कक्षा 12 भौतिकी: चुंबकत्व एवं द्रव्य NCERT समाधान
यह पृष्ठ कक्षा 12 भौतिकी के अध्याय 5, 'चुंबकत्व एवं द्रव्य' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। इसमें पृथ्वी के चुंबकत्व के विभिन्न पहलुओं, जैसे कि चुंबकीय क्षेत्र को परिभाषित करने वाली राशियाँ, विभिन्न स्थानों पर नति कोण और चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा, और पृथ्वी के चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण का अनुमान लगाने की विधि पर चर्चा की गई है। समाधानों में पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के स्रोत, समय के साथ इसके परिवर्तन, और बाहरी कारकों द्वारा इसके विकृत होने की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला गया है। यह खंड छात्रों को चुंबकीय घटनाओं की गहरी समझ विकसित करने और परीक्षा की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण अवधारणाओं को स्पष्ट करने में मदद करता है।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 12 |
| Subject | भौतिकी |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 5. चुंबकत्व एवं द्रव्य |
Chapter summary
कक्षा 12 भौतिकी के अध्याय 5 'चुंबकत्व एवं द्रव्य' के ये NCERT समाधान पृथ्वी के चुंबकत्व की मूल बातें समझाते हैं। इसमें पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को परिभाषित करने वाले अवयवों, विभिन्न भौगोलिक स्थानों पर चुंबकीय नति और दिगंश कोणों के महत्व, और पृथ्वी के चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण के अनुमान पर ध्यान केंद्रित किया गया है। समाधान पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के संभावित स्रोतों और समय के साथ इसके व्यवहार की भी पड़ताल करते हैं, जो छात्रों को इस विषय की व्यापक समझ प्रदान करते हैं।
Learning outcomes
- पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को पूर्ण रूप से व्यक्त करने वाली तीन स्वतन्त्र राशियों को पहचानना।
- विभिन्न भौगोलिक स्थानों पर नति कोण (dip angle) और चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा का विश्लेषण करना।
- पृथ्वी के चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण के परिमाण की कोटि का अनुमान लगाने की विधि को समझना।
- पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के संभावित स्रोतों और समय के साथ इसके परिवर्तनों की व्याख्या करना।
- स्थानीय चुम्बकीय ध्रुवों के उत्पन्न होने के कारणों को समझना।
- पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के बाहरी कारकों से विकृत होने की संभावनाओं का विश्लेषण करना।
Topics covered
Paper topics
- भू-चुम्बकत्व
- चुम्बकीय क्षेत्र को परिभाषित करने वाली राशियाँ
- नति कोण (Dip Angle)
- चुम्बकीय विक्षेपण
- पृथ्वी का चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण
- चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ
- पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के स्रोत
- समय के साथ चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन
- स्थानीय चुम्बकीय ध्रुव
- बाह्य कारकों से चुम्बकीय क्षेत्र का विकृत होना
- अंतरातारकीय चुम्बकीय क्षेत्र
Important topics
- पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को परिभाषित करने वाली तीन स्वतन्त्र राशियाँ
- नति कोण और विभिन्न स्थानों पर इसका मान
- पृथ्वी के चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण का अनुमान
- पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के स्रोत (डायनेमो सिद्धांत)
- समय के साथ चुम्बकीय क्षेत्र का परिवर्तन
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
भू-चुम्बकत्व सम्बंधी निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
(a) एक सदिश को पूर्ण रूप से व्यक्त करने के लिए तीन राशियों की आवश्यकता होती है। उन तीन स्वतन्त्र राशियों के नाम लिखिए जो परम्परागत रूप से पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होती हैं।
(b) दक्षिण भारत में किसी स्थान पर नित कोण का मान लगभग 18° है। ब्रिटेन में आप इससे अधिक नित कोण की अपेक्षा करेंगे या कम की?
(c) यदि आप आस्ट्रेलिया के मेल्बॉर्न शहर में भू-चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं का नक्शा बनाएँ तो ये रेखाएँ पृथ्वी के अन्दर जाएँगी या इससे बाहर आएँगी?
