CBSE Class 12 Hindi Chapter 3: अतीत में दबे पाँव NCERT Solutions
This section provides NCERT Solutions for Class 12 Hindi, Chapter 3, titled 'अतीत में दबे पाँव' (Footprints of the Past). The chapter delves into the historical significance and urban planning of ancient civilizations, primarily focusing on Mohenjo-daro and Harappa. It discusses the architectural marvels, societal structures, and daily life as revealed through archaeological findings. The solutions aim to help students understand the detailed insights into these ancient cities, their layout, public utilities like the Great Bath, and the evidence of their trade and agriculture. This resource is designed to aid students in comprehending the historical context and archaeological evidence presented in the chapter, making exam preparation more effective.
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 12 |
| Subject | हिंदी |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 3. अतीत में दबे पाँव |
Chapter summary
NCERT Solutions for Class 12 Hindi, Chapter 3, 'अतीत में दबे पाँव', offers an in-depth exploration of the ancient cities of Mohenjo-daro and Harappa. It covers aspects of urban planning, architectural features, and the archaeological discoveries that shed light on the civilization's lifestyle, trade, and agriculture. The solutions help students grasp the significance of these findings and the meticulous details of the ancient urban landscape.
Learning outcomes
- Understand the historical significance of Mohenjo-daro and Harappa.
- Analyze the urban planning and architectural features of ancient cities.
- Identify key archaeological findings and their implications.
- Appreciate the insights into the daily life, trade, and agriculture of the Indus Valley Civilization.
- Develop critical thinking skills by examining historical evidence.
Topics covered
Paper topics
- Introduction to Om Thanvi
- Summary of 'Footprints of the Past'
- Mohenjo-daro and Harappa as planned cities
- Urban planning and grid system
- Archaeological findings (statues, pottery, seals)
- The Great Bath (Mahakund)
- Citadel and residential areas
- Evidence of trade and agriculture
- Indus Valley Civilization's lifestyle
- Comparison with modern city planning
Important topics
- Mohenjo-daro's urban planning and layout
- The Great Bath and its significance
- Archaeological evidence of daily life
- Comparison of ancient and modern city planning
- Harappa's historical context
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Questions and Solutions
