कक्षा 11 हिंदी NCERT समाधान: अध्याय 12 - मियाँ नसीरुद्दीन

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यह पृष्ठ कक्षा 11 हिंदी की पाठ्यपुस्तक 'आरोह भाग-1' के अध्याय 12, 'मियाँ नसीरुद्दीन' के लिए विस्तृत समाधान प्रस्तुत करता है। यह पाठ लेखिका कृष्णा सोबती द्वारा रचित एक संस्मरण है, जिसमें उन्होंने दिल्ली के मटियामहल के एक खानदानी नानबाई (रोटी बनाने वाले) मियाँ नसीरुद्दीन के चरित्र, उनके पेशे के प्रति समर्पण और उनकी बातचीत का सजीव चित्रण किया है। समाधान में मियाँ नसीरुद्दीन के शाही अंदाज, छप्पन तरह की रोटियाँ बनाने की कला, उनके खानदानी गौरव और 'सीखने की प्रक्रिया' पर उनके विचारों को स्पष्ट किया गया है। यह छात्रों को पाठ की गहरी समझ विकसित करने और परीक्षा की तैयारी में मदद करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 11
Subjectहिंदी
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter12. मियाँ नसीरूद्दीन

Chapter summary

कक्षा 11 हिंदी के अध्याय 'मियाँ नसीरुद्दीन' के ये NCERT समाधान, कृष्णा सोबती द्वारा रचित एक संस्मरण पर केंद्रित हैं। यह समाधान मियाँ नसीरुद्दीन नामक एक अनुभवी नानबाई के चरित्र-चित्रण को उजागर करता है, जो अपने खानदानी पेशे को कला का दर्जा देते हैं। इसमें छप्पन प्रकार की रोटियाँ बनाने की उनकी महारत, उनके शाही अंदाज और 'करके सीखने' के सिद्धांत पर जोर दिया गया है। समाधान पाठ के मुख्य बिंदुओं और मियाँ नसीरुद्दीन के व्यक्तित्व की बारीकियों को समझने में सहायता करते हैं।

Learning outcomes

  • मियाँ नसीरुद्दीन के चरित्र और व्यक्तित्व को समझना।
  • खानदानी नानबाई की कला और उसके प्रति मियाँ नसीरुद्दीन के समर्पण को जानना।
  • कृष्णा सोबती की लेखन शैली और संस्मरण विधा से परिचित होना।
  • पाठ में प्रयुक्त भाषा और मुहावरों के अर्थ को समझना।
  • किसी भी पेशे को कला का दर्जा देने की भावना को आत्मसात करना।

Topics covered

Paper topics

  • मियाँ नसीरुद्दीन का चरित्र-चित्रण
  • खानदानी नानबाई की कला
  • कृष्णा सोबती का संस्मरण 'हम-हशमत'
  • दिल्ली का मटियामहल
  • छप्पन प्रकार की रोटियाँ
  • पेशे को कला का दर्जा देना
  • सीखने की प्रक्रिया (करके सीखना)
  • खानदानी गौरव
  • लेखिका और मियाँ नसीरुद्दीन के मध्य संवाद
  • व्यंग्य (अखबारों पर)

Important topics

  • मियाँ नसीरुद्दीन का चरित्र और उनका शाही अंदाज
  • नानबाई की कला और खानदानी महारत
  • 'करके सीखने' का सिद्धांत
  • लेखिका कृष्णा सोबती का परिचय
  • संवादों का महत्व

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Questions and Solutions

लेखिका परिचय

**कृष्णा सोबती का जीवन परिचय और साहित्यिक परिचय विस्तार से लिखिए।**

जीवन परिचय: कृष्णा सोबती का जन्म सन 1925 में अविभाजित भारत के गुजरात नामक स्थान पर हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा लाहौर, शिमला और दिल्ली जैसे शहरों में प्राप्त की। अपने साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान, हिंदी अकादमी का शलाका सम्मान और साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता सहित कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

रचनाएँ: कृष्णा सोबती ने हिंदी साहित्य में उपन्यास, लंबी कहानियाँ और संस्मरण जैसी विभिन्न विधाओं में अपनी लेखनी चलाई है। उनके प्रमुख उपन्यास 'जिंदगीनामा', 'दिलोदानिश', 'ऐ लड़की', और 'समय सरगम' हैं। उनके कहानी-संग्रह में 'डार से बिछुड़ी', 'मित्रो मरजानी', 'बादलों के घेरे', और 'सूरजमुखी औधेरे के' शामिल हैं। 'हम-हशमत' और 'शब्दों के आलोक में' उनके शब्दचित्र और संस्मरण हैं।

