कक्षा 12 रसायन विज्ञान: तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम NCERT समाधान

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यह पृष्ठ कक्षा 12 रसायन विज्ञान के अध्याय 6, 'तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। इसमें अयस्कों के सांद्रण की विभिन्न विधियों जैसे चुंबकीय पृथक्करण और निक्षालन के महत्व पर चर्चा की गई है। समाधान ऊष्मगतिकी के सिद्धांतों, विशेष रूप से एलिंघम आरेख के अनुप्रयोगों की व्याख्या करते हैं, यह समझने के लिए कि विभिन्न तापमानों पर कौन सी धातुएँ दूसरों को अपचयित कर सकती हैं। इसमें हाइड्रोधातुकर्म, फेन प्लवन और अपचयन जैसी धातुकर्म प्रक्रियाओं की भी पड़ताल की गई है, जिसमें यह बताया गया है कि कुछ धातुओं का निष्कर्षण दूसरों की तुलना में अधिक कठिन क्यों है। ये समाधान छात्रों को धातुओं के निष्कर्षण के पीछे के सिद्धांतों को स्पष्ट करने और परीक्षा की तैयारी में मदद करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
Subjectरसायन विज्ञान-I
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter6. तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम

Chapter summary

कक्षा 12 रसायन विज्ञान के अध्याय 6, 'तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम' के ये NCERT समाधान, धातुओं के निष्कर्षण में प्रयुक्त प्रमुख सिद्धांतों और प्रक्रियाओं पर केंद्रित हैं। इसमें अयस्कों के सांद्रण की विधियाँ, जैसे चुंबकीय पृथक्करण और निक्षालन, और धातुकर्म में ऊष्मगतिकी (एलिंघम आरेख) की भूमिका शामिल है। समाधान विभिन्न धातुओं के निष्कर्षण के लिए विशिष्ट विधियों जैसे हाइड्रोधातुकर्म और फेन प्लवन की भी व्याख्या करते हैं, और यह बताते हैं कि कुछ अयस्कों का प्रसंस्करण दूसरों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण क्यों है।

Learning outcomes

  • चुंबकीय पृथक्करण विधि द्वारा सांद्रित किए जा सकने वाले अयस्कों की पहचान करना।
  • एल्यूमीनियम के निष्कर्षण में निक्षालन प्रक्रिया के महत्व को समझना।
  • ऊष्मगतिकी के सिद्धांतों के आधार पर धातुओं के निष्कर्षण की व्यवहार्यता का विश्लेषण करना।
  • एलिंघम आरेख का उपयोग करके विभिन्न तापमानों पर धातुओं की अपचयन क्षमता की तुलना करना।
  • हाइड्रोधातुकर्म और फेन प्लवन जैसी धातुकर्म विधियों की भूमिका की व्याख्या करना।
  • ऑक्साइड अयस्कों की तुलना में पाइराइट से तांबे के निष्कर्षण की कठिनाई के कारणों को समझना।

Topics covered

Paper topics

  • अयस्कों का सांद्रण
  • चुंबकीय पृथक्करण विधि
  • निक्षालन
  • धातु निष्कर्षण के ऊष्मगतिकी सिद्धांत
  • एलिंघम आरेख
  • अपचयन प्रक्रियाएं
  • हाइड्रोधातुकर्म
  • फेन प्लवन विधि
  • अवनमक की भूमिका
  • ऑक्साइड अयस्कों का अपचयन
  • सल्फाइड अयस्कों का निष्कर्षण
  • गिब्स ऊर्जा परिवर्तन

Important topics

  • अयस्कों का सांद्रण (चुंबकीय पृथक्करण, निक्षालन)
  • एलिंघम आरेख और धातुओं के निष्कर्षण में इसका अनुप्रयोग
  • फेन प्लवन विधि और अवनमक की भूमिका
  • विभिन्न धातुओं के निष्कर्षण के लिए विशिष्ट विधियाँ
  • ऊष्मगतिकी के अनुसार अभिक्रियाओं की व्यवहार्यता

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

उन अयस्कों के नाम बताइए, जिन्हें चुम्बकीय पृथक्करण विधि द्वारा सांद्रित किया जा सकता है?
Solution: चुम्बकीय पृथक्करण विधि का उपयोग उन अयस्कों के सांद्रण के लिए किया जाता है जिनमें अयस्क या गैंग का कोई एक घटक चुंबकीय गुणों वाला होता है। इस विधि में, अयस्क को एक चुंबकीय रोलर के ऊपर से गुजारा जाता है। चुंबकीय घटक रोलर से चिपक जाता है और दूर गिरता है, जबकि गैर-चुंबकीय घटक सीधे नीचे गिर जाता है।

