CBSE Class 9 Hindi (क्षितिज) Chapter 3: उपभोक्तावाद की संस्कृति - NCERT Solutions

NCERT Solutions PDF Class 9 PDF

CBSE Class 9 क्षितिज chapter 3, 'उपभोक्तावाद की संस्कृति' by Shama Charan Dubey, critically examines the growing impact of consumerism on Indian society. This chapter explores how the relentless pursuit of material goods and brand names is reshaping traditional values, social connections, and personal identities. It questions the modern definition of happiness, highlighting how advertising influences our desires and choices. The solutions delve into the societal and ethical challenges posed by this culture, encouraging students to think critically about its implications. Designed for Class 9 students, these explanations aim to foster a deeper understanding of consumerism's pervasive influence and its effects on our lives, serving as a valuable resource for academic preparation and developing informed perspectives on contemporary societal trends.

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 9
Subjectक्षितिज
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter3. श्यामाचरण दुबे - उपभोक्तावाद की संस्कृति

Chapter summary

Chapter 3 of CBSE Class 9 Hindi (क्षितिज), 'उपभोक्तावाद की संस्कृति', critically examines the rise of consumerism. The NCERT Solutions cover key questions about the changing definition of happiness, the pervasive influence of advertising, the erosion of traditional values, and the societal challenges posed by a 'culture of display'. These solutions help students analyze how consumer culture impacts personal identity, social relations, and ethical standards, providing a clear understanding of the chapter's core arguments.

Learning outcomes

  • Understand the changing definition of 'happiness' in a consumerist society.
  • Analyze the impact of advertising on consumer behavior.
  • Evaluate the challenges posed by consumerism to traditional values and culture.
  • Explain the concept of 'culture of display' and its consequences.
  • Critically assess the influence of consumerism on social relationships and ethics.

Topics covered

Paper topics

  • उपभोक्तावाद की संस्कृति
  • सुख की आधुनिक परिभाषा
  • विज्ञापन का प्रभाव
  • सांस्कृतिक पहचान का ह्रास
  • नैतिकता और मर्यादा
  • दिखावे की संस्कृति
  • गाँधीवादी विचार
  • सामाजिक संबंध
  • उपभोग की प्रवृत्ति
  • आधुनिक जीवन शैली

Important topics

  • उपभोक्तावाद का समाज पर प्रभाव
  • विज्ञापन की भूमिका और भ्रामकता
  • सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण
  • दिखावे की संस्कृति के दुष्परिणाम
  • गाँधी जी का उपभोक्तावाद पर दृष्टिकोण

PDF preview

Read page by page below. PDF is streamed from the official NCERT website — no download button on this page.

Loading document …
Page of
Loading page …

Questions and Solutions

प्रश्न 1

लेखक के अनुसार जीवन में 'सुख' से क्या अभिप्राय है?
Solution: लेखक के अनुसार, आज के उपभोक्तावादी युग में 'सुख' की परिभाषा बदल गई है। पहले सुख का अर्थ मानसिक शांति, संतोष और आत्मिक आनंद होता था, लेकिन अब लोग भौतिक वस्तुओं के उपभोग, भोग-विलास और आराम देने वाले साधनों को ही सुख मानने लगे हैं। विभिन्न प्रकार के मानसिक, शारीरिक आराम देने वाले साधन भी 'सुख' के पर्याय बन गए हैं। इस प्रकार, आजकल लोग केवल उपभोग के साधनों को भोगने के आनंद को ही 'सुख' कहने लगे हैं।

प्रश्न 2

आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर रही है?
Solution: आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को गहराई से प्रभावित कर रही है। इसके बढ़ते प्रभाव के कारण हमारी अपनी सांस्कृतिक पहचान, परंपराएं और आस्थाएं कमजोर पड़ रही हैं। हमारे सामाजिक संबंध संकुचित हो रहे हैं और मन में अशांति व आक्रोश बढ़ रहा है। विज्ञापनों का प्रभाव इतना अधिक है कि हम वही खाते-पीते, पहनते-ओढ़ते हैं जो विज्ञापन हमें दिखाते हैं। इस संस्कृति के कारण हम धीरे-धीरे इन उत्पादों के दास बनते जा रहे हैं, जिससे हमारी मर्यादाएं और नैतिकताएं समाप्त हो रही हैं। मनुष्य स्वार्थी और आत्म-केंद्रित होता जा रहा है, और विकास का लक्ष्य हमसे दूर होता जा रहा है।

प्रश्न 3

गाँधी जी ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है?
Solution: गाँधी जी सामाजिक मर्यादा, नीति और नैतिकता के प्रबल समर्थक थे। वे चाहते थे कि लोग सदाचारी, संयमी और नीतिज्ञ बनें, जिससे समाज में प्रेम, भाईचारा और सामाजिक सरोकार बढ़े। इसके विपरीत, उपभोक्तावादी संस्कृति भोग, विलासिता और होड़ की भावना को बढ़ावा देती है, जिससे नैतिकता और मर्यादा का ह्रास होता है। गाँधी जी चाहते थे कि भारतीय अपनी मौलिकता और सभ्यता-संस्कृति पर कायम रहें। उपभोक्ता संस्कृति से हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का ह्रास हो रहा है और मनुष्य स्वार्थ-केंद्रित हो रहा है, जो भविष्य के लिए एक बड़ी सामाजिक चुनौती है।

