कक्षा 10 अर्थशास्त्र: मुद्रा और साख - NCERT समाधान

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यह पृष्ठ कक्षा 10 के लिए 'अर्थशास्त्र में विकास' पुस्तक के अध्याय 3, 'मुद्रा और साख' पर केंद्रित NCERT समाधान प्रदान करता है। यह अध्याय छात्रों को मुद्रा की भूमिका, यह कैसे विनिमय के माध्यम के रूप में कार्य करती है, और दोहरे संयोग की समस्या को कैसे हल करती है, यह समझने में मदद करता है। समाधानों में बैंकों की मध्यस्थता की भूमिका, औपचारिक और अनौपचारिक ऋण स्रोतों के बीच अंतर, और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। यह भी समझाया गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) कैसे ऋण गतिविधियों को नियंत्रित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि ऋण का प्रवाह न्यायसंगत हो। ये समाधान छात्रों को परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण अवधारणाओं को स्पष्ट करने और उनकी समझ को मजबूत करने में सहायता करते हैं।

Quick info

BoardCBSE
ClassClass 10
Subjectआर्थिक विकास की समझ
Session2026
LanguageHindi
TypeNCERT Solutions
Chapter3. मुद्रा और साख

Chapter summary

कक्षा 10 के लिए 'मुद्रा और साख' NCERT समाधान छात्रों को मुद्रा के महत्व और विभिन्न आर्थिक लेनदेन में इसकी भूमिका को समझने में मदद करते हैं। यह अध्याय दोहरे संयोग की समस्या को हल करने में मुद्रा की भूमिका, बैंकों द्वारा ऋण देने में मध्यस्थता, औपचारिक बनाम अनौपचारिक ऋण स्रोतों के बीच अंतर, और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से वित्तीय समावेशन पर केंद्रित है। समाधान भारतीय रिजर्व बैंक की नियामक भूमिका और ऋण के विकास में योगदान पर भी प्रकाश डालते हैं।

Learning outcomes

  • मुद्रा आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या को कैसे हल करती है, यह समझना।
  • ऋण के औपचारिक और अनौपचारिक स्रोतों के बीच अंतर का विश्लेषण करना।
  • बैंकों और स्वयं सहायता समूहों की ऋण वितरण में भूमिका की व्याख्या करना।
  • भारतीय रिजर्व बैंक के कार्यों और ऋण बाजार को विनियमित करने के महत्व को समझना।
  • जोखिम भरी परिस्थितियों में ऋण के संभावित नकारात्मक प्रभावों का मूल्यांकन करना।

Topics covered

Paper topics

  • मुद्रा की भूमिका
  • विनिमय का माध्यम
  • आवश्यकताओं का दोहरा संयोग
  • बैंकों की मध्यस्थता
  • ऋण के औपचारिक स्रोत
  • ऋण के अनौपचारिक स्रोत
  • स्वयं सहायता समूह (SHGs)
  • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI)
  • ऋण की शर्तें
  • ऋण जाल
  • वित्तीय समावेशन
  • विकास में ऋण की भूमिका

Important topics

  • मुद्रा की भूमिका और आवश्यकताओं का दोहरा संयोग
  • बैंकों की मध्यस्थता और ऋण वितरण
  • औपचारिक बनाम अनौपचारिक ऋण स्रोत
  • स्वयं सहायता समूहों का महत्व
  • RBI की नियामक भूमिका

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Questions and Solutions

प्रश्न 1

जोखिम वाली परिस्थितियों में ऋण कर्ज़दार के लिए और समस्याएं खड़ी कर सकता है, स्पष्ट कीजिए।
Solution: जब कोई व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में ऋण लेता है जहाँ आय अनिश्चित हो या आय का स्रोत स्थिर न हो, तो यह उसके लिए गंभीर समस्याएँ पैदा कर सकता है। ऐसी स्थिति को अक्सर "ऋण जाल" कहा जाता है। ऋण लेने पर मूलधन के साथ-साथ ब्याज भी चुकाना पड़ता है। यदि कर्जदार ऋण चुकाने में असमर्थ होता है, तो उसे अपनी गारंटी के तौर पर रखी गई संपत्ति (जैसे ज़मीन, मकान आदि) से हाथ धोना पड़ सकता है। इससे कर्जदार एक गहरी वित्तीय समस्या में फँस सकता है, जहाँ वह न केवल मूल ऋण और ब्याज चुकाने में असमर्थ रहता है, बल्कि अपनी संपत्ति भी खो देता है।

