CBSE Class 12 Hindi Aroh Chapter 14: पहलवान की ढोलक NCERT Solutions
This section provides NCERT Solutions for Chapter 14, 'Pahalwan ki Dholak', from the CBSE Class 12 Hindi Aroh textbook. The chapter explores the poignant story of Lutthan, a wrestler, and his unwavering spirit, symbolized by the rhythmic beat of his 'dholak' (drum). It delves into themes of societal change, the marginalization of traditional arts and artists in the face of modernization, and the resilience of the human spirit amidst adversity like poverty and epidemics. The solutions offer a deep dive into the narrative, character analysis, and the underlying social commentary, aiding students in comprehending the story's emotional depth and its critique of changing times. These solutions are designed to help students prepare effectively for their board examinations by providing clear explanations and insights into the chapter's content.
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 12 |
| Subject | Hindi Aroh |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | Chapter 14 |
Chapter summary
Chapter 14, 'Pahalwan ki Dholak', focuses on the life of wrestler Lutthan and the significance of his 'dholak'. The solutions cover the story's progression, highlighting how traditional art forms and artists become irrelevant with societal shifts. It examines Lutthan's struggle against poverty, disease, and the changing times, with his 'dholak' serving as a source of strength for him and the villagers. The chapter's core message revolves around the fate of folk art and artists in a modernizing India, prompting reflection on the value of traditional culture.
Learning outcomes
- Understand the story of Lutthan wrestler and the role of his 'dholak'.
- Analyze the theme of societal change and its impact on traditional artists.
- Identify the symbolism of the 'dholak' in the narrative.
- Explore the challenges of poverty and epidemics as depicted in the story.
- Reflect on the relevance of folk art in contemporary society.
- Appreciate the resilience of the human spirit in the face of adversity.
Topics covered
Paper topics
- फणीश्वर नाथ रेणु का जीवन परिचय
- फणीश्वर नाथ रेणु की रचनाएँ
- आंचलिक साहित्य की विशेषताएँ
- पहलवान की ढोलक कहानी का प्रतिपाद्य
- पहलवान की ढोलक कहानी का सारांश
- लुट्टन पहलवान का चरित्र चित्रण
- ढोलक का प्रतीकात्मक महत्व
- व्यवस्था परिवर्तन का प्रभाव
- लोक-कला और कलाकार की प्रासंगिकता
- गरीबी और महामारी का चित्रण
- मानवीय संघर्ष और resilience
- भारतीय समाज में बदलाव
Important topics
- पहलवान की ढोलक कहानी का प्रतिपाद्य और सारांश
- लुट्टन पहलवान का चरित्र और उसकी ढोलक का महत्व
- व्यवस्था परिवर्तन का लोक-कलाकारों पर प्रभाव
- आंचलिकता और लोक-जीवन का चित्रण
- कहानी में निहित सामाजिक और सांस्कृतिक प्रश्न
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Questions and Solutions
लेखक परिचय
Solution: फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च, 1921 को बिहार के पूर्णिया जिले (अब अरिया) के औराही हिंगना में हुआ था। वे हिंदी साहित्य में आंचलिक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में सक्रिय भाग लिया और 1950 में नेपाली जनता को राजशाही दमन से मुक्ति दिलाने में भी योगदान दिया। भारत सरकार ने उन्हें उनकी साहित्य-साधना और राष्ट्रीय भावना के लिए 'पदमश्री' से सम्मानित किया। 11 अप्रैल, 1977 को पटना में उनका निधन हो गया।
उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं:
- उपन्यास: मैला आँचल, परती परिकथा, दीर्घतपा, कितने चौराहे।
- कहानी-संग्रह: ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप।
- संस्मरण: ऋणजल धनजल, वनतुलसी की गंध, श्रुत-अश्रुत पूर्व।
- रिपोतज: नेपाली क्रांति कथा।
उनकी समस्त रचनाएँ 'रेणु रचनावली' के नाम से पाँच खंडों में प्रकाशित हैं।
साहित्यिक विशेषताएँ
