कक्षा 12 अर्थशास्त्र: पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत - NCERT समाधान

NCERT Solutions PDF Class 12 PDF

यह खंड सीबीएसई कक्षा 12 अर्थशास्त्र के लिए 'पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत' पर विस्तृत एन.सी.ई.आर.टी. समाधान प्रदान करता है। इसमें पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार की प्रमुख विशेषताओं, जैसे क्रेताओं और विक्रेताओं की बड़ी संख्या, समरूप वस्तु, पूर्ण ज्ञान, निर्बाध प्रवेश और बहिर्गमन, और पूर्ण गतिशीलता पर चर्चा की गई है। समाधान यह भी स्पष्ट करते हैं कि एक फर्म की कुल संप्राप्ति (Total Revenue), औसत संप्राप्ति (Average Revenue), और सीमांत संप्राप्ति (Marginal Revenue) कैसे बाजार मूल्य से संबंधित हैं, और कीमत रेखा (Price Line) की अवधारणा को समझाते हैं। यह खंड छात्रों को पूर्ण प्रतिस्पर्धा के मॉडल को समझने और परीक्षा के लिए अपनी तैयारी को मजबूत करने में मदद करता है।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
Subjectव्यष्टि अर्थव्यवस्था
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter4. पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धान्त

Chapter summary

यह अध्याय पूर्ण प्रतिस्पर्धा के बाजार ढांचे की विशेषताओं और निहितार्थों पर केंद्रित है। इसमें एक फर्म के कुल संप्राप्ति, औसत संप्राप्ति और सीमांत संप्राप्ति के बीच संबंधों की व्याख्या की गई है, साथ ही कीमत रेखा की प्रकृति को भी स्पष्ट किया गया है। समाधान छात्रों को यह समझने में मदद करते हैं कि एक कीमत-स्वीकारक फर्म का कुल संप्राप्ति वक्र कैसे ऊपर की ओर प्रवणता वाली सीधी रेखा होती है और यह मूल बिंदु से क्यों गुजरती है।

Learning outcomes

  • पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार की मुख्य विशेषताओं की पहचान करना।
  • एक फर्म की कुल संप्राप्ति, औसत संप्राप्ति और सीमांत संप्राप्ति के बीच संबंध को समझना।
  • कीमत रेखा की अवधारणा और उसके महत्व को स्पष्ट करना।
  • एक कीमत-स्वीकारक फर्म के कुल संप्राप्ति वक्र की प्रकृति का विश्लेषण करना।
  • पूर्ण प्रतिस्पर्धा के तहत फर्मों के व्यवहार के निहितार्थों को समझना।

Topics covered

Paper topics

  • पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार की विशेषताएँ
  • क्रेताओं और विक्रेताओं की बड़ी संख्या
  • समरूप वस्तु
  • पूर्ण ज्ञान
  • निर्बाध प्रवेश और बहिर्गमन
  • पूर्ण गतिशीलता
  • परिवहन लागत का अभाव
  • कुल संप्राप्ति (TR)
  • औसत संप्राप्ति (AR)
  • सीमांत संप्राप्ति (MR)
  • कीमत रेखा
  • कीमत-स्वीकारक फर्म

Important topics

  • पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार की विशेषताएँ
  • कुल संप्राप्ति, औसत संप्राप्ति और सीमांत संप्राप्ति के बीच संबंध
  • कीमत रेखा की प्रकृति
  • दीर्घकाल में सामान्य लाभ की स्थिति

PDF preview

Read page by page below. PDF is streamed from the official NCERT website — no download button on this page.

Loading document …
Page of
Loading page …

Questions and Solutions

प्रश्न 1. एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार की क्या विशेषताएँ हैं?

एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
  1. क्रेताओं और विक्रेताओं की बहुत बड़ी संख्या: बाज़ार में इतने अधिक क्रेता और विक्रेता होते हैं कि कोई भी व्यक्तिगत क्रेता अपनी माँग से बाज़ार कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता, और न ही कोई व्यक्तिगत विक्रेता अपनी पूर्ति से बाज़ार कीमत को प्रभावित कर सकता है।
  2. समरूप वस्तु: बाज़ार में बेची जाने वाली वस्तु सभी विक्रेताओं के लिए बिल्कुल एक समान या समरूप होती है। क्रेता विभिन्न विक्रेताओं की वस्तुओं के बीच कोई अंतर नहीं कर पाते हैं।
  3. बाजार मूल्य की पूर्ण जानकारी: क्रेताओं और विक्रेताओं दोनों को बाज़ार में प्रचलित कीमत और वस्तु की गुणवत्ता के बारे में पूरी जानकारी होती है।
  4. फर्मों के लिए निर्बाध प्रवेश तथा बहिर्गमन: कोई भी फर्म स्वतंत्र रूप से उद्योग में प्रवेश कर सकती है या उद्योग से बाहर निकल सकती है। प्रवेश या निकास पर कोई कानूनी या अन्य बाधा नहीं होती।
  5. उत्पादन के साधनों की पूर्ण गतिशीलता: उत्पादन के साधन (जैसे श्रम, पूंजी) बिना किसी बाधा के एक फर्म से दूसरी फर्म में या एक उद्योग से दूसरे उद्योग में स्थानांतरित हो सकते हैं।
  6. परिवहन लागत का अभाव: यह माना जाता है कि पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में किसी भी फर्म से वस्तु खरीदने पर कोई परिवहन लागत नहीं लगती है।
Solution:

एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार की निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ होती हैं:

  1. क्रेताओं और विक्रेताओं की बहुत बड़ी संख्या: इस बाज़ार में क्रेताओं और विक्रेताओं की संख्या इतनी अधिक होती है कि कोई भी व्यक्तिगत क्रेता अपनी माँग को बदलकर बाज़ार कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता। इसी प्रकार, कोई भी व्यक्तिगत विक्रेता अपनी पूर्ति को बदलकर बाज़ार कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता। इसका अर्थ है कि प्रत्येक क्रेता और विक्रेता 'कीमत स्वीकारक' (Price Taker) होता है।
  2. समरूप वस्तु: पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में सभी फर्में एक जैसी, यानी समरूप (Homogeneous) वस्तुएँ बेचती हैं। वस्तु की गुणवत्ता, डिज़ाइन, पैकेजिंग आदि में कोई अंतर नहीं होता, जिससे क्रेता किसी विशेष विक्रेता को प्राथमिकता नहीं दे पाता। वस्तुएँ एक-दूसरे की पूर्ण प्रतिस्थापक (Perfect Substitutes) होती हैं।
  3. बाजार मूल्य की पूर्ण जानकारी: बाज़ार में सभी क्रेताओं और विक्रेताओं को वस्तु की कीमत और गुणवत्ता के बारे में पूरी जानकारी होती है। इससे कोई भी विक्रेता अधिक कीमत नहीं वसूल सकता और न ही कोई क्रेता कम कीमत पर वस्तु खरीदने का अवसर चूकता है।
  4. फर्मों के लिए निर्बाध प्रवेश तथा बहिर्गमन: पूर्ण प्रतिस्पर्धा में, कोई भी फर्म स्वतंत्र रूप से उद्योग में प्रवेश कर सकती है और यदि कोई फर्म हानि में चल रही है तो वह उद्योग से बाहर निकल सकती है। प्रवेश या निकास पर कोई कानूनी, आर्थिक या तकनीकी बाधा नहीं होती।
  5. उत्पादन के साधनों की पूर्ण गतिशीलता: उत्पादन के साधन जैसे श्रम, पूंजी आदि एक फर्म से दूसरी फर्म में या एक उद्योग से दूसरे उद्योग में बिना किसी बाधा के आसानी से स्थानांतरित हो सकते हैं।
  6. परिवहन लागत का अभाव: यह मान लिया जाता है कि पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में क्रेताओं को किसी भी फर्म से वस्तु खरीदने पर कोई अतिरिक्त परिवहन लागत नहीं वहन करनी पड़ती है, जिससे सभी फर्मों की कीमत समान मानी जाती है।

इन विशेषताओं के कारण, बाज़ार में कीमत माँग और पूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित होती है, और प्रत्येक फर्म उस निर्धारित कीमत पर अपनी इच्छानुसार मात्रा बेच सकती है।

प्रश्न 2. एक फर्म की संप्राप्ति, बाज़ार कीमत तथा उसके द्वारा बेची गई मात्रा में क्या संबंध है?

