CBSE Class 10 Hindi Kshitij Chapter 15: स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन - NCERT Solutions
This chapter delves into Mahavir Prasad Dwivedi's powerful essay, 'Critique of Anti-Women Education Arguments' (स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन), from the CBSE Class 10 Hindi Kshitij textbook. The solutions meticulously address the arguments presented by Dwivedi against the prevailing societal opposition to women's education during his time. It examines the historical context, the fallacious reasoning of the opponents, and Dwivedi's logical refutations supported by historical and literary examples. The solutions also explore the use of satire and the broader implications of traditional versus modern education systems. This resource is designed to help students understand Dwivedi's progressive views, analyze his writing style, and prepare effectively for their exams by clarifying complex arguments and providing structured answers.
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 10 |
| Subject | क्षितिज-2 |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 15. महवीर प्रसाद द्विवेदी - स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन |
Chapter summary
NCERT Solutions for Class 10 Hindi Kshitij Chapter 15, 'Critique of Anti-Women Education Arguments' by Mahavir Prasad Dwivedi, focuses on analyzing Dwivedi's arguments against the opposition to women's education. It covers the historical context of such opposition, Dwivedi's counter-arguments using logic and satire, and his emphasis on the importance of women's education for societal progress. The solutions also touch upon the evolution of education systems and the need to embrace progressive traditions.
Learning outcomes
- Understand the historical opposition to women's education in India.
- Analyze Mahavir Prasad Dwivedi's arguments and use of satire to counter regressive views.
- Identify examples from ancient texts and history that support women's education.
- Compare and contrast past and present education systems.
- Evaluate the importance of tradition in relation to gender equality.
- Articulate the significance of progressive thinking in social reform.
Topics covered
Paper topics
- Mahavir Prasad Dwivedi
- Women's Education
- Critique of Traditional Arguments
- Satire in Literature
- Historical Context of Education
- Gender Equality
- Evolution of Education Systems
- Role of Tradition
- Progressive Thinking
- Analysis of Hindi Literature
Important topics
- Dwivedi's arguments against anti-women education
- Use of satire and logic
- Historical examples supporting women's education
- Comparison of past and present education systems
- Tradition vs. Gender Equality
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने स्त्री-शिक्षा के विरोधियों के तर्कों का खंडन करते हुए स्त्री-शिक्षा का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने निम्नलिखित तर्कों के आधार पर अपने विचार प्रस्तुत किए:
- ऐतिहासिक प्रमाण: द्विवेदी जी ने बताया कि प्राचीन काल में स्त्रियाँ शिक्षा ग्रहण करती थीं। उन्होंने सीता, शकुंतला, रुक्मिणी जैसी विदुषी स्त्रियों का उदाहरण दिया, जिनके प्रमाण वेद और पुराणों में भी मिलते हैं।
- प्राचीन भारतीय नारियों की क्षमता: उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत में ऐसी नारियाँ हुई हैं जिन्होंने वेद मन्त्रों की रचना की, उनकी व्याख्या की और शास्त्रार्थ भी किया। अतः प्राचीन काल की स्त्रियों को शिक्षा से वंचित नहीं कहा जा सकता।