प्रश्न 4.1

आशय स्पष्ट कीजिए - जाने-अनजाने आज के माहौल में आपका चरित्र भी बदल रहा है और आप उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं।
Solution: इस कथन का आशय है कि उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रभाव हमारे चरित्र पर अनजाने में ही पड़ता है। यह धीरे-धीरे हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाती है और हमारे सोचने-समझने के तरीके को बदल देती है। हम उत्पादों का उपभोग करते-करते न केवल उनके गुलाम बन जाते हैं, बल्कि अपने जीवन का लक्ष्य भी उन्हें प्राप्त करना और उपभोग करना ही मान बैठते हैं। इस प्रकार, हम उत्पादों के प्रति समर्पित हो जाते हैं और भोग को ही वास्तविक सुख समझने लगते हैं।

प्रश्न 4.2

आशय स्पष्ट कीजिए - प्रतिष्ठा के अनेक रूप होते हैं, चाहे वे हास्यास्पद ही क्यों न हो।
Solution: इस कथन का अर्थ है कि समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के कई तरीके होते हैं, जिनमें से कुछ बहुत ही विचित्र और हास्यास्पद (हँसने योग्य) हो सकते हैं। लोग अपनी सामाजिक स्थिति या प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए ऐसे कार्य करते हैं जो तर्कसंगत नहीं लगते। उदाहरण के लिए, अमेरिका में लोग जीवित रहते हुए ही अपने अंतिम संस्कार और विश्राम-स्थल के लिए व्यवस्था कर लेते हैं, जो कि एक हास्यास्पद झूठी प्रतिष्ठा का उदाहरण है। यह दर्शाता है कि प्रतिष्ठा पाने की चाह में लोग कई बार बेतुके कार्य भी कर बैठते हैं।

प्रश्न 5

कोई वस्तु हमारे लिए उपयोगी हो या न हो, लेकिन टी.वी. पर विज्ञापन देख कर हम उसे खरीदने के लिए अवश्य लालायित होते हैं। क्यों?
Solution: हम टीवी पर विज्ञापन देखकर किसी वस्तु को खरीदने के लिए लालायित हो जाते हैं, भले ही वह हमारे लिए उपयोगी न हो, क्योंकि विज्ञापनों का प्रभाव अत्यंत सूक्ष्म, लुभावना और सम्मोहक होता है। विज्ञापन की भाषा, दृश्य और ध्वनियाँ मनमोहक होती हैं। प्रचार तंत्र अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों और आकर्षक दृश्यों के माध्यम से हमें प्रभावित करता है। अक्सर, वे प्रसिद्ध फिल्मी चेहरों का सहारा लेते हैं, जिससे विज्ञापन हमारे अंदर भ्रम और उस वस्तु के प्रति तीव्र आकर्षण पैदा करता है। इस प्रकार, हम विज्ञापन में दिखाई गई वस्तु को उपयोगी मानकर उसे खरीदने के लिए प्रेरित हो जाते हैं।

प्रश्न 6

आपके अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार वस्तु की गुणवत्ता होनी चाहिए या उसका विज्ञापन? तर्क देकर स्पष्ट करें।
Solution: निश्चित रूप से, वस्तुओं को खरीदने का आधार उनकी गुणवत्ता होनी चाहिए, न कि केवल विज्ञापन। इसके कई कारण हैं:
  1. अधिकांश विज्ञापन हमारे मन में वस्तुओं के प्रति भ्रामक आकर्षण पैदा करते हैं। वे अक्सर वस्तु की वास्तविक गुणवत्ता के बजाय उसकी बाहरी चमक-दमक पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं।
  2. कई विज्ञापन गुणहीन वस्तुओं का भी प्रचार करते हैं, और हम आकर्षक दृश्यों के झांसे में आकर उनकी असलियत को पहचान नहीं पाते।
  3. केवल विज्ञापनों के माध्यम से हम किसी वस्तु के गुण-दोष की सच्चाई को पूरी तरह नहीं जान सकते। गुणवत्ता ही वस्तु की उपयोगिता और टिकाऊपन सुनिश्चित करती है।
इसलिए, उपभोक्ता को विज्ञापन के बजाय वस्तु की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए।