एक फर्म की कुल संप्राप्ति (Total Revenue - TR), बाज़ार कीमत (Market Price - P) तथा उसके द्वारा बेची गई मात्रा (Quantity Sold - Q) के बीच संबंध को निम्नलिखित सूत्र द्वारा दर्शाया जाता है:

TR = P \times Q

Solution:

एक फर्म की संप्राप्ति (Revenue) वह कुल आय होती है जो उसे अपनी वस्तुओं या सेवाओं को बेचने से प्राप्त होती है। यह बाज़ार कीमत (P) और बेची गई मात्रा (Q) का गुणनफल होती है। इस संबंध को निम्नलिखित सूत्र से व्यक्त किया जाता है:

कुल संप्राप्ति (TR) = बाज़ार कीमत (P) \times बेची गई मात्रा (Q)

उदाहरण के लिए, यदि एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में वस्तु की कीमत ₹10 प्रति इकाई है, और एक फर्म 5 इकाइयाँ बेचती है, तो उसकी कुल संप्राप्ति ₹50 (₹10 × 5) होगी।

इसके अतिरिक्त, औसत संप्राप्ति (Average Revenue - AR) और सीमांत संप्राप्ति (Marginal Revenue - MR) भी बाज़ार कीमत से संबंधित होते हैं:

  • औसत संप्राप्ति (AR): यह प्रति इकाई बेची गई वस्तु से प्राप्त आय होती है। चूँकि पूर्ण प्रतिस्पर्धा में कीमत स्थिर रहती है, इसलिए AR कीमत के बराबर होता है। AR = \frac{TR}{Q} = \frac{P \times Q}{Q} = P
  • सीमांत संप्राप्ति (MR): यह एक अतिरिक्त इकाई बेचने से कुल संप्राप्ति में होने वाला परिवर्तन होता है। पूर्ण प्रतिस्पर्धा में, चूँकि कीमत स्थिर रहती है, इसलिए प्रत्येक अतिरिक्त इकाई बेचने से कुल संप्राप्ति में कीमत के बराबर वृद्धि होती है। अतः MR भी कीमत के बराबर होता है। MR = \frac{\Delta TR}{\Delta Q} = P

इस प्रकार, पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में, एक फर्म के लिए बाज़ार कीमत (P), औसत संप्राप्ति (AR), और सीमांत संप्राप्ति (MR) हमेशा बराबर होते हैं।

प्रश्न 3. कीमत रेखा क्या है?

पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में, एक फर्म के लिए कीमत रेखा (Price Line) क्या होती है और यह कैसी दिखती है?
Solution:

कीमत रेखा (Price Line) एक ऐसी रेखा होती है जो पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में किसी फर्म द्वारा सामना की जाने वाली बाज़ार कीमत को दर्शाती है। एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में, फर्म 'कीमत स्वीकारक' होती है, जिसका अर्थ है कि वह बाज़ार द्वारा निर्धारित कीमत को स्वीकार करती है और उस कीमत पर अपनी इच्छानुसार किसी भी मात्रा में वस्तु बेच सकती है।

चूँकि बाज़ार कीमत स्थिर रहती है, फर्म के लिए औसत संप्राप्ति (AR) हमेशा कीमत (P) के बराबर होती है। गणितीय रूप से:

AR = \frac{TR}{Q} = \frac{P \times Q}{Q} = P

इसलिए, कीमत रेखा वास्तव में फर्म का औसत संप्राप्ति (AR) वक्र होती है। चूँकि कीमत स्थिर है, यह रेखा X-अक्ष के समानांतर एक सीधी क्षैतिज रेखा होती है। यह रेखा दर्शाती है कि फर्म किसी भी मात्रा (Q) की बिक्री पर समान कीमत (P) प्राप्त करती है।