- रुक्मिणी का उदाहरण: रुक्मिणी द्वारा श्रीकृष्ण को लिखा गया पत्र स्त्रियों के सुशिक्षित होने का एक स्पष्ट प्रमाण है।
- विदुषी स्त्रियों का उल्लेख: द्विवेदी जी ने अत्रि-पत्नी का उदाहरण दिया जो पत्नी-धर्म पर घंटों व्याख्यान देती थीं। गार्गी जैसी विदुषी ने बड़े-बड़े ब्रह्मवादियों को शास्त्रार्थ में पराजित किया था। इसी प्रकार, मंडन मिश्र की पत्नी ने शंकराचार्य को भी शास्त्रार्थ में चुनौती दी थी। ये सभी उदाहरण स्त्री शिक्षा के महत्व को दर्शाते हैं।
प्रश्न 2
द्विवेदी जी ने 'स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं' इस कुतर्क का खंडन कई तर्कों से किया है:
- पुरुषों पर भी लागू: यदि स्त्रियों द्वारा किए गए अनर्थ को उनकी शिक्षा का परिणाम माना जाए, तो पुरुषों द्वारा किए गए अनर्थों को उनकी शिक्षा का परिणाम क्यों न माना जाए? इस तर्क के अनुसार तो पुरुषों के विद्यालय भी बंद कर देने चाहिए।
- स्वाभाविकता का परिणाम: उन्होंने स्पष्ट किया कि शकुंतला द्वारा दुष्यंत को कहे गए अपशब्द या सीता का अपने परित्याग पर क्रोधित होना, उनकी शिक्षा का परिणाम न होकर उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रियाएँ थीं। इसे शिक्षा से जोड़ना गलत है।
- व्यंग्यात्मक तर्क: द्विवेदी जी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि कुछ लोग स्त्रियों के पढ़ने को 'कालकूट' और पुरुषों के पढ़ने को 'पीयूष का घूँट' मानते हैं। ऐसी अतार्किक दलीलों के आधार पर स्त्रियों को अपढ़ रखकर भारत का गौरव बढ़ाना अनुचित है।
प्रश्न 3
महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने स्त्री-शिक्षा के विरोध में दिए जाने वाले कुतर्कों का खंडन करने के लिए व्यंग्य का प्रभावी ढंग से प्रयोग किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत कुछ व्यंग्यात्मक अंश इस प्रकार हैं:
- कालकूट और पीयूष: द्विवेदी जी व्यंग्य करते हैं, "स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरुषों के लिए पीयूष का घूँट!" वे इस तर्क पर कटाक्ष करते हैं कि ऐसी ही दलीलों के आधार पर कुछ लोग स्त्रियों को अनपढ़ रखकर देश का गौरव बढ़ाना चाहते हैं, जो कि हास्यास्पद है।
- अनर्थ का परिणाम: वे कहते हैं, "स्त्रियों का किया हुआ अनर्थ यदि पढ़ाने ही का परिणाम है तो पुरुषों का किया हुआ अनर्थ भी उनकी विद्या और शिक्षा का ही परिणाम समझना चाहिए।" यह तर्क विरोधियों की दोहरी नीति पर प्रहार करता है।
- शकुंतला का कथन: शकुंतला द्वारा दुष्यंत से कहा गया व्यंग्यात्मक कथन, "आर्य पुत्र, शाबाश! बड़ा अच्छा काम किया जो मेरे साथ गंधर्व-विवाह करके मुकर गए। नीति, न्याय, सदाचार और धर्म की आप प्रत्यक्ष मूर्ति हैं!" को भी द्विवेदी जी ने उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया है, यह दर्शाने के लिए कि ऐसी बातें व्यक्तिगत स्वभाव का हिस्सा हो सकती हैं, न कि शिक्षा का दुष्परिणाम।
- पंडितों की विद्वत्ता पर व्यंग्य: द्विवेदी जी उन पंडितों पर भी व्यंग्य करते हैं जिन्होंने प्राकृत भाषा में महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। वे पूछते हैं कि यदि गाथा-सप्तशती जैसे ग्रंथ लिखने वाले अपढ़ थे, तो आज के अख़बार के संपादक भी अपढ़ माने जाएँगे क्योंकि वे प्रचलित भाषा में लिखते हैं। यह तर्क प्राचीन भाषा के प्रयोग को शिक्षा से जोड़ने की भूल को उजागर करता है।
प्रश्न 4
पाठ के आधार पर, पुराने समय की स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना उनके अपढ़ होने का बिल्कुल भी सबूत नहीं है। इसके निम्नलिखित कारण हैं:
- प्राकृत उस समय की आम भाषा थी: उस काल में प्राकृत भाषा जनसाधारण की बोलचाल की भाषा थी। सुशिक्षित और विद्वान लोग भी इसी भाषा का प्रयोग करते थे।
- साहित्य की भाषा: साहित्य की रचना भी प्रायः उसी भाषा में होती थी जो उस समय प्रचलित होती थी। जिस प्रकार आज हिंदी आम बोलचाल और साहित्यिक भाषा है, उसी प्रकार उस समय प्राकृत थी।
- तुलनात्मक तर्क: द्विवेदी जी ने तर्क दिया कि यदि आज हिंदी बोलना और लिखना किसी को अपढ़ या अशिक्षित साबित नहीं करता, तो उस समय प्राकृत बोलना स्त्रियों को अनपढ़ कैसे ठहरा सकता है?
