CBSE Class 12 समाजशास्त्र: औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास NCERT समाधान
यह खंड CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र के अध्याय 11, 'औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। यह अध्याय औद्योगिक समाजों में होने वाले महत्वपूर्ण परिवर्तनों और विकास की प्रक्रियाओं पर केंद्रित है। समाधानों में कार्य शक्ति के सामाजिक संगठन, जैसे जाति, लिंग और आयु की भूमिका, साथ ही मजदूरी प्रक्रिया, वेतन, सुविधाओं और काम करने की परिस्थितियों का गहन विश्लेषण शामिल है। इसमें उदारीकरण के बाद औद्योगिक क्षेत्र में आए बदलावों, ठेकेदारी प्रथाओं, और श्रमिकों के सामने आने वाली चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला गया है। ये समाधान छात्रों को औद्योगिक समाज की जटिलताओं को समझने और परीक्षा की तैयारी में मदद करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 12 |
| Subject | समाजशास्त्र |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 11. औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास |
Chapter summary
कक्षा 12 समाजशास्त्र के अध्याय 11 के ये NCERT समाधान औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास की प्रमुख अवधारणाओं को स्पष्ट करते हैं। इनमें कार्य शक्ति के सामाजिक संगठन, मजदूरी प्रक्रिया, वेतन, और कार्य दशाओं जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं का विश्लेषण किया गया है। समाधान उदारीकरण के प्रभाव, ठेकेदारी व्यवस्था, और श्रमिकों के सामने आने वाली चुनौतियों पर भी प्रकाश डालते हैं, जिससे छात्रों को औद्योगिकरण के सामाजिक आयामों की गहरी समझ मिलती है।
Learning outcomes
- औद्योगिक समाज में कार्य शक्ति के सामाजिक संगठन को समझना।
- औद्योगीकरण के कारण मजदूरी प्रक्रियाओं में आए परिवर्तनों का विश्लेषण करना।
- श्रमिकों को मिलने वाले वेतन और सुविधाओं का मूल्यांकन करना।
- औद्योगिक कार्य दशाओं और सुरक्षा उपायों का वर्णन करना।
- उदारीकरण और ठेकेदारी प्रथाओं के प्रभाव को समझना।
- औद्योगिक श्रमिकों के सामने आने वाली चुनौतियों की पहचान करना।
Topics covered
Paper topics
- औद्योगिक समाज में परिवर्तन
- विकास की प्रक्रियाएँ
- कार्य शक्ति का सामाजिक संगठन
- जाति, लिंग और आयु की भूमिका
- मजदूर प्रक्रिया
- वेतन और सुविधाएँ
- कार्य अवस्थाएँ (सुरक्षा, आराम का समय, कार्य के घंटे)
- उदारीकरण और आर्थिक नीतियाँ
- ठेकेदारी प्रथा
- अनुबंध श्रम
- संगठित और असंगठित क्षेत्र
- औद्योगिक श्रमिकों के जोखिम
Important topics
- कार्य शक्ति का सामाजिक संगठन (जाति, लिंग, आयु)
- उदारीकरण का औद्योगिक समाज पर प्रभाव
- ठेकेदारी प्रथा और ऋण जाल
- संगठित बनाम असंगठित क्षेत्र की कार्य दशाएँ
- औद्योगिक श्रमिकों के लिए सुरक्षा कानून और उनके उल्लंघन
- भूमिगत खानों में काम करने वाले मजदूरों के जोखिम
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
हम अपने आसपास के एक छोटे कपड़े की दुकान के व्यवसाय का उदाहरण लेते हैं और उसका वर्णन निम्नलिखित पंक्तियों में करते हैं:
- कार्य शक्ति का सामाजिक संगठन:
- जाति: इस छोटी दुकान में, मालिक और कुछ कर्मचारी एक ही समुदाय या जाति से हो सकते हैं, जो पारंपरिक रूप से इस व्यवसाय से जुड़े रहे हैं। हालाँकि, आजकल जातिगत भेद कम हो रहा है और योग्यता को अधिक महत्व दिया जा रहा है।