प्रश्न 2

मुद्रा आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या को किस तरह सुलझाती है? अपनी ओर से उदाहरण देकर समझाइए।
Solution: मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में कार्य करके आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या को प्रभावी ढंग से सुलझाती है। आवश्यकताओं का दोहरा संयोग एक ऐसी स्थिति है जहाँ वस्तु विनिमय प्रणाली में, एक व्यक्ति को वह वस्तु मिलनी चाहिए जो वह खरीदना चाहता है, और साथ ही, दूसरे व्यक्ति को वह वस्तु मिलनी चाहिए जो वह बेचना चाहता है। यह एक जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया हो सकती है। मुद्रा इस समस्या को हल करती है क्योंकि यह एक सर्वमान्य विनिमय माध्यम है।

उदाहरण: मान लीजिए एक किसान के पास गेहूँ है और वह कपड़े खरीदना चाहता है। लेकिन कपड़ा विक्रेता को गेहूँ की आवश्यकता नहीं है, बल्कि वह जूते खरीदना चाहता है। इस स्थिति में, किसान सीधे गेहूँ के बदले कपड़े नहीं खरीद सकता। लेकिन, अगर किसान अपने गेहूँ को मुद्रा (जैसे रुपये) के बदले बेचता है, और फिर उस मुद्रा का उपयोग करके कपड़े खरीदता है, तो यह लेन-देन आसानी से हो जाता है। इसी तरह, कपड़ा विक्रेता उस मुद्रा का उपयोग करके जूते खरीद सकता है। इस प्रकार, मुद्रा लेन-देन को सरल बनाती है।

प्रश्न 3

अतिरिक्त मुद्रा वाले लोगों और ज़रूरतमंद लोगों के बीच बैंक किस तरह मध्यस्थता करते हैं?
Solution: बैंक अतिरिक्त मुद्रा वाले लोगों (जमाकर्ताओं) और ज़रूरतमंद लोगों (कर्जदारों) के बीच एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। बैंक जमाकर्ताओं से उनकी अतिरिक्त धनराशि जमा के रूप में स्वीकार करते हैं और इस पर उन्हें एक निश्चित ब्याज दर का भुगतान करते हैं। इस प्रकार, जमाकर्ताओं को अपनी बचत पर आय अर्जित करने का अवसर मिलता है। बैंक इस जमा की गई धनराशि का एक हिस्सा अपने पास नकद शेष के रूप में रखते हैं और शेष राशि को उन लोगों को ऋण के रूप में देते हैं जिन्हें व्यवसाय शुरू करने, घर बनाने या अन्य जरूरतों के लिए धन की आवश्यकता होती है। बैंक इन ऋणों पर जमाकर्ताओं को दिए जाने वाले ब्याज से अधिक दर पर ब्याज वसूलते हैं, और इस अंतर से बैंक अपना लाभ कमाते हैं। इस प्रकार, बैंक धन के प्रवाह को सुगम बनाते हैं और अर्थव्यवस्था में निवेश को बढ़ावा देते हैं।

प्रश्न 4

10 रुपये के नोट को देखिए। इसके ऊपर क्या लिखा है? क्या आप इस कथन की व्याख्या कर सकते हैं?
Solution: दस रुपये के नोट पर एक महत्वपूर्ण कथन लिखा होता है: "मैं धारक को दस रुपये अदा करने का वचन देता हूँ" (या इसी तरह का कोई वाक्य)। यह कथन भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा जारी किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि भारतीय रिज़र्व बैंक इस नोट के धारक को दस रुपये का भुगतान करने का वचन देता है। यह नोट भारत की केंद्रीय बैंक, यानी RBI, द्वारा जारी की गई मुद्रा है और इसे देश भर में कानूनी निविदा (legal tender) के रूप में स्वीकार किया जाता है। यह कथन RBI की विश्वसनीयता और सरकार की गारंटी को दर्शाता है, जो सुनिश्चित करता है कि यह मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में स्वीकार्य है।

