कक्षा 12 रसायन विज्ञान: तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम NCERT समाधान
यह पृष्ठ कक्षा 12 रसायन विज्ञान के अध्याय 6, 'तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। इसमें अयस्कों के सांद्रण की विभिन्न विधियों जैसे चुंबकीय पृथक्करण और निक्षालन के महत्व पर चर्चा की गई है। समाधान ऊष्मगतिकी के सिद्धांतों, विशेष रूप से एलिंघम आरेख के अनुप्रयोगों की व्याख्या करते हैं, यह समझने के लिए कि विभिन्न तापमानों पर कौन सी धातुएँ दूसरों को अपचयित कर सकती हैं। इसमें हाइड्रोधातुकर्म, फेन प्लवन और अपचयन जैसी धातुकर्म प्रक्रियाओं की भी पड़ताल की गई है, जिसमें यह बताया गया है कि कुछ धातुओं का निष्कर्षण दूसरों की तुलना में अधिक कठिन क्यों है। ये समाधान छात्रों को धातुओं के निष्कर्षण के पीछे के सिद्धांतों को स्पष्ट करने और परीक्षा की तैयारी में मदद करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 12 |
| Subject | रसायन विज्ञान-I |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 6. तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम |
Chapter summary
कक्षा 12 रसायन विज्ञान के अध्याय 6, 'तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम' के ये NCERT समाधान, धातुओं के निष्कर्षण में प्रयुक्त प्रमुख सिद्धांतों और प्रक्रियाओं पर केंद्रित हैं। इसमें अयस्कों के सांद्रण की विधियाँ, जैसे चुंबकीय पृथक्करण और निक्षालन, और धातुकर्म में ऊष्मगतिकी (एलिंघम आरेख) की भूमिका शामिल है। समाधान विभिन्न धातुओं के निष्कर्षण के लिए विशिष्ट विधियों जैसे हाइड्रोधातुकर्म और फेन प्लवन की भी व्याख्या करते हैं, और यह बताते हैं कि कुछ अयस्कों का प्रसंस्करण दूसरों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण क्यों है।
Learning outcomes
- चुंबकीय पृथक्करण विधि द्वारा सांद्रित किए जा सकने वाले अयस्कों की पहचान करना।
- एल्यूमीनियम के निष्कर्षण में निक्षालन प्रक्रिया के महत्व को समझना।
- ऊष्मगतिकी के सिद्धांतों के आधार पर धातुओं के निष्कर्षण की व्यवहार्यता का विश्लेषण करना।
- एलिंघम आरेख का उपयोग करके विभिन्न तापमानों पर धातुओं की अपचयन क्षमता की तुलना करना।
- हाइड्रोधातुकर्म और फेन प्लवन जैसी धातुकर्म विधियों की भूमिका की व्याख्या करना।
- ऑक्साइड अयस्कों की तुलना में पाइराइट से तांबे के निष्कर्षण की कठिनाई के कारणों को समझना।
Topics covered
Paper topics
- अयस्कों का सांद्रण
- चुंबकीय पृथक्करण विधि
- निक्षालन
- धातु निष्कर्षण के ऊष्मगतिकी सिद्धांत
- एलिंघम आरेख
- अपचयन प्रक्रियाएं
- हाइड्रोधातुकर्म
- फेन प्लवन विधि
- अवनमक की भूमिका
- ऑक्साइड अयस्कों का अपचयन
- सल्फाइड अयस्कों का निष्कर्षण
- गिब्स ऊर्जा परिवर्तन
Important topics
- अयस्कों का सांद्रण (चुंबकीय पृथक्करण, निक्षालन)
- एलिंघम आरेख और धातुओं के निष्कर्षण में इसका अनुप्रयोग
- फेन प्लवन विधि और अवनमक की भूमिका
- विभिन्न धातुओं के निष्कर्षण के लिए विशिष्ट विधियाँ
- ऊष्मगतिकी के अनुसार अभिक्रियाओं की व्यवहार्यता
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