- लिंग: दुकान में पुरुष और महिला दोनों कर्मचारी काम कर सकते हैं। कुछ भूमिकाएँ, जैसे बिक्री या ग्राहक सेवा, महिलाओं द्वारा अधिक की जा सकती हैं, जबकि अन्य भूमिकाएँ पुरुषों द्वारा।
- आयु: कार्य शक्ति में विभिन्न आयु वर्ग के लोग शामिल हो सकते हैं, जैसे युवा जो अनुभव प्राप्त कर रहे हैं और अनुभवी कर्मचारी जो व्यवसाय की गहरी समझ रखते हैं। आमतौर पर, 18 से 60 वर्ष तक के लोग कार्यरत होते हैं।
- क्षेत्र: कर्मचारी उसी स्थानीय क्षेत्र से हो सकते हैं जहाँ दुकान स्थित है, जिससे उन्हें स्थानीय ग्राहकों और बाजार की अच्छी समझ होती है।
- मजदूर प्रक्रिया:
काम इस तरह से किया जाता है कि ग्राहक की आवश्यकतानुसार कपड़े दिखाना, उनकी पसंद-नापसंद पूछना, सही साइज़ और फिटिंग सुनिश्चित करना, और अंत में बिलिंग और पैकिंग करना शामिल है। इसमें स्टॉक का प्रबंधन, नए माल की व्यवस्था करना और दुकान को साफ-सुथरा रखना भी शामिल है।
- वेतन तथा अन्य सुविधाएँ:
कर्मचारियों को उनके काम के आधार पर मासिक वेतन दिया जाता है। कुछ दुकानों में, बिक्री के आधार पर कमीशन या बोनस जैसी अतिरिक्त सुविधाएँ भी मिल सकती हैं। छोटी दुकानों में, स्वास्थ्य बीमा या भविष्य निधि जैसी औपचारिक सुविधाएँ अक्सर उपलब्ध नहीं होती हैं, लेकिन कुछ मालिक अपने कर्मचारियों को व्यक्तिगत सहायता प्रदान कर सकते हैं।
- कार्यावस्था:
- सुरक्षा: दुकान में आग से बचाव के उपकरण हो सकते हैं, लेकिन बड़ी औद्योगिक इकाइयों की तुलना में सुरक्षा के मानक कम हो सकते हैं।
- आराम का समय: कर्मचारियों को दिन के दौरान भोजन या चाय के लिए छोटे ब्रेक दिए जाते हैं।
- कार्य के घंटे: आमतौर पर, दुकान के खुलने और बंद होने के समय के अनुसार कार्य घंटे निर्धारित होते हैं, जो प्रतिदिन 8 से 10 घंटे हो सकते हैं। सप्ताहांत पर काम अधिक हो सकता है।
प्रश्न 2
1990 के दशक में उदारीकरण की नीति अपनाने के बाद से भारतीय औद्योगिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। निजी और विदेशी कंपनियों के प्रवेश ने उन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाया जो पहले सरकारी एकाधिकार में थे। इससे सामान्यतः रोजगार के अवसर बढ़े, जो विज्ञापन और रोजगार कार्यालयों के माध्यम से लोगों तक पहुंचे। औद्योगिक क्षेत्रों में पुरुष और महिलाएँ दोनों कार्यरत हैं, और उन्हें वेतन के अतिरिक्त चिकित्सा और मकान भत्ते जैसे लाभ भी मिलते हैं।
श्रमिकों की नियुक्ति प्रक्रिया में भी परिवर्तन आया है। पहले जहाँ ठेकेदार श्रमिकों की नियुक्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे और कभी-कभी अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते थे, वहीं अब प्रबंधन और श्रम संगठनों के सहयोग से नियुक्ति होती है। कई कारखाने स्थायी कर्मचारियों के बजाय अनुबंध पर कर्मचारी रखते हैं, जो वर्षों से काम करने के बावजूद स्थायी नहीं हो पाते। इसे संगठित क्षेत्र में अनुबंध श्रम कहा जाता है।
निर्माण और ईंट भट्टा जैसे उद्योगों में ठेकेदारी प्रथा आज भी प्रचलित है। ठेकेदार गाँव से श्रमिकों को काम पर लाते हैं और उन्हें अग्रिम मजदूरी के रूप में पैसे उधार देते हैं, जिसमें परिवहन व्यय भी शामिल हो सकता है। यह अग्रिम राशि एक ऋण जाल का काम करती है, जिससे श्रमिकों को लंबे समय तक उसी ठेकेदार के लिए काम करना पड़ता है। यह स्थिति कृषि श्रमिकों के पुराने ऋण जाल की याद दिलाती है। हालांकि, औद्योगिक समाज में ये ठेका श्रमिक कुछ हद तक अधिक स्वतंत्र होते हैं क्योंकि वे अपना अनुबंध तोड़कर कहीं और रोजगार की तलाश कर सकते हैं। कभी-कभी पूरा परिवार काम की तलाश में पलायन कर जाता है।
