CBSE Class 11 Hindi A: NCERT Solutions for Chapter 11 'Premchand'

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This chapter's NCERT Solutions for Class 11 Hindi A, focusing on Premchand's 'Namak ka Daroga', delves into the moral complexities of society. The solutions explore the character of Munshi Bansidhar, highlighting his unwavering honesty and integrity in the face of corruption. They also analyze Pandit Alopidin's dual nature, showcasing his initial corrupt practices and eventual appreciation for virtue. The text examines how various characters represent societal truths, such as the emphasis on wealth over ethics and the public's tendency to treat suffering as spectacle. These solutions provide detailed explanations and reasoning, helping students grasp the nuances of the story and prepare effectively for their exams by understanding the underlying social commentary.

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 11
Subjectआरोह
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter11. प्रेमचंद

Chapter summary

NCERT Solutions for Class 11 Hindi A, Chapter 11, 'Premchand', focuses on the short story 'Namak ka Daroga'. It provides detailed answers to questions about the characters, particularly Munshi Bansidhar and Pandit Alopidin, and their moral dilemmas. The solutions analyze the societal issues of corruption, wealth's influence, and the importance of integrity, as depicted through various characters and their dialogues. This chapter's solutions help students understand the story's deeper meanings and the author's social critique.

Learning outcomes

  • Understand the moral conflict between honesty and corruption in 'Namak ka Daroga'.
  • Analyze the character development of Munshi Bansidhar and Pandit Alopidin.
  • Identify and explain the societal truths reflected by different characters.
  • Evaluate the significance of integrity and ethical conduct in professional life.
  • Interpret the author's social commentary on wealth and justice.

Topics covered

Paper topics

  • Character Analysis: Munshi Bansidhar
  • Character Analysis: Pandit Alopidin
  • Themes of Honesty and Integrity
  • Corruption in Society
  • Social Commentary in Literature
  • Moral Dilemmas
  • Symbolism in 'Namak ka Daroga'
  • Author's Style: Premchand
  • Critique of Wealth and Power
  • Justice and Injustice

Important topics

  • Munshi Bansidhar's unwavering honesty
  • Pandit Alopidin's character transformation
  • The contrast between integrity and corruption
  • Societal critique through characters
  • The moral message of the story

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

कहानी का कौन-सा पात्र आपको सर्वाधिक प्रभावित करता है और क्यों?
Solution: कहानी का नायक, 'मुंशी वंशीधर', पाठक को सर्वाधिक प्रभावित करता है। वह एक अत्यंत ईमानदार और कर्तव्यपरायण व्यक्ति है, जो समाज में ईमानदारी और निष्ठा का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। उसने पंडित अलोपीदीन जैसे अत्यंत धनी और प्रभावशाली व्यक्ति को भी गिरफ्तार करने का साहस दिखाया। अंततः, पंडित अलोपीदीन भी वंशीधर की दृढ़ता, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के सामने नतमस्तक हो जाते हैं, जो वंशीधर के चरित्र की महानता को दर्शाता है।

प्रश्न 2

'नमक का दारोगा' कहानी में पंडित अलोपीदीन के व्यक्तित्व के कौन से दो पहलू (पक्ष) उभरकर आते हैं?
Solution: 'नमक का दारोगा' कहानी में पंडित अलोपीदीन के व्यक्तित्व के दो प्रमुख पहलू उभरकर आते हैं:
  1. भ्रष्ट और धन-लोलुप पक्ष: पंडित अलोपीदीन अपने धन के बल पर समाज के विभिन्न वर्गों को प्रभावित करते थे और अक्सर नियमों के विरुद्ध कार्य करते थे। वे लोगों पर अत्याचार करते थे, फिर भी समाज में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। यह उनके दोहरे चरित्र को उजागर करता है, जहाँ वे अपने धन का उपयोग करके दूसरों को अपना गुलाम बनाते थे।
  2. ईमानदारी और धर्मनिष्ठा का सम्मान करने वाला पक्ष: कहानी के अंत में, पंडित अलोपीदीन का एक उज्ज्वल चरित्र सामने आता है। वे वंशीधर की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से इतने प्रभावित होते हैं कि वे स्वयं उनके घर जाकर माफ़ी मांगते हैं और उन्हें अपनी जायदाद का मैनेजर नियुक्त कर देते हैं। यह दर्शाता है कि वे अंततः सद्गुणों का सम्मान करते हैं।

