CBSE Class 12 Hindi Core NCERT Solutions: बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर

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This chapter delves into the profound thoughts of Dr. Bhimrao Ambedkar on social issues, particularly focusing on the caste system and its implications. The NCERT Solutions for Class 12 Hindi (Core) Chapter 18, 'बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर', provide detailed explanations and analyses of Ambedkar's arguments against caste as a mere division of labor. It explores how caste perpetuates inequality, hinders individual freedom, and contributes to unemployment and poverty. The solutions also discuss Ambedkar's vision of an ideal society based on equality, fraternity, and liberty, and critically examine the concept of 'Bhratrata' (fraternity). These solutions are designed to help students grasp complex sociological concepts and prepare effectively for their examinations by offering clear, step-by-step answers to the textbook questions.

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
Subjectहिंदी
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter18. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर

Chapter summary

This chapter's NCERT Solutions for Class 12 Hindi (Core) focus on Dr. B.R. Ambedkar's critical analysis of the caste system. It covers his arguments against viewing caste as a form of labor division, explaining its detrimental effects on individual freedom, skill development, and social mobility. The solutions also address how caste contributes to unemployment and poverty, and explore Ambedkar's ideal society emphasizing equality and fraternity. The exercises encourage critical thinking about social justice and equality.

Learning outcomes

  • Understand Ambedkar's arguments against caste as a division of labor.
  • Analyze how the caste system contributes to unemployment and poverty.
  • Explain Ambedkar's concept of equality and its importance for societal progress.
  • Discuss the broader definition of 'slavery' beyond legal subjugation.
  • Evaluate the concept of 'fraternity' in the context of an ideal society.

Topics covered

Paper topics

  • Caste System in India
  • Labor Division vs. Caste System
  • Ambedkar's Arguments Against Caste
  • Slavery and Freedom of Profession
  • Equality as a Practical Principle
  • Ideal Society
  • Fraternity (Bhratrata)
  • Social Justice
  • Individual Freedom
  • Unemployment and Poverty

Important topics

  • Ambedkar's critique of caste as a division of labor
  • Caste's role in unemployment and poverty
  • Ambedkar's concept of equality and its practical application
  • The broader definition of slavery
  • The elements of an ideal society (equality, fraternity)

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे अंबेडकर के क्या तर्क हैं?
Solution: डॉ. भीमराव अंबेडकर जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का एक स्वाभाविक रूप नहीं मानते थे। उनके अनुसार, इसके पीछे निम्नलिखित प्रमुख तर्क हैं:
  1. जन्म आधारित विभाजन: जाति प्रथा में श्रम का विभाजन व्यक्ति की रुचि या योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि उसके जन्म के आधार पर होता है। यह व्यवस्था व्यक्ति की स्वाभाविक प्रतिभा और पसंद की उपेक्षा करती है, जो श्रम-विभाजन के सिद्धांत के विपरीत है।
  2. योग्यता की उपेक्षा: इस प्रथा में व्यक्ति की व्यक्तिगत योग्यता, क्षमता और कौशल को कोई महत्व नहीं दिया जाता। व्यक्ति को उसके जन्म से मिले सामाजिक स्तर के आधार पर ही एक निश्चित पेशा अपनाने के लिए मजबूर किया जाता है।
  3. पेशा चुनने की स्वतंत्रता का अभाव: व्यक्ति को अपना पेशा चुनने की कोई स्वतंत्रता नहीं होती। उसके माता-पिता का पेशा ही उसका भी पेशा बन जाता है, चाहे वह उसमें कुशल हो या न हो।
  4. व्यवसाय परिवर्तन पर प्रतिबंध: जाति प्रथा व्यक्ति को अपना व्यवसाय बदलने की अनुमति नहीं देती, भले ही वह वर्तमान व्यवसाय में असफल हो या उसमें उसकी रुचि न हो।
  5. संकटकालीन स्थिति में भी प्रतिबंध: सबसे गंभीर बात यह है कि यदि किसी व्यक्ति का पैतृक पेशा अनुपयुक्त हो जाए या वह उसमें सक्षम न रहे, और भूखे मरने की नौबत आ जाए, तब भी उसे अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता नहीं होती। यह स्थिति श्रम-विभाजन के किसी भी स्वस्थ रूप के लिए अमानवीय है।
इस प्रकार, अंबेडकर का मानना था कि जाति प्रथा मनुष्य की स्वतंत्रता और क्षमता के विकास में बाधक है, इसलिए यह श्रम-विभाजन का एक अस्वाभाविक और दोषपूर्ण रूप है।

