कक्षा 12 हिंदी आरोह पाठ 15: विष्णु खरे - NCERT समाधान

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यह पृष्ठ कक्षा 12 हिंदी आरोह पुस्तक के पाठ 15, 'विष्णु खरे' पर केंद्रित NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। इसमें लेखक विष्णु खरे द्वारा चार्ली चैपलिन की कला, उनके सार्वभौमिक अपील, और भारतीय सिनेमा पर उनके प्रभाव का गहन विश्लेषण शामिल है। समाधान इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि कैसे चैपलिन की कला ने वर्ग और वर्ण भेद को तोड़ा, और कैसे राज कपूर की 'आवारा' जैसी फिल्मों में उनका 'भारतीयकरण' देखा जा सकता है। यह पाठ चार्ली के जीवन के संघर्षों और उनकी कला में त्रासदी, करुणा और हास्य के सामंजस्य की पड़ताल करता है, साथ ही भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र के संदर्भ में इसकी विशिष्टता पर भी चर्चा करता है। ये समाधान छात्रों को चार्ली चैपलिन की कलात्मकता को गहराई से समझने और परीक्षा की तैयारी में मदद करने के लिए विस्तृत स्पष्टीकरण प्रदान करते हैं।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 12
Subjectहिंदी
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter15. विष्णु खरे

Chapter summary

कक्षा 12 हिंदी आरोह के पाठ 15 के ये NCERT समाधान विष्णु खरे के लेखन पर आधारित हैं, जो मुख्य रूप से चार्ली चैपलिन की कलात्मकता और प्रभाव पर केंद्रित है। समाधान चार्ली की सार्वभौमिक अपील, उनकी फिल्मों में हास्य और त्रासदी के मिश्रण, और भारतीय सिनेमा पर उनके प्रभाव की व्याख्या करते हैं। इसमें राज कपूर द्वारा चैपलिन का 'भारतीयकरण' और गांधी-नेहरू द्वारा उनकी कला के प्रति सम्मान जैसे विषयों को भी शामिल किया गया है। यह पाठ छात्रों को कला, रस सिद्धांत और जीवन के संघर्षों के कलात्मक रूपांतरण को समझने में सहायता करता है।

Learning outcomes

  • चार्ली चैपलिन की कला की सार्वभौमिकता और उसके कारणों को समझना।
  • भारतीय सिनेमा में चार्ली चैपलिन के प्रभाव और 'भारतीयकरण' की अवधारणा को स्पष्ट करना।
  • कला में हास्य, त्रासदी और करुणा के सामंजस्य के महत्व को पहचानना।
  • भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र के संदर्भ में चार्ली की कला की विशिष्टता का विश्लेषण करना।
  • जीवन के संघर्षों और व्यक्तिगत अनुभवों के कलात्मक अभिव्यक्ति पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना।

Topics covered

Paper topics

  • चार्ली चैपलिन की कला
  • सार्वभौमिकता
  • फिल्म कला का लोकतंत्रीकरण
  • भारतीय सिनेमा पर प्रभाव
  • राज कपूर और 'आवारा'
  • हास्य और त्रासदी का सामंजस्य
  • भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र
  • रस सिद्धांत
  • जीवन के संघर्ष और कला
  • विष्णु खरे का लेखन

Important topics

  • चार्ली चैपलिन की कला की सार्वभौमिकता
  • फिल्म कला का लोकतंत्रीकरण और वर्ण व्यवस्था का टूटना
  • भारतीय सिनेमा में चार्ली का 'भारतीयकरण'
  • हास्य और त्रासदी का सामंजस्य
  • भारतीय कला में रस सिद्धांत