प्रश्न 3

कहानी के लगभग सभी पात्र समाज की किसी-न-किसी सच्चाई को उजागर करते हैं। निम्नलिखित पात्रों के संदर्भ में पाठ से उस अंश को उद्दृत करते हुए बताइए कि यह समाज की किस सच्चाई को उजागर करते हैं: 1. वृद्ध मुंशी 2. वकील 3. शहर की भीड़
Solution: कहानी के पात्र समाज की विभिन्न सच्चाइयों को उजागर करते हैं:
  1. वृद्ध मुंशी: यह पात्र समाज में धन को अत्यधिक महत्व देने वाले भ्रष्ट व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है। वे अपने बेटे वंशीधर को सलाह देते हुए कहते हैं, "मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है।" यह कथन दर्शाता है कि समाज में लोग अक्सर स्थायी आय की तुलना में अनैतिक तरीकों से अर्जित धन को अधिक महत्व देते हैं।
  2. वकील: वकील पात्र समाज की उस सच्चाई को उजागर करते हैं जहाँ धन के लिए गलत का पक्ष लेना आम बात हो गई है। वे कहते हैं, "आजकल जैसे धन लूटना ही वकीलों का धर्म बन गया है।" वे धन के लिए गलत व्यक्ति का पक्ष लेने से भी नहीं हिचकिचाते। मजिस्ट्रेट द्वारा अलोपीदीन के पक्ष में फैसला सुनाए जाने पर उनकी खुशी इस बात का प्रमाण है कि वे न्याय से अधिक धन को महत्व देते हैं।
  3. शहर की भीड़: शहर की भीड़ का वर्णन समाज की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है जहाँ लोग दूसरों के दुख या संकट को एक तमाशे की तरह देखते हैं। पाठ में उल्लेख है, "भीड़ के मारे छत और दीवार में भेद न रह गया।" यह भीड़ केवल उत्सुकता और मनोरंजन के लिए एकत्रित होती है, न कि किसी की मदद करने के लिए। यह समाज की उदासीनता और संवेदनहीनता को उजागर करता है।

प्रश्न 4

निम्न पंक्तियों को ध्यान से पढिए - "नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मज़ार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूँढ़ना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृद्धि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती है, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ।"
  1. यह किसकी उक्ति है?
  2. मासिक वेतन को पूर्णमासी का चाँद क्यों कहा गया है?
  3. क्या आप एक पिता के इस वक्तव्य से सहमत हैं?
Solution:
  1. यह उक्ति बूढ़े मुंशीजी की है, जो अपने बेटे वंशीधर को नौकरी के संबंध में सलाह दे रहे हैं।
  2. मासिक वेतन को पूर्णमासी का चाँद इसलिए कहा गया है क्योंकि यह महीने में केवल एक बार, यानी पूर्णिमा के दिन की तरह, प्राप्त होता है और फिर धीरे-धीरे खर्च होते-होते समाप्त हो जाता है, ठीक वैसे ही जैसे चाँद घटते-घटते लुप्त हो जाता है। यह वेतन की क्षणभंगुरता और अपर्याप्तता को दर्शाता है।
  3. जी नहीं, मैं एक पिता के इस वक्तव्य से बिल्कुल भी सहमत नहीं हूँ। किसी भी व्यक्ति, विशेषकर एक पिता को अपने बच्चों को भ्रष्टाचार और अनैतिक आचरण से दूर रहने की सीख देनी चाहिए। रिश्वत लेने या ऊपरी आय के माध्यम से धन कमाने की सलाह देना न केवल अनैतिक है, बल्कि यह समाज के लिए भी हानिकारक है। एक पिता का कर्तव्य है कि वह अपने बेटे को सही मार्ग दिखाए, न कि उसे गलत रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करे। ईमानदारी और सत्यनिष्ठा किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा धन है।

