कक्षा 11 समाजशास्त्र NCERT समाधान: पाठ 10 - भारतीय समाजशास्त्री
यह पृष्ठ कक्षा 11 समाजशास्त्र के लिए NCERT समाधान प्रस्तुत करता है, विशेष रूप से पाठ 10 'भारतीय समाजशास्त्री' पर केंद्रित है। इसमें अनंतकृष्ण अय्यर और शरतचंद्र रॉय जैसे प्रमुख समाजशास्त्रियों के योगदान, जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ने के विवाद के विभिन्न तर्क, और भारत में प्रजाति तथा जाति के संबंधों पर हरबर्ट रिजले और जी.एस. घूर्ये जैसे विद्वानों के विचारों का विस्तृत विश्लेषण शामिल है। ये समाधान छात्रों को भारतीय समाजशास्त्र के महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने में मदद करते हैं, जिसमें विभिन्न समाजशास्त्रियों के दृष्टिकोण और उनके द्वारा किए गए शोध कार्य शामिल हैं। परीक्षा की तैयारी के लिए, ये समाधान प्रमुख अवधारणाओं को स्पष्ट करने और परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर देने की क्षमता विकसित करने में सहायक होंगे।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 11 |
| Subject | समाजशास्त्र |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 10. भारतीय समाजशास्त्री |
Chapter summary
पाठ 10 'भारतीय समाजशास्त्री' के ये NCERT समाधान छात्रों को भारत के प्रमुख समाजशास्त्रियों और उनके योगदान से परिचित कराते हैं। इसमें अनंतकृष्ण अय्यर और शरतचंद्र रॉय के मानवशास्त्रीय अध्ययन के तरीके, जनजातीय समुदायों को जोड़ने के मुद्दे पर संरक्षणवादियों और राष्ट्रवादियों के बीच बहस, और भारत में प्रजाति व जाति के बीच संबंधों पर रिजले और घूर्ये के विचारों का सारांश प्रस्तुत किया गया है। यह समाधान छात्रों को भारतीय समाज की जटिलताओं और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोणों को समझने में मदद करता है।
Learning outcomes
- अनंतकृष्ण अय्यर और शरतचंद्र रॉय के सामाजिक मानव विज्ञान अध्ययन के तरीकों को समझना।
- जनजातीय समुदायों को जोड़ने के विवाद के विभिन्न तर्कों का विश्लेषण करना।
- भारत में प्रजाति और जाति के संबंधों पर हरबर्ट रिजले और जी.एस. घूर्ये के विचारों की रूपरेखा तैयार करना।
- जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा को सारांशित करना।
Topics covered
Paper topics
- अनंतकृष्ण अय्यर का योगदान
- शरतचंद्र रॉय का योगदान
- जनजातीय समुदायों का एकीकरण
- संरक्षणवाद बनाम राष्ट्रवाद (जनजातीय मुद्दे पर)
- प्रजाति और जाति का संबंध
- हरबर्ट रिजले का प्रजाति सिद्धांत
- जी.एस. घूर्ये का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण
- सामाजिक मानव विज्ञान में अध्ययन पद्धतियाँ
- भारतीय समाजशास्त्रीय विचार
- जनजातीय संस्कृति का संरक्षण
Important topics
- अनंतकृष्ण अय्यर और शरतचंद्र रॉय के अध्ययन
- जनजातीय समुदायों को जोड़ने का विवाद
- प्रजाति और जाति पर रिजले और घूर्ये के विचार
- सामाजिक मानव विज्ञान की परिभाषाएँ
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
अनंतकृष्ण अय्यर (1861-1931) और शरतचंद्र रॉय भारत में सामाजिक मानव विज्ञान के महत्वपूर्ण अध्येता थे। उन्होंने अपने अध्ययन का अभ्यास निम्नलिखित तरीकों से किया:
अनंतकृष्ण अय्यर:
- अनंतकृष्ण अय्यर कोचीन के दीवान द्वारा नृजातीय सर्वेक्षण में मदद करने के लिए कहे गए थे। उन्होंने इस कार्य को एक स्वयंसेवी के रूप में पूर्ण निष्ठा से किया।
- वे संभवतः पहले भारतीय मानवविज्ञानी थे जिन्होंने एक विद्वान और शिक्षाविद् के रूप में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की।