उदाहरण के लिए, मैग्नेटाइट (Fe_3O_4), हेमेटाइट (Fe_2O_3) (कुछ हद तक), और सिडेराइट (FeCO_3) (कुछ हद तक) जैसे अयस्कों को इस विधि से सांद्रित किया जा सकता है, क्योंकि इनमें लोहे के ऑक्साइड चुंबकीय गुण प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 2

ऐलुमिनियम के निष्कर्षण में निक्षालन का क्या महत्व है?
Solution: एल्यूमीनियम के निष्कर्षण में, विशेष रूप से बॉक्साइट अयस्क से, निक्षालन (Leaching) एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसका मुख्य उद्देश्य बॉक्साइट अयस्क में मौजूद अशुद्धियों को दूर करना है। बॉक्साइट में सामान्यतः सिलिका (SiO_2), आयरन ऑक्साइड (Fe_2O_3), और टाइटेनियम डाइऑक्साइड (TiO_2) जैसी अशुद्धियाँ होती हैं।

निक्षालन प्रक्रिया में, बॉक्साइट अयस्क को एक उपयुक्त अभिकर्मक के साथ उपचारित किया जाता है जो एल्यूमीनियम ऑक्साइड (Al_2O_3) को तो घुलनशील रूप में परिवर्तित कर देता है या अशुद्धियों को अघुलनशील छोड़ देता है। उदाहरण के लिए, बॉक्साइट को सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) के सांद्र विलयन के साथ उच्च ताप और दाब पर उपचारित किया जाता है। इस प्रक्रिया में, एल्यूमीनियम ऑक्साइड सोडियम एल्यूमिनेट (Na[Al(OH)_4]) के रूप में घुल जाता है, जबकि SiO_2 भी घुल जाता है लेकिन Fe_2O_3 और TiO_2 अघुलनशील रहते हैं और उन्हें छानकर अलग किया जा सकता है। बाद में, सोडियम एल्यूमिनेट विलयन को ठंडा करके और CO_2 गैस प्रवाहित करके एल्यूमीनियम हाइड्रॉक्साइड (Al(OH)_3) का अवक्षेप प्राप्त किया जाता है, जिसे गर्म करने पर शुद्ध एल्यूमीनियम ऑक्साइड मिलता है। इस प्रकार, निक्षालन एल्यूमीनियम को उसकी अशुद्धियों से अलग करने का एक प्रभावी तरीका है।

प्रश्न 3

अभिक्रिया Cr_2O_3 + 2Al \longrightarrow Al_2O_3 + 2Cr; (\Delta G^\circ = -421 \text{ kJ}) के गिब्स ऊर्जा मान से लगता है कि अभिक्रिया ऊष्मागतिकी के अनुसार संभव है, परन्तु यह कक्ष ताप पर सम्पन्न क्यों नहीं होती है?
Solution: यह अभिक्रिया ऊष्मागतिकी के अनुसार संभव है क्योंकि इसका गिब्स ऊर्जा परिवर्तन (\Delta G^\circ) ऋणात्मक है, जो दर्शाता है कि अभिक्रिया स्वतःप्रवर्तित (spontaneous) हो सकती है। हालाँकि, यह अभिक्रिया कक्ष ताप पर आसानी से सम्पन्न नहीं होती है क्योंकि किसी भी रासायनिक अभिक्रिया के होने के लिए केवल ऊष्मगतिकी की अनुकूलता ही पर्याप्त नहीं होती है, बल्कि उसे एक निश्चित मात्रा में सक्रियण ऊर्जा (E_a) की भी आवश्यकता होती है।

इस विशिष्ट अभिक्रिया में, अभिक्रियक (ठोस Cr_2O_3 और ठोस Al) कक्ष ताप पर एक-दूसरे के साथ प्रभावी ढंग से अभिक्रिया करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा नहीं रखते हैं। अभिक्रिया को शुरू करने और आगे बढ़ाने के लिए, अभिकारकों को सक्रियण ऊर्जा की बाधा को पार करना होता है। इस ऊर्जा को प्रदान करने के लिए, अभिक्रिया मिश्रण को गर्म करने की आवश्यकता होती है। तापन से अभिकारकों की गतिज ऊर्जा बढ़ती है, जिससे वे अधिक प्रभावी ढंग से टकराते हैं और सक्रियण ऊर्जा की बाधा को पार कर उत्पाद बनाते हैं। इसलिए, यद्यपि अभिक्रिया ऊष्मागतिकी रूप से संभव है, यह कक्ष ताप पर सक्रियण ऊर्जा की कमी के कारण धीमी होती है और इसे सम्पन्न कराने के लिए तापन की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 4