उदाहरण के लिए, मैग्नेटाइट (), हेमेटाइट () (कुछ हद तक), और सिडेराइट () (कुछ हद तक) जैसे अयस्कों को इस विधि से सांद्रित किया जा सकता है, क्योंकि इनमें लोहे के ऑक्साइड चुंबकीय गुण प्रदर्शित करते हैं।
प्रश्न 2
निक्षालन प्रक्रिया में, बॉक्साइट अयस्क को एक उपयुक्त अभिकर्मक के साथ उपचारित किया जाता है जो एल्यूमीनियम ऑक्साइड () को तो घुलनशील रूप में परिवर्तित कर देता है या अशुद्धियों को अघुलनशील छोड़ देता है। उदाहरण के लिए, बॉक्साइट को सोडियम हाइड्रॉक्साइड () के सांद्र विलयन के साथ उच्च ताप और दाब पर उपचारित किया जाता है। इस प्रक्रिया में, एल्यूमीनियम ऑक्साइड सोडियम एल्यूमिनेट () के रूप में घुल जाता है, जबकि भी घुल जाता है लेकिन और अघुलनशील रहते हैं और उन्हें छानकर अलग किया जा सकता है। बाद में, सोडियम एल्यूमिनेट विलयन को ठंडा करके और गैस प्रवाहित करके एल्यूमीनियम हाइड्रॉक्साइड () का अवक्षेप प्राप्त किया जाता है, जिसे गर्म करने पर शुद्ध एल्यूमीनियम ऑक्साइड मिलता है। इस प्रकार, निक्षालन एल्यूमीनियम को उसकी अशुद्धियों से अलग करने का एक प्रभावी तरीका है।
प्रश्न 3
इस विशिष्ट अभिक्रिया में, अभिक्रियक (ठोस और ठोस ) कक्ष ताप पर एक-दूसरे के साथ प्रभावी ढंग से अभिक्रिया करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा नहीं रखते हैं। अभिक्रिया को शुरू करने और आगे बढ़ाने के लिए, अभिकारकों को सक्रियण ऊर्जा की बाधा को पार करना होता है। इस ऊर्जा को प्रदान करने के लिए, अभिक्रिया मिश्रण को गर्म करने की आवश्यकता होती है। तापन से अभिकारकों की गतिज ऊर्जा बढ़ती है, जिससे वे अधिक प्रभावी ढंग से टकराते हैं और सक्रियण ऊर्जा की बाधा को पार कर उत्पाद बनाते हैं। इसलिए, यद्यपि अभिक्रिया ऊष्मागतिकी रूप से संभव है, यह कक्ष ताप पर सक्रियण ऊर्जा की कमी के कारण धीमी होती है और इसे सम्पन्न कराने के लिए तापन की आवश्यकता होती है।
प्रश्न 4
एलिंघम आरेख विभिन्न तापमानों पर धातु ऑक्साइड के निर्माण के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन () को दर्शाता है। एक धातु दूसरे धातु ऑक्साइड को तभी अपचयित कर सकती है जब उस धातु के ऑक्साइड के निर्माण के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन, दूसरे धातु ऑक्साइड के निर्माण के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन से अधिक ऋणात्मक हो (अर्थात्, उसका वक्र आरेख पर नीचे हो)।
दिए गए प्रश्न के संदर्भ में, एल्यूमीनियम () और मैग्नीशियम () के लिए एलिंघम आरेख के वक्रों का अध्ययन करने पर, यह पाया जाता है कि वे लगभग 1350°C (या 1623 K) पर एक-दूसरे को काटते हैं।
- जब तापमान 1350°C से कम हो: इस तापमान सीमा में, मैग्नीशियम के ऑक्साइड () के निर्माण के लिए का मान एल्यूमीनियम के ऑक्साइड () के निर्माण के लिए के मान से अधिक ऋणात्मक होता है। इसका मतलब है कि का बनना के बनने की तुलना में अधिक स्वतःप्रवर्तित है। इसलिए, इस तापमान पर, मैग्नीशियम () एक प्रबल अपचायक के रूप में कार्य करता है और एल्यूमीनियम ऑक्साइड () को अपचयित करके एल्यूमीनियम धातु () मुक्त कर सकता है:
- जब तापमान 1350°C से अधिक हो: इस तापमान सीमा में, एल्यूमीनियम के ऑक्साइड () के निर्माण के लिए का मान मैग्नीशियम के ऑक्साइड () के निर्माण के लिए के मान से अधिक ऋणात्मक हो जाता है। इसका मतलब है कि का बनना के बनने की तुलना में अधिक स्वतःप्रवर्तित है। इसलिए, इस तापमान पर, एल्यूमीनियम () एक प्रबल अपचायक के रूप में कार्य करता है और मैग्नीशियम ऑक्साइड () को अपचयित करके मैग्नीशियम धातु () मुक्त कर सकता है:
अतः, ये विशिष्ट परिस्थितियाँ (तापमान) निर्धारित करती हैं कि कौन सी धातु दूसरी धातु के ऑक्साइड को अपचयित कर सकती है।
प्रश्न 1
हाइड्रोधातुकर्म में, एक धातु को उसके अयस्क के विलयन से एक अधिक क्रियाशील धातु द्वारा विस्थापित किया जाता है। यह तभी संभव है जब विस्थापित करने वाली धातु का मानक इलेक्ट्रोड विभव, विलयन में उपस्थित धातु आयन के मानक इलेक्ट्रोड विभव से अधिक ऋणात्मक हो।
जिंक (Zn) और कॉपर (Cu) के लिए मानक इलेक्ट्रोड विभव के मान इस प्रकार हैं:
E^\circ (Zn^{2+}/Zn) = -0.76\,\mathrm{V}
E^\circ (Cu^{2+}/Cu) = +0.34\,\mathrm{V}
चूंकि E^\circ (Zn^{2+}/Zn) का मान E^\circ (Cu^{2+}/Cu) के मान से काफी कम ऋणात्मक है, इसका मतलब है कि जिंक (Zn) कॉपर (Cu) की तुलना में एक प्रबल अपचायक है।
कॉपर का निष्कर्षण: कॉपर के सल्फाइड अयस्कों को पहले भर्जित करके ऑक्साइड में बदला जाता है, और फिर इसे जलीय विलयन में लाया जाता है। इस विलयन से कॉपर को एक अधिक क्रियाशील धातु जैसे आयरन (Fe) द्वारा विस्थापित किया जा सकता है, क्योंकि E^\circ (Fe^{2+}/Fe) = -0.44\,\mathrm{V} जो E^\circ (Cu^{2+}/Cu) से अधिक ऋणात्मक है। हालाँकि, प्रश्न में हाइड्रोधातुकर्म का उल्लेख है, जो अक्सर साइनाइड विलयनों से धातुओं के निष्कर्षण से संबंधित होता है। कॉपर के साइनाइड विलयन से, जिंक (Zn) कॉपर (Cu) को आसानी से विस्थापित कर सकता है क्योंकि जिंक कॉपर से अधिक क्रियाशील है:
[Cu(CN)_2]^- + Zn \longrightarrow [Zn(CN)_2] + Cu \downarrow
जिंक का निष्कर्षण: जिंक का निष्कर्षण हाइड्रोधातुकर्म द्वारा सामान्यतः नहीं किया जाता है क्योंकि जिंक स्वयं एक प्रबल अपचायक है। यदि हम जिंक आयनों () के विलयन से जिंक को विस्थापित करने का प्रयास करें, तो हमें एक ऐसे धातु की आवश्यकता होगी जिसका मानक इलेक्ट्रोड विभव से भी अधिक ऋणात्मक हो, जैसे कि कैल्शियम (), मैग्नीशियम (), या एल्यूमीनियम ()। समस्या यह है कि ये धातुएँ जल के साथ अत्यधिक क्रियाशील होती हैं और हाइड्रोजन गैस () उत्पन्न करती हैं, जिससे वे स्वयं ऑक्सीकृत हो जाती हैं और जिंक को विस्थापित करने के बजाय जल से अभिक्रिया कर लेती हैं। इसलिए, जिंक का निष्कर्षण सामान्यतः विद्युत अपघटनी विधि या कार्बन अपचयन द्वारा किया जाता है।
प्रश्न 2
अवनमक एक ऐसा रासायनिक पदार्थ होता है जिसे फेन प्लवन प्रक्रिया के दौरान मिलाया जाता है। इसका मुख्य कार्य एक विशिष्ट सल्फाइड खनिज की सतह को इस प्रकार संशोधित करना है कि वह फेन (froth) में न आ सके, जबकि अन्य सल्फाइड खनिज फेन में आ सकें। यह चयनित रूप से एक सल्फाइड खनिज के साथ अभिक्रिया करके उसकी सतह के गुणों को बदल देता है, जिससे वह जलरागी (hydrophilic) हो जाता है और फेन बनाने वाले संग्राहक (collector) के साथ जुड़ नहीं पाता।