साहित्यिक परिचय: कृष्णा सोबती हिंदी कथा साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान रखती हैं। वे कम लिखने पर विश्वास करती हैं, लेकिन जो लिखती हैं वह विशिष्ट होता है। उनके संयमित लेखन और स्पष्ट रचनात्मकता ने एक स्थायी पाठक वर्ग तैयार किया है। उन्होंने हिंदी साहित्य को 'मित्रो', 'शाहनी', 'हशमत' जैसे यादगार चरित्र दिए हैं। भारत-पाकिस्तान विभाजन पर कालजयी रचनाएँ लिखने वाले लेखकों में उनका नाम प्रमुख है। 'जिंदगीनामा' उनकी एक विशिष्ट उपलब्धि मानी जाती है। 'हम-हशमत' में उन्होंने 'हशमत' नामक एक काल्पनिक चरित्र का सृजन कर अनूठा प्रयोग किया है। उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठ तत्समता, उर्दू का प्रभाव और पंजाबी की जिंदादिली का अद्भुत मिश्रण मिलता है, जिसने हिंदी कथा-भाषा को नई ताजगी दी है।

पाठ का सारांश

**'मियाँ नसीरुद्दीन' पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।**

यह पाठ 'हम-हशमत' नामक संस्मरण संग्रह से लिया गया है, जिसमें लेखिका कृष्णा सोबती ने दिल्ली के मटियामहल के एक खानदानी नानबाई (रोटी बनाने वाले) मियाँ नसीरुद्दीन के व्यक्तित्व का सजीव चित्रण किया है। मियाँ नसीरुद्दीन अपने शाही अंदाज में रोटी पकाने की अपनी कला और खानदानी महारत का वर्णन करते हैं। वे ऐसे व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अपने पेशे को एक कला मानते हैं और 'करके सीखने' को ही असली हुनर समझते हैं।

लेखिका एक दिन मटियामहल की तरफ़ घूमते हुए एक अँधेरी और साधारण सी दुकान पर पहुँचती हैं, जहाँ आटे का ढेर सनता देखकर उनकी जिज्ञासा जागृत होती है। पूछताछ करने पर पता चलता है कि यह दुकान छप्पन किस्म की रोटियाँ बनाने के लिए मशहूर खानदानी नानबाई मियाँ नसीरुद्दीन की है। मियाँ साहब चारपाई पर बैठे बीड़ी पी रहे थे, उनके चेहरे पर अनुभव की परिपक्वता, आँखों में चुस्ती और माथे पर एक कारीगर के तेवर स्पष्ट झलक रहे थे।

जब लेखिका ने उनसे सवाल पूछना शुरू किया, तो उन्होंने अखबारों पर व्यंग्य करते हुए कहा कि अखबार बनाने और पढ़ने वाले दोनों ही निठल्ले (बेकार) हैं। लेखिका के यह पूछने पर कि उन्होंने इतनी तरह की रोटियाँ बनाना कहाँ से सीखा, उन्होंने बेपरवाही से जवाब दिया कि यह उनका खानदानी पेशा है। उन्होंने बताया कि उनके पिता मियाँ बरकत शाही नानबाई थे और उनके दादा मियाँ कल्लन आला नानबाई थे। उन्होंने अपने खानदानी गौरव का अहसास कराते हुए कहा कि उन्होंने यह कला अपने पिता से सीखी है।

मियाँ नसीरुद्दीन ने इस बात पर जोर दिया कि उन्होंने यह सब मेहनत से सीखा है। उन्होंने सीखने की प्रक्रिया की तुलना बच्चों की शिक्षा से करते हुए कहा कि जैसे बच्चा पहले 'अलिफ' से शुरू होकर धीरे-धीरे ऊँची जमात में पहुँचता है, वैसे ही उन्होंने भी छोटे-छोटे काम जैसे बर्तन धोना, भट्ठी बनाना और उसे आँच देना आदि करके यह हुनर हासिल किया है। उनका मानना था कि 'तालीम की तालीम' (सीखने की प्रक्रिया) भी बहुत महत्वपूर्ण होती है।

