CBSE कक्षा 8 हमारे अतीत-III: स्वतंत्रता के बाद NCERT समाधान

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यह पृष्ठ CBSE कक्षा 8 के लिए 'हमारे अतीत-III' पुस्तक के अध्याय 12 'स्वतंत्रता के बाद' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रदान करता है। यह अध्याय स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारत के सामने मौजूद प्रमुख चुनौतियों पर प्रकाश डालता है, जिसमें विभाजन के कारण बड़े पैमाने पर हुए विस्थापन का प्रबंधन, लगभग 500 रियासतों का भारतीय संघ में एकीकरण, और एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना शामिल है जो नागरिकों की आकांक्षाओं को पूरा कर सके। समाधान योजना आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका की भी व्याख्या करते हैं, जो आर्थिक विकास के लिए नीतियाँ बनाने और उद्योगों के आवंटन को निर्देशित करने के लिए जिम्मेदार था। इसके अतिरिक्त, यह अध्याय भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के शुरुआती हिचकिचाहट और डॉ. अंबेडकर के राजनीतिक समानता बनाम सामाजिक-आर्थिक असमानता पर विचारों की पड़ताल करता है। ये समाधान छात्रों को स्वतंत्रता के बाद के भारत के निर्माण की जटिलताओं को समझने में मदद करते हैं और परीक्षा की तैयारी के लिए एक स्पष्ट मार्ग प्रदान करते हैं।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 8
Subjectहमारे अतीत -III
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter12. स्वतंत्रता के बाद

Chapter summary

कक्षा 8 के लिए 'हमारे अतीत-III' के अध्याय 12 'स्वतंत्रता के बाद' के ये NCERT समाधान स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने खड़ी प्रारंभिक चुनौतियों का एक व्यापक अवलोकन प्रदान करते हैं। इसमें विभाजन से उत्पन्न शरणार्थी संकट, रियासतों के एकीकरण की जटिल प्रक्रिया और एक नई राजनीतिक संरचना की आवश्यकता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं। समाधान योजना आयोग की भूमिका और मिश्रित अर्थव्यवस्था मॉडल पर भी प्रकाश डालते हैं। यह अध्याय भाषा के आधार पर राज्यों के गठन के मुद्दे और समानता पर डॉ. अंबेडकर के विचारों की भी पड़ताल करता है।

Learning outcomes

  • स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने आई तीन प्रमुख समस्याओं को समझना।
  • योजना आयोग की भूमिका और उसके कार्यों का विश्लेषण करना।
  • भारतीय संविधान में विषयों के वितरण को समझना।
  • मिश्रित अर्थव्यवस्था मॉडल की अवधारणा को स्पष्ट करना।
  • भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन से जुड़ी चुनौतियों को पहचानना।
  • डॉ. अंबेडकर के राजनीतिक समानता और सामाजिक-आर्थिक असमानता पर विचारों को समझना।

Topics covered

Paper topics

  • स्वतंत्रता के बाद की चुनौतियाँ
  • विभाजन और शरणार्थी संकट
  • रियासतों का एकीकरण
  • भारतीय संविधान और सूचियाँ
  • योजना आयोग की भूमिका
  • आर्थिक विकास मॉडल (मिश्रित अर्थव्यवस्था)
  • भाषा के आधार पर राज्यों का गठन
  • राजनीतिक समानता बनाम सामाजिक-आर्थिक असमानता
  • डॉ. बी. आर. अंबेडकर के विचार
  • पंचवर्षीय योजनाएँ

Important topics

  • विभाजन और शरणार्थी संकट का प्रबंधन
  • रियासतों का भारतीय संघ में एकीकरण
  • योजना आयोग की स्थापना और भूमिका
  • भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया
  • समानता पर डॉ. अंबेडकर के विचार

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

नवस्वाधीन भारत के सामने कौन सी तीन समस्याएँ थीं?
Solution:

नवस्वाधीन भारत के सामने स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद कई गंभीर समस्याएँ थीं। इनमें से तीन प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित थीं:

  1. शरणार्थी संकट: भारत के विभाजन के कारण लगभग 80 लाख लोग पाकिस्तान से भारत आए थे। इन सभी शरणार्थियों के लिए रहने की जगह और रोजगार की व्यवस्था करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी।
  2. रियासतों का एकीकरण: उस समय लगभग 500 छोटी-बड़ी रियासतें थीं जिन पर राजाओं या नवाबों का शासन था। इन सभी को नए राष्ट्र भारत में शामिल होने के लिए राजी करना और उनकी सीमाओं को एकीकृत करना एक जटिल कार्य था।
  3. नई राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना: भारत को एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करनी थी जो देश के सभी नागरिकों की आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा कर सके और उन्हें एक साझा राष्ट्रीय पहचान दे सके।

प्रश्न 2

योजना आयोग की क्या भूमिका थी?
Solution:

योजना आयोग की स्थापना भारत के आर्थिक विकास को गति देने और देश के संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई थी। इसकी मुख्य भूमिकाएँ निम्नलिखित थीं:

  1. आर्थिक नीतियाँ बनाना: योजना आयोग देश के आर्थिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएँ बनाता था और उन नीतियों को लागू करने के लिए दिशा-निर्देश जारी करता था।
  2. उद्योगों का निर्धारण: यह तय करना योजना आयोग का काम था कि कौन से महत्वपूर्ण उद्योग सरकार के नियंत्रण में रहेंगे और कौन से उद्योग निजी क्षेत्र के उद्यमियों द्वारा स्थापित किए जाएंगे।
  3. क्षेत्रीय संतुलन: योजना आयोग विभिन्न क्षेत्रों और राज्यों के बीच आर्थिक विकास में संतुलन बनाए रखने का प्रयास करता था, ताकि कोई भी क्षेत्र पिछड़ न जाए।

प्रश्न 3

रिक्त स्थान भरें:
  • (क) केंद्रीय सूची में ...... और ..... विषय रखे गए थे।
  • (ख) समवर्ती सूची में ...... और ..... विषय रखे गए थे।
  • (ग) वह आर्थिक योजना जिसमें सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों को विकास में भूमिका दी गई थी, उसे ....... मॉडल कहा जाता था।
  • (घ) ...... की मृत्यु से इतना ज़बरदस्त आंदोलन पैदा हुआ कि सरकार को आंध्र भाषी राज्य के गठन की माँग को मानना पड़ा।
Solution:

रिक्त स्थानों की पूर्ति इस प्रकार है:

  • (क) केंद्रीय सूची में कराधान, रक्षा, विदेशी मामले जैसे विषय रखे गए थे।
  • (ख) समवर्ती सूची में वन, कृषि जैसे विषय रखे गए थे।
  • (ग) वह आर्थिक योजना जिसमें सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों को विकास में भूमिका दी गई थी, उसे मिश्रित मॉडल कहा जाता था।
  • (घ) पोट्टी श्रीरामुलु की मृत्यु से इतना ज़बरदस्त आंदोलन पैदा हुआ कि सरकार को आंध्र भाषी राज्य के गठन की माँग को मानना पड़ा।

प्रश्न 4

सही या गलत बताएँ:
  • (क) आज़ादी के समय ज्यादातर भारतीय गाँवों में रहते थे।
  • (ख) संविधान भाषा कांग्रेस पार्टी के सदस्यों से मिलकर बनी थी।
  • (ग) पहले राष्ट्रीय चुनावों में केवल पुरुषों को ही वोट डालने का अधिकार दिया गया था।
  • (घ) दूसरी पंचवर्षीय योजना में भारी उद्योगों के विकास पर जोर दिया गया था।
Solution:

कथन इस प्रकार हैं:

  • (क) आज़ादी के समय ज्यादातर भारतीय गाँवों में रहते थे। सही
  • (ख) संविधान भाषा कांग्रेस पार्टी के सदस्यों से मिलकर बनी थी। गलत (संविधान सभा में विभिन्न दलों और पृष्ठभूमि के लोग शामिल थे, केवल कांग्रेस पार्टी के सदस्य नहीं।)
  • (ग) पहले राष्ट्रीय चुनावों में केवल पुरुषों को ही वोट डालने का अधिकार दिया गया था। गलत (भारतीय संविधान ने सभी वयस्क नागरिकों को, चाहे वे पुरुष हों या महिला, वोट देने का समान अधिकार दिया था।)
  • (घ) दूसरी पंचवर्षीय योजना में भारी उद्योगों के विकास पर जोर दिया गया था। सही

प्रश्न 5

"राजनीति में हमारे पास समानता होगी और सामाजिक व आर्थिक जीवन में हम असमानता की राह पर चलेंगे" कहने के पीछे डॉ. अंबेडकर का क्या आशय था?
Solution:

डॉ. बी. आर. अंबेडकर का यह कथन भारत में राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के बीच के गहरे अंतर को उजागर करता है। उनके आशय को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  1. राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र का महत्व: डॉ. अंबेडकर का मानना था कि केवल राजनीतिक लोकतंत्र (जैसे वोट देने का अधिकार) पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र भी आवश्यक है, जिसका अर्थ है जीवन में वास्तविक समानता।
  2. असमानता का बने रहना: उन्होंने कहा कि केवल वोट का अधिकार देने से समाज में मौजूद अमीर-गरीब, ऊँची-नीची जातियों का अंतर अपने आप खत्म नहीं हो जाएगा। लोग राजनीतिक रूप से भले ही बराबर हों, लेकिन सामाजिक और आर्थिक रूप से वे अभी भी असमानता का सामना करते रहेंगे।
  3. एक व्यक्ति, एक वोट बनाम एक व्यक्ति, एक मूल्य: डॉ. अंबेडकर ने इस बात पर जोर दिया कि राजनीति में हम 'एक व्यक्ति, एक वोट और एक मूल्य' के सिद्धांत का पालन करेंगे। लेकिन, हमारी सामाजिक और आर्थिक संरचना ऐसी है कि हम 'एक व्यक्ति, एक मूल्य' के सिद्धांत का निषेध करते रहेंगे, यानी समाज में कुछ लोगों का मूल्य दूसरों से अधिक माना जाता रहेगा। इसका तात्पर्य यह था कि जब तक सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ दूर नहीं होंगी, तब तक राजनीतिक समानता का पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा।

प्रश्न 6

स्वतंत्रता के बाद देश को भाषा के आधार पर राज्यों में बाँटने के प्रति हिचकिचाहट क्यों थी?
Solution:

स्वतंत्रता के बाद भारत को भाषा के आधार पर राज्यों में बाँटने के प्रति सरकार और नेताओं में काफी हिचकिचाहट थी। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:

  • राष्ट्रीय एकता का भय: नेताओं को डर था कि भाषा के आधार पर राज्यों का गठन देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा पैदा कर सकता है। उन्हें चिंता थी कि इससे क्षेत्रीयतावाद को बढ़ावा मिलेगा और देश बँट सकता है।
  • विभाजन का अनुभव: भारत ने अभी-अभी धर्म के आधार पर हुए क्रूर विभाजन का दर्दनाक अनुभव किया था। ऐसे में, एक और विभाजनकारी तत्व (भाषा) के आधार पर राज्यों का गठन करना जोखिम भरा लग रहा था।
  • प्रशासनिक और आर्थिक चुनौतियाँ: नए राज्यों के गठन से प्रशासनिक पुनर्गठन और संसाधनों के बँटवारे जैसी नई चुनौतियाँ खड़ी हो सकती थीं, जिनसे निपटने के लिए देश अभी तैयार नहीं था।
  • अन्य आधारों पर राज्यों की माँग: भाषा के अलावा, अन्य आधारों पर भी राज्यों के गठन की माँग उठ सकती थी, जिससे स्थिति और जटिल हो जाती।