(d) एक चुम्बकीय सुई जो क्षैतिज तल में घूमने के लिए स्वतन्त्र है, यदि भू-चुम्बकीय उत्तर या दक्षिण ध्रुव पर रखी हो तो यह किस दिशा में संकेत करेगी?
(e) यह माना जाता है कि पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र लगभग एक चुम्बकीय द्विध्रुव के क्षेत्र जैसा है जो पृथ्वी के केन्द्र पर रखा है और जिसका द्विध्रुव आघूर्ण है। कोई ढंग सुझाइये जिससे इस संख्या के परिमाण की कोटि जाँची जा सके।
(f) भू-गर्भशास्त्रियों का मानना है कि मुख्य N-S चुम्बकीय ध्रुवों के अतिरिक्त, पृथ्वी की सतह पर कई अन्य स्थानीय ध्रुव भी हैं, जो विभिन्न दिशाओं में विन्यस्त हैं। ऐसा होना कैसे सम्भव है?
(a) पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को पूर्ण रूप से व्यक्त करने के लिए तीन स्वतन्त्र राशियों की आवश्यकता होती है। ये राशियाँ हैं: चुम्बकीय विक्षेपण (magnetic declination), नति कोण (angle of dip), और पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक (horizontal component)। ये तीनों राशियाँ मिलकर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा और परिमाण को पूरी तरह से परिभाषित करती हैं।
(b) ब्रिटेन उत्तरी ध्रुव के समीप स्थित है, जबकि दक्षिण भारत भू-चुम्बकीय विषुवत रेखा के अपेक्षाकृत करीब है। ध्रुवों की ओर जाने पर नति कोण का मान बढ़ता है। इसलिए, ब्रिटेन में नति कोण का मान दक्षिण भारत की तुलना में काफी अधिक होगा। ब्रिटेन में यह मान लगभग 70° होता है, जबकि दक्षिण भारत में यह लगभग 18° है। अतः, आप ब्रिटेन में अधिक नित कोण की अपेक्षा करेंगे।
(c) मेल्बॉर्न ऑस्ट्रेलिया में स्थित है, जो दक्षिणी गोलार्ध में है। पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में, दक्षिणी गोलार्ध में पृथ्वी का चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव निहित होता है। चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ उत्तरी ध्रुव से निकलकर दक्षिणी ध्रुव में प्रवेश करती हैं। इसलिए, मेल्बॉर्न में भू-चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ पृथ्वी के अन्दर जाएँगी।
(d) भू-चुम्बकीय उत्तर या दक्षिण ध्रुव पर, पृथ्वी का कुल चुम्बकीय क्षेत्र लगभग ऊर्ध्वाधर (vertical) होता है। यदि एक चुम्बकीय सुई क्षैतिज तल में घूमने के लिए स्वतन्त्र है, तो ध्रुवों पर यह किसी भी दिशा में संकेत कर सकती है क्योंकि क्षैतिज घटक बहुत क्षीण होता है और ऊर्ध्वाधर घटक प्रभावी होता है। यह सुई क्षैतिज तल में स्वतंत्र रूप से घूम सकती है, लेकिन ध्रुवों पर ऊर्ध्वाधर क्षेत्र के कारण यह कोई निश्चित दिशा नहीं दर्शाएगी।
(e) पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण ज्ञात करने के लिए, हम पृथ्वी के केंद्र पर रखे एक चुम्बकीय द्विध्रुव के कारण उत्पन्न क्षेत्र की गणना कर सकते हैं। माना पृथ्वी का चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण है। हम पृथ्वी की त्रिज्या का उपयोग करके विषुवत रेखा पर किसी बिंदु पर चुम्बकीय क्षेत्र की गणना कर सकते हैं। विषुवत रेखा पर द्विध्रुव के कारण चुम्बकीय क्षेत्र का सूत्र है: । यहाँ है।
गणना करने पर: । यह मान लगभग 0.31 गॉस (G) के बराबर है, जो पृथ्वी के वास्तविक चुम्बकीय क्षेत्र के परिमाण की कोटि के समान है। इस प्रकार, हम पृथ्वी के चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण की कोटि का अनुमान लगा सकते हैं।
(f) पृथ्वी की सतह पर स्थानीय चुम्बकीय ध्रुवों का होना संभव है। ये स्थानीय ध्रुव मुख्य भू-चुम्बकीय द्विध्रुव के कारण नहीं, बल्कि पृथ्वी की पपड़ी में मौजूद चुम्बकित खनिजों के स्थानीय जमाव या अभिविन्यास के कारण उत्पन्न होते हैं। इन खनिजों का चुम्बकन विभिन्न दिशाओं में हो सकता है, जिससे स्थानीय चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होते हैं जो मुख्य भू-चुम्बकीय क्षेत्र से भिन्न हो सकते हैं।
प्रश्न 2
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
(a) एक जगह से दूसरी जगह जाने पर पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र बदलता है। क्या यह समय के साथ भी बदलता है? यदि हाँ, तो कितने समय अन्तराल पर इसमें पर्याप्त परिवर्तन होते हैं?