संक्षेप में, कीमत रेखा पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्म के लिए बाज़ार कीमत को दर्शाती है और यह X-अक्ष के समानांतर एक क्षैतिज रेखा होती है, जो AR वक्र के समान होती है।

प्रश्न 4. एक कीमत-स्वीकारक फर्म का कुल संप्राप्ति वक्र, ऊपर की ओर प्रवणता वाली सीधी रेखा क्यों होती है? यह वक्र उद्गम से होकर क्यों गुजरता है?

एक कीमत-स्वीकारक फर्म का कुल संप्राप्ति वक्र (Total Revenue Curve) ऊपर की ओर प्रवणता वाली सीधी रेखा क्यों होता है, और यह वक्र मूल बिंदु (उद्गम) से क्यों शुरू होता है?
Solution:

एक कीमत-स्वीकारक फर्म वह फर्म होती है जो बाज़ार द्वारा निर्धारित कीमत को स्वीकार करती है। पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाज़ार में ऐसी फर्मों के लिए, कुल संप्राप्ति वक्र की प्रकृति निम्नलिखित कारणों से ऊपर की ओर प्रवणता वाली सीधी रेखा होती है जो उद्गम से होकर गुजरती है:

  1. स्थिर कीमत: पूर्ण प्रतिस्पर्धा में, फर्म एक निश्चित बाज़ार कीमत (P) पर ही अपनी वस्तु बेच सकती है। यह कीमत माँग और पूर्ति द्वारा निर्धारित होती है और फर्म इसे प्रभावित नहीं कर सकती।
  2. कुल संप्राप्ति (TR) की गणना: कुल संप्राप्ति (TR) की गणना बेची गई मात्रा (Q) को बाज़ार कीमत (P) से गुणा करके की जाती है: TR = P \times Q
  3. रैखिक वृद्धि: चूँकि कीमत (P) स्थिर है, बेची गई मात्रा (Q) में प्रत्येक इकाई की वृद्धि के साथ कुल संप्राप्ति (TR) में कीमत (P) के बराबर स्थिर राशि की वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए, यदि कीमत ₹10 है, तो 1 इकाई बेचने पर TR ₹10, 2 इकाई बेचने पर ₹20, 3 इकाई बेचने पर ₹30, इत्यादि होगा। यह मात्रा के साथ संप्राप्ति में एक समान, रैखिक वृद्धि को दर्शाता है।
  4. ऊपर की ओर प्रवणता: मात्रा बढ़ने के साथ कुल संप्राप्ति में लगातार वृद्धि होने के कारण, TR वक्र का ढलान (प्रवणता) धनात्मक होता है, अर्थात यह ऊपर की ओर जाता है।
  5. उद्गम से गुजरना: जब फर्म शून्य मात्रा (Q=0) बेचती है, तो उसकी कुल संप्राप्ति भी शून्य (TR=0) होती है। इसलिए, TR वक्र हमेशा मूल बिंदु (0,0) से शुरू होता है।

इस प्रकार, कीमत (P) के स्थिर होने के कारण, एक कीमत-स्वीकारक फर्म का कुल संप्राप्ति वक्र मूल बिंदु से शुरू होने वाली एक सीधी, ऊपर की ओर प्रवणता वाली रेखा होती है। इस वक्र की प्रवणता सीमांत संप्राप्ति (MR) के बराबर होती है, जो पूर्ण प्रतिस्पर्धा में कीमत (P) के बराबर होती है।

Common mistakes

  • पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार की विशेषताओं को अन्य बाजार संरचनाओं के साथ भ्रमित करना।
  • कुल संप्राप्ति, औसत संप्राप्ति और सीमांत संप्राप्ति के बीच अंतर को समझने में कठिनाई।
  • कीमत रेखा को गलत तरीके से चित्रित करना या उसकी व्याख्या करना।
  • दीर्घकाल में सामान्य लाभ की अवधारणा को समझने में चूक।