प्रश्न 2

जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती रही है? क्या यह स्थिति आज भी है?
Solution: जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी और भुखमरी का एक प्रमुख कारण बनती रही है, जिसके निम्नलिखित कारण हैं:
  1. पेशा निर्धारण और बंधन: जाति प्रथा व्यक्ति के पेशे का निर्धारण उसके जन्म के आधार पर करती है और उसे जीवन भर के लिए उसी पेशे से बांध देती है। यदि वह पेशा व्यक्ति की योग्यता, रुचि या आवश्यकता के अनुकूल न हो, तब भी वह उसे छोड़ने के लिए स्वतंत्र नहीं होता।
  2. आधुनिक परिवर्तनों से अनुकूलन में बाधा: आधुनिक युग में उद्योग-धंधों की प्रक्रियाएं, तकनीकें और आवश्यकताएं निरंतर बदलती रहती हैं। इन परिवर्तनों के साथ तालमेल बिठाने के लिए व्यक्ति को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है। लेकिन जाति प्रथा की जकड़न के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाता।
  3. भूखमरी की नौबत: यदि किसी व्यक्ति का पैतृक पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त हो जाए और वह उसमें सफल न हो पाए, तो भी उसे पेशा बदलने की अनुमति नहीं होती। ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में, व्यक्ति के पास भूखे मरने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं रहता। इस प्रकार, यह प्रथा बेरोजगारी को बढ़ावा देती है और भुखमरी की स्थिति उत्पन्न करती है।
क्या यह स्थिति आज भी है? आज भारत की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में काफी बदलाव आया है। सरकारी कानूनों, सामाजिक सुधारों और वैश्विक परिवर्तनों के कारण जाति प्रथा के बंधन पहले की तुलना में कुछ लचीले हो गए हैं। लोग अब अपनी जाति से अलग अन्य पेशे भी अपना रहे हैं और अपनी योग्यता, रुचि व क्षमता के अनुसार अवसर तलाश रहे हैं। हालांकि, जातिगत भेदभाव और पूर्वाग्रह पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं, और कुछ हद तक ये आज भी बेरोजगारी और आर्थिक असमानता में योगदान कर सकते हैं, विशेषकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में। फिर भी, पहले की तुलना में स्थिति निश्चित रूप से बेहतर हुई है और पेशा चुनने की स्वतंत्रता बढ़ी है।

प्रश्न 3

लेखक के मत से 'दासता' की व्यापक परिभाषा क्या है?
Solution: लेखक डॉ. भीमराव अंबेडकर के अनुसार, 'दासता' केवल कानूनी रूप से किसी व्यक्ति या समूह का दूसरे के अधीन होना मात्र नहीं है। उन्होंने दासता की एक अधिक व्यापक परिभाषा प्रस्तुत की है, जिसके अंतर्गत निम्नलिखित बातें आती हैं:
  1. पेशा चुनने की स्वतंत्रता का अभाव: किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा या योग्यता के अनुसार पेशा चुनने की आजादी न देना, बल्कि उसे केवल वही पेशा अपनाने के लिए विवश करना जो उसके पूर्वजों का था या समाज द्वारा निर्धारित किया गया हो।
  2. मनोनुकूल आचरण न करने देना: व्यक्ति को अपनी पसंद या इच्छा के अनुसार कार्य करने या व्यवहार करने की स्वतंत्रता न देना।
  3. सामाजिक विवशता: सामाजिक दासता की स्थिति में, कुछ व्यक्तियों को समाज के अन्य लोगों द्वारा तय किए गए व्यवहारों, कर्तव्यों और नियमों का पालन करने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्हें अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं या विचारों को व्यक्त करने की अनुमति नहीं होती।
संक्षेप में, अंबेडकर के लिए दासता वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता खो देता है और उसे दूसरों द्वारा निर्धारित जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ता है, चाहे वह कानूनी रूप से स्वतंत्र ही क्यों न हो।