अतः, स्त्रियों का प्राकृत भाषा में बोलना उनकी शिक्षा या अशिक्षा का पैमाना नहीं था, बल्कि यह उस समय की भाषाई प्रवृत्ति का द्योतक था।
प्रश्न 5
यह कथन बिल्कुल सत्य है कि परंपरा के केवल उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ावा देते हों। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं:
- बदलते सामाजिक मूल्य: समाज निरंतर परिवर्तनशील है। जो परंपराएँ प्राचीन काल में प्रासंगिक रही होंगी, वे आज के आधुनिक समाज के लिए अनुपयुक्त हो सकती हैं। हमें समय के साथ विकसित होना चाहिए।
- समानता का सिद्धांत: आधुनिक समाज समानता के सिद्धांत पर आधारित है। स्त्री और पुरुष दोनों समाज के अभिन्न अंग हैं और उन्हें समान अवसर और सम्मान मिलना चाहिए। जो परंपराएँ लैंगिक असमानता को बढ़ावा देती हैं, वे त्याज्य हैं।
- समाज की उन्नति: समाज की वास्तविक उन्नति तभी संभव है जब स्त्री और पुरुष मिलकर कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करें। यदि परंपराएँ स्त्रियों को कमतर आंकती हैं या उन्हें पीछे रखती हैं, तो यह समाज की प्रगति में बाधक है।
- परिवर्तन आवश्यक: हमें परंपराओं का आँख बंद करके अनुसरण करने के बजाय, उनका मूल्यांकन करना चाहिए। जो परंपराएँ प्रगतिशील हैं और समानता को बढ़ाती हैं, उन्हें अपनाना चाहिए, और जो रूढ़िवादी और असमानता फैलाने वाली हैं, उन्हें छोड़ देना चाहिए।
इस प्रकार, स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ाने वाली परंपराओं को अपनाना और असमानता फैलाने वाली परंपराओं को त्यागना एक स्वस्थ और प्रगतिशील समाज के निर्माण के लिए अनिवार्य है।
प्रश्न 6
महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध के आधार पर, तब की शिक्षा प्रणाली और अब की शिक्षा प्रणाली में निम्नलिखित महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट होते हैं:
- शिक्षा का अधिकार: पहले की शिक्षा प्रणाली में स्त्रियों और समाज के निम्न वर्गों को शिक्षा से वंचित रखा जाता था। इसके विपरीत, आज की शिक्षा प्रणाली में सभी जाति, वर्ग, लिंग के लोगों को शिक्षा प्राप्त करने का समान अधिकार है।
- शिक्षा का स्वरूप: पहले शिक्षा मुख्य रूप से गुरुकुलों में प्राप्त होती थी, जहाँ विद्यार्थियों को गुरु के साथ रहना पड़ता था। आज शिक्षा के लिए विद्यालय, महाविद्यालय और अन्य संस्थाएँ हैं, और शिक्षा अधिक सुलभ हो गई है।
- पाठ्यक्रम का बल: पहले जीवन-मूल्यों और नैतिक शिक्षा पर अधिक बल दिया जाता था। आज की शिक्षा प्रणाली व्यावसायिक और व्यावहारिक ज्ञान पर अधिक केंद्रित है, ताकि विद्यार्थी रोजगार प्राप्त कर सकें।
- गुरु-शिष्य परंपरा: पहले गुरु-शिष्य का संबंध अत्यंत घनिष्ठ होता था और गुरु-परंपरा का विशेष महत्व था। आज यह परंपरा काफी हद तक क्षीण हो गई है।
- स्त्री-पुरुष समानता: पहले स्त्रियों की शिक्षा को लेकर अनेक बाधाएँ थीं, जबकि आज शिक्षा में स्त्री-पुरुष के बीच कोई भेद नहीं किया जाता है।
