कक्षा 12 इतिहास: विचारक, विश्वास और इमारतें - NCERT समाधान

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यह पृष्ठ कक्षा 12 के लिए "भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I - II - III" पुस्तक के अध्याय 4, "विचारक, विश्वास और इमारतें: सांस्कृतिक विकास" पर केंद्रित NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। इसमें उपनिषदों के दार्शनिक विचारों, जैन धर्म की शिक्षाओं, साँची स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका, और बौद्ध साहित्य व मूर्ति-कला के बीच संबंध जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा शामिल है। समाधानों में एक महत्वपूर्ण अभिलेख का विश्लेषण भी किया गया है, जिसमें एक बौद्ध भिक्षुणी द्वारा बोधिसत्व की मूर्ति स्थापित करने का उल्लेख है। ये समाधान छात्रों को इन जटिल अवधारणाओं को समझने, महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों के महत्व को जानने और परीक्षा के लिए प्रभावी ढंग से तैयारी करने में मदद करते हैं।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
Subjectभारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I - II - III
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter4. विचारक, विश्वास और इमारतें सांस्वृफतिक विकास

Chapter summary

यह खंड कक्षा 12 के इतिहास के अध्याय "विचारक, विश्वास और इमारतें" के लिए NCERT समाधान प्रदान करता है। इसमें उपनिषदों के दार्शनिक विचारों की नियतिवाद और भौतिकवाद से तुलना, जैन धर्म की प्रमुख शिक्षाएं जैसे अहिंसा और कर्म का सिद्धांत, और साँची स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों के योगदान पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, एक पुरातात्विक अभिलेख का विश्लेषण और बौद्ध साहित्य के माध्यम से साँची की मूर्ति-कला को समझने की विधि भी समझाई गई है।

Learning outcomes

  • उपनिषदों के दार्शनिक विचारों और नियतिवाद/भौतिकवाद के बीच अंतर को समझना।
  • जैन धर्म की मुख्य शिक्षाओं और उनके व्यावहारिक पहलुओं का वर्णन करना।
  • साँची स्तूप के संरक्षण में ऐतिहासिक हस्तियों के योगदान का विश्लेषण करना।
  • बौद्ध साहित्य और मूर्ति-कला के बीच संबंध को स्पष्ट करना।
  • प्राचीन अभिलेखों से ऐतिहासिक जानकारी निकालने का अभ्यास करना।

Topics covered

Paper topics

  • उपनिषदों के दार्शनिक विचार
  • नियतिवाद और भौतिकवाद
  • जैन धर्म की शिक्षाएँ
  • अहिंसा का सिद्धांत
  • कर्म और पुनर्जन्म
  • संघ और भिक्षु/भिक्खुनी जीवन
  • साँची स्तूप का संरक्षण
  • भोपाल की बेगमों का योगदान
  • बौद्ध साहित्य और मूर्ति-कला
  • बौद्ध प्रतीक (रिक्त स्थान, पहिया, स्तूप)
  • बोधिसत्व की अवधारणा
  • प्राचीन अभिलेखों का विश्लेषण

Important topics

  • उपनिषदों के दार्शनिक विचार बनाम नियतिवाद/भौतिकवाद
  • जैन धर्म की पंच महाव्रत और कर्म सिद्धांत
  • साँची स्तूप का संरक्षण और भोपाल की बेगमों की भूमिका
  • बौद्ध प्रतीकों का अर्थ और मूर्ति-कला में उनका चित्रण
  • बोधिसत्व की अवधारणा और मूर्ति स्थापना का महत्व

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

क्या उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे? अपने जवाब के पक्ष में तर्क दीजिए।
Solution: उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे। उपनिषद मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और कर्म के सिद्धांत के आधार पर पुनर्जन्म के विचार में विश्वास करते थे। इसके विपरीत, नियतिवादी मानते थे कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है और मनुष्य के कर्मों का कोई प्रभाव नहीं होता। भौतिकवादी, जो चार तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु) से मनुष्य के निर्माण में विश्वास करते थे, यह मानते थे कि मृत्यु के उपरांत ये तत्व अपने मूल तत्वों में विलीन हो जाते हैं और चेतना समाप्त हो जाती है। इस प्रकार, उपनिषदों का पुनर्जन्म और कर्म पर जोर, नियतिवादियों की पूर्व-निर्धारितता और भौतिकवादियों की भौतिकवादी व्याख्या से अलग था।

