कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान: लड़के और लड़कियों के रूप में बड़ा होना - NCERT समाधान

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यह पृष्ठ कक्षा 7 के सामाजिक विज्ञान के अध्याय 4, "लड़के और लड़कियों के रूप में बड़ा होना" के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। यह अध्याय बच्चों के बड़े होने के अनुभवों में भिन्नताओं, सामाजिक भूमिकाओं के निर्माण और लिंग-आधारित अपेक्षाओं की पड़ताल करता है। समाधान सामोआ जैसे विभिन्न समाजों में पालन-पोषण के तरीकों की तुलना भारतीय संदर्भ से करते हैं, जिसमें बच्चों की जिम्मेदारियों और स्वतंत्रता पर प्रकाश डाला गया है। यह उन कारणों पर भी चर्चा करता है कि क्यों सार्वजनिक स्थानों पर देर शाम महिलाओं और लड़कियों की उपस्थिति कम होती है, और घर के कामों में पुरुषों और महिलाओं की भागीदारी पर सवाल उठाता है। ये समाधान छात्रों को लिंग रूढ़िवादिता को समझने और चुनौती देने में मदद करते हैं, जो परीक्षा की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण हैं।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 7
Subjectसामाजिक एवं राजनीतिक जीवन
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter4. लड़के और लड़कियों के रूप में बड़ा होना

Chapter summary

कक्षा 7 के सामाजिक विज्ञान के अध्याय 4, "लड़के और लड़कियों के रूप में बड़ा होना" के लिए NCERT समाधान, लिंग भूमिकाओं और सामाजिक अपेक्षाओं की पड़ताल करते हैं। यह अध्याय विभिन्न संस्कृतियों में बच्चों के पालन-पोषण के तरीकों की तुलना करता है, जिसमें सामोआ और भारत के उदाहरण शामिल हैं। समाधान बच्चों की जिम्मेदारियों, स्वतंत्रता के स्तर और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की उपस्थिति जैसे मुद्दों पर प्रकाश डालते हैं। यह घर के कामों में लैंगिक असमानता पर भी चर्चा करता है और छात्रों को इन सामाजिक मानदंडों पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

Learning outcomes

  • विभिन्न समाजों में लड़के और लड़कियों के बड़े होने के अनुभवों में अंतर को समझना।
  • सामाजिक भूमिकाओं और अपेक्षाओं को प्रभावित करने वाले कारकों का विश्लेषण करना।
  • सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की कम उपस्थिति के कारणों की पहचान करना।
  • घर के कामों में लैंगिक समानता के महत्व पर विचार करना।
  • लिंग रूढ़िवादिता और पूर्वाग्रहों को चुनौती देने के तरीकों को समझना।

Topics covered

Paper topics

  • लड़के और लड़कियों के बड़े होने के अनुभव
  • सामोआ में बच्चों का पालन-पोषण
  • भारत में बच्चों की जिम्मेदारियाँ
  • सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की उपस्थिति
  • लिंग-आधारित सामाजिक भूमिकाएँ
  • घर के काम और उनकी महत्ता
  • लिंग रूढ़िवादिता
  • सामाजिक अपेक्षाएँ
  • बच्चों की देखभाल
  • स्वतंत्रता और जिम्मेदारी

Important topics

  • लड़के और लड़कियों के बड़े होने के अनुभवों में अंतर
  • सामाजिक भूमिकाओं का निर्माण
  • सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा
  • घर के कामों में लैंगिक समानता
  • लिंग रूढ़िवादिता को समझना

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

आपके बड़े होने के अनुभव, सामोआ के बच्चों और किशोरों के अनुभव से किस प्रकार भिन्न हैं? इन अनुभवों में वर्णित क्या ऐसी कोई बात है, जिसे आप अपने बड़े होने के अनुभव में शामिल करना चाहेंगे? (एन॰सी॰ई॰आर॰टी॰ पाठ्यपुस्तक, पेज-45)
Solution: मेरे बड़े होने के अनुभव सामोआ के बच्चों और किशोरों के अनुभवों से काफी भिन्न हैं। जब हम छोटे थे, तो हमारी देखभाल मुख्य रूप से माता-पिता या बड़े परिवार के सदस्य करते थे, और यह सिलसिला किशोरावस्था के बाद तक चलता रहा। इसके विपरीत, सामोआ में, जैसे ही बच्चे चलना शुरू कर देते थे, उनकी देखभाल बड़े बच्चे (जो स्वयं भी छोटे होते थे) करने लगते थे। लड़के और लड़कियाँ दोनों अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल करते थे।