संक्षेप में, शिक्षा प्रणाली आज अधिक व्यापक, सुलभ और व्यावहारिक हो गई है, जबकि पहले यह सीमित, विशिष्ट और अधिक नैतिक मूल्यों पर आधारित थी।
प्रश्न 7
महावीर प्रसाद द्विवेदी का निबंध 'स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन' वास्तव में उनकी दूरगामी और खुली सोच का एक उत्कृष्ट प्रमाण है। यह निम्नलिखित कारणों से स्पष्ट होता है:
- प्रगतिशील विचार: जिस समय समाज में स्त्री शिक्षा को लेकर घोर अंधविश्वास और विरोध था, द्विवेदी जी ने न केवल स्त्री शिक्षा के महत्व को समझा बल्कि उसे समाज के सामने पुरजोर तरीके से रखा। यह उस समय के लिए एक अत्यंत प्रगतिशील विचार था।
- तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण: उन्होंने स्त्री-शिक्षा के विरोध में दिए जाने वाले अतार्किक और अवैज्ञानिक तर्कों का खंडन ऐतिहासिक प्रमाणों, तर्कों और व्यंग्य के माध्यम से किया। उन्होंने भावनाओं के बजाय विवेक और तर्क को महत्व दिया।
- सामाजिक सुधार की पहल: द्विवेदी जी ने केवल समस्या को उठाया ही नहीं, बल्कि उसका समाधान भी प्रस्तुत किया। उन्होंने समाज को रूढ़ियों से बाहर निकलकर स्त्रियों को शिक्षित करने के लिए प्रेरित किया, जो सामाजिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
- समानता का समर्थन: उनका निबंध स्त्री-पुरुष समानता के पक्ष में एक मजबूत आवाज था। उन्होंने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि शिक्षा किसी एक लिंग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए और स्त्रियों को भी पुरुषों के समान अधिकार मिलने चाहिए।
- भविष्योन्मुखी सोच: द्विवेदी जी ने यह समझा कि एक राष्ट्र की प्रगति के लिए स्त्रियों का शिक्षित होना कितना आवश्यक है। उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा को केवल व्यक्तिगत मामला न मानकर, राष्ट्रीय उन्नति का एक अनिवार्य अंग माना।
इस प्रकार, द्विवेदी जी का यह निबंध उनकी तत्कालीन समाज की संकीर्ण सोच से परे, एक आधुनिक, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील दृष्टिकोण को दर्शाता है।
Common mistakes
- Confusing historical context with present-day realities.
- Misinterpreting satire and its purpose.
- Failing to connect historical examples to Dwivedi's arguments.
- Overlooking the nuanced approach to tradition and reform.
Revision tips
- Focus on Dwivedi's main arguments and the evidence he uses.
- Pay attention to the examples of learned women from ancient India.
- Understand how Dwivedi uses satire to expose the flaws in the opposition's logic.
- Compare the 'then' and 'now' aspects of education systems discussed.
- Practice writing answers that reflect Dwivedi's progressive viewpoint.
Practice MCQs
Q1. प्राचीन काल में किन स्त्रियों के उदाहरण स्त्री-शिक्षा का समर्थन करते हैं?