प्रश्न 4

शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद अंबेडकर 'समता' को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?
Solution: डॉ. भीमराव अंबेडकर यह मानते हैं कि शारीरिक बनावट (वंश-परंपरा) और सामाजिक पृष्ठभूमि (उत्तराधिकार) के कारण मनुष्यों में स्वाभाविक रूप से कुछ असमानताएं मौजूद रहती हैं। इसके बावजूद, वे 'समता' (समानता) को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यवहार्य सिद्धांत मानते हैं। इसके पीछे उनके तर्क इस प्रकार हैं:
  1. समाज की अधिकतम उपयोगिता: अंबेडकर का मानना है कि यदि समाज के सभी सदस्यों को समान अवसर दिए जाएं और उन्हें अपनी क्षमता विकसित करने की स्वतंत्रता हो, तो समाज उनसे अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकता है। जब हर व्यक्ति अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार कार्य करेगा, तो वह उसमें उत्कृष्टता प्राप्त करेगा, जिससे पूरे समाज का भला होगा।
  2. क्षमता विकास और रुचि अनुरूप व्यवसाय: समता का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमताओं को निखारने और अपनी रुचि के अनुसार व्यवसाय चुनने का अवसर मिले। यह व्यक्तिगत विकास के लिए आवश्यक है और समाज को अधिक कुशल बनाता है।
  3. व्यवहार्यता और राजनीतिक सिद्धांत: राजनीतिक क्षेत्र में, व्यवहार्यता के लिए यह आवश्यक है कि सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार किया जाए। सबको समान अवसर मिलने से उनमें मानसिक स्तर पर भेदभाव की भावना उत्पन्न नहीं होती और वे राष्ट्र निर्माण में सक्रिय रूप से भाग ले पाते हैं।
  4. मानसिक समानता को बढ़ावा: यद्यपि शारीरिक असमानताएं हो सकती हैं, लेकिन मानसिक स्तर पर सभी को समान अवसर मिलने से उनमें हीन भावना या श्रेष्ठता की भावना नहीं पनपती, जिससे सामाजिक सद्भाव बना रहता है।
इसलिए, अंबेडकर के लिए समता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक सिद्धांत है जो समाज की प्रगति और सभी सदस्यों के कल्याण के लिए अनिवार्य है।