अपने खानदान के नाम पर उन्हें गर्व था। उन्होंने एक किस्सा सुनाया कि कैसे एक बादशाह ने उनके बुजुर्गों से ऐसी चीज बनाने को कहा जो आग या पानी से न पके, और उन्होंने वह बना दी, जो बादशाह को बहुत पसंद आई। वे अपनी खानदानी शान का बखान करते हुए कहते हैं कि एक खानदानी नानबाई कुएँ में भी रोटी पका सकता है। जब लेखिका ने इस कहावत की सच्चाई पर सवाल उठाया, तो वे थोड़े नाराज़ हो गए। लेखिका ने जब उनके बुजुर्गों के बादशाह के बारे में पूछा, तो मियाँ नसीरुद्दीन का स्वर बदल गया और वे स्वयं भी उस बादशाह का नाम ठीक से नहीं जानते थे, वे इधर-उधर की बातें करने लगे।

Common mistakes

  • मियाँ नसीरुद्दीन के शाही अंदाज को केवल घमंड समझना।
  • अखबारों पर उनकी टिप्पणी के पीछे के व्यंग्य को न समझ पाना।
  • 'करके सीखने' के महत्व को कम आंकना।
  • पाठ के ऐतिहासिक संदर्भों को नजरअंदाज करना।

Revision tips

  • मियाँ नसीरुद्दीन के संवादों पर विशेष ध्यान दें, वे उनके चरित्र को दर्शाते हैं।
  • लेखिका कृष्णा सोबती के जीवन और लेखन परिचय को समझें।
  • पाठ में आए विभिन्न प्रकार की रोटियों के नामों को याद करें।
  • 'सीखने की प्रक्रिया' पर मियाँ नसीरुद्दीन के विचारों को रेखांकित करें।

Practice MCQs

Q1. मियाँ नसीरुद्दीन किस मोहल्ले की दुकान पर मिलते हैं?

Q2. मियाँ नसीरुद्दीन को किस कला में महारत हासिल थी?

Q3. मियाँ नसीरुद्दीन अखबारों के बारे में क्या सोचते थे?

Q4. मियाँ नसीरुद्दीन ने रोटी पकाने की कला किससे सीखी?

Q5. मियाँ नसीरुद्दीन के दादा का क्या नाम था?

Frequently asked questions

यह NCERT समाधान किस कक्षा और विषय के लिए है?

यह NCERT समाधान कक्षा 11 के हिंदी विषय के लिए है, जो 'आरोह भाग-1' पाठ्यपुस्तक के अध्याय 12 'मियाँ नसीरुद्दीन' पर आधारित है।

'मियाँ नसीरुद्दीन' पाठ का मुख्य विषय क्या है?

इस पाठ का मुख्य विषय दिल्ली के एक खानदानी नानबाई (रोटी बनाने वाले) मियाँ नसीरुद्दीन का चरित्र-चित्रण है, जिसमें उनकी कला, उनके पेशे के प्रति समर्पण और उनके शाही अंदाज को दर्शाया गया है।

लेखिका कृष्णा सोबती ने मियाँ नसीरुद्दीन के बारे में क्या बताया है?

लेखिका कृष्णा सोबती ने मियाँ नसीरुद्दीन को एक अनुभवी और खानदानी नानबाई के रूप में प्रस्तुत किया है, जो छप्पन तरह की रोटियाँ बनाने में माहिर हैं और अपने पेशे को कला का दर्जा देते हैं।

मियाँ नसीरुद्दीन 'करके सीखने' के बारे में क्या कहते हैं?

मियाँ नसीरुद्दीन का मानना है कि किसी भी हुनर को छोटे-छोटे काम करके ही सीखा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे बच्चे धीरे-धीरे पढ़ाई में आगे बढ़ते हैं। उन्होंने बर्तन धोने और भट्ठी बनाने जैसे कामों का उदाहरण दिया।

क्या यह समाधान परीक्षा की तैयारी में सहायक है?

हाँ, यह समाधान पाठ की गहरी समझ विकसित करने, मुख्य बिंदुओं को समझने और अभ्यास प्रश्नों के उत्तर जानने में मदद करता है, जो परीक्षा की तैयारी के लिए अत्यंत उपयोगी है।

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