यह पाठ सिंधु घाटी सभ्यता के दो प्रमुख नगरों - हड़प्पा और मुअनजो-दड़ो - के पुरातात्विक अवशेषों और उनके सुनियोजित शहरी जीवन का वर्णन करता है। लेखक ओम थानवी हमें इन प्राचीन शहरों की गलियों, मकानों, सार्वजनिक स्नान कुंडों और अन्य संरचनाओं के माध्यम से उस समय के जीवन की झलक दिखाते हैं। यह समाधान छात्रों को पाठ के मुख्य बिंदुओं, शहरी नियोजन की विशेषताओं, पुरातात्विक साक्ष्यों और तत्कालीन समाज की जीवनशैली को समझने में मदद करेगा, जिससे वे परीक्षा की तैयारी बेहतर ढंग से कर सकें।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1
पाठ के अनुसार, हड़प्पा और मुअनजो-दड़ो को दुनिया के सबसे पुराने नियोजित शहर माना जाता है। मुअनजो-दड़ो ताम्रपाषाण काल के शहरों में सबसे बड़ा था और इसे सभ्यता का केंद्र माना जाता है। यह लगभग दो सौ हेक्टेयर क्षेत्र में फैला था और इसकी आबादी लगभग पचासी हजार थी। शहर को छोटे-मोटे टीलों पर बसाया गया था, जिन्हें कच्ची-पक्की ईंटों से ऊँचा उठाया गया था। यहाँ की सड़कें, गलियाँ, मकान, चबूतरे, खिड़कियाँ और रसोई आज भी उस समय के सुंदर नगर-नियोजन की कहानी कहते हैं। हालाँकि हड़प्पा के अधिकांश साक्ष्य रेल लाइन बिछाने के दौरान नष्ट हो गए, मुअनजो-दड़ो अपने मूल स्वरूप में काफी हद तक बचा हुआ है, जिससे हमें उस काल की उन्नत सभ्यता की जानकारी मिलती है।
प्रश्न 2
मुअनजो-दड़ो को 'सभ्यता का केंद्र' इसलिए कहा गया है क्योंकि यह ताम्रपाषाण काल के सबसे बड़े और सबसे सुनियोजित शहरों में से एक था। पाठ में इसके बारे में निम्नलिखित बातें बताई गई हैं:
- यह लगभग 200 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला था और इसकी आबादी लगभग 85,000 थी।
- शहर को प्राकृतिक टीलों पर नहीं, बल्कि कच्ची-पक्की ईंटों से ऊँचा उठाकर बसाया गया था।
- यहाँ की सड़कें और गलियाँ व्यवस्थित थीं, जो एक उत्कृष्ट नगर-नियोजन का प्रमाण हैं।
- खुदाई में बड़ी संख्या में इमारतें, धातु-पत्थर की मूर्तियाँ, चाक पर बने चित्रित भौंडे (बर्तन), मुहरें, औजार और खिलौने मिले हैं।
- शहर के सबसे ऊँचे हिस्से पर एक बड़ा बौद्ध स्तूप है, जिसके पश्चिम में प्रशासनिक इमारतें, सभा-भवन, ज्ञानशाला और कोठार जैसे महत्वपूर्ण भवन थे।
- यहाँ का महाकुंड (Great Bath) सामूहिक स्नान के लिए प्रयोग किया जाता था और यह जल-निकासी की सुव्यवस्थित व्यवस्था का प्रतीक है।
प्रश्न 3
पाठ में मुअनजो-दड़ो के महाकुंड को 'दैव मार्ग' कहा गया है और यह संभवतः सामूहिक स्नान के लिए प्रयोग किया जाता था। यह कुंड अपने मूल स्वरूप में बचा हुआ है और इसकी वास्तुकला प्रभावशाली है।
- आकार: यह 40 फुट लंबा, 25 फुट चौड़ा और 7 फुट गहरा था।
- निर्माण: इसका निर्माण पक्की ईंटों से किया गया था।
- जल रिसाव रोकथाम: पानी के रिसाव को रोकने और गंदे पानी से बचाव के लिए कुंड की दीवारों और तल पर चूने व चिरोड़ी के गारे का प्रयोग किया गया था।
- सुविधाएँ: इसके उत्तर और दक्षिण दिशा से सीढ़ियाँ उतरती थीं। कुंड के तीन तरफ साधुओं के कक्ष थे और उत्तर में दो पाँत में आठ स्नानघर बने थे, जिनमें किसी का दरवाजा दूसरे के सामने नहीं खुलता था।
- जल आपूर्ति और निकासी: पानी के लिए एक तरफ कुआँ था और कुंड से पानी बाहर निकालने के लिए पक्की ईंटों से बनी और ढकी हुई नालियाँ थीं।
प्रश्न 4
मुअनजो-दड़ो की नगर-नियोजन की विशेषताएँ इसे एक अत्यंत विकसित और व्यवस्थित शहर बनाती हैं:
- ग्रिड प्लान: अधिकांश सड़कें सीधी थीं या एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं, जिसे वास्तुकार 'ग्रिड प्लान' कहते हैं। यह आधुनिक चंडीगढ़ या ब्रासीलिया जैसे शहरों की योजना से मिलता-जुलता है, लेकिन मुअनजो-दड़ो में स्वयं विकसित होने की क्षमता अधिक थी।
- ऊँचाई पर बसावट: शहर को प्राकृतिक टीलों पर नहीं, बल्कि कच्ची-पक्की ईंटों से धरती की सतह को ऊँचा उठाकर बसाया गया था, जिससे बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचाव होता था।
- सड़कें और गलियाँ: सड़कें और गलियाँ चौड़ी और सीधी थीं, जिससे आवागमन सुगम होता था।
- मकान: मकान भी पक्की ईंटों से बने थे और उनकी बनावट में नगर-नियोजन का ध्यान रखा गया था।
- जल निकासी व्यवस्था: शहर में जल-निकासी की अत्यंत सुव्यवस्थित व्यवस्था थी, जिसमें नालियाँ पक्की ईंटों से बनी और ढकी हुई थीं।
- सार्वजनिक सुविधाएँ: महाकुंड जैसी सार्वजनिक सुविधाएँ नगर-नियोजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थीं।
प्रश्न 5
पाठ के अनुसार, सिंधु घाटी सभ्यता में खेती और व्यापार के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं, जो इसे एक समृद्ध सभ्यता बनाते हैं:
- खेती:
- यहाँ कपास, गेहूँ, जौ, सरसों और चने की उपज के सबूत मिले हैं।
- इसके अतिरिक्त, बेर, खजूर, खरबूजे, अंगूर, ज्वार, बाजरा और रागी जैसी फसलें भी उगाई जाती थीं।
- यहाँ से मिला सूती कपड़ा दुनिया के सबसे पुराने नमूनों में से एक है, जो उन्नत कृषि और वस्त्र-निर्माण का प्रमाण है।
- व्यापार:
- पत्थर और ताँबे की बहुतायत थी, जिनका उपयोग औजार बनाने में होता था। पत्थर सिंध से और ताँबा राजस्थान से आता था, जो व्यापार की ओर संकेत करता है।
- विशाल कोठार (अनाज भंडार) मिले हैं, जहाँ संभवतः कर के रूप में प्राप्त अनाज जमा किया जाता था, जो संगठित व्यापार और संग्रहण प्रणाली को दर्शाता है।
- उत्तर की एक गली में बैलगाड़ियों के प्रयोग के साक्ष्य मिले हैं, जो माल की ढुलाई के लिए उपयोग की जाती होंगी।
- ऊन और लिनन का आयात सुमेर से होता था, जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का प्रमाण है।
प्रश्न 6
लेखक ने मुअनजो-दड़ो के नगर-नियोजन की तुलना ब्रासीलिया, चंडीगढ़ और इस्लामाबाद जैसे आधुनिक ग्रिड शैली के शहरों से की है। मुअनजो-दड़ो की तरह इन आधुनिक शहरों में भी सड़कें सीधी और आड़ी (ग्रिड प्लान) होती हैं। लेखक का मानना है कि यह नियोजन व्यवस्था आधुनिक कॉलोनियों में भी देखने को मिलती है, लेकिन वह इसे रहन-सहन को नीरस बना सकती है। हालाँकि, लेखक यह भी इंगित करते हैं कि मुअनजो-दड़ो जैसे प्राचीन शहर में स्वयं विकसित होने की क्षमता अधिक थी, जबकि आधुनिक ग्रिड शैली के शहरों में यह क्षमता कम पाई जाती है। इस तुलना के माध्यम से लेखक प्राचीन नगर-नियोजन की उत्कृष्टता और उसकी दीर्घकालिक प्रासंगिकता को उजागर करते हैं।
प्रश्न 7
