कक्षा 12 अर्थशास्त्र के लिए NCERT समाधान: अध्याय 6 - भुगतान संतुलन

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यह खंड कक्षा 12 अर्थशास्त्र के लिए NCERT समाधान प्रस्तुत करता है, जो अध्याय 6: खुली अर्थव्यवस्था - भुगतान संतुलन पर केंद्रित है। इसमें संतुलित व्यापार शेष और चालू खाता संतुलन के बीच अंतर, आधिकारिक आरक्षित निधि लेनदेन का महत्व, मौद्रिक और वास्तविक विनिमय दरों के बीच अंतर, और नम्य विनिमय दर प्रणाली के तहत विनिमय दर निर्धारण जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है। समाधानों में अवमूल्यन और मूल्यह्रास के बीच अंतर और स्वर्णमान के तहत स्वचालित समायोजन तंत्र की व्याख्या भी शामिल है। ये विस्तृत स्पष्टीकरण छात्रों को भुगतान संतुलन की जटिलताओं को समझने और परीक्षा के लिए प्रभावी ढंग से तैयारी करने में मदद करते हैं।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
Subjectसमष्टि अर्थशास्त्र एक परिचय
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter6. खुली अर्थव्यवस्था - भुगतान संतुलन

Chapter summary

अध्याय 6, 'खुली अर्थव्यवस्था - भुगतान संतुलन', के ये NCERT समाधान छात्रों को भुगतान संतुलन की अवधारणाओं की गहन समझ प्रदान करते हैं। इसमें व्यापार शेष, चालू खाता, आधिकारिक आरक्षित निधि, मौद्रिक और वास्तविक विनिमय दरें, और स्वर्णमान व नम्य विनिमय दर प्रणालियों के तहत विनिमय दर निर्धारण तंत्र जैसे प्रमुख विषयों को शामिल किया गया है। समाधानों को स्पष्टता और सटीकता के साथ प्रस्तुत किया गया है, जो छात्रों को इन महत्वपूर्ण आर्थिक अवधारणाओं को समझने और परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों को हल करने में सहायता करते हैं।

Learning outcomes

  • संतुलित व्यापार शेष और चालू खाता संतुलन के बीच अंतर को समझना।
  • आधिकारिक आरक्षित निधि लेनदेन के महत्व का विश्लेषण करना।
  • मौद्रिक और वास्तविक विनिमय दरों के बीच भेद करना।
  • नम्य विनिमय दर प्रणाली में विनिमय दर निर्धारण की प्रक्रिया को समझना।
  • अवमूल्यन और मूल्यह्रास के बीच अंतर स्पष्ट करना।
  • स्वर्णमान के तहत भुगतान संतुलन के स्वचालित समायोजन तंत्र की व्याख्या करना।

Topics covered

Paper topics

  • संतुलित व्यापार शेष
  • चालू खाता संतुलन
  • आधिकारिक आरक्षित निधि
  • मौद्रिक विनिमय दर
  • वास्तविक विनिमय दर
  • विनिमय दर गणना
  • स्वर्णमान
  • स्वचालित युक्ति
  • नम्य विनिमय दर
  • विनिमय दर निर्धारण
  • अवमूल्यन
  • मूल्यह्रास

Important topics

  • चालू खाता संतुलन और व्यापार शेष में अंतर
  • मौद्रिक बनाम वास्तविक विनिमय दर
  • नम्य विनिमय दर निर्धारण
  • आधिकारिक आरक्षित निधि का महत्व
  • अवमूल्यन और मूल्यह्रास के बीच अंतर

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

संतुलित व्यापार शेष और चालू खाता संतुलन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
Solution:

संतुलित व्यापार शेष और चालू खाता संतुलन, दोनों ही भुगतान संतुलन के महत्वपूर्ण घटक हैं, लेकिन उनके दायरे में अंतर होता है।

  1. संतुलित व्यापार शेष (Balanced Trade Balance): इसका अर्थ है कि किसी देश के लिए दृश्य वस्तुओं (tangible goods) के निर्यात और आयात का मूल्य बराबर है। इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा दर्शाया जा सकता है:

    वस्तुओं का निर्यात - वस्तुओं का आयात = 0

    यह केवल वस्तुओं के व्यापार पर केंद्रित होता है।
  2. चालू खाता संतुलन (Current Account Balance): यह एक व्यापक अवधारणा है जिसमें न केवल वस्तुओं का व्यापार शामिल होता है, बल्कि सेवाओं का व्यापार, हस्तांतरण प्राप्तियाँ (जैसे प्रेषण, उपहार) और हस्तांतरण भुगतान भी शामिल होते हैं। चालू खाता संतुलन तब संतुलित माना जाता है जब इन सभी का योग शून्य हो:

    चालू खाता संतुलन = (वस्तुओं का निर्यात + सेवाओं का निर्यात + हस्तांतरण प्राप्तियाँ) - (वस्तुओं का आयात + सेवाओं का आयात + हस्तांतरण भुगतान) = 0

    यह किसी देश की अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों का एक समग्र चित्र प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 2

आधिकारिक आरक्षित निधि का लेन-देन क्या है? अदायगी संतुलन में इनके महत्त्व का वर्णन कीजिए।
Solution:

आधिकारिक आरक्षित निधि (Official Reserve Assets) का लेन-देन भुगतान संतुलन को ठीक करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें देश के केंद्रीय बैंक या मौद्रिक प्राधिकरण के पास उपलब्ध विदेशी मुद्रा भंडार, जैसे कि सोना और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राएँ (जैसे अमेरिकी डॉलर, यूरो), में होने वाली कमी या वृद्धि शामिल है।

महत्व:

  1. घाटे का समायोजन: जब किसी देश के भुगतान संतुलन में घाटा होता है (अर्थात, आयात और अन्य बाहरी भुगतान निर्यात और अन्य बाहरी प्राप्तियों से अधिक होते हैं), तो सरकार या केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में अपनी आधिकारिक आरक्षित निधि (जैसे विदेशी मुद्रा) बेचकर इस घाटे को पूरा कर सकता है। इससे घरेलू मुद्रा की विनिमय दर को स्थिर रखने में मदद मिलती है। आधिकारिक आरक्षित निधि में यह कमी 'आधिकारिक आरक्षित निधि संव्यवहार' कहलाती है और यह भुगतान संतुलन के घाटे को दर्शाती है।
  2. आधिक्य का समायोजन: इसके विपरीत, यदि भुगतान संतुलन में आधिक्य होता है (अर्थात, प्राप्तियाँ भुगतानों से अधिक होती हैं), तो केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार से विदेशी मुद्रा खरीदकर अपनी आधिकारिक आरक्षित निधि को बढ़ा सकता है। इससे घरेलू मुद्रा की विनिमय दर में अत्यधिक वृद्धि को रोका जा सकता है। आधिकारिक आरक्षित निधि में यह वृद्धि 'आधिकारिक आरक्षित निधि संव्यवहार' कहलाती है और यह भुगतान संतुलन के आधिक्य को दर्शाती है।

इस प्रकार, आधिकारिक आरक्षित निधि का लेन-देन भुगतान संतुलन में अस्थिरता को कम करने और विनिमय दर को स्थिर बनाए रखने के लिए एक आवश्यक उपकरण के रूप में कार्य करता है।

प्रश्न 3

मौद्रिक विनिमय दर और वास्तविक विनिमय दर में भेद कीजिए। यदि आपको घरेलू वस्तु अथवा विदेशी वस्तुओं के बीच किसी की खरीदने का निर्णय करना हो तो कौन-सी दर अधिक प्रासंगिक होगी?
Solution:

मौद्रिक विनिमय दर और वास्तविक विनिमय दर, दोनों ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे अलग-अलग पहलुओं को दर्शाती हैं:

  1. मौद्रिक विनिमय दर (Nominal Exchange Rate): यह एक मुद्रा की दूसरी मुद्रा के सापेक्ष विनिमय की दर है। यह केवल मुद्राओं के बीच विनिमय के अनुपात को दर्शाती है, बिना कीमतों के स्तर में अंतर को ध्यान में रखे। उदाहरण के लिए, यदि 1 अमेरिकी डॉलर = 80 रुपये, तो यह मौद्रिक विनिमय दर है। यह मुद्रास्फीति से अप्रभावित नहीं होती।
  2. वास्तविक विनिमय दर (Real Exchange Rate): यह दो देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं की सापेक्ष कीमतों को दर्शाती है। इसकी गणना मौद्रिक विनिमय दर को दोनों देशों के मूल्य स्तरों के अनुपात से समायोजित करके की जाती है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं की खरीद शक्ति की तुलना करने में मदद करती है और मुद्रास्फीति के प्रभाव से मुक्त होती है। इसका सूत्र है:

    वास्तविक विनिमय दर = मौद्रिक विनिमय दर × (विदेशी मूल्य स्तर / घरेलू मूल्य स्तर)

खरीद निर्णय के लिए प्रासंगिकता:

यदि आपको घरेलू वस्तुएँ या विदेशी वस्तुएँ खरीदने का निर्णय लेना हो, तो वास्तविक विनिमय दर अधिक प्रासंगिक होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि वास्तविक विनिमय दर आपको यह समझने में मदद करती है कि विभिन्न देशों में वस्तुओं की सापेक्ष कीमतें क्या हैं, जब उनकी कीमतों के स्तर में अंतर को ध्यान में रखा जाता है। मौद्रिक विनिमय दर केवल मुद्राओं के अनुपात को बताती है, लेकिन यह नहीं कि उन मुद्राओं से वास्तव में कितनी वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं। वास्तविक विनिमय दर आपको यह तय करने में मदद करती है कि कौन सी वस्तु (घरेलू या विदेशी) आपकी मुद्रा के लिए अधिक किफायती है।

प्रश्न 4

यदि 1 ₹ की कीमत 1.25 येन है और जापान में कीमत स्तर 3 हो तथा भारत में 1.2 हो तो भारत और जापान के बीच वास्तविक विनिमय दर की गणना कीजिए (जापानी वस्तु की कीमत भारतीय वस्तु के संदर्भ में)। संकेत : रुपये में येन की कीमत के रूप में मौद्रिक विनिमय दर को पहले ज्ञात कीजिए।
Solution:

हमें भारत और जापान के बीच वास्तविक विनिमय दर की गणना करनी है।

दिया गया है:

  • मौद्रिक विनिमय दर: 1 ₹ = 1.25 येन
  • जापान में कीमत स्तर (PJapan) = 3
  • भारत में कीमत स्तर (PIndia) = 1.2

चरण 1: मौद्रिक विनिमय दर को रुपये प्रति येन में ज्ञात करें।

यदि 1 ₹ = 1.25 येन है, तो 1 येन का मूल्य रुपये में होगा:

1 येन = \frac{1}{1.25}

1 येन = 0.80 ₹

यह मौद्रिक विनिमय दर है (रुपये प्रति येन)।

चरण 2: वास्तविक विनिमय दर की गणना करें।

वास्तविक विनिमय दर का सूत्र है:

वास्तविक विनिमय दर = मौद्रिक विनिमय दर (घरेलू मुद्रा प्रति विदेशी मुद्रा) × \frac{घरेलू मूल्य स्तर}{विदेशी मूल्य स्तर}

यहां, हम जापानी वस्तु की कीमत भारतीय वस्तु के संदर्भ में देख रहे हैं, इसलिए हम मौद्रिक विनिमय दर को रुपये प्रति येन में लेंगे और मूल्य स्तरों का अनुपात इस प्रकार रखेंगे कि हमें यह पता चले कि कितने येन के बराबर की वस्तु हम कितने रुपये में खरीद सकते हैं, या इसके विपरीत।

प्रश्न के संकेत के अनुसार, हम रुपये में येन की कीमत (मौद्रिक विनिमय दर) का उपयोग करेंगे और मूल्य स्तरों को समायोजित करेंगे।

वास्तविक विनिमय दर = (रुपये प्रति येन) × \frac{भारत का मूल्य स्तर}{जापान का मूल्य स्तर}