Solution: फणीश्वर नाथ रेणु हिंदी साहित्य में एक प्रमुख आंचलिक कथाकार के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की, जिसने उनके रचनात्मक साहित्य को एक नया तेवर दिया।
उनकी साहित्यिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- आंचलिकता: 1954 में प्रकाशित उनके उपन्यास 'मैला आँचल' ने हिंदी उपन्यास विधा को नई दिशा दी और आंचलिक उपन्यासों पर विमर्श की शुरुआत की। उन्होंने गाँव की भाषा, संस्कृति और लोक-जीवन को केंद्र में रखा, जिसमें लोकगीत, लोकोक्ति, लोक-संस्कृति, लोकभाषा और लोकनायक की अवधारणाएँ शामिल हैं। उनके साहित्य में अंचल का कच्चा और अनगढ़ रूप प्रस्तुत होता है, जो शस्य-श्यामल होने के साथ-साथ धूल-भरा और मैला भी है।
- सामाजिक सरोकार: आजादी के बाद जब विकास शहरों में केंद्रित हो रहा था, तब रेणु ने अंचल की समस्याओं को अपने साहित्य में स्थान दिया।
- भाषा-शैली: उनकी भाषा अंचल-विशेष से प्रभावित है और आम बोलचाल की भाषा को अपनाती है। उन्होंने मिश्रित शब्दावली का प्रयोग किया है। गंभीर विषयों पर उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ हो जाती है। उनकी भाषा में चित्रात्मकता, भाव-प्रवाह के अनुसार छोटे वाक्य और विशेषणों का सुंदर प्रयोग मिलता है। भाषा की सार्थकता बोली के साहचर्य में ही है, इस अवधारणा को भी उनकी रचनाएँ पुष्ट करती हैं।
पाठ का प्रतिपाद्य
Solution: 'पहलवान की ढोलक' कहानी मुख्य रूप से व्यवस्था परिवर्तन के साथ लोक-कला और इसके कलाकारों के अप्रासंगिक हो जाने की मार्मिक व्यथा को प्रस्तुत करती है। कहानी में राजा साहब की जगह नए राजकुमार का आगमन केवल सत्ता का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह पुरानी व्यवस्था के पूर्णतः उलट जाने और उस पर सभ्यता के नाम पर एक नई व्यवस्था के आरोपित हो जाने का प्रतीक है। यह 'भारत' पर 'इंडिया' के छा जाने की समस्या को दर्शाता है, जो लुट्टन पहलवान जैसे लोक-कलाकार को उसकी पहचान और सम्मान से वंचित कर देता है।
ऐसी परिस्थितियों में, जहाँ गाँव गरीबी और महामारी से जूझ रहा है, लुट्टन पहलवान अपनी जीवटता और ढोलक की आवाज़ के माध्यम से न केवल स्वयं को जीवित रखता है, बल्कि भूख और मौत से लड़ रहे गाँव वालों को भी लड़ने की ताकत प्रदान करता है। कहानी के अंत में, जब भूख और महामारी के रूप में आई मौत लुट्टन की पहलवानी को परास्त कर देती है, तो यह करुणा और त्रासदी पाठक के मन में कई प्रश्न छोड़ जाती है: क्या कला की प्रासंगिकता व्यवस्था पर निर्भर करती है, या उसका अपना स्वतंत्र मूल्य भी है? मनुष्यता और जीवन-सौंदर्य के लिए लोक-कलाओं को प्रासंगिक बनाए रखने में हमारी क्या भूमिका हो सकती है? यह पाठ इन गंभीर प्रश्नों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।
कहानी का सारांश
Solution: 'पहलवान की ढोलक' कहानी सर्द मौसम में मलेरिया और हैजे से पीड़ित एक गाँव के अँधेरे और निस्तब्ध माहौल का चित्रण करती है। अमावस्या की रात में, जब केवल तारे ही प्रकाश दे रहे होते हैं और सियारों व उल्लुओं की डरावनी आवाज़ें सन्नाटे को भंग करती हैं, तब भी गाँव में एक आवाज़ लगातार गूँजती रहती है - पहलवान लुट्टन की ढोलक की आवाज़। यह ढोलक की आवाज़ संध्या से सुबह तक एक ही लय में बजती रहती है और मृतप्राय गाँव में संजीवनी शक्ति का संचार करती है।
लुट्टन पहलवान, जो नौ वर्ष की आयु में अनाथ हो गया था और अपनी विधवा सास द्वारा पाला गया था, बचपन से ही कसरत करता था। किशोरावस्था में ही वह पहलवान बन गया। एक बार श्यामनगर मेले में उसने 'शेर के बच्चे' के नाम से प्रसिद्ध चाँद सिंह को कुश्ती के लिए चुनौती दी। चाँद सिंह, जो बादल सिंह का शिष्य था और कई पहलवानों को हरा चुका था, अपनी श्रेष्ठता के लिए दहाड़ता फिरता था। वृद्ध राजा साहब, जो शिकार-प्रिय थे, लुट्टन को अपने दरबार में रखना चाहते थे, लेकिन लुट्टन ने चाँद सिंह को चुनौती देकर सबको चौंका दिया।
शुरुआत में दर्शक लुट्टन को पागल समझ रहे थे। चाँद सिंह बाज की तरह उस पर झपटा, पर लुट्टन ने कुशलता से आक्रमण को संभाला। राजा ने लुट्टन को कुश्ती से हटने को कहा, लेकिन उसने लड़ने की इजाजत माँगी। मैनेजर और सिपाहियों के समझाने पर भी जब वह नहीं माना, तो उसने पत्थर पर माथा पटककर मर जाने की धमकी दी। भीड़ अधीर हो रही थी, और पंजाबी पहलवान लुट्टन को देखकर...