प्रश्न 5

सही में अंबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है, जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन-सुविधाओं का तर्क दिया है। क्या इससे आप सहमत हैं?
Solution: हाँ, मैं इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भावनात्मक समत्व (समान भावना) की मानवीय दृष्टि से जातिवाद के उन्मूलन की वकालत की है, और इसके लिए उन्होंने भौतिक स्थितियों तथा जीवन-सुविधाओं की समानता को एक आवश्यक आधार माना है। मेरे सहमत होने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं:
  1. भावनात्मक समत्व के लिए समानता आवश्यक: किसी भी समाज में भाईचारा और भावनात्मक जुड़ाव तभी संभव है जब उसके सदस्यों के बीच समानता का भाव हो। जाति प्रथा समाज को विभिन्न वर्गों में बांटती है, जिससे एक वर्ग दूसरे के प्रति ईर्ष्या, घृणा या हीन भावना रखता है। यह भावनात्मक समत्व को नष्ट करता है।
  2. भौतिक समानता का महत्व: जब तक समाज में भौतिक सुविधाओं (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आर्थिक अवसर) के वितरण में भारी असमानता रहेगी, तब तक भावनात्मक समानता केवल एक कोरा आदर्श बनकर रह जाएगी। वंचित वर्ग के लोग हमेशा शोषित महसूस करेंगे, जिससे उनमें आक्रोश बना रहेगा। इसलिए, जातिवाद के उन्मूलन के लिए सभी को समान भौतिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  3. योग्यता का सही मूल्यांकन: अंबेडकर का तर्क है कि जब तक सभी को समान अवसर और सुविधाएँ नहीं मिलेंगी, तब तक किसी की योग्यता का सही मूल्यांकन संभव नहीं है। उदाहरण के लिए, एक गरीब गाँव की पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चे की तुलना एक संपन्न कान्वेंट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे से सीधे तौर पर नहीं की जा सकती, क्योंकि दोनों को मिलने वाली सुविधाएँ और अवसर भिन्न होते हैं। जातिवाद और असमानता इसी मूल्यांकन को बाधित करती है।
  4. स्वस्थ मानसिकता और खुले विचार: जातिवाद के उन्मूलन और भावनात्मक समत्व की स्थापना के लिए न केवल बाहरी (भौतिक) समानता बल्कि आंतरिक (मानसिक) समानता भी आवश्यक है। इसके लिए स्वस्थ मानसिकता और खुले विचारों का होना जरूरी है, जो तब विकसित होते हैं जब व्यक्ति सुरक्षित और समान महसूस करता है।
अतः, जातिवाद के उन्मूलन के लिए भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के साथ-साथ भौतिक और जीवन-सुविधाओं की समानता का तर्क देना अत्यंत प्रासंगिक और आवश्यक है।

प्रश्न 6

आदर्श समाज के तीन तत्त्वों में से एक 'भ्रातृता' को रखकर लेखक ने अपने आदर्श समाज में स्त्रियों को भी सम्मिलित किया है अथवा नहीं? आप इस 'भ्रातृता' शब्द से कहाँ तक सहमत हैं? यदि नहीं तो आप क्या शब्द उचित समझेंगे/समझेंगी?
Solution: स्त्रियों का समावेश: लेखक डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने आदर्श समाज के तीन प्रमुख तत्त्वों में से एक 'भ्रातृता' (भाईचारा) का उल्लेख किया है। हालांकि, उन्होंने अपने आदर्श समाज में स्त्रियों को 'भ्रातृता' शब्द के अंतर्गत स्पष्ट रूप से अलग से सम्मिलित किया है या नहीं, इसका सीधा उल्लेख नहीं किया है। परंतु, यह समझना महत्वपूर्ण है कि किसी भी समाज का निर्माण स्त्री और पुरुष दोनों के सहयोग से ही होता है। इसलिए, यह मान लेना अनुचित होगा कि अंबेडकर ने स्त्रियों को अपने आदर्श समाज की अवधारणा से बाहर रखा होगा। 'भ्रातृता' शब्द का अर्थ व्यापक भाईचारा है, जिसमें समाज के सभी सदस्यों, चाहे वे स्त्री हों या पुरुष, का समावेश स्वाभाविक रूप से होना चाहिए। स्त्रियों को अलग से उल्लेखित न करना शायद इसलिए हो सकता है क्योंकि वे समाज का एक अभिन्न अंग हैं और उनके बिना किसी भी आदर्श समाज की कल्पना अधूरी है। 'भ्रातृता' शब्द पर सहमति और वैकल्पिक शब्द: मैं 'भ्रातृता' शब्द के मूल भाव से पूर्णतः सहमत हूँ, जिसका अर्थ है भाईचारा या बंधुत्व। यह एक ऐसा सिद्धांत है जो समाज में प्रेम, सहयोग और आपसी सम्मान को बढ़ावा देता है। हालांकि, 'भ्रातृता' शब्द संस्कृत मूल का है और यह केवल भाइयों के बीच के संबंध का बोध कराता है, जो शायद आधुनिक समाज की समावेशी भावना को पूरी तरह व्यक्त नहीं करता। इसलिए, यदि 'भ्रातृता' शब्द के स्थान पर कोई अन्य शब्द चुनना हो, तो मैं निम्नलिखित शब्दों को अधिक उचित समझूंगा/समझूंगी:
  • भाईचारा: यह एक सामान्य और प्रचलित शब्द है जो सभी के बीच प्रेमपूर्ण संबंधों को दर्शाता है।
  • बंधुत्व: यह शब्द भी भाईचारे के समान ही है और सभी मनुष्यों के बीच एक गहरी एकता और संबंध का बोध कराता है।
  • सामंजस्य: यह शब्द समाज में विभिन्न लोगों के बीच सद्भावपूर्ण सह-अस्तित्व और आपसी समझ को दर्शाता है।
इनमें से 'भाईचारा' या 'बंधुत्व' शब्द 'भ्रातृता' के भाव को अधिक स्पष्टता और व्यापकता के साथ व्यक्त करते हैं, क्योंकि ये केवल लिंग विशेष तक सीमित नहीं हैं बल्कि सभी मनुष्यों के बीच समान संबंध स्थापित करने पर जोर देते हैं।