शरतचंद्र रॉय:
- शरतचंद्र रॉय की विशेष रुचि जनजातीय समाजों में थी, जो उनकी नौकरी की आवश्यकता से भी जुड़ी थी। उन्हें अदालतों में जनजातीय परंपराओं और कानूनों की व्याख्या करनी पड़ती थी।
- उन्होंने ओराव, मुंडा और खरिया जैसी जनजातियों पर प्रसिद्ध प्रबंध लिखे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने राष्ट्रीय और ब्रिटिश शैक्षिक पत्रिकाओं में सौ से अधिक लेख प्रकाशित किए।
- रॉय ने सन् 1922 में 'मैन इन इंडिया' नामक जर्नल की स्थापना की, जो उस समय भारत का पहला इस प्रकार का जर्नल था।
दोनों विद्वानों ने अपने-अपने क्षेत्रों में गहन क्षेत्रीय कार्य और विस्तृत लेखन के माध्यम से सामाजिक मानव विज्ञान के अध्ययन को आगे बढ़ाया।
प्रश्न 2
जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा भारतीय समाज से जोड़ने के मुद्दे पर दो प्रमुख दृष्टिकोण थे, जिनके अपने-अपने तर्क थे:
1. संरक्षणवादियों का पक्ष (मुख्यधारा से अलगाव और संरक्षण):
- कई ब्रिटिश प्रशासक और मानवविज्ञानी मानते थे कि भारतीय जनजातियाँ 'आदिम' लोग हैं जिनकी अपनी विशिष्ट संस्कृति है और वे हिंदू मुख्यधारा से काफी हद तक पृथक हैं।
- उनका मानना था कि यदि इन सीधे-सादे जनजातीय लोगों को मुख्यधारा में शामिल किया गया, तो उनका न केवल शोषण होगा, बल्कि उनकी विशिष्ट संस्कृति का पतन भी होगा।
- इसलिए, उनका तर्क था कि राज्य का यह कर्तव्य है कि वह इन जनजातियों को संरक्षण दे ताकि वे अपनी जीवन शैली और संस्कृति को बनाए रख सकें, खासकर तब जब उन पर हिंदू संस्कृति में समायोजन करने का दबाव बन रहा था।
2. राष्ट्रवादियों का पक्ष (एकीकरण और पिछड़े हिंदू समाज के रूप में पहचान):
- जी.एस. घूर्ये जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थक इस विचार से असहमत थे। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारतीय जनजातियों को एक भिन्न सांस्कृतिक समूह के बजाय पिछड़े हिंदू समाज के एक हिस्से के रूप में पहचाना जाना चाहिए।
- उनका तर्क था कि मुख्यधारा की संस्कृति के प्रभाव से होने वाले दुष्परिणाम (जैसे शोषण और सांस्कृतिक विलुप्तता) केवल जनजातीय संस्कृति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारतीय समाज के सभी पिछड़े और दलित वर्गों में समान रूप से देखे जा सकते हैं।
- वे मानते थे कि जनजातीय संस्कृति को बचाने का प्रयास एक भ्रामक कोशिश है और इसका परिणाम जनजातियों का पिछड़ापन ही है।
मुख्य अंतर: मतभेद इस बात पर था कि मुख्यधारा की संस्कृति के प्रभाव का मूल्यांकन कैसे किया जाए। संरक्षणवादी इसे जनजातियों के शोषण और सांस्कृतिक विलुप्तता का कारण मानते थे, जबकि घूर्ये और राष्ट्रवादी इसे भारतीय समाज के व्यापक पिछड़ेपन का हिस्सा मानते थे।
प्रश्न 3
भारत में प्रजाति और जाति के संबंधों पर हरबर्ट रिजले और जी.एस. घूर्ये के विचारों की रूपरेखा इस प्रकार है:
हरबर्ट रिजले का दृष्टिकोण:
- रिजले के अनुसार, मनुष्य को उसकी शारीरिक विशिष्टताओं के आधार पर अलग-अलग प्रजातियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। इन विशिष्टताओं में नाक की लंबाई, खोपड़ी की चौड़ाई, कपाल का भार और मस्तिष्क का स्थान शामिल थे।
- उन्होंने भारत को प्रजातीय उद्विकास के अध्ययन के लिए एक विशिष्ट 'प्रयोगशाला' माना। उनका मानना था कि जाति व्यवस्था ने विभिन्न समूहों के बीच अंतर्विवाह को लंबे समय से प्रतिबंधित किया है।
- रिजले के अनुसार, उच्च जातियों ने भारतीय-आर्य प्रजाति की विशेषताएँ ग्रहण कीं, जबकि निम्न जातियों में अनार्य जनजातियों, मंगोल या अन्य प्रजातियों की विशेषताएँ पाई जाती हैं।
