CBSE Class 10 Hindi स्पर्श पाठ-01 कबीर: साखी NCERT Solutions

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This comprehensive set of NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Course B) 'Sparsh' Chapter 1, 'Kabir: Sakhi', delves into the profound verses of the renowned poet Kabir. The solutions meticulously explain the meaning and context of each Sakhi, covering themes such as the power of sweet speech, the illumination of knowledge, the omnipresence of God, the nature of happiness and sorrow, and the path to inner purity. Students will find detailed explanations on interpreting Kabir's symbolism, like the lamp representing knowledge and sleep representing ignorance. The solutions also highlight the linguistic features of Kabir's poetry, characterized by its 'Panchmel Khichdi' or 'Sadukkadi' language, a blend of various dialects. This resource is designed to help students grasp the philosophical depth and practical wisdom embedded in Kabir's teachings, aiding in their exam preparation by providing clear, step-by-step interpretations of complex ideas.

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 10
Subjectहिंदी
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter1. कबीरः साख़ी

Chapter summary

This chapter's NCERT Solutions for Class 10 Hindi (Course B) 'Sparsh' focuses on Kabir's Sakhi. It provides in-depth explanations of verses dealing with the impact of pleasant speech, the role of knowledge in dispelling ignorance, the immanence of God, and the distinction between the truly awake and the ignorant. The solutions also explore Kabir's advice on maintaining a pure nature by accepting criticism and emphasize the superiority of devotion over mere scholarly knowledge. The unique linguistic style of Kabir's poetry is also discussed, offering students a complete understanding of these foundational verses.

Learning outcomes

  • Understand the significance of sweet speech and its impact on oneself and others.
  • Explain the symbolism of the lamp and darkness in relation to knowledge and ignorance.
  • Comprehend the concept of God's omnipresence and the reasons for human inability to perceive it.
  • Differentiate between the truly happy and the sorrowful individuals as described by Kabir.
  • Identify Kabir's advice for maintaining a pure and honest nature.
  • Appreciate the emphasis on devotion and love over ritualistic knowledge.
  • Recognize the linguistic characteristics of Kabir's 'Sadukkadi' language.

Topics covered

Paper topics

  • Meaning of sweet speech
  • Symbolism of lamp and darkness
  • Omnipresence of God
  • Nature of happiness and sorrow
  • Maintaining a pure nature
  • Superiority of devotion
  • Linguistic features of Kabir's poetry
  • Interpretation of specific Sakhi verses

Important topics

  • The power of sweet speech
  • Knowledge vs. Ignorance
  • God's omnipresence
  • The essence of devotion
  • Kabir's language and style

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है?
Solution: मीठी और मधुर वाणी का प्रभाव अत्यंत प्रभावशाली होता है। जब हम दूसरों से विनम्रता और प्रेम से बात करते हैं, तो यह न केवल सुनने वाले को सुख और शांति प्रदान करती है, बल्कि बोलने वाले के मन को भी शीतलता और प्रसन्नता का अनुभव कराती है। मीठी वाणी मन से क्रोध, घृणा और कटुता जैसे नकारात्मक भावों को दूर करती है, जिससे आंतरिक शांति मिलती है। इसके प्रभाव से आपसी संबंध मधुर बनते हैं और वातावरण सौहार्दपूर्ण हो जाता है। इस प्रकार, मीठी वाणी का उच्चारण करने वाले और सुनने वाले दोनों के लिए सुखद और शीतल अनुभव होता है।

प्रश्न 2

दीपक दिखाई देने पर अँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
Solution: कबीर की साखी के अनुसार, जिस प्रकार एक छोटा सा दीपक जलने पर अपने चारों ओर फैले घने अंधकार को तुरंत मिटा देता है और प्रकाश फैला देता है, उसी प्रकार ज्ञान का प्रकाश भी अज्ञानता के अंधकार को दूर करता है। यहाँ 'दीपक' ज्ञान का प्रतीक है और 'अंधियारा' अज्ञान, अहंकार, भ्रम और अविद्या का प्रतीक है। जब हृदय में ज्ञान का दीपक प्रज्वलित होता है, तो अज्ञान रूपी अंधकार स्वतः ही समाप्त हो जाता है। इससे मन के विकार जैसे अहंकार, संशय, मोह, लोभ आदि नष्ट हो जाते हैं और व्यक्ति को सत्य का बोध होता है, जिससे वह सर्वव्यापी ईश्वर को अनुभव कर पाता है।