(b) पृथ्वी के क्रोड में लोहा है, यह ज्ञात है। फिर भी भू-गर्भशास्त्री इसको पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का स्रोत नहीं मानते। क्यों?
(c) पृथ्वी के क्रोड के बाहरी चालक भाग में प्रवाहित होने वाली आवेश धाराएँ भू-चुम्बकीय क्षेत्र के लिए उत्तरदायी समझी जाती हैं। इन धाराओं को बनाए रखने वाली बैटरी (ऊर्जा स्रोत) क्या हो सकती है?
(d) अपने 4.5 अरब वर्षों के इतिहास में पृथ्वी अपने चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा कई बार उलट चुकी होगी। भू-गर्भशास्त्री, इतने सुन्दर अतीत के पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के बारे में कैसे जान पाते हैं?
(e) बहुत अधिक दूरियों पर (30,000 km से अधिक) पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र अपनी द्विध्रुवीय आकृति से काफी भिन्न हो जाता है। कौन-से कारक इस विकृति के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं?
(f) अंतरातारकीय अंतरिक्ष में की कोटि का बहुत ही क्षीण चुम्बकीय क्षेत्र होता है। क्या इस क्षीण चुम्बकीय क्षेत्र के भी कुछ प्रभावी परिणाम हो सकते हैं? समझाइए।
टिप्पणी: प्रश्न 2 का उद्देश्य मुख्यतः आपकी जिज्ञासा जगाना है। उपरोक्त कई प्रश्नों के उत्तर या तो काम चलाऊ हैं या अज्ञात हैं। जितना सम्भव हो सका, प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर पुस्तक के अन्त में दिए गए हैं। विस्तृत उत्तरों के लिए आपको भू-चुम्बकत्व पर कोई अच्छी पाठ्य पुस्तक देखनी होगी।
(a) हाँ, पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र समय के साथ बदलता रहता है। यह परिवर्तन विभिन्न समय अंतरालों पर हो सकता है, जैसे कि दैनिक परिवर्तन, वार्षिक परिवर्तन, और दीर्घकालिक परिवर्तन। चुम्बकीय आँधी (magnetic storms) के दौरान यह अनियमित रूप से बदलता है। सामान्यतः, पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में पर्याप्त परिवर्तन कुछ सौ वर्षों के अन्तराल पर देखे जा सकते हैं।
(b) पृथ्वी के क्रोड में लोहा पाया जाता है, लेकिन यह अत्यधिक तापमान (लगभग 4000°C से 6000°C) के कारण द्रवीभूत अवस्था में होता है। इस उच्च तापमान पर, लोहा अपनी लौह चुम्बकीय (ferromagnetic) प्रकृति खो देता है और अनुचुम्बकीय (paramagnetic) या प्रतिचुम्बकीय (diamagnetic) व्यवहार प्रदर्शित करता है। इसलिए, यह सीधे तौर पर पृथ्वी के चुम्बकत्व का स्रोत नहीं हो सकता।
(c) पृथ्वी के क्रोड के बाहरी चालक भाग में प्रवाहित होने वाली आवेश धाराओं को बनाए रखने वाली ऊर्जा का स्रोत संभवतः पृथ्वी के अन्दर होने वाली संवहन धाराएँ (convection currents) हैं। ये धाराएँ क्रोड में ऊष्मा के अंतर के कारण उत्पन्न होती हैं, जो रेडियोधर्मी क्षय या पृथ्वी के निर्माण के समय से बची हुई ऊष्मा से प्राप्त होती है। इन धाराओं के कारण उत्पन्न होने वाला 'डायनेमो प्रभाव' (dynamo effect) विद्युत धाराओं को बनाए रखता है जो भू-चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करती हैं।