- रिजले और उनके समकालीन विद्वानों ने यह भी सुझाव दिया कि निम्न जातियाँ ही भारत की मूल निवासी हैं, और आर्यों ने उनका शोषण किया जो बाहर से आकर बसे थे।
जी.एस. घूर्ये का दृष्टिकोण:
- जी.एस. घूर्ये ने रिजले के तर्कों को पूरी तरह से अस्वीकार नहीं किया, लेकिन उन्हें केवल आंशिक रूप से सत्य माना।
- उन्होंने इस समस्या की ओर ध्यान दिलाया कि केवल औसत शारीरिक मापदंडों के आधार पर किसी समुदाय पर विशिष्ट प्रजातीय विशेषताएँ थोप देना एक विस्तृत और सुव्यवस्थित विश्लेषण नहीं है।
- घूर्ये ने प्रजातीय शुद्धता के विचार पर भी सवाल उठाया, यह मानते हुए कि यह केवल भारत के उत्तरी भागों में कुछ हद तक शेष रह गई थी जहाँ अंतर्विवाह निषिद्ध था।
- हालांकि घूर्ये ने रिजले के प्रजाति-आधारित विश्लेषण को पूरी तरह से नहीं अपनाया, उन्होंने जाति व्यवस्था के अध्ययन में प्रजातीय दृष्टिकोण के महत्व को स्वीकार किया, लेकिन इसे अन्य सामाजिक कारकों के साथ जोड़कर देखा।
संक्षेप में, रिजले ने प्रजाति को जाति के निर्धारण का मुख्य कारक माना, जबकि घूर्ये ने इस दृष्टिकोण को अधिक सूक्ष्मता से देखा और इसे भारतीय समाज की जटिलताओं के संदर्भ में विश्लेषित किया।
प्रश्न 4
सामाजिक मानवविज्ञान के दृष्टिकोण से, जाति को एक जटिल सामाजिक स्तरीकरण प्रणाली के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- खंडित स्तरीकरण (Segmental Division): समाज को विभिन्न अंतर्विवाही समूहों (जातियों) में विभाजित किया जाता है, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट दर्जा और व्यवसाय होता है।
- पदानुक्रम (Hierarchy): ये जातियाँ एक पदानुक्रमित व्यवस्था में व्यवस्थित होती हैं, जहाँ कुछ जातियाँ दूसरों से श्रेष्ठ मानी जाती हैं। यह पदानुक्रम शुद्धता और प्रदूषण की धारणाओं पर आधारित होता है।
- अंतर्विवाह (Endogamy): प्रत्येक जाति समूह के सदस्य केवल उसी जाति के भीतर विवाह कर सकते हैं। यह जाति की सदस्यता को बनाए रखने का एक प्रमुख तंत्र है।
- व्यवसाय प्रतिबंध (Occupational Restrictions): पारंपरिक रूप से, प्रत्येक जाति का एक निश्चित व्यवसाय होता था, और अन्य जातियों के सदस्यों को उस व्यवसाय को अपनाने की अनुमति नहीं थी।
- सामाजिक प्रतिबंध (Social Restrictions): जातियों के बीच खान-पान, सामाजिक मेलजोल और अन्य सामाजिक व्यवहारों पर कड़े प्रतिबंध होते हैं।
- जन्म आधारित सदस्यता (Hereditary Membership): किसी व्यक्ति की जाति सदस्यता जन्म से निर्धारित होती है और इसे बदला नहीं जा सकता।
सामाजिक मानवविज्ञान जाति का अध्ययन उसके सदस्यों के सामाजिक व्यवहार, धार्मिक विश्वासों, आर्थिक गतिविधियों और सांस्कृतिक प्रथाओं के संदर्भ में करता है, यह समझने के लिए कि यह व्यवस्था भारतीय समाज को कैसे संरचित करती है।
Common mistakes
- जनजातीय समुदायों को जोड़ने के विवाद में दोनों पक्षों के तर्कों को स्पष्ट रूप से अलग न कर पाना।
- रिजले और घूर्ये के प्रजाति और जाति संबंधी विचारों के बीच सूक्ष्म अंतर को समझने में कठिनाई।
- समाजशास्त्रियों के योगदान को केवल सतही तौर पर याद रखना, उनके शोध के तरीकों को न समझना।
Revision tips
- प्रत्येक समाजशास्त्री के मुख्य योगदान और शोध पद्धति को संक्षेप में लिखें।
- जनजातीय एकीकरण पर बहस के दोनों पक्षों के तर्कों की तुलना करें।
- प्रजाति और जाति पर रिजले और घूर्ये के विचारों के बीच समानताएं और अंतर नोट करें।
Practice MCQs
Q1. अनंतकृष्ण अय्यर और शरतचंद्र रॉय ने सामाजिक मानव विज्ञान के अध्ययन का अभ्यास किस प्रकार किया?