प्रश्न 5

हमें भारत में ऋण के औपचारिक स्रोतों को बढ़ाने की क्यों जरूरत है?
Solution: भारत में ऋण के औपचारिक स्रोतों को बढ़ाने की आवश्यकता के दो मुख्य कारण हैं:
  1. अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भरता कम करना: भारत में आज भी बड़ी संख्या में लोग साहूकारों और अन्य अनौपचारिक ऋणदाताओं पर निर्भर हैं। ये अनौपचारिक ऋणदाता अक्सर बहुत अधिक ब्याज दरें वसूलते हैं, जिससे कर्जदार ऋण जाल में फँस जाते हैं और उनकी आर्थिक स्थिति और खराब हो जाती है। औपचारिक स्रोतों के विस्तार से लोग इन शोषणकारी प्रथाओं से बच सकते हैं।
  2. अधिक लोगों तक ऋण की पहुँच: औपचारिक ऋण संस्थाएँ, जैसे बैंक, यदि ठीक से काम करें तो वे अधिक लोगों को, विशेषकर ग्रामीण और वंचित समुदायों को, उचित शर्तों पर ऋण उपलब्ध करा सकती हैं। इससे छोटे किसान, लघु उद्यमी और अन्य जरूरतमंद लोग अपनी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने और गरीबी से बाहर निकलने के लिए ऋण का उपयोग कर सकते हैं। सरकार द्वारा औपचारिक ऋण स्रोतों को बढ़ावा देने से वित्तीय समावेशन बढ़ता है।

प्रश्न 6

गरीबों के लिए स्वयं सहायता समूहों के संगठनों के पीछे मूल विचार क्या है? अपने शब्दों में व्याख्या कीजिए।
Solution: गरीबों के लिए स्वयं सहायता समूहों (Self-Help Groups - SHGs) के गठन के पीछे मूल विचार उन्हें वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाना और अनौपचारिक ऋणदाताओं पर उनकी निर्भरता को कम करना है। ये समूह आमतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के 15-20 सदस्यों (मुख्यतः महिलाओं) का एक छोटा समूह होते हैं जो नियमित रूप से मिलते हैं और अपनी छोटी-छोटी बचतों को एक सामान्य कोष में जमा करते हैं। इस कोष का उपयोग सदस्यों को उनकी तात्कालिक जरूरतों, जैसे कि बीज खरीदना, बीमारी का इलाज कराना, या छोटे व्यवसाय शुरू करना, के लिए कम ब्याज दर पर ऋण देने के लिए किया जाता है। यह ब्याज दर आमतौर पर साहूकारों द्वारा ली जाने वाली दरों से काफी कम होती है। यदि स्वयं सहायता समूह एक वर्ष से अधिक समय तक सफलतापूर्वक कार्य करता है, तो वह बैंकों से भी ऋण प्राप्त करने के योग्य हो जाता है, जिससे सदस्यों के लिए और अधिक अवसर खुलते हैं। इस प्रकार, SHGs गरीबों को संगठित करके, बचत को बढ़ावा देकर और सस्ती ऋण सुविधाएँ प्रदान करके उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद करते हैं।

प्रश्न 7

क्या कारण है कि बैंक कुछ कर्जदारों को कर्ज देने के लिए तैयार नहीं होता?
Solution: बैंक कुछ कर्जदारों को ऋण देने के लिए तैयार नहीं होते हैं क्योंकि वे ऋण की वापसी को लेकर अनिश्चित होते हैं। बैंक एक व्यावसायिक संस्था है और उसका मुख्य उद्देश्य जमाकर्ताओं के धन को सुरक्षित रखते हुए लाभ कमाना है। इसलिए, बैंक उन व्यक्तियों या संस्थाओं को ऋण देने में संकोच करते हैं जिनके बारे में उन्हें लगता है कि वे ऋण चुकाने में सक्षम नहीं होंगे। इसके कुछ प्रमुख कारण हो सकते हैं:
  • आय की अनिश्चितता: यदि कर्जदार की आय का स्रोत स्थिर नहीं है या उसकी आय बहुत कम है, तो बैंक को ऋण वापसी की उम्मीद कम रहती है।
  • रोजगार की कमी: स्थायी नौकरी न होने पर भी बैंक ऋण देने से कतरा सकते हैं।
  • खराब ऋण इतिहास: यदि किसी व्यक्ति का पिछला ऋण चुकाने का इतिहास खराब रहा है, तो बैंक उसे नया ऋण देने से मना कर सकते हैं।
  • पर्याप्त जमानत का अभाव: बैंक अक्सर ऋण के बदले कुछ गिरवी रखने (जमानत) की मांग करते हैं। यदि कर्जदार पर्याप्त जमानत प्रदान नहीं कर पाता है, तो बैंक जोखिम नहीं लेना चाहेंगे।
बैंक केवल उन्हीं को ऋण देना पसंद करते हैं जिनसे उन्हें ऋण की वापसी का आश्वासन होता है।