प्रश्न 5

'नमक का दारोगा' कहानी के कोई दो अन्य शीर्षक बताते हुए उसके आधार को भी स्पष्ट कीजिए।
Solution: 'नमक का दारोगा' कहानी के दो अन्य संभावित शीर्षक और उनके आधार इस प्रकार हैं:
  1. ईमानदारी का फल: इस शीर्षक का आधार कहानी का वह संदेश है कि ईमानदारी का फल अंततः सुखद होता है। कहानी के नायक मुंशी वंशीधर को अनेक कठिनाइयों और प्रलोभनों का सामना करने के बावजूद अंत में अपनी ईमानदारी का पुरस्कार मिलता है, जब पंडित अलोपीदीन स्वयं उन्हें अपनी जायदाद का मैनेजर नियुक्त करते हैं। यह शीर्षक कहानी के नैतिक संदेश को उजागर करता है।
  2. भ्रष्टाचार और न्याय व्यवस्था: यह शीर्षक कहानी में दर्शाई गई सामाजिक बुराइयों पर केंद्रित है। कहानी में दिखाया गया है कि कैसे न्याय के रक्षक माने जाने वाले वकील भी धन के प्रभाव में आकर गलत व्यक्ति (अलोपीदीन) का पक्ष लेते हैं। यह न्याय व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और धन के प्रभाव को दर्शाता है, जहाँ सत्य और न्याय अक्सर धन के सामने हार जाते हैं।

प्रश्न 6

कहानी के अंत में अलोपीदीन के वंशीधर को मैनेजर नियुक्त करने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए। आप इस कहानी का अंत किस प्रकार करते?
Solution: कहानी के अंत में पंडित अलोपीदीन द्वारा वंशीधर को मैनेजर नियुक्त करने के पीछे कई कारण हो सकते हैं:
  • ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से प्रभावित होना: अलोपीदीन ने स्वयं वंशीधर की अटूट ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा को प्रत्यक्ष रूप से देखा था। जब उन्होंने वंशीधर को रिश्वत लेने से इनकार करते हुए और उन्हें गिरफ्तार करते हुए देखा, तो वे उसकी सत्यनिष्ठा से बहुत प्रभावित हुए।
  • आत्मग्लानि और पश्चाताप: संभवतः अलोपीदीन को अपनी गलतियों का एहसास हुआ होगा। उन्होंने महसूस किया होगा कि धन के बल पर उन्होंने जो भी किया, वह गलत था। वंशीधर जैसे ईमानदार व्यक्ति के सामने उन्हें अपनी करनी पर ग्लानि हुई होगी।
  • ईमानदार व्यक्ति की आवश्यकता: अलोपीदीन जैसे व्यक्ति को अपनी विशाल संपत्ति और व्यापार को संभालने के लिए एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो ईमानदार और भरोसेमंद हो। वंशीधर उनकी इस आवश्यकता को पूरा कर सकते थे।
मैं इस कहानी का अंत इस प्रकार करता: यदि मैं इस कहानी का अंत लिखता, तो मैं वंशीधर को अलोपीदीन के यहाँ मैनेजर की नौकरी स्वीकार करने से मना कर देता। मैं यह तर्क देता कि अलोपीदीन की सहृदयता और पश्चाताप प्रशंसनीय है, लेकिन उनकी संपत्ति का प्रबंधन करना, जो संभवतः अनैतिक तरीकों से अर्जित की गई है, मेरे सिद्धांतों के विरुद्ध होगा। मैं वंशीधर को यह समझाता कि सच्ची संतुष्टि ईमानदारी से कमाए गए थोड़े से धन में है, न कि बेईमानी से प्राप्त बड़ी दौलत की रखवाली करने में। मैं कहानी का अंत वंशीधर के अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने और एक साधारण, ईमानदार जीवन जीने के साथ करता।