इन चिंताओं के बावजूद, अंततः भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की माँग को स्वीकार किया गया, जैसा कि आंध्र राज्य के गठन से स्पष्ट होता है।

Common mistakes

  • विभाजन के कारण हुए शरणार्थी संकट के पैमाने को कम आंकना।
  • रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया की जटिलताओं को अनदेखा करना।
  • योजना आयोग की भूमिका को केवल आर्थिक नियोजन तक सीमित समझना।
  • भाषा के आधार पर राज्यों के गठन के विरोध के कारणों को न समझना।

Revision tips

  • विभाजन और रियासतों के एकीकरण से संबंधित मुख्य घटनाओं और तिथियों को याद करें।
  • योजना आयोग के प्रमुख कार्यों और पंचवर्षीय योजनाओं के उद्देश्यों को समझें।
  • संविधान की सूचियों (केंद्रीय, राज्य, समवर्ती) में विषयों के वितरण पर ध्यान दें।
  • भाषा के आधार पर राज्यों के गठन के पक्ष और विपक्ष में तर्कों का विश्लेषण करें।
  • डॉ. अंबेडकर के विचारों को उनके सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में समझें।

Practice MCQs

Q1. स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारत के सामने मुख्य समस्याएँ क्या थीं?

Q2. योजना आयोग की प्राथमिक भूमिका क्या थी?

Q3. संविधान की केंद्रीय सूची में कौन से विषय शामिल थे?

Q4. वह आर्थिक मॉडल जिसमें सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों को विकास में भूमिका दी गई, क्या कहलाता था?

Q5. किसकी मृत्यु के कारण सरकार को आंध्र भाषी राज्य के गठन की माँग माननी पड़ी?

Frequently asked questions

स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने मुख्य तीन समस्याएँ क्या थीं?

स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने तीन मुख्य समस्याएँ थीं: विभाजन के कारण आए लाखों शरणार्थियों का पुनर्वास और रोजगार की व्यवस्था करना, लगभग 500 रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करना, और एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना जो लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा कर सके।

योजना आयोग का क्या कार्य था?

योजना आयोग का मुख्य कार्य भारत के आर्थिक विकास के लिए नीतियाँ बनाना और उन्हें लागू करना था। यह यह भी तय करता था कि कौन से उद्योग सरकार द्वारा और कौन से निजी उद्योगपतियों द्वारा चलाए जाएंगे, और विभिन्न क्षेत्रों व राज्यों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा।

भाषा के आधार पर राज्यों के गठन के प्रति शुरुआती हिचकिचाहट क्यों थी?

भाषा के आधार पर राज्यों के गठन के प्रति हिचकिचाहट इसलिए थी क्योंकि नेताओं को डर था कि इससे देश की एकता और अखंडता को खतरा हो सकता है, और यह नए राष्ट्र के लिए अतिरिक्त चुनौतियाँ पैदा कर सकता है।

डॉ. अंबेडकर के 'राजनीति में समानता, सामाजिक व आर्थिक जीवन में असमानता' कथन का क्या अर्थ था?

डॉ. अंबेडकर का आशय था कि केवल वोट देने का अधिकार (राजनीतिक समानता) पर्याप्त नहीं है; सामाजिक और आर्थिक जीवन में भी वास्तविक समानता होनी चाहिए, जहाँ अमीर-गरीब या ऊँची-नीची जातियों का अंतर समाप्त हो, अन्यथा राजनीतिक समानता का कोई मतलब नहीं रहेगा।

दूसरी पंचवर्षीय योजना में किस पर जोर दिया गया था?

दूसरी पंचवर्षीय योजना में भारी उद्योगों के विकास पर विशेष जोर दिया गया था, ताकि देश का औद्योगिक आधार मजबूत हो सके।

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