा का पालन हो सके।
Common mistakes
- उत्पादन श्रृंखला में विभिन्न हितधारकों की भूमिकाओं को स्पष्ट रूप से अलग करने में कठिनाई।
- छोटे किसानों और बुनकरों द्वारा सामना की जाने वाली आर्थिक कठिनाइयों को कम आंकना।
- बाजार में मूल्य निर्धारण को प्रभावित करने वाले कारकों को पूरी तरह से न समझना।
- दादन व्यवस्था के लाभ और हानियों का विश्लेषण करने में चूक।
Revision tips
- प्रत्येक प्रश्न के उत्तर को ध्यान से पढ़ें और उत्पादन श्रृंखला के प्रत्येक चरण में शामिल लोगों की भूमिका को समझें।
- किसानों और बुनकरों के सामने आने वाली चुनौतियों पर विशेष ध्यान दें, जैसे कि ऋण और उचित मूल्य प्राप्त करना।
- इरोड जैसे कपड़ा बाजारों की कार्यप्रणाली और दादन व्यवस्था के उदाहरणों को याद करें।
- विभिन्न हितधारकों के बीच शक्ति असंतुलन और निर्भरता के संबंधों का विश्लेषण करें।
Practice MCQs
Q1. स्वप्ना को अपनी रूई का उचित मूल्य क्यों नहीं मिला?
Explanation: स्वप्ना को कर्ज के बदले अपनी सारी रूई व्यापारी को कम दाम पर बेचनी पड़ी, जिससे उसे उचित मूल्य नहीं मिला।
Q2. इरोड के कपड़ा बाजार में व्यापारी का मुख्य कार्य क्या है?
Explanation: इरोड के कपड़ा बाजार में व्यापारी बुनकरों से कपड़ा खरीदते हैं और फिर उसे आगे बेचते हैं।
Q3. बुनकर व्यापारियों पर किस प्रकार निर्भर होते हैं?
Explanation: बुनकर उत्पादन के लिए सूत, करघे खरीदने के लिए ऋण और उत्पादन के लिए ऑर्डर, इन सभी के लिए व्यापारियों पर निर्भर होते हैं।
Q4. दादन व्यवस्था में व्यापारी की क्या भूमिका होती है?
Explanation: दादन व्यवस्था में व्यापारी उत्पादन प्रक्रिया में शामिल होकर कच्चा माल उपलब्ध कराता है और तैयार माल वापस लेता है।
Q5. विदेशी खरीदार वस्त्र निर्यातकों से क्या अपेक्षा रखते हैं?
Explanation: विदेशी खरीदार न्यूनतम मूल्य, उच्चतम गुणवत्ता और समय पर डिलीवरी जैसी सख्त शर्तें रखते हैं।
Frequently asked questions
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान के अध्याय 9 'बाजार में एक कमीज' में मुख्य रूप से क्या सिखाया गया है?
यह अध्याय सिखाता है कि एक साधारण कमीज कैसे बनती है, जिसमें कपास की खेती से लेकर अंतिम उपभोक्ता तक की पूरी उत्पादन श्रृंखला शामिल है। यह किसानों, व्यापारियों, बुनकरों और निर्यातकों की भूमिकाओं और उनके बीच संबंधों को भी स्पष्ट करता है।
स्वप्ना को अपनी रूई का उचित मूल्य क्यों नहीं मिला?
स्वप्ना को उचित मूल्य इसलिए नहीं मिला क्योंकि उसने एक व्यापारी से ऊँची ब्याज दर पर कर्ज लिया था और बदले में अपनी सारी रूई उसी व्यापारी को कम दाम पर बेचने की शर्त मानी थी।
दादन व्यवस्था क्या है?
दादन व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें व्यापारी कारीगर को कच्चा माल उपलब्ध कराता है और तैयार माल वापस लेता है, जिसके लिए कारीगर को भुगतान मिलता है।
बुनकर व्यापारियों पर क्यों निर्भर होते हैं?
बुनकर व्यापारियों पर सूत प्राप्त करने, करघे खरीदने के लिए ऋण लेने और अपने द्वारा बनाए गए कपड़े बेचने के लिए निर्भर होते हैं।
विदेशी खरीदार वस्त्र निर्यातकों से क्या उम्मीदें रखते हैं?
विदेशी खरीदार न्यूनतम मूल्य पर माल खरीदने, उच्चतम गुणवत्ता सुनिश्चित करने और समय पर डिलीवरी देने की अपेक्षा रखते हैं।
ये समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करते हैं?
ये समाधान अध्याय की प्रमुख अवधारणाओं को स्पष्ट करते हैं, महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर प्रदान करते हैं, और छात्रों को बाजार की जटिलताओं और उत्पादन श्रृंखला के बारे में आलोचनात्मक रूप से सोचने में मदद करते हैं, जो परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
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