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

लेखक ने ऐसा क्यों कहा है कि अभी चैप्लिन पर करीब 50 वर्षों तक काफी कुछ कहा जाएगा?
Solution: लेखक का यह कथन कि चार्ली चैपलिन पर अभी करीब 50 वर्षों तक काफी कुछ कहा जाएगा, कई कारणों पर आधारित है। पहला, चार्ली की कला की सार्वभौमिकता के पीछे के सही कारणों की गहनता से पड़ताल अभी बाकी है। उनका चरित्र, जो अक्सर मुसीबतों से घिरा रहता है, दर्शकों को आत्मीयता का अनुभव कराता है। दूसरा, जैसे-जैसे विकासशील दुनिया में टेलीविजन, वीडियो और अन्य माध्यमों का प्रसार हो रहा है, एक नया दर्शक वर्ग चार्ली की फिल्मों को देखेगा और उनकी कला को समझेगा। तीसरा, चैपलिन की कुछ ऐसी फिल्में या इस्तेमाल न की गई रीलें भी सामने आई हैं जिनके बारे में अभी तक कोई जानकारी नहीं है, जिन पर आगे शोध और विश्लेषण किया जा सकता है। इन सभी कारणों से, चैपलिन की कला और उनके योगदान पर भविष्य में काफी चर्चा और लेखन की संभावना बनी रहेगी।

प्रश्न 2

चैपलिन ने न सिर्फ़ फ़िल्म-कला को लोकतांत्रिक बनाया बल्कि दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को तोडा। इस पंक्ति में लोकतांत्रिक बनाने का और वर्ण-व्यवस्था तोड़ने का क्या अभिप्राय है? क्या आप इससे सहमत हैं?
Solution: लेखक का आशय है कि चार्ली चैपलिन ने फिल्म कला को 'लोकतांत्रिक' बनाया, जिसका अर्थ है उसे सभी के लिए सुलभ, लोकप्रिय और आनंददायक बनाया। उन्होंने 'दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को तोड़ा', जिसका अर्थ है समाज में व्याप्त अमीर-गरीब, जाति, धर्म, या किसी भी अन्य समूह विशेष के आधार पर बने भेदभाव को समाप्त किया। इससे पहले, कला अक्सर विशिष्ट वर्गों या समूहों तक सीमित रहती थी, लेकिन चैपलिन ने ऐसी फिल्में बनाईं जिन्हें आम आदमी भी समझ सकता था और उनसे आनंद प्राप्त कर सकता था।

मैं इस कथन से पूरी तरह सहमत हूँ। चार्ली चैपलिन की फिल्मों की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे किसी विशेष दर्शक वर्ग या सामाजिक पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने अपनी फिल्मों में आम आदमी के संघर्षों, भावनाओं और हास्य को इस तरह प्रस्तुत किया कि वे भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं को लांघ गईं। उन्होंने कला के एकाधिकार को समाप्त किया और यह सिद्ध किया कि कला स्वतंत्र होती है और किसी एक परिवेश या वर्ग की मोहताज नहीं। उनकी फिल्में आज भी सार्वभौमिक रूप से सराही जाती हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने वास्तव में कला को लोकतांत्रिक बनाया और दर्शकों के बीच की कृत्रिम व्यवस्थाओं को तोड़ा।

प्रश्न 3

लेखक ने चार्ली का भारतीयकरण किसे कहा और क्यों? गाँधी और नेहरू ने भी उनका सानिध्य क्यों चाहा?
Solution: लेखक ने चार्ली चैपलिन का 'भारतीयकरण' राज कपूर द्वारा निर्मित फिल्म 'आवारा' को कहा है। इसका कारण यह है कि इस फिल्म में पहली बार राज कपूर ने फिल्म के नायक को स्वयं पर हँसने वाला, यानी एक हास्यास्पद और दयनीय पात्र के रूप में प्रस्तुत किया, जो चार्ली चैपलिन की शैली से काफी मिलता-जुलता था। इस नवीन प्रयोग ने दर्शकों को प्रभावित किया और इसके बाद भारतीय फिल्मों में भी नायक-नायिकाओं के ऐसे चरित्रों को चित्रित करने की परंपरा चल पड़ी, जो स्वयं पर हँस सकते थे। दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, अनिल कपूर और नई पीढ़ी के कलाकारों ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