Revision tips

  • पूर्ण प्रतिस्पर्धा की सभी विशेषताओं को सूचीबद्ध करें और प्रत्येक का अर्थ समझें।
  • कुल संप्राप्ति, औसत संप्राप्ति और सीमांत संप्राप्ति के बीच संबंधों को दर्शाने वाले आरेख का अभ्यास करें।
  • कीमत रेखा और कुल संप्राप्ति वक्र के बीच संबंध को स्पष्ट करें।
  • अल्पकाल और दीर्घकाल में फर्मों द्वारा अर्जित लाभ की स्थितियों की तुलना करें।

Practice MCQs

Q1. पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार की एक प्रमुख विशेषता क्या है?

Q2. पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में बेची जाने वाली वस्तु कैसी होती है?

Q3. एक कीमत-स्वीकारक फर्म के लिए, औसत संप्राप्ति (AR) वक्र कैसा होता है?

Q4. कुल संप्राप्ति (TR) वक्र, मूल बिंदु से क्यों गुजरता है?

Q5. पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में फर्मों को दीर्घकाल में कौन सा लाभ प्राप्त होता है?

Frequently asked questions

पूर्ण प्रतिस्पर्धा क्या है?

पूर्ण प्रतिस्पर्धा एक ऐसी बाजार स्थिति है जहाँ बहुत बड़ी संख्या में क्रेता और विक्रेता होते हैं, वस्तुएँ समरूप होती हैं, सभी को बाजार का पूर्ण ज्ञान होता है, और फर्मों को उद्योग में प्रवेश करने या छोड़ने की स्वतंत्रता होती है। इस स्थिति में, कोई भी व्यक्तिगत फर्म कीमत को प्रभावित नहीं कर सकती।

पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

मुख्य विशेषताएँ हैं: क्रेताओं और विक्रेताओं की बड़ी संख्या, समरूप वस्तु, फर्मों का पूर्ण ज्ञान, उद्योग में निर्बाध प्रवेश और बहिर्गमन, उत्पादन के साधनों की पूर्ण गतिशीलता, और परिवहन लागत का अभाव।

एक कीमत-स्वीकारक फर्म का कुल संप्राप्ति वक्र कैसा होता है?

एक कीमत-स्वीकारक फर्म का कुल संप्राप्ति वक्र (TR Curve) मूल बिंदु से शुरू होने वाली ऊपर की ओर प्रवणता वाली एक सीधी रेखा होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि फर्म बाजार द्वारा निर्धारित कीमत को स्वीकार करती है और बेची गई मात्रा के साथ कुल संप्राप्ति रैखिक रूप से बढ़ती है।

पूर्ण प्रतिस्पर्धा में फर्मों को दीर्घकाल में क्या लाभ होता है?

पूर्ण प्रतिस्पर्धा में, फर्मों को दीर्घकाल में केवल सामान्य लाभ (Normal Profit) होता है। यदि फर्में असामान्य लाभ कमाती हैं, तो नई फर्में उद्योग में प्रवेश करेंगी, जिससे आपूर्ति बढ़ेगी और कीमत कम हो जाएगी। यदि फर्में हानि उठाती हैं, तो कुछ फर्में उद्योग छोड़ देंगी, जिससे आपूर्ति कम होगी और कीमत बढ़ जाएगी।

कीमत रेखा (Price Line) क्या दर्शाती है?

कीमत रेखा एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में फर्म द्वारा सामना की जाने वाली कीमत को दर्शाती है। यह औसत संप्राप्ति (AR) वक्र के समान होती है और X-अक्ष के समानांतर एक सीधी रेखा होती है, क्योंकि फर्म किसी भी मात्रा में वस्तु बेच सकती है और कीमत स्थिर रहती है।

Content reviewed by the NCERT Help team. Editorial Team and update policy

NCERT Solutions PDF PDF on NCERT Help. URL unchanged for search indexing.