क्या यह सत्य है कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में मैग्नीशियम, Al_2O_3 को अपचयित कर सकता है और Al, MgO को भी? वे परिस्थितियाँ कौन-सी हैं?
Solution: हाँ, यह सत्य है कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में मैग्नीशियम (Mg) एल्यूमीनियम ऑक्साइड (Al_2O_3) को अपचयित कर सकता है, और एल्यूमीनियम (Al) मैग्नीशियम ऑक्साइड (MgO) को अपचयित कर सकता है। यह इन धातुओं की सापेक्ष अपचयन क्षमता पर निर्भर करता है, जिसे एलिंघम आरेख (Ellingham diagram) का उपयोग करके समझा जा सकता है।

एलिंघम आरेख विभिन्न तापमानों पर धातु ऑक्साइड के निर्माण के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन (\Delta G^\circ) को दर्शाता है। एक धातु दूसरे धातु ऑक्साइड को तभी अपचयित कर सकती है जब उस धातु के ऑक्साइड के निर्माण के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन, दूसरे धातु ऑक्साइड के निर्माण के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन से अधिक ऋणात्मक हो (अर्थात्, उसका वक्र आरेख पर नीचे हो)।

दिए गए प्रश्न के संदर्भ में, एल्यूमीनियम (Al) और मैग्नीशियम (Mg) के लिए एलिंघम आरेख के वक्रों का अध्ययन करने पर, यह पाया जाता है कि वे लगभग 1350°C (या 1623 K) पर एक-दूसरे को काटते हैं।

  • जब तापमान 1350°C से कम हो: इस तापमान सीमा में, मैग्नीशियम के ऑक्साइड (MgO) के निर्माण के लिए \Delta G^\circ का मान एल्यूमीनियम के ऑक्साइड (Al_2O_3) के निर्माण के लिए \Delta G^\circ के मान से अधिक ऋणात्मक होता है। इसका मतलब है कि MgO का बनना Al_2O_3 के बनने की तुलना में अधिक स्वतःप्रवर्तित है। इसलिए, इस तापमान पर, मैग्नीशियम (Mg) एक प्रबल अपचायक के रूप में कार्य करता है और एल्यूमीनियम ऑक्साइड (Al_2O_3) को अपचयित करके एल्यूमीनियम धातु (Al) मुक्त कर सकता है: 3MgO + 2Al \longrightarrow Al_2O_3 + 3Mg
  • जब तापमान 1350°C से अधिक हो: इस तापमान सीमा में, एल्यूमीनियम के ऑक्साइड (Al_2O_3) के निर्माण के लिए \Delta G^\circ का मान मैग्नीशियम के ऑक्साइड (MgO) के निर्माण के लिए \Delta G^\circ के मान से अधिक ऋणात्मक हो जाता है। इसका मतलब है कि Al_2O_3 का बनना MgO के बनने की तुलना में अधिक स्वतःप्रवर्तित है। इसलिए, इस तापमान पर, एल्यूमीनियम (Al) एक प्रबल अपचायक के रूप में कार्य करता है और मैग्नीशियम ऑक्साइड (MgO) को अपचयित करके मैग्नीशियम धातु (Mg) मुक्त कर सकता है: Al_2O_3 + 3Mg \longrightarrow 3MgO + 2Al

अतः, ये विशिष्ट परिस्थितियाँ (तापमान) निर्धारित करती हैं कि कौन सी धातु दूसरी धातु के ऑक्साइड को अपचयित कर सकती है।

प्रश्न 1

कॉपर का निष्कर्षण हाइड्रोधातुकर्म द्वारा किया जाता है, परन्तु जिंक का नहीं। व्याख्या कीजिए।
Solution: कॉपर (Cu) का निष्कर्षण हाइड्रोधातुकर्म (Hydrometallurgy) द्वारा किया जाता है, जबकि जिंक (Zn) का निष्कर्षण सामान्यतः इस विधि से नहीं किया जाता है। इसका मुख्य कारण उनकी सापेक्ष अपचयन क्षमता और मानक इलेक्ट्रोड विभव (E^\circ) के मान हैं।