गांधीजी और नेहरू द्वारा चार्ली का सानिध्य चाहने का कारण यह था कि लेखक के अनुसार, महात्मा गांधी में भी चार्ली की तरह स्वयं पर हँसने का गुण था। वे चार्ली की अपने आप पर हँसने की कला से बहुत प्रभावित थे और शायद इसी गुण के कारण वे चार्ली की कलात्मकता और उनके व्यक्तित्व का अनुभव करना चाहते थे। यह स्वयं पर हँसने की क्षमता व्यक्ति को विनम्र और मानवीय बनाती है, जो गांधीजी जैसे महान नेताओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण गुण रहा होगा।

प्रश्न 4

लेखक ने कलाकृति और रस के संदर्भ में किसे श्रेयस्कर माना है और क्यों? क्या आप कुछ ऐसे उदाहरण दे सकते हैं जहाँ कई रस साथ-साथ आए हों?
Solution: लेखक ने कलाकृति और रस के संदर्भ में 'रस' को अधिक श्रेयस्कर माना है। इसका कारण यह है कि किसी भी कलाकृति में जब एक साथ कई रसों का समावेश होता है, तो वह कला और भी अधिक समृद्ध, प्रभावशाली और रुचिकर बन जाती है। रस मानवीय भावों का दर्पण होते हैं, जो कला के माध्यम से दर्शकों या श्रोताओं तक पहुँचते हैं। विभिन्न रसों का एक साथ आना कला को गहराई और बहुआयामीता प्रदान करता है।

हाँ, ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं जहाँ कई रस एक साथ आते हैं:

  • एक नायिका जब चोरी-छिपे प्रेम पत्र पढ़ रही होती है, तो उसके चेहरे पर श्रृंगार रस (प्रेम) के भाव होते हैं। उसी क्षण यदि उसके पिता द्वारा पकड़े जाने का भय उत्पन्न हो जाए, तो उसमें भय रस का संचार हो जाता है। यहाँ श्रृंगार और भय रस एक साथ उपस्थित हैं।
  • सीमा पर लड़ते हुए एक सैनिक के वीरगति प्राप्त करने के दृश्य में वीर रस (शौर्य) और उसके पश्चात शांति या करुण रस (शोक या शांति) का भाव भी अनुभव किया जा सकता है।
  • किसी हास्य दृश्य के अंत में अचानक कोई दुखद घटना घटित हो जाए, तो हास्य और करुण रस का मिश्रण देखने को मिल सकता है।

प्रश्न 5

जीवन की जद्दोजहद ने चार्ली के व्यक्तित्व को कैसे संपन्न बनाया?
Solution: चार्ली चैपलिन का बचपन अत्यंत संघर्षपूर्ण और अभावग्रस्त रहा। उनके पिता से अलगाव के बाद, उन्हें अपनी माँ के साथ परित्यक्त जीवन जीना पड़ा। उनकी माँ, जो स्वयं एक स्टेज अभिनेत्री थीं, बाद में मानसिक रूप से अस्वस्थ हो गईं। इस प्रकार, एक स्वस्थ पारिवारिक जीवन के अभाव और कटु सामाजिक परिस्थितियों का सामना करते हुए, चार्ली ने जीवन की अनेक कठिनाइयों को झेला। साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और सामंतशाही से भरे समाज द्वारा बार-बार ठुकराया जाना और तिरस्कृत होना, इन जटिल और विपरीत परिस्थितियों ने चार्ली को एक 'घुमंतू' चरित्र प्रदान किया। उन्होंने समाज के बड़े लोगों की सच्चाई और उनकी गरिमाहीन दशा को अपनी आँखों से देखा। इसी अनुभव ने उन्हें अपनी फिल्मों में ऐसे पात्रों को दिखाकर उन पर हँसने का आधार प्रदान किया, जिससे उनका व्यक्तित्व और उनकी कला दोनों ही संपन्न बने। जीवन के दुखों और संघर्षों ने उन्हें मानवीय पीड़ा की गहरी समझ दी, जिसे उन्होंने अपनी कला के माध्यम से व्यक्त किया।