वास्तविक विनिमय दर = 0.80 × \frac{1.2}{3}

वास्तविक विनिमय दर = 0.80 × 0.4

वास्तविक विनिमय दर = 0.32

इसका अर्थ है कि 1 येन की कीमत, कीमतों के स्तर को समायोजित करने के बाद, 0.32 रुपये के बराबर है। दूसरे शब्दों में, 1 येन की क्रय शक्ति 0.32 रुपये के बराबर है।

प्रश्न 5

स्वचालित युक्ति की व्याख्या कीजिए, जिसके द्वारा स्वर्णमान के अंतर्गत अदायगी-संतुलन प्राप्त किया जाता था।
Solution:

अर्थशास्त्री डेविड ह्यूम ने 1752 में स्वर्णमान (Gold Standard) के तहत भुगतान संतुलन को स्वचालित रूप से संतुलित करने वाली एक युक्ति की व्याख्या की थी। यह युक्ति मूल्य-स्पर्शरेखा (price-specie flow mechanism) पर आधारित थी।

स्वचालित समायोजन की प्रक्रिया:

  1. प्रतिकूल भुगतान संतुलन: यदि किसी देश का भुगतान संतुलन प्रतिकूल हो जाता है (अर्थात, आयात निर्यात से अधिक हो जाते हैं), तो उस देश को अपने आयात का भुगतान करने के लिए सोने का निर्यात करना पड़ता है।
  2. कीमतों और लागतों में कमी: सोने के बहिर्वाह के कारण, देश के भीतर मुद्रा की आपूर्ति कम हो जाती है। मुद्रा की आपूर्ति में कमी से वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें तथा उत्पादन लागतें अनुपातिक रूप से कम हो जाती हैं।
  3. निर्यात में वृद्धि और आयात में कमी: घरेलू कीमतें और लागतें कम होने से, देश की वस्तुएँ अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ती हो जाती हैं। इससे विदेशी खरीदारों के लिए निर्यात आकर्षक हो जाता है और निर्यात बढ़ जाता है। साथ ही, विदेशी वस्तुएँ घरेलू बाजार में महंगी हो जाती हैं, जिससे आयात कम हो जाता है।
  4. अनुकूल भुगतान संतुलन वाले देश पर प्रभाव: इसके विपरीत, जिस देश को सोना प्राप्त होता है (अर्थात, जिसका भुगतान संतुलन अनुकूल होता है), वहां मुद्रा की आपूर्ति बढ़ती है। इससे वहां कीमतें और लागतें बढ़ जाती हैं, जिससे उसका निर्यात महंगा हो जाता है और आयात सस्ता। परिणामस्वरूप, उस देश का निर्यात घटता है और आयात बढ़ता है।
  5. संतुलन की पुनर्स्थापना: यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक कि प्रतिकूल भुगतान संतुलन वाले देश का व्यापार संतुलन अनुकूल न हो जाए और अनुकूल भुगतान संतुलन वाले देश का व्यापार संतुलन प्रतिकूल न हो जाए। इस प्रकार, सोने के प्रवाह के माध्यम से कीमतों में होने वाले परिवर्तन, निर्यात और आयात को प्रभावित करते हैं, जिससे भुगतान संतुलन स्वतः ही साम्यावस्था में आ जाता है।

इस प्रकार, स्वर्णमान के तहत, सोने के प्रवाह द्वारा संचालित मूल्य तंत्र, भुगतान संतुलन में स्वतः सामंजस्य स्थापित करता था और विनिमय दरों को स्थिर रखता था।

प्रश्न 6

नम्य विनिमय दर व्यवस्था में विनिमय दर का निर्धारण कैसे होता है?
Solution:

नम्य विनिमय दर व्यवस्था (Flexible Exchange Rate System), जिसे फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट सिस्टम भी कहा जाता है, में विनिमय दर का निर्धारण मुख्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में मांग और पूर्ति की शक्तियों के द्वारा होता है।

निर्धारण प्रक्रिया:

  1. विदेशी मुद्रा की मांग: विदेशी मुद्रा की मांग तब उत्पन्न होती है जब घरेलू निवासियों को विदेशी वस्तुओं और सेवाओं का आयात करने, विदेशी संपत्तियों में निवेश करने, या विदेशी मुद्रा में ऋण चुकाने की आवश्यकता होती है। विदेशी मुद्रा की मांग इसकी अपनी कीमत (विनिमय दर) के साथ विपरीत रूप से संबंधित होती है; अर्थात, जब विनिमय दर अधिक होती है (घरेलू मुद्रा कमजोर होती है), तो विदेशी मुद्रा की मांग कम होती है, और जब विनिमय दर कम होती है (घरेलू मुद्रा मजबूत होती है), तो विदेशी मुद्रा की मांग अधिक होती है।
  2. विदेशी मुद्रा की पूर्ति: विदेशी मुद्रा की पूर्ति तब होती है जब विदेशी निवासी घरेलू वस्तुओं और सेवाओं का आयात करते हैं, घरेलू संपत्तियों में निवेश करते हैं, या घरेलू मुद्रा में ऋण चुकाते हैं। विदेशी मुद्रा की पूर्ति इसकी अपनी कीमत (विनिमय दर) के साथ प्रत्यक्ष रूप से संबंधित होती है; अर्थात, जब विनिमय दर अधिक होती है (घरेलू मुद्रा कमजोर होती है), तो विदेशी मुद्रा की पूर्ति अधिक होती है, और जब विनिमय दर कम होती है (घरेलू मुद्रा मजबूत होती है), तो विदेशी मुद्रा की पूर्ति कम होती है।
  3. संतुलन बिंदु: विनिमय दर वह स्तर होती है जहाँ विदेशी मुद्रा की मांग और पूर्ति बराबर हो जाती है। यह संतुलन बिंदु बाजार की शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है, और सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम या न के बराबर होता है।

संक्षेप में, नम्य विनिमय दर व्यवस्था में, विनिमय दर एक स्वचालित मूल्य निर्धारण तंत्र के माध्यम से निर्धारित होती है, जो विदेशी मुद्रा की मांग और पूर्ति के निरंतर बदलते संतुलन को दर्शाता है।

प्रश्न 7

अवमूल्यन और मूल्यह्रास में अंतर स्पष्ट कीजिए।
Solution:

अवमूल्यन (Devaluation) और मूल्यह्रास (Depreciation) दोनों ही घरेलू मुद्रा के मूल्य में विदेशी मुद्राओं की तुलना में कमी को दर्शाते हैं, लेकिन उनके कारण और संदर्भ भिन्न होते हैं:

  1. अवमूल्यन (Devaluation):
    • परिभाषा: अवमूल्यन का अर्थ है सरकार द्वारा जानबूझकर, एक आधिकारिक घोषणा के माध्यम से, अपनी घरेलू मुद्रा के मूल्य को विदेशी मुद्राओं के संबंध में कम करना।
    • संदर्भ: यह तब होता है जब विनिमय दरें निश्चित (fixed) या प्रबंधित (managed) होती हैं, और सरकार सक्रिय रूप से विनिमय दर को प्रभावित करती है।
    • कारण: इसका मुख्य उद्देश्य निर्यात को सस्ता बनाकर और आयात को महंगा बनाकर देश के भुगतान संतुलन घाटे को कम करना होता है।
  2. मूल्यह्रास (Depreciation):
    • परिभाषा: मूल्यह्रास का अर्थ है घरेलू मुद्रा के मूल्य में विदेशी मुद्राओं के संबंध में कमी आना, जो बाजार की शक्तियों (मांग और पूर्ति) के कारण होती है।
    • संदर्भ: यह मुख्य रूप से नम्य (flexible) या फ्लोटिंग विनिमय दर व्यवस्था में होता है, जहाँ विनिमय दरें बाजार द्वारा निर्धारित होती हैं।
    • कारण: यह विदेशी मुद्रा की मांग में वृद्धि या पूर्ति में कमी, या घरेलू अर्थव्यवस्था में अस्थिरता, उच्च मुद्रास्फीति, या व्यापार घाटे जैसे कारकों के कारण हो सकता है।

मुख्य अंतर:

सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि अवमूल्यन एक जानबूझकर किया गया सरकारी कार्य है जो निश्चित विनिमय दर प्रणाली में होता है, जबकि मूल्यह्रास एक बाजार-संचालित घटना है जो नम्य विनिमय दर प्रणाली में होती है।

Common mistakes

  • व्यापार शेष और चालू खाता संतुलन के बीच भ्रमित होना।
  • मौद्रिक और वास्तविक विनिमय दरों के बीच अंतर को गलत समझना।
  • अवमूल्यन और मूल्यह्रास के बीच सूक्ष्म अंतर को पहचानने में विफलता।

Revision tips

  • प्रत्येक अवधारणा के लिए दिए गए सूत्रों और परिभाषाओं की समीक्षा करें।
  • विनिमय दर निर्धारण के विभिन्न तंत्रों के बीच अंतर को समझने पर ध्यान केंद्रित करें।
  • स्वर्णमान और नम्य विनिमय दर प्रणालियों के तहत स्वचालित समायोजन तंत्र के उदाहरणों का अभ्यास करें।
  • अवमूल्यन और मूल्यह्रास के बीच अंतर को स्पष्ट करने के लिए तुलनात्मक तालिकाएँ बनाएँ।

Practice MCQs

Q1. संतुलित व्यापार शेष का क्या अर्थ है?

Q2. चालू खाता संतुलन में निम्नलिखित में से क्या शामिल नहीं है?

Q3. आधिकारिक आरक्षित निधि का उपयोग मुख्य रूप से किसके लिए किया जाता है?

Q4. वास्तविक विनिमय दर मुद्रास्फीति के प्रभाव से मुक्त क्यों मानी जाती है?

Q5. नम्य विनिमय दर प्रणाली में विनिमय दर का निर्धारण कैसे होता है?

Frequently asked questions

भुगतान संतुलन में संतुलित व्यापार शेष और चालू खाता संतुलन में क्या अंतर है?

संतुलित व्यापार शेष का अर्थ है कि वस्तुओं का निर्यात और वस्तुओं का आयात बराबर है। चालू खाता संतुलन में वस्तुओं, सेवाओं और हस्तांतरणों के सभी लेन-देन शामिल होते हैं, और यह तब संतुलित होता है जब इन सभी का योग शून्य हो।

आधिकारिक आरक्षित निधि का भुगतान संतुलन में क्या महत्व है?

आधिकारिक आरक्षित निधि का उपयोग भुगतान संतुलन में घाटे या आधिक्य को ठीक करने के लिए किया जाता है। घाटे की स्थिति में आरक्षित निधि का उपयोग किया जाता है, और आधिक्य की स्थिति में इसे बढ़ाया जाता है।

वास्तविक विनिमय दर की गणना क्यों महत्वपूर्ण है?

वास्तविक विनिमय दर विभिन्न देशों के कीमत स्तरों में परिवर्तन को ध्यान में रखती है, जिससे यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार और प्रतिस्पर्धा का अधिक सटीक माप प्रदान करती है। यह मुद्रास्फीति के प्रभाव से मुक्त होती है।

नम्य विनिमय दर प्रणाली कैसे काम करती है?

नम्य विनिमय दर प्रणाली में, विनिमय दर का निर्धारण विदेशी मुद्रा बाजार में मांग और पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है। सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम होता है।

अवमूल्यन और मूल्यह्रास में मुख्य अंतर क्या है?

अवमूल्यन सरकार द्वारा जानबूझकर घरेलू मुद्रा के मूल्य में की गई कमी है, जबकि मूल्यह्रास बाजार की शक्तियों (मांग और पूर्ति) के कारण होता है।

स्वर्णमान के तहत भुगतान संतुलन कैसे स्वतः समायोजित होता था?

स्वर्णमान के तहत, यदि किसी देश का भुगतान संतुलन प्रतिकूल होता था, तो सोने का बहिर्वाह होता था, जिससे कीमतें और लागतें कम होती थीं। इससे निर्यात बढ़ते थे और आयात घटते थे, जिससे संतुलन स्वतः बहाल हो जाता था।

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