हाइड्रोधातुकर्म में, एक धातु को उसके अयस्क के विलयन से एक अधिक क्रियाशील धातु द्वारा विस्थापित किया जाता है। यह तभी संभव है जब विस्थापित करने वाली धातु का मानक इलेक्ट्रोड विभव, विलयन में उपस्थित धातु आयन के मानक इलेक्ट्रोड विभव से अधिक ऋणात्मक हो।

जिंक (Zn) और कॉपर (Cu) के लिए मानक इलेक्ट्रोड विभव के मान इस प्रकार हैं:

E^\circ (Zn^{2+}/Zn) = -0.76\,\mathrm{V}

E^\circ (Cu^{2+}/Cu) = +0.34\,\mathrm{V}

चूंकि E^\circ (Zn^{2+}/Zn) का मान E^\circ (Cu^{2+}/Cu) के मान से काफी कम ऋणात्मक है, इसका मतलब है कि जिंक (Zn) कॉपर (Cu) की तुलना में एक प्रबल अपचायक है।

कॉपर का निष्कर्षण: कॉपर के सल्फाइड अयस्कों को पहले भर्जित करके ऑक्साइड में बदला जाता है, और फिर इसे जलीय विलयन में लाया जाता है। इस विलयन से कॉपर को एक अधिक क्रियाशील धातु जैसे आयरन (Fe) द्वारा विस्थापित किया जा सकता है, क्योंकि E^\circ (Fe^{2+}/Fe) = -0.44\,\mathrm{V} जो E^\circ (Cu^{2+}/Cu) से अधिक ऋणात्मक है। हालाँकि, प्रश्न में हाइड्रोधातुकर्म का उल्लेख है, जो अक्सर साइनाइड विलयनों से धातुओं के निष्कर्षण से संबंधित होता है। कॉपर के साइनाइड विलयन से, जिंक (Zn) कॉपर (Cu) को आसानी से विस्थापित कर सकता है क्योंकि जिंक कॉपर से अधिक क्रियाशील है:

[Cu(CN)_2]^- + Zn \longrightarrow [Zn(CN)_2] + Cu \downarrow

जिंक का निष्कर्षण: जिंक का निष्कर्षण हाइड्रोधातुकर्म द्वारा सामान्यतः नहीं किया जाता है क्योंकि जिंक स्वयं एक प्रबल अपचायक है। यदि हम जिंक आयनों (Zn^{2+}) के विलयन से जिंक को विस्थापित करने का प्रयास करें, तो हमें एक ऐसे धातु की आवश्यकता होगी जिसका मानक इलेक्ट्रोड विभव Zn^{2+}/Zn से भी अधिक ऋणात्मक हो, जैसे कि कैल्शियम (Ca), मैग्नीशियम (Mg), या एल्यूमीनियम (Al)। समस्या यह है कि ये धातुएँ जल के साथ अत्यधिक क्रियाशील होती हैं और हाइड्रोजन गैस (H_2) उत्पन्न करती हैं, जिससे वे स्वयं ऑक्सीकृत हो जाती हैं और जिंक को विस्थापित करने के बजाय जल से अभिक्रिया कर लेती हैं। इसलिए, जिंक का निष्कर्षण सामान्यतः विद्युत अपघटनी विधि या कार्बन अपचयन द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 2

फेन प्लवन विधि में अवनमक की भूमिका क्या है?
Solution: फेन प्लवन विधि (Froth Flotation Method) का उपयोग मुख्य रूप से सल्फाइड अयस्कों के सांद्रण के लिए किया जाता है। इस विधि में, जब अयस्क में दो या दो से अधिक सल्फाइड खनिज मौजूद होते हैं जिन्हें अलग करना होता है, तो अवनमक (Depressant) की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

अवनमक एक ऐसा रासायनिक पदार्थ होता है जिसे फेन प्लवन प्रक्रिया के दौरान मिलाया जाता है। इसका मुख्य कार्य एक विशिष्ट सल्फाइड खनिज की सतह को इस प्रकार संशोधित करना है कि वह फेन (froth) में न आ सके, जबकि अन्य सल्फाइड खनिज फेन में आ सकें। यह चयनित रूप से एक सल्फाइड खनिज के साथ अभिक्रिया करके उसकी सतह के गुणों को बदल देता है, जिससे वह जलरागी (hydrophilic) हो जाता है और फेन बनाने वाले संग्राहक (collector) के साथ जुड़ नहीं पाता।