प्रश्न 3

ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते?
Solution: ईश्वर सर्वव्यापी है, अर्थात वह हर कण में मौजूद है। तथापि, हम उसे इसलिए नहीं देख पाते क्योंकि हमारा मन अज्ञानता, अहंकार, सांसारिक मोह-माया और विभिन्न प्रकार की वासनाओं में लिप्त रहता है। ये मानसिक अवरोध हमें ईश्वर की उपस्थिति को अनुभव करने से रोकते हैं। कबीर के अनुसार, ईश्वर को पाने के लिए ज्ञान का प्रकाश आवश्यक है। जिस प्रकार एक हिरण अपनी नाभि में स्थित कस्तूरी की सुगंध को पाने के लिए पूरे जंगल में भटकता रहता है, उसी प्रकार मनुष्य भी ईश्वर को मंदिरों, मस्जिदों या अन्य बाहरी स्थानों पर ढूंढता रहता है, जबकि वह उसके भीतर ही निवास करता है। अज्ञानता के कारण हम इस सत्य को नहीं पहचान पाते।

प्रश्न 4

संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुखी कौन ? यहाँ 'सोना' और 'जागना' किसके प्रतीक हैं? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
Solution: कबीर के अनुसार, संसार में वह व्यक्ति सुखी है जो केवल सांसारिक सुखों, जैसे खाना-पीना और ऐशो-आराम में डूबा रहता है और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को नहीं समझता। ऐसे व्यक्ति को कबीर 'सोया हुआ' मानते हैं।

यहाँ 'सोना' अज्ञानता, प्रमाद और सांसारिक मोह में लीन रहने का प्रतीक है। इसके विपरीत, 'जागना' ज्ञान, विवेक और ईश्वर के प्रति सजगता का प्रतीक है। जो व्यक्ति सांसारिक सुखों को क्षणभंगुर और व्यर्थ समझता है, ईश्वर भक्ति में लीन रहता है, और संसार की नश्वरता को समझकर चिंतित रहता है, वही 'जागृत' या ज्ञानी व्यक्ति है। ऐसे ज्ञानी व्यक्ति संसार की दुर्दशा को देखकर दुखी होते हैं क्योंकि वे सत्य को जानते हैं और दूसरों को भी सचेत करना चाहते हैं।

प्रश्न 5

अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है?
Solution: कबीर दास जी बताते हैं कि अपने स्वभाव को निर्मल, निष्कपट और सरल बनाए रखने के लिए सबसे प्रभावी उपाय यह है कि हमें निंदक (आलोचक) को हमेशा अपने पास रखना चाहिए। निंदक व्यक्ति, जो हमारी बुराइयों और त्रुटियों को बिना किसी संकोच के बताता है, वह हमारा सबसे सच्चा हितैषी होता है। यदि हम उसकी बातों को ध्यान से सुनें और अपनी कमियों को स्वीकार करके उनमें सुधार करें, तो हम अपने स्वभाव को निरंतर परिष्कृत और निर्मल बना सकते हैं। इस प्रकार, निंदक की आलोचना हमें आत्म-सुधार का अवसर प्रदान करती है।