आज औद्योगिक क्षेत्र में 15 से 60 वर्ष तक के सभी जाति और लिंग के लोग कार्यरत हैं। श्रमिकों के कार्य घंटे उनकी योग्यता, अनुभव, आयु और कार्य की जोखिम के अनुसार भिन्न होते हैं। अनुबंध के तहत काम करने वाले ठेका श्रमिकों को एक निश्चित मजदूरी मिलती है। संगठित क्षेत्र में असंगठित क्षेत्र की तुलना में वेतन और भत्ते अधिक होते हैं।
भारत सरकार ने औद्योगिक श्रमिकों की कार्य दशाओं में सुधार के लिए कई कानून बनाए हैं, जैसे 1952 का खान अधिनियम, जो कार्य घंटों को परिभाषित करता है। निर्धारित समय से अधिक काम करने पर अतिरिक्त भुगतान का भी प्रावधान है। बड़ी कंपनियाँ इन नियमों का पालन करती हैं, लेकिन छोटी कंपनियाँ अक्सर इनकी अवहेलना करती हैं। उप-अनुबंध का प्रचलन भी बढ़ रहा है।
भूमिगत खानों में काम करने वाले मजदूरों को बाढ़, आग, छत गिरने, गैस उत्सर्जन और ऑक्सीजन की कमी जैसे गंभीर खतरों का सामना करना पड़ता है, जिससे उन्हें साँस की बीमारियाँ और अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती हैं।
ईंट बनाने, बीड़ी रोल करने, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग या खदानों में काम करने वाले श्रमिकों के सामाजिक संगठन में उनकी जाति, लिंग, रिश्तेदारी और क्षेत्र का प्रभाव पड़ता है। कुछ रोजगार क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है, जैसे शिक्षक और नर्स के रूप में। भारत में लगभग 90% कार्य असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र में है। सरकारी रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं। नगरीय क्षेत्रों में विभिन्न पृष्ठभूमि के लोग एक साथ काम करते हैं। भारत में अधिकांश लोग छोटे पैमाने पर काम करना पसंद करते हैं। भारत में लगभग 60% लोग प्राथमिक क्षेत्र (कृषि, खान), 17% द्वितीयक क्षेत्र (उत्पादन, निर्माण) और 23% तृतीयक क्षेत्र (व्यापार, सेवाएँ) में कार्यरत हैं। कृषि क्षेत्र में कार्य में तीव्रता से कमी आई है।
मधु जैसी लड़कियाँ, जो बीड़ी बनाने जैसे कामों में लगी होती हैं, अपना अधिकांश समय इसी काम में बिताती हैं। वे अक्सर अपने परिवार के साथ बैठकर अन्य महिलाओं के साथ गपशप करती हैं, लेकिन उनका मुख्य ध्यान काम पर ही रहता है। वे अपने काम को अपनी आजीविका का साधन मानती हैं और उसी के अनुसार अपनी दिनचर्या बनाती हैं।
Common mistakes
- कार्य शक्ति के सामाजिक संगठन के विभिन्न आयामों (जाति, लिंग, आयु) को अलग-अलग समझने में भ्रम।
- ठेकेदारी प्रथा और अग्रिम मजदूरी के जाल को पूरी तरह न समझ पाना।
- संगठित और असंगठित क्षेत्रों की कार्य दशाओं में अंतर को स्पष्ट न कर पाना।
- उदारीकरण की नीति के औद्योगिक श्रमिकों पर पड़ने वाले मिश्रित प्रभावों को अनदेखा करना।
Revision tips
- प्रत्येक व्यवसाय के लिए कार्य शक्ति के सामाजिक संगठन के कारकों (जाति, लिंग, आयु) को सूचीबद्ध करें।
- ठेकेदारी प्रथा के फायदे और नुकसान की तुलना करें।
- संगठित और असंगठित क्षेत्रों में वेतन और सुविधाओं के अंतर को स्पष्ट करें।
- औद्योगिक श्रमिकों के लिए बनाए गए कानूनों और उनके पालन की स्थिति पर ध्यान दें।
Practice MCQs
Q1. 1990 के दशक से भारत सरकार ने किस आर्थिक नीति को अपनाया, जिसने औद्योगिक क्षेत्र में विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया?