उदाहरण: यदि हमें लेड सल्फाइड () और जिंक सल्फाइड () के मिश्रण से को अलग करना है, तो हम सोडियम साइनाइड () को अवनमक के रूप में उपयोग कर सकते हैं। चयनित रूप से की सतह पर अधिशोषित (adsorbed) हो जाता है और उसे जलरागी बना देता है, जिससे वह फेन में नहीं आता। दूसरी ओर, की सतह जलविरागी (hydrophobic) बनी रहती है और संग्राहक (जैसे पाइन तेल) के साथ जुड़कर फेन के साथ ऊपर आ जाती है, जिसे आसानी से अलग किया जा सकता है।
इस प्रकार, अवनमक दो सल्फाइड अयस्कों के चयनात्मक पृथक्करण (selective separation) में सहायता करता है, जिससे शुद्ध अयस्क प्राप्त करना संभव होता है।
प्रश्न 3
ऑक्साइड अयस्कों को सामान्यतः कार्बन () या हाइड्रोजन () जैसे अपचायकों का उपयोग करके आसानी से अपचयित किया जा सकता है, क्योंकि इन ऑक्साइडों के अपचयन के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन () का मान ऋणात्मक होता है। उदाहरण के लिए, कॉपर ऑक्साइड () को कार्बन के साथ गर्म करने पर कॉपर प्राप्त होता है:
इसके विपरीत, कॉपर सल्फाइड (Cu_2S) के सीधे अपचयन के लिए आवश्यक ऊष्मगतिकी स्थितियाँ उतनी अनुकूल नहीं होती हैं। कार्बन (C) या हाइड्रोजन (H_2) द्वारा Cu_2S के अपचयन के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन का मान सामान्यतः धनात्मक होता है, जिसका अर्थ है कि ये अभिक्रियाएँ स्वतःप्रवर्तित नहीं होती हैं।
उदाहरण के लिए, कार्बन द्वारा Cu_2S के अपचयन की अभिक्रिया:
2 Cu_2S + C \longrightarrow 4 Cu + CS_2
इस अभिक्रिया के लिए \Delta G^\circ का मान सामान्यतः धनात्मक होता है, जो इसे स्वतःप्रवर्तित नहीं बनाता है। इसी प्रकार, हाइड्रोजन द्वारा अपचयन भी स्वतःप्रवर्तित नहीं होता है:
Cu_2S + H_2 \longrightarrow 2Cu + H_2S
इसलिए, सल्फाइड अयस्कों को पहले भर्जन (roasting) प्रक्रिया द्वारा उनके संगत ऑक्साइड में परिवर्तित किया जाता है। भर्जन के दौरान, सल्फाइड ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड () बनाता है:
फिर इस कॉपर ऑक्साइड () को कार्बन या अन्य अपचायकों द्वारा आसानी से अपचयित करके कॉपर धातु प्राप्त की जाती है। इस प्रकार, सल्फाइड अयस्क को पहले ऑक्साइड में परिवर्तित करना और फिर उसका अपचयन करना, सल्फाइड का सीधे अपचयन करने की तुलना में अधिक व्यवहार्य और सरल प्रक्रिया है।
Common mistakes
- चुंबकीय पृथक्करण के लिए उपयुक्त अयस्कों की पहचान करने में त्रुटि।
- निक्षालन प्रक्रिया के महत्व को कम आंकना।
- ऊष्मगतिकी की व्याख्याओं को गलत समझना, विशेषकर एलिंघम आरेख के संदर्भ में।
- विभिन्न धातुकर्म विधियों के अनुप्रयोगों को भ्रमित करना।
- धातु निष्कर्षण की कठिनाई के कारणों को स्पष्ट करने में चूक।
Revision tips
- प्रत्येक अयस्क सांद्रण विधि के लिए विशिष्ट उदाहरणों को याद करें।
- एलिंघम आरेख के प्रमुख बिंदुओं और विभिन्न धातुओं के वक्रों के प्रतिच्छेदन को समझें।
- विभिन्न धातुओं के निष्कर्षण के लिए उपयोग की जाने वाली प्रमुख धातुकर्म प्रक्रियाओं की तुलना करें।
- प्रत्येक प्रश्न में पूछे गए विशिष्ट धातुओं और उनकी अयस्क प्रकारों पर ध्यान केंद्रित करें।
- अभिक्रियाओं और उनके ऊष्मगतिकी संबंधी विचारों के बीच संबंध स्थापित करें।
Practice MCQs
Q1. निम्नलिखित में से कौन सा अयस्क चुंबकीय पृथक्करण विधि द्वारा सांद्रित किया जा सकता है?