सामोआ में, लगभग नौ साल की उम्र के बाद लड़के बड़े लड़कों के समूह में शामिल होकर मछली पकड़ने और नारियल के पेड़ लगाने जैसे बाहरी काम सीखते थे। वहीं, लड़कियाँ तेरह-चौदह साल की उम्र तक छोटे बच्चों की देखभाल और घर के छोटे-मोटे काम करती थीं, लेकिन इस उम्र के बाद वे भी मछली पकड़ने, बागानों में काम करने और डलिया बुनने जैसे काम सीखती थीं और अधिक स्वतंत्र हो जाती थीं।

भारत में, बच्चे आमतौर पर लगभग 20 साल की उम्र के बाद ही कमाना शुरू करते हैं, हालाँकि कुछ मजबूरीवश इससे कम उम्र में भी काम करना शुरू कर देते हैं। सामोआ के बच्चों की तरह, मैं भी अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल में अधिक सक्रिय भूमिका निभाना चाहूँगा/चाहूँगी, और घर के कामों में अधिक जिम्मेदारी लेना चाहूँगा/चाहूँगी, जिससे परिवार के बड़े सदस्यों पर बोझ कम हो सके।

प्रश्न 2

क्या आप वे कारण बता सकते हैं जिनकी वजह से आपके पड़ोस में, सड़क पर, पार्कों और बाज़ारों में देर शाम या रात के समय स्त्रियाँ तथा लड़कियाँ कम दिखाई देती हैं? (एन॰सी॰ई॰आर॰टी॰ पाठ्यपुस्तक, पेज-46)
Solution: हमारे पड़ोस, सड़कों, पार्कों और बाज़ारों में देर शाम या रात के समय स्त्रियों और लड़कियों की कम उपस्थिति के कई सामाजिक और सांस्कृतिक कारण हैं:
  1. पारंपरिक भूमिकाएँ: हमारे देश में पारंपरिक रूप से यह माना जाता है कि पुरुष बाहरी काम करते हैं और महिलाएँ घर के काम संभालती हैं। इस कारण महिलाएँ घर से बाहर कम निकलती हैं।
  2. रोज़गार के अवसर: कार्यालयों, व्यवसायों और अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में काफी कम है, जिससे वे सार्वजनिक स्थानों पर कम दिखाई देती हैं।
  3. सुरक्षा की चिंता: महिलाएँ और लड़कियाँ अक्सर बाहर, विशेषकर देर शाम या रात में, खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। यह असुरक्षा की भावना उन्हें बाहर निकलने से रोकती है।
  4. सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिबंध: भारतीय संस्कृति में महिलाओं को अक्सर घर से बाहर देर तक रहने की स्वतंत्रता कम दी जाती है, जो उनकी सार्वजनिक उपस्थिति को सीमित करता है।

प्रश्न 3

क्या लड़के और लड़कियाँ अलग-अलग कामों में लगे हैं? क्या आप विचार करके इसका कारण बता सकते हैं? यदि आप लड़के और लड़कियों का स्थान परस्पर बदल देंगे, अर्थात लड़कियों के स्थान पर लड़कों और लड़कों के स्थान पर लड़कियों को रखेंगे तो क्या होगा? (एन०सी०ई०आर०टी० पाठ्यपुस्तक, पेज-46)
Solution: हाँ, भारत में अधिकांश लड़के और लड़कियाँ अलग-अलग कामों में लगे हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
  1. भारतीय संस्कृति और परंपरा: हमारी संस्कृति में लड़कियों को मुख्य रूप से घरेलू कामों की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जबकि लड़कों को बाहर के काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
  2. व्यवसाय का चुनाव: भारत में व्यवसाय, यातायात (जैसे ड्राइवर), सेना, पुलिस जैसे कई क्षेत्रों में लड़कों की बहुलता है। वहीं, शिक्षा, नर्सिंग और कुछ कार्यालयों में लड़कियों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन अभी भी कई काम ऐसे हैं जिन्हें पारंपरिक रूप से लड़कियों के लिए अनुपयुक्त माना जाता है।