उदाहरण: यदि हमें लेड सल्फाइड (PbS) और जिंक सल्फाइड (ZnS) के मिश्रण से ZnS को अलग करना है, तो हम सोडियम साइनाइड (NaCN) को अवनमक के रूप में उपयोग कर सकते हैं। NaCN चयनित रूप से ZnS की सतह पर अधिशोषित (adsorbed) हो जाता है और उसे जलरागी बना देता है, जिससे वह फेन में नहीं आता। दूसरी ओर, PbS की सतह जलविरागी (hydrophobic) बनी रहती है और संग्राहक (जैसे पाइन तेल) के साथ जुड़कर फेन के साथ ऊपर आ जाती है, जिसे आसानी से अलग किया जा सकता है।

इस प्रकार, अवनमक दो सल्फाइड अयस्कों के चयनात्मक पृथक्करण (selective separation) में सहायता करता है, जिससे शुद्ध अयस्क प्राप्त करना संभव होता है।

प्रश्न 3

अपचयन द्वारा ऑक्साइड अयस्कों की अपेक्षा पाइराइट से ताँबे का निष्कर्षण अधिक कठिन क्यों हैं?
Solution: कॉपर (Cu) के निष्कर्षण में, ऑक्साइड अयस्कों की तुलना में पाइराइट (मुख्यतः कॉपर सल्फाइड, Cu_2S) से निष्कर्षण अधिक कठिन होता है। इसका कारण सल्फाइड अयस्क के अपचयन के लिए आवश्यक ऊष्मगतिकी (thermodynamic) स्थितियाँ हैं।

ऑक्साइड अयस्कों को सामान्यतः कार्बन (C) या हाइड्रोजन (H_2) जैसे अपचायकों का उपयोग करके आसानी से अपचयित किया जा सकता है, क्योंकि इन ऑक्साइडों के अपचयन के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन (\Delta G^\circ) का मान ऋणात्मक होता है। उदाहरण के लिए, कॉपर ऑक्साइड (Cu_2O) को कार्बन के साथ गर्म करने पर कॉपर प्राप्त होता है:

Cu_2O + C \longrightarrow 2Cu + CO

इसके विपरीत, कॉपर सल्फाइड (Cu_2S) के सीधे अपचयन के लिए आवश्यक ऊष्मगतिकी स्थितियाँ उतनी अनुकूल नहीं होती हैं। कार्बन (C) या हाइड्रोजन (H_2) द्वारा Cu_2S के अपचयन के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन का मान सामान्यतः धनात्मक होता है, जिसका अर्थ है कि ये अभिक्रियाएँ स्वतःप्रवर्तित नहीं होती हैं।

उदाहरण के लिए, कार्बन द्वारा Cu_2S के अपचयन की अभिक्रिया:

2 Cu_2S + C \longrightarrow 4 Cu + CS_2

इस अभिक्रिया के लिए \Delta G^\circ का मान सामान्यतः धनात्मक होता है, जो इसे स्वतःप्रवर्तित नहीं बनाता है। इसी प्रकार, हाइड्रोजन द्वारा अपचयन भी स्वतःप्रवर्तित नहीं होता है:

Cu_2S + H_2 \longrightarrow 2Cu + H_2S

इसलिए, सल्फाइड अयस्कों को पहले भर्जन (roasting) प्रक्रिया द्वारा उनके संगत ऑक्साइड में परिवर्तित किया जाता है। भर्जन के दौरान, सल्फाइड ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड (SO_2) बनाता है:

2 Cu_2S + 3O_2 \longrightarrow 2 Cu_2O + 2 SO_2

फिर इस कॉपर ऑक्साइड (Cu_2O) को कार्बन या अन्य अपचायकों द्वारा आसानी से अपचयित करके कॉपर धातु प्राप्त की जाती है। इस प्रकार, सल्फाइड अयस्क को पहले ऑक्साइड में परिवर्तित करना और फिर उसका अपचयन करना, सल्फाइड का सीधे अपचयन करने की तुलना में अधिक व्यवहार्य और सरल प्रक्रिया है।

Common mistakes

  • चुंबकीय पृथक्करण के लिए उपयुक्त अयस्कों की पहचान करने में त्रुटि।
  • निक्षालन प्रक्रिया के महत्व को कम आंकना।
  • ऊष्मगतिकी की व्याख्याओं को गलत समझना, विशेषकर एलिंघम आरेख के संदर्भ में।
  • विभिन्न धातुकर्म विधियों के अनुप्रयोगों को भ्रमित करना।
  • धातु निष्कर्षण की कठिनाई के कारणों को स्पष्ट करने में चूक।