प्रश्न 6

चार्ली चैपलिन की फ़िल्मों में निहित त्रासदी/करूणा/हास्य का सामंजस्य भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र की परिधि में क्यों नहीं आता?
Solution: चार्ली चैपलिन की फिल्मों में त्रासदी, करुणा और हास्य का जो सामंजस्य देखने को मिलता है, वह भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र की पारंपरिक परिधि में आसानी से नहीं आता। इसका मुख्य कारण यह है कि भारतीय कला परंपरा में रसों की महत्ता तो है, लेकिन करुण रस के साथ हास्य रस का मिश्रण सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है। भारतीय कला में हास्य को करुणा में परिवर्तित करने की प्रवृत्ति नहीं पाई जाती। उदाहरण के लिए, 'रामायण' और 'महाभारत' जैसे महाकाव्यों में भी जो हास्य है, वह प्रायः दूसरों पर आधारित होता है, न कि स्वयं की करुणा से जुड़ा हुआ। इसी प्रकार, संस्कृत नाटकों में विदूषक पात्र होते हैं जो परिहास करते हैं, लेकिन वे भी करुणा और हास्य का सीधा सामंजस्य स्थापित नहीं करते। चार्ली चैपलिन की कला की यह विशिष्टता है कि वे जीवन की गहरी त्रासदियों और करुणा को भी हास्य के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं, जो भारतीय सौंदर्यशास्त्र के स्थापित नियमों से भिन्न है।

प्रश्न 7

चार्ली सबसे ज्यादा स्वयं पर कब हँसता है?
Solution: चार्ली चैपलिन सबसे ज्यादा स्वयं पर तब हँसते हैं, जब वे स्वयं को अत्यधिक गर्वोन्नत, आत्म-विश्वासी, सफलता, सभ्यता, संस्कृति और समृद्धि की प्रतिमूर्ति के रूप में देखते हैं। विशेष रूप से, जब वे स्वयं को दूसरों से अधिक शक्तिशाली और श्रेष्ठ समझने लगते हैं, और अचानक ऐसी असहाय या दयनीय अवस्था में पहुँच जाते हैं जहाँ उनकी सारी श्रेष्ठता और शक्ति निरर्थक सिद्ध हो जाती है। यह 'वज्रादपि कठोराणि' (वज्र से भी कठोर) या 'मृदुनि कुसुमादपि' (फूल से भी कोमल) क्षणों का अनुभव होता है, जब वे अपनी ही स्थिति पर व्यंग्यात्मक रूप से हँस पड़ते हैं। यह आत्म-व्यंग्य उनकी कला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

प्रश्न 8

आपके विचार से मूक और सवाक् फ़िल्मों में से किसमें ज्य़ादा परिश्रम करने की आवश्यकता है और क्यों?
Solution: मेरे विचार से मूक फिल्मों में सवाक् (बोलने वाली) फिल्मों की तुलना में अधिक परिश्रम करने की आवश्यकता होती है। इसका कारण यह है कि सवाक् फिल्मों में कलाकार अपने संवादों, आवाज के उतार-चढ़ाव और शब्दों के माध्यम से अपने भावों और विचारों को सीधे दर्शकों तक पहुंचा सकता है। संवाद अभिनय को एक अतिरिक्त आयाम प्रदान करते हैं, जिससे कलाकार अपनी बात आसानी से कह पाता है।

इसके विपरीत, मूक फिल्मों में कलाकार को केवल अपने शारीरिक हाव-भावों, चेहरे के भावों (facial expressions) और शारीरिक मुद्राओं (body language) के माध्यम से ही अपनी भावनाओं, विचारों और कहानी को व्यक्त करना होता है। बिना बोले, केवल अभिनय के बल पर दर्शक को पात्र की मनःस्थिति समझाना अत्यंत कठिन कार्य है। इसके लिए कलाकार को अपनी शारीरिक अभिव्यक्ति पर असाधारण नियंत्रण और सूक्ष्मता की आवश्यकता होती है। इसलिए, मूक फिल्मों में अभिनय और अभिव्यक्ति के लिए कहीं अधिक परिश्रम और कौशल की जरूरत होती है।