यदि हम लड़कियों के स्थान पर लड़कों और लड़कों के स्थान पर लड़कियों को रखेंगे, तो कई तरह की दिक्कतें उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि कुछ काम पारंपरिक रूप से लड़कियों द्वारा बेहतर तरीके से किए जाते हैं, और कुछ काम लड़कों द्वारा। यदि यह व्यवस्था बदल दी जाए, तो समाज को नए सिरे से इन भूमिकाओं को अपनाना होगा। उदाहरण के लिए, यदि लड़कियाँ सेना या पुलिस में अधिक संख्या में जाएँ और लड़कियाँ घर के काम या नर्सिंग जैसे क्षेत्रों में, तो यह एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन होगा। इससे यह भी पता चलेगा कि कौन से काम वास्तव में लिंग-विशिष्ट हैं या केवल सामाजिक धारणाओं पर आधारित हैं।

प्रश्न 4

क्या हरमीत और सोनाली का यह कहना सही था कि हरमीत की माँ काम नहीं करती? (एन॰सी॰ई॰आर॰टी॰ पाठ्यपुस्तक, पेज-49)
Solution: हरमीत और सोनाली का यह कहना बिल्कुल सही नहीं था कि हरमीत की माँ काम नहीं करती। वे शायद यह सोच रहे थे कि 'काम' का मतलब केवल वह काम होता है जिसके लिए पैसे मिलते हैं और जो घर के बाहर किया जाता है। हरमीत की माँ घर का सारा काम करती थी, जैसे खाना बनाना, सफाई करना, कपड़े धोना, और परिवार की देखभाल करना। ये सभी कार्य बहुत महत्वपूर्ण और श्रमसाध्य होते हैं, भले ही उनके लिए कोई वेतन न मिलता हो। इसलिए, हरमीत की माँ निश्चित रूप से काम करती थी।

प्रश्न 5

आप क्या सोचते हैं, अगर आपकी माँ या वे लोग, जो घर के काम में लगे हैं, एक दिन के लिए हड़ताल पर चले जाएँ, तो क्या होगा? (एन॰सी॰ई॰आर॰टी॰ पाठ्यपुस्तक, पेज-49)
Solution: अगर मेरी माँ या घर के काम में लगे अन्य लोग एक दिन के लिए हड़ताल पर चले जाएँ, तो घर का सारा काम ठप्प हो जाएगा। इसका मतलब है कि खाना नहीं बनेगा, कपड़े नहीं धुलेंगे, घर की सफाई नहीं होगी, और बच्चों की देखभाल भी प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में, घर के अन्य सदस्यों, जैसे पिता या बड़े भाई-बहनों को ये सारे काम खुद करने पड़ेंगे। चूँकि वे इन कामों के आदी नहीं हैं या उन्हें इन कामों को करने का अनुभव नहीं है, तो यह बहुत मुश्किल हो जाएगा। शायद हमें बाहर से खाना मंगवाना पड़े या घर अस्त-व्यस्त हो जाए। यह स्थिति घर के कामों के महत्व को दर्शाती है, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।

प्रश्न 6

आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि सामान्यतया पुरुष या लड़के घर का काम नहीं करते? आपके विचार में क्या उन्हें घर का काम करना चाहिए? (एन॰सी॰ई॰आर॰टी॰ पाठ्यपुस्तक, पेज-49)
Solution: हम ऐसा इसलिए सोचते हैं कि सामान्यतया पुरुष या लड़के घर का काम नहीं करते, क्योंकि अधिकांश घरों में यह काम लड़कियों या महिलाओं द्वारा ही किया जाता है। यह एक सामाजिक धारणा बन गई है कि घर के काम महिलाओं की जिम्मेदारी हैं, जबकि पुरुषों के काम बाहर के होते हैं।