प्रश्न 2

जैन धर्म की महत्वपूर्ण शिक्षाओं को संक्षेप में लिखिए।
Solution: जैन धर्म की महत्वपूर्ण शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं:
  1. संपूर्ण विश्व प्राणवान है: जैन मान्यता के अनुसार, केवल मनुष्य और जानवर ही नहीं, बल्कि पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन होता है।
  2. जीवों के प्रति अहिंसा: यह जैन धर्म का केंद्रीय सिद्धांत है, जिसका अर्थ है सभी जीवित प्राणियों, विशेष रूप से मनुष्यों, जानवरों, पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना।
  3. कर्म और पुनर्जन्म: जैन धर्म के अनुसार, जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है। अच्छे कर्म अच्छे भविष्य की ओर ले जाते हैं, जबकि बुरे कर्म कष्टकारी पुनर्जन्म की ओर।
  4. कर्म चक्र से मुक्ति: कर्म के चक्र से मुक्ति पाने के लिए त्याग और तपस्या की आवश्यकता होती है। यह संसार के भौतिक सुखों और इच्छाओं के त्याग से ही संभव है, इसीलिए भिक्षुओं के लिए विहारों में निवास करना एक अनिवार्य नियम बन गया।
  5. पाँच व्रत: जैन साधु और साध्वी पाँच मुख्य व्रतों का पालन करते हैं: हत्या न करना (अहिंसा), चोरी न करना (अस्तेय), झूठ न बोलना (सत्य), ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचर्य), और धन संग्रह न करना (अपरिग्रह)।

प्रश्न 3

साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चर्चा कीजिए।
Solution: साँची के स्तूप जैसे प्राचीन स्थल के संरक्षण में भोपाल की बेगमों ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भोपाल की शासक, शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम, ने इस ऐतिहासिक स्थल के जीर्णोद्धार और रखरखाव के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की। विशेष रूप से, सुल्तानजहाँ बेगम ने न केवल स्तूप के संरक्षण के लिए अनुदान दिया, बल्कि वहाँ एक संग्रहालय और एक अतिथिशाला के निर्माण के लिए भी धन उपलब्ध कराया। उनके संरक्षण में ही पुरातत्वविद् जॉन मार्शल ने साँची पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं, जिनके विभिन्न खंडों के प्रकाशन में भी सुल्तानजहाँ बेगम ने आर्थिक सहयोग दिया। इन बेगमों के प्रयासों के कारण ही बौद्ध धर्म के इस महत्वपूर्ण केंद्र को संरक्षित किया जा सका, जिससे प्रारंभिक बौद्ध धर्म के बारे में हमारी समझ में वृद्धि हुई और यह आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सफल संरक्षण कार्यों का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

प्रश्न 4

निम्नलिखित संक्षिप्त अभिलेख को पढ़िए और जवाब दीजिए: महाराजा हुविष्क (एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिष्या, त्रिपिटक जानने वाली भिक्खुनी बुद्धमिता के बहन की बेटी भिक्खुनी धनवती ने अपने माता-पिता के साथ मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित की।

(क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख कैसे निश्चित की?

(ख) आपके अनुसार उन्होंने बोधिसत्त की मूर्ति क्यों स्थापित की?

(ग) वे अपने किन रिश्तेदारों का नाम लेती हैं?

(घ) वे कौन-से बौद्ध ग्रंथों को जानती थीं?

(ङ) उन्होंने ये पाठ किससे सीखे थे?

Solution:

(क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख को महाराजा हुविष्क के शासनकाल के तैंतीसवें वर्ष के रूप में निश्चित किया, जो गर्म मौसम के पहले महीने का आठवाँ दिन था। यह उस समय की एक सामान्य प्रथा थी जिसमें शासक के शासनकाल के वर्षों का उपयोग तारीख निर्धारण के लिए किया जाता था।

(ख) उन्होंने बोधिसत्त की मूर्ति इसलिए स्थापित की क्योंकि बोधिसत्वों को अत्यंत दयालु प्राणी माना जाता था जिन्होंने कड़े प्रयासों से योग्यता अर्जित की थी और संसार को त्याग दिया था। बुद्ध और बोधिसत्वों की मूर्तियों की पूजा करना उस समय एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा बन गई थी, जो भक्तों को प्रेरणा देती थी और पुण्य अर्जित करने का माध्यम थी।

(ग) वे अपने माता-पिता का नाम लेती हैं। इसके अतिरिक्त, वे अपनी माँ की बहन, भिक्खुनी बुद्धमिता, और बुद्धमिता की बेटी, भिक्खुनी धनवती (स्वयं), का भी उल्लेख करती हैं, जो उनके परिवारिक संबंधों को दर्शाती है।

