कक्षा 10 हिंदी क्षितिज पाठ 15: स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन - NCERT समाधान
यह पृष्ठ कक्षा 10 की हिंदी क्षितिज पुस्तक के पाठ 15, 'स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। यह पाठ द्विवेदी जी द्वारा स्त्री शिक्षा के विरोध में दिए गए कुतर्कों का खंडन करता है और स्त्री शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालता है। समाधानों में प्राचीन काल की विदुषी स्त्रियों के उदाहरण, शिक्षा के अभाव में होने वाले अनर्थों का पुरुषों की शिक्षा से तुलनात्मक विश्लेषण, और व्यंग्यात्मक तर्कों का स्पष्टीकरण शामिल है। ये समाधान छात्रों को पाठ की गहरी समझ विकसित करने, परीक्षा की तैयारी को मजबूत करने और स्त्री शिक्षा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनाने में सहायता करेंगे।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 10 |
| Subject | Hindi Kshitiz |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | Chapter 15 |
Chapter summary
कक्षा 10 हिंदी क्षितिज के पाठ 15 के ये NCERT समाधान, स्त्री शिक्षा के विरोध में दिए गए पुरातनपंथी तर्कों का खंडन करते हैं। समाधानों में द्विवेदी जी द्वारा प्रस्तुत तर्कों का विश्लेषण किया गया है, जिसमें प्राचीन विदुषी स्त्रियों के उदाहरण, शिक्षा के परिणाम स्वरूप होने वाले कथित 'अनर्थों' का खंडन, और व्यंग्य का प्रयोग शामिल है। यह पाठ छात्रों को स्त्री शिक्षा के महत्व और उसके विरोध में दिए जाने वाले निराधार तर्कों को समझने में मदद करता है।
Learning outcomes
- स्त्री शिक्षा के विरोध में दिए गए पुरातनपंथी तर्कों को पहचानना।
- द्विवेदी जी द्वारा स्त्री शिक्षा के समर्थन में प्रस्तुत तर्कों को समझना।
- प्राचीन काल की विदुषी स्त्रियों के उदाहरणों से स्त्री शिक्षा के महत्व को समझना।
- व्यंग्य के प्रयोग द्वारा कुतर्कों का खंडन करने की शैली को समझना।
- स्त्री-पुरुष समानता के संदर्भ में परंपराओं के स्वीकार्य पक्षों का विश्लेषण करना।
Topics covered
Paper topics
- स्त्री शिक्षा का महत्व
- पुरातनपंथी तर्क
- द्विवेदी जी के तर्क
- प्राचीन विदुषी स्त्रियाँ
- शिक्षा और अनर्थ
- स्त्री-पुरुष समानता
- व्यंग्य शैली का प्रयोग
- प्राकृत भाषा का संदर्भ
- कुतर्कों का खंडन
- सामाजिक उन्नति
Important topics
- स्त्री शिक्षा के विरोध में दिए गए कुतर्कों का खंडन
- द्विवेदी जी द्वारा स्त्री शिक्षा के समर्थन में प्रस्तुत तर्क
- व्यंग्य शैली का प्रयोग और उसका प्रभाव
- स्त्री-पुरुष समानता का महत्व
- प्राचीन काल में स्त्रियों की शिक्षा की स्थिति
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने स्त्री-शिक्षा के विरोध में दिए गए पुरातनपंथी तर्कों का खंडन करने के लिए अनेक प्रभावी तर्क प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने स्त्री-शिक्षा का समर्थन करते हुए निम्नलिखित बिंदु उठाए हैं:
- प्राचीन काल की विदुषी स्त्रियाँ: द्विवेदी जी ने यह तर्क दिया कि प्राचीन काल में भी स्त्रियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त करती थीं। उन्होंने सीता, शकुंतला, रुकमणी जैसी विदुषी महिलाओं का उदाहरण दिया, जिनके बारे में वेदों और पुराणों में भी प्रमाण मिलते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि प्राचीन काल में अनेक पदों की रचना भी स्त्रियों ने की थी।
- 'अनर्थ' का तर्क और उसका खंडन: विरोधियों का एक तर्क था कि स्त्रियों की शिक्षा से घर में कलह और अनर्थ होते हैं। द्विवेदी जी ने इस तर्क का खंडन करते हुए व्यंग्य किया कि यदि स्त्रियों द्वारा किए गए अनर्थ उनकी शिक्षा का परिणाम हैं, तो पुरुषों द्वारा किए जाने वाले चोरी, डकैती, हत्या जैसे अपराध भी उनकी शिक्षा का ही परिणाम माने जाने चाहिए। अतः पुरुषों की शिक्षा पर भी प्रतिबंध लगाना चाहिए।
- ऐतिहासिक तथ्यों का आधार: द्विवेदी जी ने उन लोगों को संबोधित किया जो कहते थे कि पुराने ज़माने में स्त्रियाँ नहीं पढ़ती थीं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग या तो इतिहास से अनभिज्ञ हैं या जानबूझकर समाज को धोखा दे रहे हैं। यदि किसी कारणवश पुराने समय में स्त्रियों की शिक्षा पर रोक थी भी, तो उस नियम को तोड़ देना चाहिए क्योंकि यह समाज की उन्नति में बाधक है।
प्रश्न 2
आचार्य द्विवेदी ने 'स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं' इस कुतर्क का खंडन बड़ी चतुराई और व्यंग्य के साथ किया है। उन्होंने इस दलील को कई तरह से निरस्त किया है:
- पुरुषों से तुलना: द्विवेदी जी ने कहा कि यदि स्त्रियों द्वारा किए गए अनर्थ (जैसे शकुंतला का दुष्यंत को कुवचन कहना या सीता का राम के प्रति क्रोध) उनकी शिक्षा का परिणाम माने जाते हैं, तो पुरुषों द्वारा किए जाने वाले गंभीर अपराध जैसे चोरी, डकैती, हत्या आदि भी उनकी शिक्षा का ही परिणाम माने जाने चाहिए। इस प्रकार, यदि स्त्रियों की शिक्षा बंद करनी है तो पुरुषों की शिक्षा भी बंद करनी पड़ेगी, जो कि हास्यास्पद है।
- स्वाभाविकता बनाम शिक्षा: उन्होंने स्पष्ट किया कि शकुंतला का दुष्यंत को कड़वा वचन कहना या सीता का अपने परित्याग पर राम से क्रोधित होना उनकी शिक्षा का परिणाम नहीं, बल्कि उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया या स्वाभिमान का प्रकटीकरण था।
- व्यंग्यात्मक प्रस्तुति: द्विवेदी जी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि कुछ लोग स्त्रियों को अपढ़ रखकर भारत का गौरव बढ़ाना चाहते हैं। वे स्त्रियों के पढ़ने को 'कालकूट' और पुरुषों के पढ़ने को 'पीयूष का घूँट' बताते हैं, जो कि एक पक्षपाती और अतार्किक विचार है।
इस प्रकार, द्विवेदी जी ने यह सिद्ध किया कि अनर्थ का शिक्षा से सीधा संबंध जोड़ना गलत है और यह तर्क स्त्रियों की शिक्षा रोकने का कोई ठोस आधार नहीं है।
प्रश्न 3
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने स्त्री-शिक्षा के विरोध में दिए गए तर्कों का खंडन करने के लिए व्यंग्य का भरपूर प्रयोग किया है। उनके द्वारा निबंध में से छाँटे गए कुछ अन्य व्यंग्यात्मक अंश और उनका स्पष्टीकरण इस प्रकार है:
- 'कालकूट' बनाम 'पीयूष का घूँट': द्विवेदी जी व्यंग्य करते हैं, "स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरूषों के लिए पीयूष का घूँट!" इसका अर्थ है कि जो चीज़ पुरुषों के लिए अमृत समान लाभकारी है, वही स्त्रियों के लिए विष के समान हानिकारक कैसे हो सकती है? यह दोहरा मापदंड और पक्षपातपूर्ण सोच पर कटाक्ष है।
- पुरुषों के अनर्थों की उपेक्षा: द्विवेदी जी लिखते हैं, "स्त्रियों का किया हुआ अनर्थ यदि पढ़ाने ही का परिणाम है तो पुरुषों का किया हुआ अनर्थ भी उनकी विद्या और शिक्षा का ही परिणाम समझना चाहिए।" यह व्यंग्य इस बात पर है कि लोग स्त्रियों की छोटी-मोटी गलतियों को उनकी शिक्षा से जोड़ देते हैं, जबकि पुरुष द्वारा किए गए बड़े अपराधों को शिक्षा का परिणाम नहीं मानते।
- अत्रि की पत्नी और गार्गी का उदाहरण: द्विवेदी जी उन लोगों पर व्यंग्य करते हैं जो स्त्रियों के विद्वान होने को आपत्तिजनक मानते हैं। वे कहते हैं कि यदि अत्रि की पत्नी पत्नी-धर्म पर व्याख्यान दे, गार्गी बड़े-बड़े ब्रह्मवादियों को हरा दे, या मंडन मिश्र की पत्नी शंकराचार्य को शास्त्रार्थ में हरा दे, तो कुछ लोग इसे 'गज़ब' और 'भयंकर बात' मानते हैं। यह व्यंग्य उन लोगों की संकीर्ण मानसिकता पर है जो स्त्रियों की विद्वत्ता को स्वीकार नहीं करना चाहते।
- प्राकृत भाषा और अपढ़ता का संबंध:कुछ पंडितों द्वारा प्राकृत में ग्रंथ लिखने वाले लेखकों को अपढ़ कहने पर द्विवेदी जी व्यंग्य करते हैं। वे कहते हैं कि यदि प्राकृत में लिखने वाले अपढ़ थे, तो आज के हिंदी अख़बार के संपादक भी अपढ़ माने जाएँगे, क्योंकि वे भी प्रचलित भाषा में लिखते हैं। यह व्यंग्य भाषा और विद्वत्ता के बीच गलत संबंध स्थापित करने वालों पर है।
इन व्यंग्यात्मक अंशों के माध्यम से द्विवेदी जी ने स्त्री-शिक्षा विरोधियों की दलीलों की निरर्थकता और उनके पीछे छिपे पूर्वाग्रहों को उजागर किया है।
प्रश्न 4
पाठ के आधार पर, पुराने समय में स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना उनके अपढ़ होने का बिल्कुल भी सबूत नहीं है। द्विवेदी जी ने इस तर्क का खंडन करते हुए स्पष्ट किया है कि:
- प्राकृत उस समय की सर्वसाधारण की भाषा थी: जिस प्रकार आज हिंदी आम बोलचाल की भाषा है और इसका प्रयोग करना किसी को अशिक्षित साबित नहीं करता, उसी प्रकार प्राचीन काल में प्राकृत भाषा जनसाधारण की भाषा थी। सुशिक्षित और विद्वान लोग भी इसी भाषा का प्रयोग करते थे।
- भाषा का प्रयोग शिक्षा का मापदंड नहीं: केवल किसी विशेष भाषा का प्रयोग करना, विशेषकर यदि वह उस समय की प्रचलित भाषा हो, किसी व्यक्ति की शिक्षा या अशिक्षा का मापदंड नहीं हो सकता। यदि हिंदी बोलने और लिखने वाले आज के समय में अशिक्षित नहीं माने जाते, तो उस समय प्राकृत बोलने वाली स्त्रियाँ भी अनपढ़ या गँवार नहीं हो सकतीं।
- साहित्यिक रचनाओं का उदाहरण: पाठ में यह भी उल्लेख है कि गाथा-सप्तशती, सेतुबंध-महाकाव्य और कुमारपालचरित जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ प्राकृत भाषा में रचे गए थे। यदि इन ग्रंथों के रचयिता विद्वान थे, तो प्राकृत भाषा का प्रयोग करने वाले अन्य लोग भी निश्चित रूप से शिक्षित हो सकते थे।
