CBSE Class 12 Sanskrit NCERT Solutions: दारिद्रये दुर्लभं सत्त्वम्

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CBSE Class 12 Sanskrit, Chapter 7, 'दारिद्रये दुर्लभं सत्त्वम्' (Virtue is Rare in Poverty), presents an excerpt from Mahakavi Bhasa's play 'Charudattam'. It introduces Charudatta, a formerly affluent nobleman from Ujjain, celebrated for his generosity and love of arts. Despite falling into poverty due to his charitable deeds, Charudatta's noble character remains intact. The chapter also features his loyal friend, Maitreya, who stands by him through thick and thin. The initial scenes, as explored in the solutions, depict the Sutradhar's discussion with the Nati regarding the household's limited resources, effectively establishing Charudatta's challenging situation. These solutions aim to deepen students' comprehension of the Sanskrit text, the dynamics between characters, and the central themes of integrity and companionship amidst adversity, thereby supporting their academic preparation.

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
Subjectसंस्कृत
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter7. दारिद्र्ये दुर्लभं सत्त्वम्

Chapter summary

Chapter 7, 'दारिद्रये दुर्लभं सत्त्वम्', presents an excerpt from Mahakavi Bhasa's 'Charudattam'. It focuses on the protagonist Charudatta, who, despite his poverty, retains his noble qualities. The solutions explain the initial dramatic setup, including the Sutradhar's dialogue revealing the household's financial struggles and the introduction of the loyal friend Maitreya. This chapter's exercises help students grasp the Sanskrit text, understand character interactions, and appreciate the theme of enduring virtue amidst adversity.

Learning outcomes

  • Understand the story and characters of 'Charudattam'.
  • Analyze the theme of maintaining virtue in poverty.
  • Learn about the role of the Sutradhar and Nati in Sanskrit drama.
  • Improve comprehension of Sanskrit prose and dramatic dialogues.
  • Identify the significance of friendship in difficult times.

Topics covered

Paper topics

  • Introduction to Charudattam
  • Charudatta's character and circumstances
  • Maitreya's friendship
  • Sutradhar's role
  • Nati's dialogue
  • Theme of virtue in poverty
  • Sanskrit dramatic conventions
  • Analysis of initial dramatic scenes

Important topics

  • Charudatta's character and his enduring virtue
  • The theme of friendship in adversity
  • Understanding the dramatic structure of the excerpt
  • Significance of maintaining nobility despite poverty

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Questions and Solutions

पाठ 7: दारिद्रये दुर्लभं सत्त्वम्

प्रश्न: प्रस्तुत पाठ 'चारुदत्तं' नाटकस्य प्रथमाङ्कात् सङ्कलितः। नाटकस्य नायकः चारुदतः अस्ति। सः उज्जयिनीवासी, रूपवान्, गुणवान् सङ्गीतविद्यायाः प्रेमी, परोपकारपरायणः च। चारुदत्तः पूर्वं धनवान् आसीत् परं सः उदारतावशदानकारणात् च शीघ्रं दरिद्रो जातः। दरिद्रावस्थायां मित्राणाम् उपेक्षायाः कारणात् कटुः अनुभवः भवति । किन्तु दैन्येऽपि तस्य मनः भ्रष्टं न भवति । मैत्रेयः अस्य मित्रम् । सः विनोदप्रियः विपत्तौ अपि तस्य विश्वासपात्रम्।
Solution: यह पाठ महाकवि भास द्वारा रचित प्रसिद्ध नाटक 'चारुदत्तम्' के प्रथम अंक से लिया गया एक अंश है। इस पाठ का नायक चारुदत्त है, जो उज्जयिनी का निवासी है। वह न केवल सुन्दर और गुणवान है, बल्कि संगीत कला का प्रेमी और दूसरों की भलाई में तत्पर रहने वाला व्यक्ति भी है। पूर्व में चारुदत्त अत्यंत धनवान था, परन्तु अपनी उदारता और दानशीलता के कारण वह शीघ्र ही दरिद्र हो गया। दरिद्रता की अवस्था में उसे मित्रों द्वारा उपेक्षा का कड़वा अनुभव होता है। इसके बावजूद, दीनता में भी उसका मन विचलित नहीं होता और वह अपने सद्गुणों को बनाए रखता है। मैत्रेय उसका अभिन्न मित्र है, जो स्वभाव से विनोदप्रिय है और चारुदत्त के विपत्ति के समय में भी उसका विश्वासपात्र बना रहता है। यह अंश चारुदत्त के चरित्र की महानता और मित्रता के महत्व को दर्शाता है।