मेरे विचार में, पुरुषों और लड़कों को भी घर का काम करना चाहिए। घर का काम केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि पूरे परिवार का काम होता है। जब महिलाएँ बीमार पड़ जाती हैं, बाहर चली जाती हैं, या जब घर में कोई विशेष अवसर होता है जैसे पर्व-त्योहार या मेहमानों का आना, तब पुरुषों और लड़कों को भी घर के कामों में हाथ बँटाना चाहिए। यह न केवल काम को बाँटने में मदद करता है, बल्कि परिवार के सदस्यों के बीच आपसी सहयोग और सम्मान को भी बढ़ाता है। यह लैंगिक समानता को बढ़ावा देता है और यह दर्शाता है कि घर के सभी सदस्य परिवार के प्रति समान रूप से जिम्मेदार हैं।

Common mistakes

  • घर के कामों को केवल महिलाओं की जिम्मेदारी मानना।
  • सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को नज़रअंदाज़ करना।
  • लिंग-आधारित भूमिकाओं को स्वाभाविक या अपरिवर्तनीय मानना।
  • बच्चों की देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियों के महत्व को कम आंकना।

Revision tips

  • सामोआ और भारत के अनुभवों की तुलना करते हुए मुख्य अंतरों को नोट करें।
  • घर के कामों और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी से संबंधित कारणों की सूची बनाएं।
  • लिंग भूमिकाओं पर समाज के प्रभाव के बारे में अपने विचारों को स्पष्ट करें।
  • घर के कामों में पुरुषों की भागीदारी के महत्व पर चर्चा करें।

Practice MCQs

Q1. सामोआ में, लगभग 5 साल की उम्र के बच्चे अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल कब शुरू करते हैं?

Q2. भारत में, लड़कियाँ आमतौर पर लगभग कितने वर्ष की होने तक छोटे बच्चों की देखभाल और घर के काम करती हैं?

Q3. देर शाम या रात के समय सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं और लड़कियों की उपस्थिति कम होने का एक मुख्य कारण क्या है?

Q4. भारतीय संस्कृति में, कुछ कामों को विशेष रूप से किसके लिए अनुपयुक्त माना जाता है, जिससे वे मुख्य रूप से पुरुषों द्वारा किए जाते हैं?

Q5. यदि घर के काम करने वाले एक दिन के लिए हड़ताल पर चले जाएं, तो क्या होने की संभावना है?

Frequently asked questions

कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान के अध्याय 4 का मुख्य विषय क्या है?

अध्याय 4, "लड़के और लड़कियों के रूप में बड़ा होना", मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि कैसे समाज लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग भूमिकाएँ और अपेक्षाएँ निर्धारित करता है, और यह उनके बड़े होने के अनुभवों को कैसे प्रभावित करता है।

यह समाधान छात्रों को लिंग भूमिकाओं को समझने में कैसे मदद करते हैं?

समाधान विभिन्न समाजों (जैसे सामोआ और भारत) में बच्चों के पालन-पोषण के तरीकों की तुलना करके, और घर के कामों व सार्वजनिक जीवन में पुरुषों और महिलाओं की भागीदारी पर चर्चा करके छात्रों को लिंग भूमिकाओं और अपेक्षाओं के सामाजिक निर्माण को समझने में मदद करते हैं।

क्या इन समाधानों में घर के कामों के महत्व पर प्रकाश डाला गया है?

हाँ, समाधान इस बात पर जोर देते हैं कि घर के काम, भले ही वे भुगतान वाले न हों, अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और यदि घर के काम करने वाले एक दिन के लिए रुक जाएं तो इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इस पर भी चर्चा की गई है।

सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की कम उपस्थिति के बारे में समाधान क्या बताते हैं?

समाधान बताते हैं कि महिलाएं और लड़कियां अक्सर बाहर खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं, और भारतीय संस्कृति भी उन्हें देर तक बाहर रहने की कम स्वतंत्रता देती है, जिसके कारण वे देर शाम या रात में सार्वजनिक स्थानों पर कम दिखाई देती हैं।

क्या इन समाधानों का उपयोग परीक्षा की तैयारी के लिए किया जा सकता है?

हाँ, ये समाधान अध्याय की मुख्य अवधारणाओं को स्पष्ट करते हैं और छात्रों को लिंग भूमिकाओं, सामाजिक अपेक्षाओं और समानता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन समझ विकसित करने में मदद करते हैं, जो परीक्षा के लिए उपयोगी है।

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