(d) भू-गर्भशास्त्री प्राचीन पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के बारे में जानकारी ज्वालामुखी चट्टानों और तलछटों (sediments) के अध्ययन से प्राप्त करते हैं। जब पिघला हुआ लावा ठंडा होकर चट्टान बनता है, तो उसमें मौजूद चुम्बकीय खनिज पृथ्वी के उस समय के चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में चुम्बकित हो जाते हैं। इन चट्टानों के अध्ययन से अतीत में चुम्बकीय क्षेत्र की दिशाओं और ध्रुवों के उलटने के प्रमाण मिलते हैं।
(e) बहुत अधिक दूरियों पर (30,000 km से अधिक), पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र सौर पवन (solar wind) के प्रभाव से विकृत हो जाता है। सौर पवन आवेशित कणों की एक धारा है जो सूर्य से निकलती है। जब यह पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र से टकराती है, तो यह चुम्बकीय क्षेत्र को संपीड़ित (compress) करती है और एक 'चुम्बकीय पुच्छ' (magnetotail) बनाती है, जिससे क्षेत्र की द्विध्रुवीय आकृति बदल जाती है।
(f) हाँ, अंतरातारकीय अंतरिक्ष में (या ) की कोटि का बहुत ही क्षीण चुम्बकीय क्षेत्र भी प्रभावी परिणाम दिखा सकता है। यह क्षेत्र ब्रह्मांडीय किरणों (cosmic rays) के प्रसार को प्रभावित कर सकता है, जो उच्च-ऊर्जा कण होते हैं। यह क्षेत्र आकाशगंगाओं के निर्माण और संरचना को भी प्रभावित कर सकता है, और तारों के निर्माण की प्रक्रियाओं में भूमिका निभा सकता है। यह आवेशित कणों को निर्देशित और सीमित कर सकता है, जिससे विभिन्न खगोलीय घटनाओं पर प्रभाव पड़ता है।
Common mistakes
- पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को केवल एक द्विध्रुव के रूप में मानना और स्थानीय विविधताओं को अनदेखा करना।
- पृथ्वी के क्रोड में लोहे की उपस्थिति के बावजूद उसे चुम्बकत्व का स्रोत न मानने के कारण को न समझना।
- चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में सही ढंग से न बता पाना।
- नति कोण के मान को भौगोलिक स्थिति के अनुसार सही ढंग से न जोड़ पाना।
Revision tips
- पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को परिभाषित करने वाली तीन मुख्य राशियों (विक्षेपण, नति कोण, क्षैतिज घटक) को याद करें।
- विभिन्न स्थानों (जैसे, भू-चुम्बकीय ध्रुव, विषुवत रेखा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन) पर नति कोण और क्षेत्र रेखाओं की दिशा के बारे में समझें।
- पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के स्रोत (जैसे, क्रोड में धाराएँ) और इसके समय के साथ परिवर्तन के कारणों पर ध्यान केंद्रित करें।
- पृथ्वी के चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण के अनुमान के लिए उपयोग किए गए सूत्र और गणना को समझें।
Practice MCQs
Q1. पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को पूर्ण रूप से व्यक्त करने के लिए कितनी स्वतन्त्र राशियों की आवश्यकता होती है?
Explanation: पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को पूर्ण रूप से परिभाषित करने के लिए तीन स्वतन्त्र राशियों की आवश्यकता होती है, जो चुम्बकीय विक्षेपण, नति कोण और पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक हैं।
Q2. यदि कोई व्यक्ति मेल्बॉर्न, ऑस्ट्रेलिया में हो, तो वहाँ पृथ्वी की चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ किस दिशा में प्रवेश करेंगी?