पाठ 7: दारिद्रये दुर्लभं सत्त्वम्

प्रश्न: (नान्धन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः) किन्नु खलु अद्य प्रत्यूष एव गेहान्निष्क्रान्तस्य बुभुक्षया पुष्करपत्रपतितजलबिन्दू इव चञ्चलायेते इव मेऽक्षिणी। यावद् गेहं गत्वा जानामि किन्नु खलु संविधा विहिता न वेति। (परिक्रम्य) एतद् अस्माकं गृहम्। यावत् आर्यां शब्दापयामि । आर्ये! इतस्तावत्। (नटी प्रविश्य) आर्य! इयमस्मि । आर्य दिष्ट्या खलु आगतोऽसि । आर्ये! किम् अस्त्यस्माकं गेहे कोऽपि प्रातराशः। अस्ति, घृतं गुडो दधि तण्डुलाश्च सर्वमस्ति। चिरं जीव, एवं शोभनानां भोजनानां दात्री भव। आर्ये! किमेतत् सर्वम् अस्माकं गेहेऽस्ति। नहि नहि, अन्तरापणे। (सरोषम्) आः अनार्ये! एवं ते आशा छिद्यताम्। अहं पर्वताद् दूरमारोप्य पातितोऽस्मि। मा बिभीहि, मा बिभीहि। मुहूर्तकं प्रतिपालयतु आर्यः। सर्वं सञ्जं भविष्यति। आर्य! अद्य ममोपवासः अस्ति। यदि आर्यस्यानुग्रहः स्यात् तर्हि अस्मादृशयोग्यं कञ्चिद् जनं निमन्त्रयितुम् इच्छामि । (परिक्रम्य) कुत्र नु खलु दरिद्रं योग्यं जनं लभेय। (विलोक्य) एष आर्यचारूदत्तस्य वयस्यः आर्यमैत्रेयः इतएवागच्छति । यावद् उपनिमन्त्रयामि । (परिक्रम्य) आर्य! निमन्त्रितोऽसि । (निष्क्रान्तः) (नेपथ्ये) अन्यमन्यं निमन्त्रयतु भवान् । नाहं तावद् दिदः ।
Solution: (नान्दी समाप्त होने पर सूत्रधार मंच पर प्रवेश करता है।) सूत्रधार कहता है कि पता नहीं क्यों आज सुबह घर से निकलने के बाद भूख के कारण मेरी दोनों आँखें कमल के पत्ते पर गिरे हुए पानी की बूँदों की तरह चंचल हो रही हैं। मैं घर जाकर देखता हूँ कि भोजन की कोई व्यवस्था हुई है या नहीं। (घूमकर) यह मेरा घर है। मैं अपनी पत्नी (आर्या) को पुकारता हूँ। हे आर्या! इधर आइए। नटी (प्रवेश करके) आर्य! मैं आ गई हूँ। आर्य, आप आ गए, यह सौभाग्य की बात है। सूत्रधार पूछता है, हे देवि! क्या हमारे घर में कुछ नाश्ता है? नटी उत्तर देती है, हाँ, घी, गुड़, दही और चावल सब कुछ है। सूत्रधार प्रसन्न होकर कहता है, तुम दीर्घायु हो, ऐसी ही सुंदर भोजन देने वाली बनो। फिर वह पूछता है, क्या यह सब कुछ हमारे घर में है? नटी कहती है, नहीं, नहीं, यह सब बाजार में है। सूत्रधार क्रोधित होकर कहता है, अरे दुष्ट स्त्री! तेरा यह आशा (भोजन) नष्ट हो जाए। मुझे तो ऐसा लगा जैसे मुझे पर्वत से बहुत ऊँचा उठाकर फेंक दिया गया हो (अर्थात् मेरी आशाएँ बहुत ऊँची थीं और अब वे टूट गईं)। नटी कहती है, डरो मत, डरो मत। आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें। सब कुछ हो जाएगा। आर्य! आज मेरा उपवास है। यदि आपकी कृपा हो तो मैं आप जैसे योग्य व्यक्ति को भोजन के लिए आमंत्रित करना चाहती हूँ। (सूत्रधार घूमकर सोचता है) मैं कहाँ एक दरिद्र योग्य व्यक्ति को ढूँढूँ? (देखकर) अरे, यह आर्य चारुदत्त का मित्र मैत्रेय इधर ही आ रहा है। मैं उसे आमंत्रित करता हूँ। (घूमकर) आर्य! आपको निमंत्रण है। (सूत्रधार चला जाता है।) (पर्दे के पीछे से आवाज आती है) आप किसी और को निमंत्रण दें। मैं अभी भूखा नहीं हूँ।

Common mistakes

  • Misinterpreting the financial situation of Charudatta.
  • Confusing the roles of Sutradhar and Maitreya.
  • Difficulty in understanding the nuances of Sanskrit dramatic language.
  • Overlooking the importance of maintaining character despite hardship.

Revision tips

  • Read the original Sanskrit text carefully alongside the simplified explanations.
  • Focus on understanding the character motivations of Charudatta and Maitreya.
  • Pay attention to the dramatic context and the initial dialogues.
  • Practice translating key Sanskrit phrases and sentences from the excerpt.

Practice MCQs

Q1. नाटकस्य नायकः कः अस्ति?

Q2. चारुदत्तः कुत्रवासी आसीत्?

Q3. चारुदत्तः पूर्वं कीदृशः आसीत्?

Q4. सूत्रधारस्य मित्रं कः अस्ति?

Q5. 'दारिद्रये दुर्लभं सत्त्वम्' पाठः कस्मात् नाटकातः सङ्कलितः?

Frequently asked questions

यह पाठ किस नाटक से लिया गया है?

यह पाठ महाकवि भास द्वारा रचित 'चारुदत्तम्' नाटक के प्रथम अंक से संकलित है।

पाठ का मुख्य पात्र कौन है?

पाठ का मुख्य पात्र चारुदत्त है, जो उज्जयिनी का एक उदार और परोपकारी व्यक्ति है।

चारुदत्त की वर्तमान स्थिति क्या है?

चारुदत्त अपनी उदारता और दान के कारण अब दरिद्र हो गया है, लेकिन वह अपनी अच्छाई नहीं छोड़ता।

मैत्रेय कौन है और उसका चारुदत्त से क्या संबंध है?

मैत्रेय चारुदत्त का मित्र है, जो विपत्ति में भी उसका विश्वासपात्र बना रहता है।

सूत्रधार और नटी की भूमिका क्या है?

सूत्रधार नाटक का व्यवस्थापक होता है और नटी एक अभिनेत्री। वे नाटक के आरम्भ में वार्तालाप करते हैं।

इस पाठ से क्या मुख्य संदेश मिलता है?

इस पाठ से यह संदेश मिलता है कि दरिद्रता में भी अपने अच्छे गुणों और चरित्र को बनाए रखना दुर्लभ है।

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