प्रश्न 7

पाठ के आधार पर आज के उपभोक्तावादी युग में पनप रही "दिखावे की संस्कृति" पर विचार व्यक्त कीजिए।
Solution: आज के उपभोक्तावादी युग में "दिखावे की संस्कृति" का बोलबाला है। लोग स्वयं को आधुनिक और विशिष्ट दिखाने के लिए महंगे सौंदर्य-प्रसाधन, संगीत सिस्टम, मोबाइल फोन, घड़ियाँ और कपड़े खरीदते हैं। समाज में इन वस्तुओं से ही लोगों की हैसियत आँकी जाती है। यहाँ तक कि लोग मरने के बाद अपनी कब्र पर भी लाखों रुपये खर्च करने लगे हैं, ताकि दुनिया में अपनी हैसियत का प्रदर्शन कर सकें। यह दिखावे की संस्कृति हमारे चरित्र को बदल रही है, हमारी सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और आस्थाओं को कमजोर कर रही है। इससे सामाजिक संबंध संकुचित हो रहे हैं, मन में अशांति और आक्रोश बढ़ रहा है, और नैतिक मर्यादाएं घट रही हैं। व्यक्तिवाद, स्वार्थ और भोगवाद जैसी कुप्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं।

प्रश्न 8

आज की उपभोक्ता संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को किस प्रकार प्रभावित कर रही है? अपने अनुभव के आधार पर एक अनुच्छेद लिखिए।
Solution: आज की उपभोक्ता संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को काफी हद तक प्रभावित कर रही है। त्योहार अब केवल परंपरा या उल्लास के अवसर न रहकर, महंगे उपहारों के आदान-प्रदान और प्रदर्शन का माध्यम बन गए हैं। उदाहरण के लिए, दिवाली पर लोग एक-दूसरे को महंगे गिफ्ट हैंपर और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स देते हैं, जबकि पहले पारंपरिक मिठाइयों और हस्तनिर्मित वस्तुओं का चलन था। होली पर भी अब रासायनिक रंगों की जगह ब्रांडेड और महंगे रंग बिकते हैं। शादियों में भी दिखावे के लिए अनावश्यक खर्च किया जाता है, जैसे कि महंगे डेकोरेशन, डिजाइनर कपड़े और विदेशी व्यंजन। उपभोक्ता संस्कृति ने त्योहारों की मूल भावना को कम कर दिया है और उन्हें व्यावसायिक बना दिया है, जहाँ लोग अपनी आर्थिक हैसियत दिखाने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इससे त्योहारों का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व कम हो रहा है।

Common mistakes

  • Confusing material possessions with true happiness.
  • Being overly influenced by advertisements without considering product quality.
  • Underestimating the subtle ways consumerism changes personal character and values.
  • Failing to recognize the erosion of traditional culture and social bonds due to consumerism.

Revision tips

  • Focus on understanding the author's critical perspective on consumerism.
  • Analyze how advertisements manipulate consumer desires.
  • Relate the chapter's concepts to real-life examples of consumer culture.
  • Pay attention to the distinction between genuine needs and manufactured wants.
  • Summarize the societal and ethical challenges highlighted in the solutions.

Practice MCQs

Q1. लेखक के अनुसार, आज के समय में 'सुख' का क्या अर्थ माना जाता है?

Q2. उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को कैसे प्रभावित करती है?

Q3. गाँधी जी ने उपभोक्ता संस्कृति को समाज के लिए चुनौती क्यों माना?

Q4. विज्ञापन हमें अनुपयोगी वस्तुएँ खरीदने के लिए कैसे लालायित करते हैं?

Q5. पाठ के अनुसार, 'दिखावे की संस्कृति' के दुष्परिणामों में क्या शामिल है?

Frequently asked questions

यह NCERT समाधान किस कक्षा और विषय के लिए हैं?

यह NCERT समाधान CBSE कक्षा 9 के हिंदी (क्षितिज) विषय के लिए हैं, विशेष रूप से पाठ 3 'उपभोक्तावाद की संस्कृति' पर केंद्रित हैं।

इन समाधानों में क्या खास है?

इन समाधानों में प्रत्येक प्रश्न के उत्तर को स्पष्ट और विस्तृत तरीके से फिर से लिखा गया है, जिससे छात्रों को विषय को गहराई से समझने में मदद मिलती है। मूल प्रश्न अपरिवर्तित रखे गए हैं।

उपभोक्तावाद की संस्कृति से लेखक का क्या तात्पर्य है?

लेखक का तात्पर्य उस संस्कृति से है जहाँ भौतिक वस्तुओं के उपभोग और प्रदर्शन को सुख और प्रतिष्ठा का पैमाना माना जाता है, जिससे पारंपरिक मूल्य और नैतिकता प्रभावित होती है।

क्या ये समाधान परीक्षा की तैयारी में मदद करेंगे?

हाँ, ये समाधान पाठ की मुख्य अवधारणाओं, तर्कों और आलोचनाओं को स्पष्ट करते हैं, जो परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर देने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

पाठ में 'दिखावे की संस्कृति' से क्या आशय है?

दिखावे की संस्कृति से आशय समाज में अपनी हैसियत या आधुनिकता दिखाने के लिए महंगी वस्तुओं, सौंदर्य प्रसाधनों, गैजेट्स आदि का प्रदर्शन करना है, भले ही वे उपयोगी न हों।

Content reviewed by the NCERT Help team. Editorial Team and update policy

NCERT Solutions PDF PDF on NCERT Help. URL unchanged for search indexing.