Explanation: मैग्नेटाइट (Fe3O4) एक चुंबकीय अयस्क है, इसलिए इसे चुंबकीय पृथक्करण विधि द्वारा सांद्रित किया जा सकता है।
Q2. बॉक्साइट अयस्क के निष्कर्षण में निक्षालन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
Explanation: निक्षालन प्रक्रिया में, बॉक्साइट अयस्क से सिलिका (SiO2), आयरन ऑक्साइड (Fe2O3) और टाइटेनियम डाइऑक्साइड (TiO2) जैसी अशुद्धियों को रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा हटाया जाता है।
Q3. Cr2O3 के एल्यूमीनियम द्वारा अपचयन की अभिक्रिया ऊष्मागतिकी के अनुसार संभव है, लेकिन कक्ष ताप पर संपन्न नहीं होती। इसका कारण क्या है?
Explanation: यद्यपि अभिक्रिया ऊष्मागतिकी रूप से संभव है, कक्ष ताप पर यह धीमी गति से होती है क्योंकि इसे शुरू करने के लिए एक निश्चित मात्रा में सक्रियण ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिसके लिए तापन आवश्यक है।
Q4. एलिंघम आरेख के अनुसार, लगभग 1350°C (1623 K) से नीचे के तापमान पर कौन सी धातु एल्यूमीनियम ऑक्साइड (Al2O3) को अपचयित कर सकती है?
Explanation: एलिंघम आरेख दर्शाता है कि 1350°C से नीचे, मैग्नीशियम का ΔG° वक्र एल्यूमीनियम के ΔG° वक्र से नीचे होता है, जिसका अर्थ है कि Mg, Al2O3 को अपचयित कर सकता है।
Q5. फेन प्लवन विधि में अवनमक (depressant) की क्या भूमिका है?
Explanation: अवनमक का उपयोग दो सल्फाइड अयस्कों को अलग करने के लिए किया जाता है; यह एक सल्फाइड अयस्क को फेन में आने से रोकता है जबकि दूसरे को आने देता है।
Frequently asked questions
कक्षा 12 रसायन विज्ञान के अध्याय 6 में किन मुख्य धातुकर्म प्रक्रियाओं पर चर्चा की गई है?
अध्याय 6 में अयस्कों के सांद्रण की विधियाँ जैसे चुंबकीय पृथक्करण और निक्षालन, और धातुओं के निष्कर्षण की प्रक्रियाएँ जैसे हाइड्रोधातुकर्म, फेन प्लवन और अपचयन पर चर्चा की गई है। इसमें ऊष्मगतिकी के सिद्धांतों, विशेष रूप से एलिंघम आरेख के अनुप्रयोगों को भी शामिल किया गया है।
एलिंघम आरेख धातुओं के निष्कर्षण में कैसे मदद करता है?
एलिंघम आरेख विभिन्न तापमानों पर धातु ऑक्साइड के निर्माण के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन (ΔG°) को दर्शाता है। यह हमें यह अनुमान लगाने में मदद करता है कि कौन सी धातुएँ अन्य धातु ऑक्साइड को अपचयित कर सकती हैं, जिससे निष्कर्षण के लिए सबसे उपयुक्त अपचायक और तापमान का चयन किया जा सके।
फेन प्लवन विधि में अवनमक का क्या कार्य है?
फेन प्लवन विधि में अवनमक का उपयोग तब किया जाता है जब दो सल्फाइड अयस्कों को अलग करना होता है। अवनमक एक सल्फाइड अयस्क को फेन में आने से रोकता है, जबकि दूसरे को फेन में आने देता है, जिससे उनका पृथक्करण संभव होता है।
क्या सभी धातु अयस्कों को एक ही विधि से सांद्रित किया जा सकता है?
नहीं, अयस्क की प्रकृति और उसमें मौजूद अशुद्धियों के आधार पर विभिन्न सांद्रण विधियों का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, चुंबकीय अयस्कों के लिए चुंबकीय पृथक्करण, जबकि सल्फाइड अयस्कों के लिए फेन प्लवन का उपयोग किया जाता है।
यह समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करेंगे?
ये समाधान प्रत्येक प्रश्न के लिए विस्तृत और स्पष्ट स्पष्टीकरण प्रदान करते हैं, जिससे छात्रों को धातुओं के निष्कर्षण के पीछे के सिद्धांतों और प्रक्रियाओं को गहराई से समझने में मदद मिलती है। यह उन्हें विभिन्न विधियों, उनके अनुप्रयोगों और ऊष्मगतिकी के महत्व को याद रखने में सहायता करता है।
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