प्रश्न 6

'ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होई' - इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
Solution: इस पंक्ति के माध्यम से कवि कबीर दास जी यह कहना चाहते हैं कि ईश्वर (प्रियतम) को पाने के लिए केवल एक अक्षर का प्रेम या ईश्वर के नाम का स्मरण ही पर्याप्त है। उन्होंने बड़ी-बड़ी पोथियों या ग्रंथों को पढ़ने वाले तथा शास्त्रीय ज्ञान अर्जित करने वाले लोगों की तुलना में ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम और भक्ति को अधिक श्रेष्ठ बताया है। कवि के अनुसार, सच्चा पंडित या ज्ञानी वह व्यक्ति है जो ईश्वर के नाम के एक अक्षर को हृदय से स्मरण करता है और उसे अपने जीवन में उतारता है, न कि वह जिसने केवल किताबी ज्ञान प्राप्त किया हो पर ईश्वर के प्रति प्रेम न हो। इसके लिए मन को सांसारिक मोह-माया से हटाकर पूरी तरह ईश्वर भक्ति में लगाना आवश्यक है।

प्रश्न 7

कबीर की उद्धृत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए।
Solution: कबीर दास जी का अनुभव क्षेत्र अत्यंत विस्तृत था, क्योंकि उन्होंने विभिन्न स्थानों की यात्राएँ कीं और प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया। इसी कारण उनकी साखियों की भाषा में कई बोलियों और भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उनकी भाषा में अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी भाषा के शब्दों का मिश्रण मिलता है। इस मिश्रित और लोक-प्रचलित भाषा के कारण ही उनकी भाषा को 'पचमेल खिचड़ी' कहा जाता है। साथ ही, उनकी भाषा को 'सधुक्कड़ी' भी कहा जाता है, जो साधु-संतों द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा का प्रतीक है। कबीर ने अपनी बात को सीधे और सरल ढंग से कहने का प्रयास किया, जैसा वे बोलते थे वैसा ही लिखते थे। उनकी भाषा में लयबद्धता, उपदेशात्मकता, प्रवाह, सहजता और सरलता जैसे गुण विद्यमान हैं। उन्होंने लोकभाषा के शब्दों का भी प्रयोग किया है, जैसे - 'खायै', 'नेड़ा', 'मुवा', 'जाल्या', 'आँगणि' आदि।

प्रश्न 8

निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए - बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
Solution: इस पंक्ति का भाव यह है कि ईश्वर से विरह (बिछोह) की व्यथा अत्यंत कष्टदायक होती है, जो विषैले सर्प के काटने से भी अधिक घातक है। कबीर दास जी कहते हैं कि जब ईश्वर से विरह का सर्प (विरह-व्यथा) शरीर के अंदर बस जाता है, तो उस पर कोई भी मंत्र या उपाय काम नहीं करता है। सामान्यतः सर्प बाहरी अंगों को डसता है, जिस पर मंत्रों का प्रभाव हो सकता है, परन्तु ईश्वर के विरह का सर्प तो आत्मा के भीतर गहराई में प्रवेश कर जाता है और निरंतर पीड़ा देता रहता है। कवि का आशय है कि ईश्वर के वियोग में व्यक्ति या तो जीवित नहीं रह पाता या फिर वह पागल हो जाता है, क्योंकि इस असहनीय पीड़ा को शांत करने का कोई बाहरी उपचार संभव नहीं है।

प्रश्न 9

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढे बन माँहि।
Solution: इस पंक्ति के माध्यम से कवि कबीर दास जी मनुष्य की अज्ञानता और भ्रम की स्थिति को स्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि जिस प्रकार एक कस्तूरी मृग की नाभि (कुंडलि) में ही स्थित होती है, उसकी सुगंध उसी के भीतर से आती है, परन्तु वह मृग उस सुगंध को अपने आस-पास न पाकर पूरे जंगल में उसे ढूँढ़ता फिरता है। इसी प्रकार, मनुष्य भी ईश्वर को अपने भीतर या हर कण में व्याप्त होने के बजाय बाहरी स्थानों, जैसे मंदिर, मस्जिद, तीर्थयात्राओं, पूजा-पाठ या कर्मकांडों में ढूंढता रहता है। मनुष्य की यह अज्ञानता उसे ईश्वर की सर्वव्यापकता का बोध नहीं करने देती, जबकि ईश्वर उसके अपने ही भीतर निवास करता है।