प्रश्न 7

दारोगा वंशीधर गैरकानूनी कार्यों की वजह से पंडित अलोपीदीन को गिरफ्तार करता है, लेकिन कहानी के अंत में इसी पंडित अलोपीदीन की सहृदयता पर मुग्ध होकर उसके यहाँ मैनेजर की नौकरी को तैयार हो जाता है। आपके विचार से वंशीधर का ऐसा करना उचित था? आप उसकी जगह होते तो क्या करते?
Solution: मेरे विचार से, वंशीधर का पंडित अलोपीदीन के यहाँ मैनेजर की नौकरी स्वीकार करना पूरी तरह से उचित नहीं था। यद्यपि अलोपीदीन की सहृदयता और पश्चाताप सराहनीय है, फिर भी उनकी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा संभवतः अनैतिक और भ्रष्ट तरीकों से अर्जित किया गया था। ऐसे व्यक्ति के यहाँ मैनेजर के रूप में कार्य करना, जो कभी भ्रष्टाचार का पर्याय था, वंशीधर के अपने ईमानदारी और नैतिकता के सिद्धांतों के विरुद्ध जाता। यदि मैं वंशीधर की जगह होता, तो मैं निम्नलिखित कदम उठाता:
  • मैं पंडित अलोपीदीन के पश्चाताप और उनकी ईमानदारी की कद्र करने की भावना का सम्मान करता।
  • मैं उन्हें धन्यवाद देता कि उन्होंने मेरी ईमानदारी को पहचाना और मुझे एक प्रतिष्ठित पद की पेशकश की।
  • लेकिन, मैं विनम्रतापूर्वक नौकरी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देता। मैं यह स्पष्ट करता कि मैं ऐसे व्यक्ति के लिए काम नहीं कर सकता जिसकी आय का स्रोत संदिग्ध हो, भले ही वह अब सुधर गया हो।
  • मैं उन्हें सलाह देता कि वे अपनी संपत्ति का उपयोग समाज की भलाई के कार्यों में करें और अपनी ईमानदारी को बनाए रखें।
  • मैं अपनी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के बल पर किसी अन्य स्थान पर नौकरी की तलाश करता, जहाँ मैं बिना किसी नैतिक समझौते के कार्य कर सकूँ।
मेरा मानना है कि सच्ची संतुष्टि और आत्म-सम्मान ईमानदारी से अर्जित थोड़े से धन में ही निहित है, न कि बेईमानी से प्राप्त बड़ी दौलत की रखवाली करने में।

प्रश्न 8

नमक विभाग के दारोगा पद के लिए बड़ों-बड़ों का जी ललचाता था। वर्तमान समाज में ऐसा कौन-सा पद होगा जिसे पाने के लिए...
Solution: नमक विभाग के दारोगा का पद उस समय बहुत प्रतिष्ठित और आकर्षक माना जाता था क्योंकि यह पद ऊपरी आय (रिश्वत) का एक बड़ा स्रोत था, जैसा कि वृद्ध मुंशी के कथन से स्पष्ट होता है। वर्तमान समाज में भी ऐसे कई पद हैं जिनके लिए लोग लालायित रहते हैं, मुख्य रूप से उनके आकर्षण और लाभ के कारण। वर्तमान समाज में ऐसे कुछ पद या अवसर हो सकते हैं:
  • उच्च प्रशासनिक सेवाएँ (जैसे IAS, IPS): ये पद शक्ति, प्रतिष्ठा और समाज में प्रभाव डालने का अवसर प्रदान करते हैं। हालाँकि ये पद ईमानदारी से सेवा करने के लिए होते हैं, पर इनमें भी भ्रष्टाचार की संभावनाएँ बनी रहती हैं, जो इन्हें कुछ लोगों के लिए आकर्षक बनाती हैं।
  • बड़े कॉर्पोरेट घरानों में उच्च पद: बड़ी कंपनियों में उच्च प्रबंधन के पदों पर आकर्षक वेतन, भत्ते, बोनस और अन्य सुविधाएँ मिलती हैं। ये पद वित्तीय लाभ और व्यावसायिक शक्ति प्रदान करते हैं।
  • राजनीतिक पद: विधायक, सांसद या मंत्री जैसे पद शक्ति, प्रभाव और निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करते हैं। हालाँकि ये पद जनसेवा के लिए होते हैं, पर इनमें भी अक्सर आर्थिक लाभ और व्यक्तिगत हित साधने की प्रवृत्तियाँ देखी जाती हैं।
  • रियल एस्टेट या वित्तीय क्षेत्र में प्रभावशाली पद: ये क्षेत्र अक्सर बड़े वित्तीय लाभ के अवसर प्रदान करते हैं, जहाँ थोड़ी सी भी चतुराई या अनैतिकता से भारी मुनाफा कमाया जा सकता है।
इन सभी पदों का आकर्षण केवल उनके वेतन या सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उनमें निहित शक्ति, प्रभाव और अनैतिक तरीकों से धन कमाने की संभावनाएँ भी उन्हें 'बड़ों-बड़ों का जी ललचाने वाला' बनाती हैं, ठीक उसी तरह जैसे नमक विभाग का दारोगा पद था।