(घ) वे त्रिपिटकों को जानती थीं। त्रिपिटक बौद्ध धर्म के प्रमुख धर्मग्रंथ हैं, जिनमें बुद्ध की शिक्षाएँ संकलित हैं। इसका ज्ञान उनकी बौद्ध धर्म में गहरी आस्था और शिक्षा को दर्शाता है।

(ङ) उन्होंने ये पाठ भिक्खुनी बुद्धमिता से सीखे थे। अभिलेख में उल्लेख है कि धनवती, बुद्धमिता की शिष्या थी, जो स्वयं त्रिपिटक जानने वाली थीं। इससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने अपनी गुरु से बौद्ध धर्म और त्रिपिटकों का ज्ञान प्राप्त किया था।

प्रश्न 5

आपके अनुसार स्त्री-पुरुष संघ में क्यों जाते थे?
Solution: संघ, भिक्षुओं और भिक्खुनीयों की एक संस्था थी जो धम्म (धर्म) के शिक्षक बन गए थे। स्त्री-पुरुष संघ में कई कारणों से जाते थे:
  1. आध्यात्मिक उन्नति की इच्छा: संघ में शामिल होकर वे सांसारिक जीवन की मोह-माया, संपत्ति और सुखों का त्याग कर एक सादा और अनुशासित जीवन व्यतीत करते थे, जिसका उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना और मोक्ष की ओर बढ़ना था।
  2. धम्म का प्रसार: संघ के सदस्य धम्म के शिक्षक बनते थे और समाज में इसके प्रसार में योगदान देते थे।
  3. समानता का अनुभव: संघ में प्रवेश के बाद, सभी सदस्यों को उनकी पिछली सामाजिक पहचान या लिंग की परवाह किए बिना समान माना जाता था। यह समानता उन्हें एक नई पहचान और समुदाय का अनुभव प्रदान करती थी।
  4. सादा जीवन: संघ के सदस्य केवल जीवनयापन के लिए आवश्यक न्यूनतम वस्तुएँ रखते थे, जिससे वे भौतिकवादी जीवन की चिंताओं से मुक्त हो जाते थे।
शुरू में केवल पुरुष ही संघ में शामिल हो सकते थे, लेकिन बाद में महिलाओं को भी अनुमति मिल गई, जिससे यह सभी के लिए आध्यात्मिक जीवन जीने का एक मार्ग बन गया।

प्रश्न 6

साँची की मूर्ति-कला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है?
Solution: साँची की मूर्ति-कला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से अत्यधिक सहायता मिलती है। समकालीन बौद्ध ग्रंथों में विभिन्न दार्शनिक और चिंतन परंपराओं का उल्लेख मिलता है, जो मूर्तियों में चित्रित दृश्यों और प्रतीकों के अर्थ को समझने में मदद करते हैं। इतिहासकार मूर्तियों में दर्शाई गई कहानियों का अध्ययन करते हैं और उनकी तुलना पाठ्य साक्ष्यों से करके उनका अर्थ निकालते हैं।

उदाहरण के लिए:

  • बुद्ध के जीवन से संबंधित घटनाओं, जैसे कि बुद्ध के चरित लेखन में वर्णित आत्मज्ञान प्राप्त करने की घटना, मूर्तिकला को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
  • प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को सीधे मानव रूप में चित्रित करने के बजाय प्रतीकों का उपयोग किया। जैसे, एक रिक्त स्थान (empty space) बुद्ध के ध्यान को इंगित करता था, जबकि एक स्तूप उनके महापरिनिर्वाण (मृत्यु के बाद की अवस्था) का प्रतिनिधित्व करता था।
  • सारनाथ में बुद्ध द्वारा दिए गए प्रथम धर्मोपदेश को दर्शाने के लिए 'पहिया' (wheel) प्रतीक का प्रयोग किया जाता था।
  • साँची में उत्कीर्णित कुछ मूर्तियाँ, जैसे कि सुंदर स्त्रियाँ जो पेड़ से झूलती हुई दिखाई देती हैं, संभवतः बौद्ध मत से सीधे जुड़ी नहीं थीं, लेकिन वे तत्कालीन सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की झलक देती हैं।
  • जानवरों को भी अक्सर मानवीय विशेषताओं के प्रतीक के रूप में चित्रित किया जाता था, जैसे शक्ति और ज्ञान को दर्शाने के लिए हाथी।
इस प्रकार, बौद्ध साहित्य मूर्तिकला में प्रयुक्त प्रतीकों, कथाओं और धार्मिक अवधारणाओं की व्याख्या करने के लिए एक आवश्यक संदर्भ प्रदान करता है, जिससे हम साँची की कला को गहराई से समझ पाते हैं।