Explanation: 1990 के दशक से भारत सरकार ने उदारीकरण की नीति को अपनाया, जिससे निजी और विदेशी कंपनियों को उन क्षेत्रों में निवेश करने का अवसर मिला जो पहले सरकारी नियंत्रण में थे।
Q2. औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों की नियुक्ति की प्रक्रिया में हाल के वर्षों में क्या प्रमुख परिवर्तन आया है?
Explanation: हाल के वर्षों में, औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों की नियुक्ति की प्रक्रिया में ठेकेदारों के माध्यम से नियुक्ति का चलन बढ़ा है, जिसने पारंपरिक नियुक्ति विधियों को बदल दिया है।
Q3. ठेकेदारी प्रथा में, ठेकेदार श्रमिकों को काम पर रखने से पहले अक्सर क्या करते हैं?
Explanation: ठेकेदारी प्रथा में, ठेकेदार अक्सर श्रमिकों को काम पर रखने से पहले अग्रिम मजदूरी के रूप में कुछ पैसे उधार देते हैं, जो एक प्रकार का ऋण जाल बनाता है।
Q4. असंगठित क्षेत्रों की तुलना में संगठित क्षेत्र में श्रमिकों को सामान्यतः क्या अधिक मिलता है?
Explanation: असंगठित क्षेत्रों की तुलना में संगठित क्षेत्रों में श्रमिकों को सामान्यतः बेहतर वेतन और अतिरिक्त भत्ते प्राप्त होते हैं, साथ ही कार्य दशाएं भी बेहतर होती हैं।
Q5. भूमिगत खानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए निम्नलिखित में से कौन सा खतरा सबसे गंभीर है?
Explanation: भूमिगत खानों में काम करने वाले मजदूरों को बाढ़, आग, खान की दीवारों और छतों के गिरने जैसे अत्यंत जोखिम भरे खतरों का सामना करना पड़ता है।
Frequently asked questions
कक्षा 12 समाजशास्त्र के अध्याय 11 में किन मुख्य विषयों को शामिल किया गया है?
अध्याय 11 'औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास' औद्योगिक समाजों में कार्य शक्ति के सामाजिक संगठन, मजदूरी प्रक्रियाओं, वेतन, सुविधाओं और कार्य दशाओं में आए परिवर्तनों पर केंद्रित है। इसमें उदारीकरण के प्रभाव और ठेकेदारी प्रथा जैसे विषयों का भी विश्लेषण किया गया है।
ये NCERT समाधान छात्रों की परीक्षा की तैयारी में कैसे मदद करेंगे?
ये समाधान प्रत्येक प्रश्न के विस्तृत और स्पष्ट उत्तर प्रदान करते हैं, जिससे छात्र औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास से संबंधित अवधारणाओं को गहराई से समझ सकते हैं। यह उन्हें परीक्षा में पूछे जाने वाले विभिन्न प्रकार के प्रश्नों का सामना करने के लिए तैयार करता है।
कार्य शक्ति के सामाजिक संगठन से क्या तात्पर्य है?
कार्य शक्ति के सामाजिक संगठन का अर्थ है कि किसी कार्यस्थल पर श्रमिकों का समाजशास्त्रीय आधार पर कैसे वर्गीकरण और व्यवस्था की जाती है, जिसमें जाति, लिंग, आयु और क्षेत्रीयता जैसे कारक शामिल होते हैं।
उदारीकरण की नीति ने औद्योगिक क्षेत्र को कैसे प्रभावित किया है?
उदारीकरण की नीति ने 1990 के दशक से निजी और विदेशी कंपनियों को उन क्षेत्रों में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जो पहले सरकारी नियंत्रण में थे, जिससे औद्योगिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और रोजगार के अवसरों में बदलाव आया है।
ठेकेदारी प्रथा औद्योगिक श्रमिकों के लिए किस प्रकार की चुनौतियाँ प्रस्तुत करती है?
ठेकेदारी प्रथा में श्रमिकों को अक्सर अग्रिम मजदूरी के रूप में ऋण जाल में फँसाया जाता है, जिससे उनकी मजदूरी पर नियंत्रण कम हो जाता है और वे असुरक्षित स्थिति में काम करने को मजबूर होते हैं।
संगठित और असंगठित क्षेत्रों के श्रमिकों की कार्य दशाओं में मुख्य अंतर क्या है?
संगठित क्षेत्रों में श्रमिकों को सामान्यतः बेहतर वेतन, भत्ते और सुरक्षा मिलती है, जबकि असंगठित क्षेत्रों में कार्य दशाएँ अनिश्चित, कम वेतन वाली और कम सुरक्षित होती हैं।
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