प्रश्न 10

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
Solution: इस पंक्ति का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। कवि कबीर दास जी कहते हैं कि जब तक मेरे अंदर 'मैं' या 'अहंकार' (अहंकार की भावना) विद्यमान थी, तब तक मुझे ईश्वर की अनुभूति नहीं हो पा रही थी। अहंकार ईश्वर और जीवात्मा के बीच एक बड़ी बाधा है। परन्तु, जब ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण बढ़ा, तो मेरा अहंकार (मैं) धीरे-धीरे समाप्त हो गया। अब जब अहंकार पूरी तरह से समाप्त हो गया है, तो मुझे ईश्वर की सर्वव्यापकता का अनुभव हो रहा है। यह पंक्ति अहंकार के त्याग और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार की अवस्था को दर्शाती है, जहाँ जीवात्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है।

Common mistakes

  • Misinterpreting the symbolic meanings of 'deepak' (lamp) and 'andhiyara' (darkness).
  • Failing to grasp the concept of God's omnipresence due to ego and ignorance.
  • Confusing worldly pleasures with true happiness.
  • Underestimating the value of constructive criticism for self-improvement.

Revision tips

  • Read each Sakhi aloud to understand its rhythm and flow.
  • Focus on the core message and symbolism within each verse.
  • Relate Kabir's teachings to modern-day life situations.
  • Pay attention to the explanation of 'Panchmel Khichdi' language for better comprehension.

Practice MCQs

Q1. कबीर के अनुसार, मीठी वाणी बोलने से स्वयं को क्या प्राप्त होता है?

Q2. साखी में 'दीपक' किसका प्रतीक है?

Q3. ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, फिर भी हम उसे क्यों नहीं देख पाते?

Q4. कबीर के अनुसार, 'सोना' किसका प्रतीक है?

Q5. स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने किसे अपने आँगन में रखने का सुझाव दिया है?

Q6. कबीर की साखियों की भाषा को क्या कहा जाता है?

Frequently asked questions

कक्षा 10 के लिए कबीर की साखियों का क्या महत्व है?

कबीर की साखियाँ जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों जैसे वाणी की मधुरता, ज्ञान का महत्व, ईश्वर की सर्वव्यापकता और आत्म-सुधार पर जोर देती हैं, जो कक्षा 10 के छात्रों के लिए प्रासंगिक हैं।

साखी में 'दीपक' और 'अंधियारा' का क्या अर्थ है?

साखी में 'दीपक' ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है और 'अंधियारा' अज्ञान या अहंकार का प्रतीक है। दीपक के जलने से जैसे अंधकार मिट जाता है, वैसे ही ज्ञान से अज्ञानता दूर होती है।

कबीर के अनुसार सच्चा ज्ञानी कौन है?

कबीर के अनुसार, सच्चा ज्ञानी वह है जो शास्त्रीय ज्ञान के बजाय ईश्वर के नाम के एक अक्षर (प्रेम) को समझता है और भक्ति में लीन रहता है, न कि वह जिसने केवल पोथियाँ पढ़ी हैं।

कबीर ने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए क्या उपाय बताया है?

कबीर ने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए निंदक को अपने पास रखने का सुझाव दिया है। निंदक की बातों से अपनी कमियों को जानकर उन्हें दूर करने से स्वभाव निर्मल बनता है।

कबीर की भाषा की क्या विशेषता है?

कबीर की भाषा 'पचमेल खिचड़ी' या 'सधुक्कड़ी' कहलाती है, क्योंकि इसमें अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी जैसी कई भाषाओं के शब्दों का मिश्रण है। यह भाषा सरल और सहज है।

यह समाधान छात्रों की परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करेंगे?

ये समाधान प्रत्येक प्रश्न के विस्तृत और स्पष्ट उत्तर प्रदान करते हैं, जिससे छात्रों को कबीर की साखियों के अर्थ, प्रतीकों और संदेश को गहराई से समझने में मदद मिलती है, जो परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए आवश्यक है।

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