Common mistakes

  • उपनिषदों के विचारों और नियतिवाद/भौतिकवाद के बीच सूक्ष्म अंतर को समझने में कठिनाई।
  • जैन धर्म की शिक्षाओं को केवल अहिंसा तक सीमित समझना, कर्म और त्याग के महत्व को अनदेखा करना।
  • साँची स्तूप के संरक्षण में योगदान देने वाली विशिष्ट हस्तियों और उनके कार्यों को याद रखने में भ्रम।
  • बौद्ध प्रतीकों (जैसे रिक्त स्थान, पहिया) के अर्थ को गलत समझना।

Revision tips

  • प्रत्येक दार्शनिक विचारधारा (उपनिषद, नियतिवाद, भौतिकवाद) के मुख्य बिंदुओं को सारणीबद्ध करें।
  • जैन धर्म के पंच महाव्रतों और कर्म सिद्धांत को याद करने के लिए फ्लैशकार्ड का उपयोग करें।
  • साँची स्तूप से संबंधित ऐतिहासिक व्यक्तियों और उनके योगदानों की एक सूची बनाएं।
  • बौद्ध साहित्य में वर्णित प्रतीकों और उनसे संबंधित मूर्तिकला को जोड़कर समझें।

Practice MCQs

Q1. उपनिषदों के दार्शनिकों का पुनर्जन्म के संबंध में क्या विश्वास था?

Q2. जैन धर्म के अनुसार, जीवों के प्रति किस प्रकार का व्यवहार महत्वपूर्ण है?

Q3. साँची स्तूप के संरक्षण में किसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?

Q4. बौद्ध मूर्तिकला में 'रिक्त स्थान' (empty space) किसका प्रतीक था?

Q5. त्रिपिटक जानने वाली भिक्खुनी धनवती ने अपने अभिलेख में किस शासक का उल्लेख किया है?

Frequently asked questions

यह NCERT समाधान किस कक्षा और विषय के लिए है?

यह NCERT समाधान कक्षा 12 के लिए "भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I - II - III" पुस्तक के अध्याय 4 "विचारक, विश्वास और इमारतें: सांस्कृतिक विकास" के लिए है।

क्या इन समाधानों में सभी प्रश्न शामिल हैं?

हाँ, ये समाधान स्रोत में दिए गए सभी प्रश्नों (Q1 से Q6) को कवर करते हैं, जिसमें लघु निबंध प्रश्न भी शामिल हैं।

जैन धर्म की मुख्य शिक्षाएँ क्या हैं?

जैन धर्म की मुख्य शिक्षाओं में सभी जीवों के प्रति अहिंसा, कर्म के सिद्धांत के अनुसार जन्म-पुनर्जन्म का चक्र, और कर्म से मुक्ति के लिए त्याग व तपस्या शामिल हैं। साधु-साध्वी पंच महाव्रत (हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य, धन संग्रह न करना) का पालन करते हैं।

साँची स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों का क्या योगदान था?

भोपाल की बेगमों, विशेष रूप से शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम, ने साँची स्तूप के रख-रखाव के लिए धन अनुदान दिया। सुल्तानजहाँ बेगम ने एक संग्रहालय और अतिथिशाला के निर्माण के लिए भी अनुदान दिया और जॉन मार्शल की पुस्तकों के प्रकाशन में सहायता की।

बौद्ध मूर्तिकला में बुद्ध को प्रतीकों द्वारा क्यों दर्शाया गया?

प्रारंभिक बौद्ध मूर्तिकला में, बुद्ध को सीधे मानव रूप में चित्रित करने के बजाय प्रतीकों जैसे रिक्त स्थान (ध्यान), स्तूप (महापरिनिर्वाण), और पहिया (प्रथम उपदेश) का उपयोग करके उनकी उपस्थिति को दर्शाया गया।

यह समाधान परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करेगा?

ये समाधान प्रत्येक प्रश्न के उत्तर को विस्तृत और स्पष्ट तरीके से प्रस्तुत करते हैं, जिससे छात्रों को अवधारणाओं को गहराई से समझने और परीक्षा में पूछे जाने वाले विभिन्न प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देने में मदद मिलती है।

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