Explanation: पाठ के अनुसार, प्राचीन काल में सीता, शकुंतला, रुक्मिणी जैसी कई महिलाएँ शिक्षा ग्रहण करती थीं, जिनके उदाहरण स्त्री-शिक्षा का समर्थन करते हैं।
Q2. स्त्री-शिक्षा विरोधी कुतर्कवादी 'अनर्थ' का क्या कारण मानते थे?
Explanation: कुतर्कवादी मानते थे कि स्त्रियों के पढ़ने से अनर्थ होते हैं, जिसका खंडन द्विवेदी जी ने तर्कसंगत ढंग से किया है।
Q3. द्विवेदी जी ने व्यंग्य का प्रयोग किसलिए किया?
Explanation: द्विवेदी जी ने स्त्री-शिक्षा विरोधी कुतर्कों की खामियों और अतार्किकता को उजागर करने के लिए व्यंग्य का प्रभावी ढंग से प्रयोग किया है।
Q4. प्राकृत भाषा का प्रयोग स्त्रियों के लिए किसका प्रमाण माना जाता था?
Explanation: कुछ लोग पुराने समय में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा का प्रयोग उनके अपढ़ होने का सबूत मानते थे, जिसका खंडन पाठ में किया गया है।
Q5. परंपरा के किन पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए?
Explanation: पाठ के अनुसार, परंपरा के केवल उन्हीं पक्षों को अपनाया जाना चाहिए जो स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ावा देते हैं और समाज की उन्नति में सहायक हों।
Frequently asked questions
स्त्री-शिक्षा के विरोध में पुरातन पंथी लोग क्या तर्क देते थे?
पुरातन पंथी लोग मानते थे कि स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं और वे पूजनीय पुरुषों का मुकाबला करने लगती हैं। वे प्राचीन उदाहरणों को तोड़-मरोड़ कर या गलत तरीके से प्रस्तुत करते थे।
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने स्त्री-शिक्षा का समर्थन किन तर्कों से किया?
द्विवेदी जी ने प्राचीन काल की सुशिक्षित स्त्रियों (जैसे सीता, गार्गी) के उदाहरण दिए, वेदों और पुराणों से प्रमाण प्रस्तुत किए, और व्यंग्य का प्रयोग करके विरोधियों के तर्कों की निरर्थकता सिद्ध की।
क्या द्विवेदी जी ने केवल तर्कों से ही अपनी बात कही?
नहीं, द्विवेदी जी ने अपने तर्कों को पुष्ट करने के लिए व्यंग्य का भी भरपूर प्रयोग किया। उन्होंने विरोधियों की दलीलों पर कटाक्ष करके उनकी अतार्किकता को उजागर किया।
पाठ के अनुसार, प्राकृत भाषा का प्रयोग स्त्रियों के लिए क्या दर्शाता था?
पाठ के अनुसार, उस समय प्राकृत आम बोलचाल की भाषा थी। स्त्रियों द्वारा प्राकृत का प्रयोग उनके अपढ़ होने का नहीं, बल्कि उस समय की सामान्य भाषा के प्रयोग का प्रमाण था।
हमें परंपरा के बारे में द्विवेदी जी के विचारों से क्या सीखना चाहिए?
हमें यह सीखना चाहिए कि परंपरा की हर बात आँख बंद करके नहीं मान लेनी चाहिए। हमें केवल उन्हीं परंपराओं को अपनाना चाहिए जो स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ाती हों और समाज की उन्नति में सहायक हों।
यह निबंध द्विवेदी जी की किस सोच को दर्शाता है?
यह निबंध द्विवेदी जी की दूरगामी, प्रगतिशील और खुली सोच को दर्शाता है, क्योंकि उन्होंने उस समय समाज में प्रचलित स्त्री-शिक्षा विरोधी विचारों का साहसपूर्वक खंडन किया और स्त्रियों के अधिकारों का समर्थन किया।
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