Common mistakes
- Overlooking the symbolic significance of the 'dholak'.
- Failing to connect Lutthan's personal struggles with broader societal changes.
- Interpreting the story solely as a narrative of a wrestler without considering its social commentary.
- Not recognizing the critique of modernization's impact on traditional arts.
Revision tips
- Focus on the symbolism of the 'dholak' and its connection to Lutthan's spirit.
- Analyze how the changing times affect Lutthan and his art.
- Understand the socio-economic conditions described in the story.
- Consider the questions raised by the author about the relevance of folk art.
- Read the summary and then refer to specific parts of the story for details.
Practice MCQs
Q1. कहानी 'पहलवान की ढोलक' में मलेरिया और हैजे जैसी बीमारियों का प्रकोप किस समय दिखाया गया है?
Explanation: कहानी में मलेरिया और हैजे के प्रकोप का वर्णन अमावस्या की ठंडी, निस्तब्ध रात के संदर्भ में किया गया है, जो माहौल की गंभीरता को बढ़ाता है।
Q2. लुट्टन पहलवान को पालने-पोसने का काम किसने किया?
Explanation: लुट्टन नौ वर्ष की आयु में अनाथ हो गया था और उसकी शादी हो चुकी थी। उसकी विधवा सास ने ही उसे पाला और उसकी देखभाल की।
Q3. श्यामनगर के दंगल में लुट्टन पहलवान ने किसे चुनौती दी थी?
Explanation: लुट्टन ने श्यामनगर के मेले में 'शेर के बच्चे' के नाम से प्रसिद्ध चाँद सिंह को कुश्ती के लिए चुनौती दी थी।
Q4. कहानी के अनुसार, व्यवस्था परिवर्तन का प्रतीक क्या है?
Explanation: कहानी में राजा साहब की जगह नए राजकुमार का आना केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि पुरानी व्यवस्था के पूरी तरह उलट जाने और नई व्यवस्था के आरोपित होने का प्रतीक है।
Q5. लुट्टन पहलवान की ढोलक गाँव वालों के लिए किसका प्रतीक थी?
Explanation: भयंकर बीमारी और मौत के माहौल में भी लुट्टन की ढोलक की आवाज़ मृतप्राय गाँव में संजीवनी शक्ति भरने का काम करती थी।
Frequently asked questions
यह NCERT समाधान किस कक्षा और विषय के लिए हैं?
यह NCERT समाधान CBSE कक्षा 12 के हिंदी आरोह भाग-2 के लिए हैं, विशेष रूप से अध्याय 14 'पहलवान की ढोलक' पर केंद्रित हैं।
'पहलवान की ढोलक' कहानी का मुख्य विषय क्या है?
कहानी का मुख्य विषय व्यवस्था परिवर्तन के साथ लोक-कला और कलाकारों के अप्रासंगिक हो जाने की त्रासदी है, साथ ही गरीबी और महामारी के बीच मानवीय संघर्ष और resilience को भी दर्शाया गया है।
कहानी में ढोलक का क्या महत्व है?
कहानी में ढोलक लुट्टन पहलवान के लिए जीवन शक्ति का स्रोत है और यह मृतप्राय गाँव में भी संजीवनी शक्ति भरने का काम करती है, जो कठिन समय में आशा का प्रतीक है।
ये समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करेंगे?
ये समाधान कहानी के सार, पात्रों, विषयों और निहितार्थों की विस्तृत व्याख्या प्रदान करते हैं, जिससे छात्रों को अध्याय की गहरी समझ विकसित करने और परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों का उत्तर देने में मदद मिलती है।
क्या कहानी में सामाजिक परिवर्तन का कोई पहलू है?
हाँ, कहानी में 'भारत' पर 'इंडिया' के छा जाने की समस्या को दर्शाया गया है, जहाँ पुरानी व्यवस्था और लोक-कलाओं की जगह नई सभ्यता और व्यवस्था हावी हो जाती है।
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