अतः, स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा का प्रयोग उनकी शिक्षा या अशिक्षा का प्रमाण न होकर, उस समय की सामाजिक और भाषाई स्थिति का सूचक था।
प्रश्न 5
यह कथन बिल्कुल सत्य है कि परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ावा देते हों। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं:
- सामाजिक प्रगति का आधार: समाज की प्रगति तभी संभव है जब उसके सभी सदस्य, चाहे वे स्त्री हों या पुरुष, समान अवसर और सम्मान प्राप्त करें। परंपरा के वे पहलू जो लैंगिक असमानता को बनाए रखते हैं, वे समाज के विकास में बाधा डालते हैं।
- मानवाधिकारों का उल्लंघन: स्त्री-पुरुष समानता एक मौलिक मानवाधिकार है। परंपरा के ऐसे नियम या प्रथाएँ जो स्त्रियों को पुरुषों से कमतर आंकती हैं या उन्हें सीमित करती हैं, वे इस मानवाधिकार का उल्लंघन करती हैं।
- क्षमता का पूर्ण उपयोग: जब स्त्रियों को समान अवसर और शिक्षा मिलती है, तो वे अपनी पूरी क्षमता का उपयोग कर सकती हैं। इससे न केवल उनका व्यक्तिगत विकास होता है, बल्कि वे समाज और राष्ट्र के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। परंपरा के वे पक्ष जो स्त्रियों को पीछे धकेलते हैं, वे इस क्षमता के उपयोग को रोकते हैं।
- न्याय और नैतिकता: समानता का सिद्धांत न्याय और नैतिकता पर आधारित है। किसी भी व्यक्ति के साथ उसके लिंग के आधार पर भेदभाव करना अनैतिक और अन्यायपूर्ण है। इसलिए, परंपरा के उन हिस्सों को बनाए रखना चाहिए जो सभी के लिए निष्पक्ष और न्यायपूर्ण हों।
- आधुनिक समाज की आवश्यकता: आज का समाज वैज्ञानिक और तार्किक सोच पर आधारित है। पुरानी रूढ़ियों और परंपराओं को आँख बंद करके मानने के बजाय, हमें उनका मूल्यांकन करना चाहिए और केवल उन्हीं को अपनाना चाहिए जो वर्तमान समय की आवश्यकताओं और समानता के सिद्धांतों के अनुरूप हों।
निष्कर्षतः, परंपरा एक जीवंत धारा की तरह है जिसे समय के साथ परिष्कृत होते रहना चाहिए। जो परंपराएँ स्त्री-पुरुष को समान दृष्टि से नहीं देखतीं, वे प्रगतिशील समाज के लिए अनुपयुक्त हैं और उन्हें त्याग देना ही उचित है।
Common mistakes
- स्त्री शिक्षा के विरोध में दिए गए तर्कों को सत्य मान लेना।
- प्राचीन काल की स्त्रियों की शिक्षा के महत्व को कम आंकना।
- व्यंग्य और तर्कों के बीच अंतर को न समझ पाना।
- प्राकृत भाषा के प्रयोग को अपढ़ता का प्रमाण मान लेना।
Revision tips
- पाठ में द्विवेदी जी द्वारा दिए गए सभी तर्कों को सूचीबद्ध करें और उनके खंडन को समझें।
- प्राचीन काल की विदुषी स्त्रियों के उदाहरणों को याद रखें।
- पाठ में प्रयुक्त व्यंग्यात्मक अंशों को पहचानें और उनके अर्थ को समझें।
- स्त्री-पुरुष समानता के संदर्भ में पाठ के मुख्य संदेश को आत्मसात करें।
Practice MCQs
Q1. द्विवेदी जी के अनुसार, प्राचीन काल में कौन-सी महिलाएँ शिक्षा ग्रहण कर सकती थीं?