पाठ में 'गढ़' का उल्लेख मुअनजो-दड़ो के सबसे ऊँचे चबूतरे के रूप में किया गया है, जहाँ एक बड़ा बौद्ध स्तूप स्थित है। इस 'गढ़' के ठीक पश्चिम में दुनिया की प्रसिद्ध इमारतों के खंडहर हैं, जिनमें प्रशासनिक इमारतें, सभा-भवन, ज्ञानशाला और कोठार शामिल हैं। 'गढ़' के ठीक सामने, यानी चबूतरे के पश्चिम की ओर, 'उच्च वर्ग की बस्ती' का उल्लेख किया गया है। इसके पीछे, दक्षिण दिशा में, पाँच किलोमीटर दूर सिंधु नदी बहती है। लेखक यह भी बताते हैं कि इस उच्च वर्ग की बस्ती के पीछे टूटे-फूटे घर कामगारों के थे। इसका तात्पर्य यह है कि मुअनजो-दड़ो में सामाजिक और आर्थिक आधार पर बस्तियों का विभाजन था। 'गढ़' संभवतः प्रशासनिक और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र था, जबकि उसके पास उच्च वर्ग के लोग रहते थे। कामगारों के घर थोड़ी दूरी पर थे। लेखक यह प्रश्न भी उठाते हैं कि क्या निम्न वर्ग का अस्तित्व था या उनके घर इतने कमजोर थे कि समय के साथ नष्ट हो गए। यह विभाजन तत्कालीन समाज की संरचना को समझने में मदद करता है।
प्रश्न 8
लेखक ने सिंधु घाटी सभ्यता को 'खेतिहर व पशुपालक सभ्यता' इसलिए कहा है क्योंकि पुरातात्विक खुदाई से प्राप्त साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि इस सभ्यता के लोग कृषि और पशुपालन पर बहुत अधिक निर्भर थे। पाठ में निम्नलिखित प्रमाण दिए गए हैं:
- कृषि: यहाँ कपास, गेहूँ, जौ, सरसों, चना, बेर, खजूर, खरबूजे, अंगूर, ज्वार, बाजरा और रागी जैसी विभिन्न प्रकार की फसलें उगाई जाती थीं। कपास की खेती का प्रमाण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ से मिला सूती कपड़ा दुनिया के सबसे पुराने नमूनों में से एक है।
- पशुपालन: हालाँकि पाठ में सीधे तौर पर पशुपालन का विस्तृत वर्णन नहीं है, लेकिन यह माना जाता है कि कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी जीवन का एक अभिन्न अंग था, जो उस समय की किसी भी सभ्यता के लिए स्वाभाविक था। बैलगाड़ियों के साक्ष्य भी माल ढुलाई में पशुओं के उपयोग की ओर इशारा करते हैं।
प्रश्न 9
पाठ के अनुसार, सिंधु घाटी सभ्यता में पत्थर और ताँबे का प्रचुर मात्रा में प्रयोग होता था। पत्थर औजारों और अन्य उपयोगी वस्तुएँ बनाने के काम आते थे, जो संभवतः सिंध क्षेत्र से प्राप्त होते थे। ताँबे का प्रयोग भी औजारों और संभवतः मूर्तियों व अन्य कलाकृतियों के निर्माण में किया जाता था, जो राजस्थान जैसे क्षेत्रों से आयात किया जाता था। हालाँकि, पाठ स्पष्ट रूप से बताता है कि इस सभ्यता में **लोहे का प्रयोग नहीं होता था**। यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है क्योंकि लोहे का ज्ञान बाद के काल में हुआ। धातुओं के संदर्भ में, यह सभ्यता मुख्य रूप से ताम्रपाषाण (ताँबा और पत्थर) युग से संबंधित थी, न कि लौह युग से।
प्रश्न 10
लेखक ने मुअनजो-दड़ो की जल-निकासी व्यवस्था की प्रशंसा इसलिए की है क्योंकि यह अत्यंत सुव्यवस्थित, उन्नत और उस समय के हिसाब से अभूतपूर्व थी। पाठ में इसके निम्नलिखित पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है:
- पक्की नालियाँ: शहर की नालियाँ पक्की ईंटों से बनी थीं, जो उनकी मजबूती और टिकाऊपन को दर्शाती हैं।
- ढकी हुई नालियाँ: इन नालियों को ईंटों से ढका भी जाता था, जिससे स्वच्छता बनी रहती थी और गंदगी फैलने का खतरा कम होता था।
- महाकुंड से जुड़ाव: महाकुंड से पानी को बाहर बहाने के लिए भी विशेष नालियों की व्यवस्था थी, जो कुंड के पानी के निकास को सुनिश्चित करती थी।
- समग्र नियोजन: यह व्यवस्था केवल सड़कों तक सीमित नहीं थी, बल्कि घरों से निकलने वाले पानी के निकास का भी ध्यान रखती थी।
Common mistakes
- Confusing details between Harappa and Mohenjo-daro.