प्रश्न 8

भारतीय रिजर्व बैंक अन्य बैंकों की गतिविधियों पर किस तरह नजर रखता है? यह जरूरी क्यों है?
Solution: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भारत की बैंकिंग प्रणाली का नियामक और पर्यवेक्षक है। RBI विभिन्न तरीकों से अन्य बैंकों की गतिविधियों पर नज़र रखता है:
  • नकद शेष की निगरानी: RBI यह सुनिश्चित करता है कि बैंक अपनी कुल जमा राशि का एक निश्चित हिस्सा नकद के रूप में अपने पास रखें (नकद आरक्षित अनुपात - CRR) और एक निश्चित मात्रा में सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करें (वैधानिक तरलता अनुपात - SLR)। RBI इन अनुपातों की निगरानी करता है।
  • ऋण वितरण की निगरानी: RBI यह देखता है कि बैंक कितना ऋण दे रहे हैं और वे किस क्षेत्र को ऋण दे रहे हैं। RBI यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि बैंक केवल बड़े व्यवसायों को ही नहीं, बल्कि छोटे किसानों, लघु उद्योगों और अन्य छोटे उधारकर्ताओं को भी पर्याप्त ऋण प्रदान करें।
  • सूचनाओं का आदान-प्रदान: बैंकों को RBI को समय-समय पर अपनी जमा राशि, ऋण वितरण, ब्याज दरों और अन्य वित्तीय गतिविधियों के बारे में विस्तृत जानकारी देनी होती है।
  • नीतियों का निर्धारण: RBI मौद्रिक नीति के माध्यम से ब्याज दरों और ऋण की उपलब्धता को प्रभावित करता है, जिससे बैंकों के व्यवहार पर अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण रहता है।
यह निगरानी आवश्यक है ताकि:
  • वित्तीय स्थिरता बनी रहे: RBI यह सुनिश्चित करता है कि बैंक अत्यधिक जोखिम न लें और वित्तीय प्रणाली स्थिर रहे।
  • समानता को बढ़ावा मिले: यह सुनिश्चित किया जाता है कि ऋण का लाभ केवल कुछ बड़े लोगों तक सीमित न रहे, बल्कि छोटे और वंचित वर्गों को भी मिले।
  • मुद्रास्फीति नियंत्रित रहे: RBI ऋण की मात्रा को नियंत्रित करके अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति को प्रबंधित करता है, जिससे मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
  • जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा हो: RBI यह सुनिश्चित करता है कि बैंक जमाकर्ताओं के धन का सुरक्षित और उचित उपयोग करें।

प्रश्न 9

विकास में ऋण की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
Solution: ऋण (क्रेडिट) किसी भी अर्थव्यवस्था के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह व्यक्तियों, व्यवसायों और यहाँ तक कि सरकारों को उनकी वर्तमान क्षमता से अधिक निवेश करने और उपभोग करने में सक्षम बनाता है।

विकास में ऋण की भूमिका इस प्रकार है:

  • निवेश और उत्पादन को बढ़ावा: व्यवसायों को नए संयंत्र और मशीनरी स्थापित करने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने या नए उत्पादों को विकसित करने के लिए ऋण की आवश्यकता होती है। यह बढ़ी हुई उत्पादन क्षमता आर्थिक विकास को गति देती है। किसान बीज, उर्वरक और उपकरण खरीदने के लिए ऋण लेते हैं, जिससे कृषि उत्पादन बढ़ता है।
  • रोजगार सृजन: जब व्यवसाय ऋण लेकर विस्तार करते हैं या नए उद्यम शुरू करते हैं, तो इससे अधिक लोगों को रोजगार मिलता है। यह बेरोजगारी को कम करने और लोगों की आय बढ़ाने में मदद करता है।
  • उपभोग को बढ़ाना: ऋण व्यक्तियों को बड़ी खरीदारी करने में सक्षम बनाता है, जैसे कि कार, घर या अन्य टिकाऊ वस्तुएँ, भले ही उनके पास तुरंत पूरी राशि न हो। इससे मांग बढ़ती है, जो अंततः उत्पादन और आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करती है।
  • आर्थिक गतिविधियों का सुगमीकरण: ऋण विनिमय के माध्यम के रूप में कार्य करता है और विभिन्न आर्थिक लेन-देन को सुगम बनाता है। यह अर्थव्यवस्था में तरलता बनाए रखने में मदद करता है।
  • गरीबी उन्मूलन में सहायक: विशेष रूप से स्वयं सहायता समूहों और सूक्ष्म-वित्त संस्थानों के माध्यम से प्रदान किया जाने वाला ऋण, गरीबों को छोटे व्यवसाय शुरू करने या अपनी आय बढ़ाने के अवसर प्रदान करके गरीबी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
  • बुनियादी ढांचे का विकास: सरकारें अक्सर बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, जैसे सड़क, बिजली, या परिवहन नेटवर्क के निर्माण के लिए ऋण लेती हैं, जो दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए आवश्यक हैं।
हालाँकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ऋण की भूमिका सकारात्मक तभी होती है जब यह उत्पादक गतिविधियों में उपयोग किया जाए और समय पर चुकाया जाए। अनुत्पादक उपयोग या अत्यधिक ऋणग्रस्तता अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक भी हो सकती है।