Explanation: द्विवेदी जी ने सीता, शकुंतला और रुकमणी जैसी ऐतिहासिक और पौराणिक महिलाओं का उदाहरण देकर सिद्ध किया कि प्राचीन काल में भी स्त्रियाँ शिक्षा ग्रहण कर सकती थीं।
Q2. स्त्री शिक्षा के विरोधियों का एक प्रमुख तर्क क्या था?
Explanation: कुछ पुरातनपंथी लोग यह मानते थे कि स्त्रियों को पढ़ाने से घर में कलह और अनर्थ उत्पन्न होते हैं, जिसे द्विवेदी जी ने खंडित किया।
Q3. द्विवेदी जी ने 'अनर्थ' के तर्क का खंडन कैसे किया?
Explanation: द्विवेदी जी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि यदि स्त्रियों द्वारा किए गए अनर्थ उनकी शिक्षा का परिणाम हैं, तो पुरुषों द्वारा किए गए अनर्थ भी उनकी शिक्षा का ही परिणाम माने जाने चाहिए।
Q4. पाठ के अनुसार, प्राचीन काल की स्त्रियों द्वारा प्राकृत भाषा में बोलना किसका प्रमाण था?
Explanation: पाठ स्पष्ट करता है कि प्राकृत उस समय की सर्वसाधारण की भाषा थी, इसलिए स्त्रियों द्वारा इसका प्रयोग उनके अपढ़ होने का नहीं, बल्कि उस समय की सामान्य बोलचाल का प्रमाण था।
Q5. द्विवेदी जी ने स्त्री-शिक्षा के विरोधियों के तर्कों का खंडन करने के लिए किस साहित्यिक शैली का प्रयोग किया?
Explanation: द्विवेदी जी ने स्त्री शिक्षा के विरोध में दिए गए कुतर्कों का खंडन करने के लिए प्रभावी ढंग से व्यंग्य शैली का प्रयोग किया है, जिससे तर्कों की निरर्थकता सिद्ध होती है।
Frequently asked questions
कक्षा 10 हिंदी क्षितिज के पाठ 15 का मुख्य विषय क्या है?
कक्षा 10 हिंदी क्षितिज के पाठ 15 का मुख्य विषय 'स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन' है, जिसमें आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने स्त्री शिक्षा के विरोध में दिए गए निराधार तर्कों का खंडन किया है।
द्विवेदी जी ने स्त्री शिक्षा के विरोधियों के तर्कों का खंडन कैसे किया?
द्विवेदी जी ने प्राचीन विदुषी स्त्रियों के उदाहरण देकर, शिक्षा से होने वाले कथित 'अनर्थों' की तुलना पुरुषों के कार्यों से करके, और व्यंग्य का प्रयोग करके स्त्री शिक्षा के विरोधियों के तर्कों का खंडन किया।
क्या यह समाधान परीक्षा की तैयारी में सहायक हैं?
हाँ, ये समाधान पाठ की गहरी समझ विकसित करने, महत्वपूर्ण तर्कों को स्पष्ट करने और परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर देने में छात्रों की सहायता करेंगे।
पाठ में 'अनर्थ' के तर्क का क्या अर्थ है और उसका खंडन कैसे किया गया है?
पाठ में 'अनर्थ' का तर्क यह है कि स्त्रियों को पढ़ाने से घर में कलह और बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं। द्विवेदी जी ने इसका खंडन करते हुए कहा कि यदि ऐसा है तो पुरुषों की शिक्षा भी बंद कर देनी चाहिए, क्योंकि पुरुष भी अनर्थ करते हैं।
प्राकृत भाषा का उल्लेख पाठ में किस संदर्भ में किया गया है?
पाठ में प्राकृत भाषा का उल्लेख यह स्पष्ट करने के लिए किया गया है कि प्राचीन काल की स्त्रियों द्वारा इस भाषा का प्रयोग उनके अपढ़ होने का प्रमाण नहीं था, बल्कि यह उस समय की सामान्य बोलचाल की भाषा थी।
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