Revision tips

  • प्रत्येक अयस्क सांद्रण विधि के लिए विशिष्ट उदाहरणों को याद करें।
  • एलिंघम आरेख के प्रमुख बिंदुओं और विभिन्न धातुओं के वक्रों के प्रतिच्छेदन को समझें।
  • विभिन्न धातुओं के निष्कर्षण के लिए उपयोग की जाने वाली प्रमुख धातुकर्म प्रक्रियाओं की तुलना करें।
  • प्रत्येक प्रश्न में पूछे गए विशिष्ट धातुओं और उनकी अयस्क प्रकारों पर ध्यान केंद्रित करें।
  • अभिक्रियाओं और उनके ऊष्मगतिकी संबंधी विचारों के बीच संबंध स्थापित करें।

Practice MCQs

Q1. निम्नलिखित में से कौन सा अयस्क चुंबकीय पृथक्करण विधि द्वारा सांद्रित किया जा सकता है?

Q2. बॉक्साइट अयस्क के निष्कर्षण में निक्षालन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

Q3. Cr2O3 के एल्यूमीनियम द्वारा अपचयन की अभिक्रिया ऊष्मागतिकी के अनुसार संभव है, लेकिन कक्ष ताप पर संपन्न नहीं होती। इसका कारण क्या है?

Q4. एलिंघम आरेख के अनुसार, लगभग 1350°C (1623 K) से नीचे के तापमान पर कौन सी धातु एल्यूमीनियम ऑक्साइड (Al2O3) को अपचयित कर सकती है?

Q5. फेन प्लवन विधि में अवनमक (depressant) की क्या भूमिका है?

Frequently asked questions

कक्षा 12 रसायन विज्ञान के अध्याय 6 में किन मुख्य धातुकर्म प्रक्रियाओं पर चर्चा की गई है?

अध्याय 6 में अयस्कों के सांद्रण की विधियाँ जैसे चुंबकीय पृथक्करण और निक्षालन, और धातुओं के निष्कर्षण की प्रक्रियाएँ जैसे हाइड्रोधातुकर्म, फेन प्लवन और अपचयन पर चर्चा की गई है। इसमें ऊष्मगतिकी के सिद्धांतों, विशेष रूप से एलिंघम आरेख के अनुप्रयोगों को भी शामिल किया गया है।

एलिंघम आरेख धातुओं के निष्कर्षण में कैसे मदद करता है?

एलिंघम आरेख विभिन्न तापमानों पर धातु ऑक्साइड के निर्माण के लिए गिब्स ऊर्जा परिवर्तन (ΔG°) को दर्शाता है। यह हमें यह अनुमान लगाने में मदद करता है कि कौन सी धातुएँ अन्य धातु ऑक्साइड को अपचयित कर सकती हैं, जिससे निष्कर्षण के लिए सबसे उपयुक्त अपचायक और तापमान का चयन किया जा सके।

फेन प्लवन विधि में अवनमक का क्या कार्य है?

फेन प्लवन विधि में अवनमक का उपयोग तब किया जाता है जब दो सल्फाइड अयस्कों को अलग करना होता है। अवनमक एक सल्फाइड अयस्क को फेन में आने से रोकता है, जबकि दूसरे को फेन में आने देता है, जिससे उनका पृथक्करण संभव होता है।

क्या सभी धातु अयस्कों को एक ही विधि से सांद्रित किया जा सकता है?

नहीं, अयस्क की प्रकृति और उसमें मौजूद अशुद्धियों के आधार पर विभिन्न सांद्रण विधियों का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, चुंबकीय अयस्कों के लिए चुंबकीय पृथक्करण, जबकि सल्फाइड अयस्कों के लिए फेन प्लवन का उपयोग किया जाता है।

यह समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करेंगे?

ये समाधान प्रत्येक प्रश्न के लिए विस्तृत और स्पष्ट स्पष्टीकरण प्रदान करते हैं, जिससे छात्रों को धातुओं के निष्कर्षण के पीछे के सिद्धांतों और प्रक्रियाओं को गहराई से समझने में मदद मिलती है। यह उन्हें विभिन्न विधियों, उनके अनुप्रयोगों और ऊष्मगतिकी के महत्व को याद रखने में सहायता करता है।

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