Common mistakes

  • Overlooking the dual nature of characters like Alopidin.
  • Failing to connect character actions to broader societal issues.
  • Misinterpreting the symbolic meaning of dialogues and events.
  • Focusing only on the plot without analyzing the underlying moral themes.

Revision tips

  • Reread the story 'Namak ka Daroga' to reinforce understanding of plot and characters.
  • Focus on the character analyses provided in the solutions, especially Bansidhar and Alopidin.
  • Pay attention to the explanations of societal truths represented by each character.
  • Consider the ethical dilemmas presented and how they relate to real-life situations.
  • Use the solutions to practice answering questions on character motivation and theme.

Practice MCQs

Q1. कहानी का कौन-सा पात्र ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है?

Q2. पंडित अलोपीदीन के व्यक्तित्व का कौन-सा पहलू कहानी के अंत में उभरकर आता है?

Q3. वृद्ध मुंशी अपने बेटे वंशीधर को ऊपरी आय बनाने की सलाह क्यों देता है?

Q4. शहर की भीड़ कहानी में किस सामाजिक सच्चाई को उजागर करती है?

Q5. कहानी के अंत में अलोपीदीन द्वारा वंशीधर को मैनेजर नियुक्त करने का मुख्य कारण क्या था?

Frequently asked questions

यह समाधान किस कक्षा और विषय के लिए हैं?

ये समाधान CBSE कक्षा 11 हिंदी (आरोह भाग-1) के छात्रों के लिए हैं, विशेष रूप से प्रेमचंद द्वारा लिखित 'नमक का दारोगा' पाठ के लिए।

कहानी का मुख्य पात्र कौन है और वह क्यों महत्वपूर्ण है?

कहानी का मुख्य पात्र मुंशी वंशीधर है। वह अपनी बेदाग ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के लिए महत्वपूर्ण है, जो उसे भ्रष्ट समाज में भी अपने सिद्धांतों पर टिके रहने की प्रेरणा देता है।

पंडित अलोपीदीन के चरित्र के कौन से दो पहलू कहानी में दिखाए गए हैं?

कहानी में पंडित अलोपीदीन के दो पहलू दिखाए गए हैं: पहला, धन के बल पर नियम विरुद्ध कार्य करने वाला भ्रष्ट व्यक्ति, और दूसरा, अंत में ईमानदारी और धर्मनिष्ठा के गुणों की कद्र करने वाला व्यक्ति।

वृद्ध मुंशी अपने बेटे को मासिक वेतन के बारे में क्या सलाह देते हैं?

वृद्ध मुंशी मासिक वेतन को 'पूर्णमासी का चाँद' कहते हैं जो एक दिन दिखाई देकर घटते-घटते लुप्त हो जाता है, और ऊपरी आय को 'बहता हुआ स्रोत' बताते हैं जिससे सदैव प्यास बुझती है। वे बेटे को ऊपरी आय बनाने की सलाह देते हैं।

क्या वंशीधर का अलोपीदीन के यहाँ मैनेजर की नौकरी स्वीकार करना उचित था?

वंशीधर का नौकरी स्वीकार करना उचित नहीं था, क्योंकि यह बेईमानी की कमाई की रखवाली करना था। हालाँकि, कहानी में इसे उसकी मजबूरी और अलोपीदीन की सहृदयता के प्रति कृतज्ञता के रूप में दिखाया गया है।

यह समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करेंगे?

ये समाधान कहानी के पात्रों, विषयों और सामाजिक संदेश की गहरी समझ प्रदान करते हैं, जिससे छात्र परीक्षा में पूछे जाने वाले विश्लेषणात्मक और व्याख्यात्मक प्रश्नों का उत्तर देने में सक्षम होंगे।

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