Common mistakes

  • औपचारिक और अनौपचारिक ऋण स्रोतों के बीच के अंतर को समझने में भ्रमित होना।
  • स्वयं सहायता समूहों के लाभों और कार्यप्रणाली को पूरी तरह से न समझना।
  • मुद्रा की भूमिका को केवल विनिमय के माध्यम तक सीमित मानना, अन्य कार्यों को अनदेखा करना।
  • ऋण के जोखिमों और अनौपचारिक स्रोतों से जुड़े उच्च ब्याज दरों के प्रभावों को कम आंकना।

Revision tips

  • प्रत्येक प्रश्न के उत्तर में दिए गए उदाहरणों को ध्यान से समझें।
  • बैंकों और RBI की भूमिकाओं के बीच अंतर को स्पष्ट करें।
  • स्वयं सहायता समूहों के गठन और लाभों पर विशेष ध्यान दें।
  • ऋण के औपचारिक और अनौपचारिक स्रोतों के फायदे और नुकसान की तुलना करें।

Practice MCQs

Q1. मुद्रा आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या को कैसे हल करती है?

Q2. बैंक अतिरिक्त मुद्रा वाले लोगों और ज़रूरतमंद लोगों के बीच कैसे मध्यस्थता करते हैं?

Q3. स्वयं सहायता समूहों (SHGs) का मुख्य उद्देश्य क्या है?

Q4. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मुख्य भूमिका क्या है?

Q5. अनौपचारिक ऋण स्रोतों से जुड़ा एक प्रमुख जोखिम क्या है?

Frequently asked questions

कक्षा 10 के लिए 'मुद्रा और साख' अध्याय में मुख्य रूप से किन विषयों को शामिल किया गया है?

इस अध्याय में मुद्रा के विभिन्न कार्यों, जैसे विनिमय के माध्यम और आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या को हल करने की इसकी क्षमता पर चर्चा की गई है। इसमें बैंकों की भूमिका, ऋण के औपचारिक और अनौपचारिक स्रोत, स्वयं सहायता समूह और भारतीय रिजर्व बैंक के कार्यों को भी शामिल किया गया है।

ऋण के औपचारिक और अनौपचारिक स्रोतों में क्या अंतर है?

औपचारिक स्रोतों में बैंक और सहकारी समितियाँ शामिल हैं जो RBI द्वारा विनियमित होती हैं और उचित ब्याज दरें वसूलती हैं। अनौपचारिक स्रोतों में साहूकार, रिश्तेदार और दोस्त शामिल हैं, जो अक्सर उच्च ब्याज दरें वसूलते हैं और कम विनियमित होते हैं।

स्वयं सहायता समूह (SHG) कैसे काम करते हैं?

स्वयं सहायता समूह समान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के लोगों का एक छोटा समूह होता है जो नियमित रूप से मिलते हैं और अपनी बचत को एक सामान्य कोष में जमा करते हैं। इस कोष का उपयोग सदस्यों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार कम ब्याज दर पर ऋण देने के लिए किया जाता है।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की क्या भूमिका है?

RBI भारत का केंद्रीय बैंक है जो मुद्रा जारी करता है, बैंकों के लिए नकद शेष राशि निर्धारित करता है, और देश की बैंकिंग प्रणाली की निगरानी करता है। यह सुनिश्चित करता है कि ऋण का प्रवाह उचित हो और वित्तीय प्रणाली स्थिर रहे।

जोखिम वाली परिस्थितियों में ऋण लेने के क्या परिणाम हो सकते हैं?

जोखिम वाली परिस्थितियों में ऋण लेने से कर्जदार ऋण जाल में फंस सकता है। यदि वह ऋण चुकाने में असमर्थ होता है, तो उसे अपनी संपत्ति से हाथ धोना पड़ सकता है और वह एक गंभीर वित्तीय संकट में पड़ सकता है।

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