Common mistakes

  • Confusing caste as a simple division of labor rather than a system of social hierarchy.
  • Underestimating the link between caste restrictions and economic hardship.
  • Interpreting 'equality' solely in political terms without considering social and economic aspects.
  • Overlooking the inclusive nature of 'fraternity' in Ambedkar's ideal society.

Revision tips

  • Focus on Ambedkar's core arguments against the caste system for each question.
  • Pay close attention to the definitions of 'slavery' and 'equality' as presented by Ambedkar.
  • Understand the connection between caste, profession, and economic well-being.
  • Consider the broader implications of 'fraternity' and its role in social reform.
  • Practice articulating Ambedkar's vision of an ideal society.

Practice MCQs

Q1. जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का रूप न मानने के पीछे अंबेडकर का मुख्य तर्क क्या है?

Q2. जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी का कारण कैसे बनती है?

Q3. लेखक के अनुसार 'दासता' की व्यापक परिभाषा क्या है?

Q4. अंबेडकर 'समता' को व्यवहार्य सिद्धांत क्यों मानते हैं?

Q5. आदर्श समाज के लिए लेखक ने 'भ्रातृता' के साथ किन अन्य तत्त्वों का उल्लेख किया है?

Frequently asked questions

यह NCERT समाधान किस कक्षा और विषय के लिए हैं?

यह NCERT समाधान CBSE कक्षा 12 के हिंदी कोर विषय के लिए हैं, विशेष रूप से पाठ 18: बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर पर केंद्रित हैं।

इन समाधानों में किन मुख्य विषयों को शामिल किया गया है?

इन समाधानों में जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का रूप न मानने के अंबेडकर के तर्क, जाति प्रथा से उत्पन्न बेरोजगारी और भुखमरी, दासता की व्यापक परिभाषा, और समता व भ्रातृता पर आधारित आदर्श समाज की अवधारणा जैसे विषयों को शामिल किया गया है।

क्या ये समाधान मूल पाठ के प्रश्नों को बदलते हैं?

नहीं, ये समाधान मूल पाठ के प्रश्नों को वैसे ही रखते हैं, लेकिन प्रत्येक प्रश्न के उत्तर को स्पष्टता और विस्तार के साथ फिर से लिखा गया है।

ये समाधान छात्रों की परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करते हैं?

ये समाधान छात्रों को अंबेडकर के विचारों की गहरी समझ प्रदान करते हैं, जटिल अवधारणाओं को सरल भाषा में समझाते हैं, और परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर देने के लिए एक स्पष्ट ढाँचा प्रदान करते हैं।

क्या समाधानों में कोई गणितीय या वैज्ञानिक सूत्र शामिल हैं?

नहीं, यह पाठ हिंदी साहित्य और समाजशास्त्र से संबंधित है, इसलिए इसमें गणितीय या वैज्ञानिक सूत्रों के बजाय सामाजिक और दार्शनिक तर्कों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

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