- Underestimating the sophistication of ancient urban planning.
- Misinterpreting the purpose of structures like the Great Bath.
- Overlooking the evidence of trade and agriculture in the civilization.
Revision tips
- Focus on the unique features of Mohenjo-daro's urban planning.
- Memorize key structures like the Great Bath and the citadel.
- Understand the evidence presented for trade and agricultural practices.
- Relate the archaeological findings to the daily life of the inhabitants.
- Review the author's observations on modern city planning in comparison to ancient ones.
Practice MCQs
Q1. मुअनजो-दड़ो को किस काल का सबसे बड़ा नियोजित शहर माना जाता है?
Explanation: मुअनजो-दड़ो को ताम्रपाषाण काल के शहरों में सबसे बड़ा और नियोजित शहर माना जाता है, जो कांस्य युग से संबंधित है।
Q2. हड़प्पा सभ्यता के अधिकांश साक्ष्य किस कारण नष्ट हो गए?
Explanation: हड़प्पा के अधिकांश साक्ष्य रेल लाइन बिछाने के विकास कार्य के दौरान नष्ट हो गए थे।
Q3. मुअनजो-दड़ो में 'गढ़' किसे कहा जाता है?
Explanation: मुअनजो-दड़ो में सबसे ऊँचे चबूतरे को 'गढ़' कहा जाता है, जिस पर एक बड़ा बौद्ध स्तूप स्थित है।
Q4. मुअनजो-दड़ो का महाकुंड (Great Bath) किस लिए प्रयोग किया जाता था?
Explanation: महाकुंड को 'दैव मार्ग' भी कहा जाता था और यह सामूहिक स्नान के लिए प्रयोग किया जाता था।
Q5. मुअनजो-दड़ो की सड़कों और गलियों का नियोजन किस शैली का था?
Explanation: मुअनजो-दड़ो की अधिकांश सड़कें सीधी या आड़ी थीं, जिसे वास्तुकार 'ग्रिड प्लान' कहते हैं।
Frequently asked questions
यह पाठ 'अतीत में दबे पाँव' किस बारे में है?
यह पाठ सिंधु घाटी सभ्यता के दो प्रमुख नगरों - हड़प्पा और मुअनजो-दड़ो - के पुरातात्विक अवशेषों और उनके सुनियोजित शहरी जीवन का वर्णन करता है।
मुअनजो-दड़ो की शहरी योजना की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
मुअनजो-दड़ो की मुख्य विशेषताएँ इसकी सीधी सड़कें, गलियाँ, पक्की ईंटों के मकान, जल निकासी व्यवस्था और महाकुंड (Great Bath) जैसी सार्वजनिक सुविधाएँ हैं, जो एक उत्कृष्ट ग्रिड प्लान का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
महाकुंड (Great Bath) का क्या महत्व था?
महाकुंड संभवतः सामूहिक स्नान या धार्मिक अनुष्ठानों के लिए प्रयोग किया जाता था। इसका निर्माण पक्की ईंटों से हुआ था और इसमें जल रिसाव रोकने के पुख्ता इंतजाम थे।
हड़प्पा सभ्यता के लोग किस प्रकार की खेती करते थे?
हड़प्पा सभ्यता के लोग कपास, गेहूँ, जौ, सरसों, चना, बेर, खजूर, खरबूजे, अंगूर, ज्वार, बाजरा और रागी जैसी फसलों की खेती करते थे। वे पशुपालन भी करते थे।
यह समाधान छात्रों की परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करेगा?
यह समाधान पाठ के मुख्य बिंदुओं, पुरातात्विक साक्ष्यों और शहरी नियोजन की विस्तृत जानकारी प्रदान करता है, जिससे छात्रों को विषय को गहराई से समझने और परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों का उत्तर देने में सहायता मिलती है।
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