Explanation: अनंतकृष्ण अय्यर और शरतचंद्र रॉय दोनों ने क्षेत्रीय सर्वेक्षण और विशेष रूप से जनजातीय समुदायों के गहन अध्ययन के माध्यम से सामाजिक मानव विज्ञान का अभ्यास किया।
Q2. जनजातीय समुदायों को जोड़ने के विवाद में संरक्षणवादियों का मुख्य तर्क क्या था?
Explanation: संरक्षणवादियों का मानना था कि जनजातियों का शोषण होगा और उनकी संस्कृति का पतन होगा यदि उन्हें मुख्यधारा में एकीकृत किया गया, इसलिए उन्हें संरक्षण की आवश्यकता थी।
Q3. जी.एस. घूर्ये ने भारतीय जनजातियों को किस रूप में पहचाने जाने पर बल दिया?
Explanation: जी.एस. घूर्ये राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थक थे और उन्होंने भारतीय जनजातियों को एक भिन्न सांस्कृतिक समूह की बजाय पिछड़े हिंदू समाज के रूप में पहचाने जाने पर बल दिया।
Q4. हरबर्ट रिजले ने मनुष्य को वर्गीकृत करने का आधार क्या माना?
Explanation: हरबर्ट रिजले के अनुसार, मनुष्य को उसकी शारीरिक विशिष्टताओं जैसे नाक की लंबाई, खोपड़ी की चौड़ाई आदि के आधार पर पृथक-पृथक जनजातियों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
Q5. शरतचंद्र रॉय ने किस प्रसिद्ध जर्नल की स्थापना की थी?
Explanation: शरतचंद्र रॉय ने सन् 1922 ई० में 'मैन इन इंडिया' (Man in India) नामक जर्नल की स्थापना की, जो भारत में अपने समय का पहला ऐसा जर्नल था।
Frequently asked questions
कक्षा 11 समाजशास्त्र के पाठ 10 में किन प्रमुख समाजशास्त्रियों पर चर्चा की गई है?
कक्षा 11 समाजशास्त्र के पाठ 10 'भारतीय समाजशास्त्री' में मुख्य रूप से अनंतकृष्ण अय्यर, शरतचंद्र रॉय, हरबर्ट रिजले और जी.एस. घूर्ये जैसे समाजशास्त्रियों और उनके योगदान पर चर्चा की गई है।
जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ने के विवाद के दो मुख्य पक्ष कौन से थे?
इस विवाद के दो मुख्य पक्ष थे: एक ओर संरक्षणवादी थे जो जनजातियों की विशिष्ट संस्कृति को बचाने के लिए उन्हें संरक्षण देने के पक्ष में थे, और दूसरी ओर राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थक (जैसे घूर्ये) थे जो उन्हें पिछड़े हिंदू समाज का हिस्सा मानते थे और एकीकरण पर बल देते थे।
हरबर्ट रिजले ने भारत में प्रजाति और जाति के संबंध को कैसे समझाया?
हरबर्ट रिजले ने शारीरिक विशिष्टताओं के आधार पर प्रजातीय वर्गीकरण किया और सुझाव दिया कि उच्च जातियों ने भारतीय-आर्य प्रजाति की विशेषताएँ ग्रहण कीं, जबकि निम्न जातियों में अनार्य जनजातियों या अन्य प्रजातियों की विशेषताएँ पाई जाती हैं।
जी.एस. घूर्ये ने रिजले के प्रजाति संबंधी विचारों पर क्या प्रतिक्रिया दी?
जी.एस. घूर्ये ने रिजले के तर्कों को अंशतः सत्य माना और इस बात पर ध्यान दिलाया कि प्रजातीय शुद्धता का विचार केवल औसत के आधार पर समुदाय पर मापदंड लागू करने से उत्पन्न होता है, जो विस्तृत और सुव्यवस्थित नहीं था।
ये NCERT समाधान कक्षा 11 के छात्रों के लिए कैसे उपयोगी हैं?
ये समाधान छात्रों को 'भारतीय समाजशास्त्री' पाठ के महत्वपूर्ण अवधारणाओं, समाजशास्त्रियों के दृष्टिकोणों और उनके शोध पद्धतियों को समझने में मदद करते हैं, जिससे वे परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर प्रभावी ढंग से दे सकें।
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