Explanation: मेल्बॉर्न दक्षिणी गोलार्ध में स्थित है। दक्षिणी गोलार्ध में पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का उत्तरी ध्रुव निहित होता है, इसलिए चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ पृथ्वी के अन्दर प्रवेश करती हुई प्रतीत होती हैं।
Q3. पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का अनुमानित द्विध्रुव आघूर्ण कितना है?
Explanation: पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को एक चुम्बकीय द्विध्रुव के क्षेत्र के रूप में माना जाता है, जिसका द्विध्रुव आघूर्ण लगभग 8 x 10^22 JT^-1 होता है।
Q4. पृथ्वी के क्रोड में लोहा होने के बावजूद उसे चुम्बकीय क्षेत्र का स्रोत क्यों नहीं माना जाता?
Explanation: पृथ्वी के क्रोड में उपस्थित लोहा अत्यधिक तापमान के कारण द्रवीभूत अवस्था में होता है, जिससे वह लौह चुम्बकीय प्रकृति प्रदर्शित नहीं कर पाता और इसलिए चुम्बकत्व का स्रोत नहीं बन सकता।
Q5. पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र समय के साथ कैसे बदलता है?
Explanation: पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र प्रत्येक स्थान पर और प्रत्येक समय बदलता रहता है। यह दैनिक, वार्षिक रूप से बदल सकता है और चुम्बकीय आँधी के दौरान अनियमित रूप से बदलता है, जिसमें कुछ सौ वर्षों के अन्तराल पर पर्याप्त परिवर्तन होते हैं।
Frequently asked questions
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को व्यक्त करने के लिए किन तीन स्वतन्त्र राशियों का उपयोग किया जाता है?
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को व्यक्त करने के लिए तीन स्वतन्त्र राशियाँ हैं: चुम्बकीय विक्षेपण (magnetic declination), नति कोण (angle of dip), और पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक (horizontal component)।
नति कोण (dip angle) क्या है और यह विभिन्न स्थानों पर कैसे बदलता है?
नति कोण वह कोण है जो पृथ्वी का कुल चुम्बकीय क्षेत्र क्षैतिज तल के साथ बनाता है। यह भू-चुम्बकीय ध्रुवों पर 90° और भू-चुम्बकीय विषुवत रेखा पर 0° होता है। जैसे-जैसे हम ध्रुवों के पास जाते हैं, नति कोण बढ़ता है।
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का मुख्य स्रोत क्या माना जाता है?
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का मुख्य स्रोत इसके बाहरी क्रोड में प्रवाहित होने वाली आवेश धाराएँ मानी जाती हैं, जो संभवतः संवहन धाराओं और पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न होती हैं (डायनेमो सिद्धांत)।
क्या पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र समय के साथ बदलता है?
हाँ, पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र समय के साथ बदलता है। यह परिवर्तन दैनिक, वार्षिक हो सकता है और कुछ सौ वर्षों के अन्तराल पर इसमें पर्याप्त परिवर्तन देखे जा सकते हैं। इसके अलावा, पृथ्वी के चुम्बकीय ध्रुव भी समय के साथ विस्थापित होते रहते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ पृथ्वी के अन्दर क्यों जाती हैं?
ऑस्ट्रेलिया दक्षिणी गोलार्ध में स्थित है। दक्षिणी गोलार्ध में पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का उत्तरी ध्रुव निहित होता है, इसलिए चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ पृथ्वी के अन्दर प्रवेश करती हुई प्रतीत होती हैं।
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की द्विध्रुवीय आकृति बहुत अधिक दूरी पर क्यों भिन्न हो जाती है?
बहुत अधिक दूरियों पर (30,000 km से अधिक), पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र सौर पवन (solar wind) और अन्य अंतर्ग्रहीय प्लाज्मा के साथ अंतःक्रिया के कारण अपनी द्विध्रुवीय आकृति से काफी भिन्न हो जाता है। यह अंतःक्रिया पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को विकृत करती है।
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