Common mistakes

  • भारतीय कला में करुण रस के साथ हास्य रस के सामंजस्य की अनुपस्थिति को समझने में कठिनाई।
  • चार्ली चैपलिन की कला को केवल हास्य तक सीमित समझना, उसकी त्रासदी और करुणा की उपेक्षा करना।
  • कला को लोकतांत्रिक बनाने और वर्ण व्यवस्था तोड़ने के अर्थ को सही ढंग से न समझ पाना।

Revision tips

  • चार्ली चैपलिन की फिल्मों के मुख्य विषयों (हास्य, त्रासदी, सामाजिक टिप्पणी) को सूचीबद्ध करें।
  • राज कपूर की 'आवारा' और चार्ली चैपलिन की फिल्मों के बीच समानताएं और अंतर नोट करें।
  • भारतीय कला में रस सिद्धांत और चार्ली की कला के सामंजस्य पर लेखक के विचारों को संक्षेप में लिखें।
  • गांधीजी और नेहरू द्वारा चार्ली चैपलिन के प्रति सम्मान के कारणों पर विचार करें।

Practice MCQs

Q1. लेखक के अनुसार, चार्ली चैपलिन पर अगले 50 वर्षों तक काफी कुछ क्यों कहा जाएगा?

Q2. लेखक ने राज कपूर की किस फिल्म को चार्ली का 'भारतीयकरण' कहा है?

Q3. चार्ली चैपलिन ने फिल्म कला को कैसे लोकतांत्रिक बनाया?

Q4. भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र की परिधि में चार्ली चैपलिन की फिल्मों का कौन सा तत्व नहीं आता?

Q5. लेखक ने कलाकृति और रस के संदर्भ में किसे श्रेयस्कर माना है?

Frequently asked questions

यह NCERT समाधान किस कक्षा और विषय के लिए हैं?

यह NCERT समाधान CBSE कक्षा 12 हिंदी (आरोह पुस्तक) के लिए हैं, विशेष रूप से पाठ 15 'विष्णु खरे' पर केंद्रित।

इन समाधानों में मुख्य रूप से किन विषयों पर चर्चा की गई है?

इन समाधानों में चार्ली चैपलिन की कला, उनकी फिल्मों में हास्य और त्रासदी का सामंजस्य, भारतीय सिनेमा पर उनका प्रभाव, और भारतीय कला के संदर्भ में उनकी कला की विशिष्टता जैसे विषयों पर चर्चा की गई है।

चार्ली चैपलिन की कला को 'सार्वभौमिक' क्यों कहा गया है?

चार्ली चैपलिन की कला को सार्वभौमिक इसलिए कहा गया है क्योंकि उनकी फिल्में वर्ग, वर्ण, भाषा और संस्कृति की सीमाओं को पार कर दुनिया भर के दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ती हैं और आनंद प्रदान करती हैं।

राज कपूर की फिल्म 'आवारा' का चार्ली चैपलिन से क्या संबंध है?

लेखक ने राज कपूर की फिल्म 'आवारा' को चार्ली चैपलिन का 'भारतीयकरण' कहा है, क्योंकि इस फिल्म में पहली बार भारतीय सिनेमा में नायक को हास्य का पात्र बनाया गया, जो चैपलिन की शैली से प्रेरित था।

क्या ये समाधान परीक्षा की तैयारी में मदद करेंगे?

हाँ, ये समाधान पाठ के महत्वपूर्ण बिंदुओं, अवधारणाओं और विश्लेषणों को स्पष्ट करते हैं, जिससे छात्रों को परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर देने में मदद मिलेगी।

भारतीय कला में हास्य और करुण रस का सामंजस्य क्यों नहीं पाया जाता?

लेखक के अनुसार, भारतीय कला परंपरा में हास्य को करुणा में नहीं बदला जाता है। संस्कृत नाटकों में विदूषक परिहास करते हैं, लेकिन करुणा और हास्य का सीधा सामंजस्य नहीं मिलता, जो चार्ली की फिल्मों में प्रमुख है।

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